<?xml version='1.0' encoding='UTF-8'?><?xml-stylesheet href="http://www.blogger.com/styles/atom.css" type="text/css"?><feed xmlns='http://www.w3.org/2005/Atom' xmlns:openSearch='http://a9.com/-/spec/opensearchrss/1.0/' xmlns:georss='http://www.georss.org/georss' xmlns:gd='http://schemas.google.com/g/2005' xmlns:thr='http://purl.org/syndication/thread/1.0'><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289</id><updated>2012-02-04T09:09:07.913-08:00</updated><category term='सपनें'/><category term='चिट्ठा चर्चा'/><category term='पत्रकारिता... प्रियंका कौशल.. चैनल'/><category term='ट्रकों के पीछे शायरी'/><category term='गुरुदेव'/><category term='सुनील कालड़ा'/><category term='काली लड़की'/><category term='लेखक समुदाय'/><category term='सतीश जैन'/><category term='लाला जगदलपुरी'/><category term='विनोद कुमार शुक्ल'/><category term='तीजनबाई'/><category term='भीड़'/><category term='निरंजन महावर'/><category term='मिथुन चक्रवर्ती'/><category term='डाक्टर महेंद्र ठाकुर'/><category term='बसंत 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बद्रर्स'/><category term='तलवार'/><category term='ब्लाग जगत'/><category term='करतब'/><title type='text'>बिगुल</title><subtitle type='html'></subtitle><link rel='http://schemas.google.com/g/2005#feed' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/posts/default'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default?max-results=100'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/'/><link rel='hub' href='http://pubsubhubbub.appspot.com/'/><link rel='next' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default?start-index=101&amp;max-results=100'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' 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style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/--jMEeFH0a8w/TZSUpq7iY5I/AAAAAAAAAsw/0-V1nkuk2NY/s320/DSC_0135.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;क्या आप प्रियंका को जानते है... नहीं जानते होंगे तो अभी जान जाएंगे प्रियंका कौन है. चलिए मैं आपको प्रियंका के बारे में थोड़ी सी जानकारी देता हूं. प्रियंका अपने शहर इंदौर को छोड़कर एक चैनल में काम करने के लिए कुछ साल पहले रायपुर आई थी. मेरी&amp;nbsp; उससे पहली मुलाकात एक पत्रकारवार्ता में हुई थी. यह परिचय बड़ा सामान्य सा था. हैलो सर... हाय सर... आप क्या बीट देखते हैं .. जैसा कुछ.,लेकिन मैं यह सोचकर ही खुश था कि चलो एक लड़की अब उन भकले और जोजवे लोगों के बीच आ गई है जो घर छोड़कर पत्रकारिता करने की बात पर अपनी नानी और दादी का गला दबा देते हैं. मेरा मतलब उन पत्रकारों से है जिन्हें&amp;nbsp; प्रबंधन की तरफ से जैसे ही&amp;nbsp; यह सूचना मिलती है कि अब उन्हें दिल्ली या बंबई&amp;nbsp; के कार्यालय में शिफ्ट किया जा रहा है तो वे अपनी दादी या नानी की तेहरवी का कार्ड लेकर संपादक या मालिक के पास खड़े हो जाते हैं.&amp;nbsp; जो कार्ड लेकर खड़े नहीं होते वे नेताओं के पास पहुंचकर मालिकों तक सिफारिश पहुंचाने में लग जाते हैं.... अरे सर आपका आदमी हूं... कब आपका ख्याल&amp;nbsp; नहीं रखा.. कोई तकलीफ हो तो बोलिए... बस एक फोन कर दीजिए. कोई इसे माने या न माने लेकिन यह सच है कि देश के बड़े मीडिया संस्थानों की तरह छत्तीसगढ़ की मीडिया में राजनीतिक नियुक्तियां होने लगी है. जहां राजनीतिक नियुक्तियां नहीं हो रही वहां कुछ लोग सीडी बनाकर इंट्री मार रहे हैं. छत्तीसगढ़ में यह चर्चा आम है कि कुछ समय पहले जब एक चैनल नकारा और नेतागिरी करने वाले लोगों की छंटनी कर रहा था तब&amp;nbsp; उदय चोपड़ा की शक्ल-सूरत रखने वाले एक पत्रकार ने सीडी-वीडी के जरिए प्रिंट मीडिया में अपनी घुसपैठ कर ली थी.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं आपको एक रोचक वाक्या बताना चाहता हूं. जब मैं जनसत्ता में काम करता था तो एक पत्रकार हर तीसरे रोज अपने चाचा, भांजा, मौसी, चाची, फूफी को ठिकाने लगाते हुए मेरे सामने आ धमकता&amp;nbsp; था. एक रोज जब वह हमेशा की तरह छुट्टी मांगने आया तो मैंने स्वाभाविक तौर पर पूछ लिया, क्यों भाई आज किसका इंतकाल हो गया.&amp;nbsp; पत्रकार ने भी बेशर्मी से उत्तर दिया, सर तीन दिन पहले मौसा निपट&amp;nbsp; गए थे, अब सदमे में मौसी चली गई. मैंने पूछा- कैसे तो वह बोला, कुछ नहीं सर... जब ग्रह- नक्षत्र खराब चलते हैं तो किसी न किसी को ऊपर जाकर हाजिरी लगानी ही पड़ती है. मैंने उसे छुट्टी तो दी ही लेकिन साथ ही&amp;nbsp; पैसों से&amp;nbsp; भी मदद की. इधर से उधर से फोन नंबर लेकर जब मैंने उसके घर में फोन लगाया तो सन्न रह गया. पत्रकार के पिताश्री ने फोन उठाया था. मैंने मौसी के मरने पर दुख प्रकट किया तो उन्होंने उल्टा मुझसे पूछा अरे कब मर गई. मैंने उन्हें बताया अभी-अभी आपके बेटे ने बताया है तो वे मामला समझ गए. उन्होंने बताया, साहब... मेरा पत्रकार बेटा आपके यहां काम करने के पहले जहां काम करता था वहां तो उसने मुझको ही मार दिया था. इस सूचना के बाद मैं कई दिनों तक यही बात सोचकर पागल रहा कि आखिर कोई कैसे अपने जिंदा बाप को मार सकता है.&amp;nbsp; मैं इस बात से परेशान चल ही रहा था कि कुछ ही दिनों में एक मीडियाकर्मी ने मेरी मुश्किल और बढ़ा दी. जिस मीडियाकर्मी का यहां मैं जिक्र कर रहा हूं उसका नाम नहीं लिख रहा हूं. बस उसके बारे में इतना बता सकता हूं यह पत्रकार जरूरत से ज्यादा बात करता है यानि बड़बोला है और मुफ्त की शराब पीने का&amp;nbsp; आदी है. इस मीडियाकर्मी ने &lt;br /&gt;ढाई साल पहले संपन्न हुए&amp;nbsp; विधानसभा चुनाव के दौरान एक मंत्री के लिए जमकर दलाली की थी. जब यह बात खुल गई तो दलाली नहीं करने वाले मीडियाकर्मियों ने उसकी जमकर धुनाई भी की थी. तो पाठकों इस कथित मीडियाकर्मी ने सरकार के एक&amp;nbsp; विभाग से पैसा निकालने के लिए अपने सगे बाप को&amp;nbsp; अस्पताल में हार्ट अटैक हो गया है कहकर एडमिड होना बता दिया था. पत्रकार के पिता जिस तिथि को अस्पताल में एडमिट थे उसी तिथि को वे तत्कालीन गृहमंत्री के यहां मिट्टी तेल का डिब्बा लेकर भी खड़े हुए थे. सौभाग्य से मैं मंत्री महोदय के घर गया हुआ था. मुझे पत्रकार मित्र के पिता को देखकर हैरत हुई. मैंने उनसे पूछा- आपको तो अस्पताल में होना चाहिए था. वे बोले, पिछले कुछ दिनों से मेरा मन&amp;nbsp; प्रफुल्लित नहीं चल रहा है&amp;nbsp; इसलिए अब सोचा है कि कुछ करना है.&amp;nbsp; मैं मिट्टी का डिब्बा लेकर मंत्री जी के पास इसलिए आया हूं क्योंकि मैं उनसे पूछना चाहता हूं&amp;nbsp; आमजनता को मिट्टी का तेल क्यों नहीं मिल रहा है. मीडियाकर्मी के पूज्यनीय पिताजी जिस मंत्री के घर पर खड़े थे उस दौरान उस मंत्री के पास गृह विभाग का प्रभार था. मुझे हैरत हुई कि भला गृहमंत्री मिट्टी तेल कैसे दिला सकता है. बाद में पता चला कि पूज्य पापाजी मिट्टी तेल के साथ-साथ अपने छोटे लड़के के&amp;nbsp; द्वारा संचालित किए जाने वाले एनजीओ को काम देने की सिफारिश करने भी गए हुए थे. लोग अक्सर मुझसे यह पूछते है कि मैं छत्तीसगढ़ के पत्रकारों को लेकर इतना विषवमन क्यों करते रहता हूं. मैं यहां साफ कर देना चाहता हूं कि मेरा विरोध उन पत्रकारों से जरा भी नहीं है जो अपने काम में ईमानदारी से लगे हुए हैं. मैं सिर्फ उन्ही पत्रकारों की बात करता हूं जो अपनी प्रतिभा से ज्यादा अपने हथकंडों से आगे बढ़ने पर यकीन रखते हैं. अब आप ही बताइए मैं राजेश शर्मा जैसे लोगों की खिलाफत न करूं तो क्या करूं. राजेश शर्मा पत्रकारिता की आड़ में छत्तीसगढ़ से चार सौ करोड़ रूपए लेकर फरार हो गया. उसके अखबार नेशनल लुक में काम करने वाले तमाम पत्रकार सड़क पर आ गए. अब जो पत्रकार राजेश शर्मा जैसे लोगों का सहयोग कर रहे थे क्या उनके बारे में भी दो चार वाक्य न कहा जाए. बात निकलेगी तो फिर दूर तलक जाएगी... इसलिए छोडिए इन बातों को&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;लौटते है फिर से प्रियंका के प्रसंग पर.....&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;तो पहली और सामान्य सी मुलाकात के बाद मैं प्रियंका को भूल गया, लेकिन एक रोज जब मैं बूढ़ा तालाब के धरना स्थल से गुजर रहा था तो मैंने देखा ढेर सारे लोग प्रियंका को घेरकर खड़े हुए हैं. शायद किसी कर्मचारी संगठन का आंदोलन था. मैं भी अपनी मोटर साइकिल किनारे लगाकर भीड़ में शामिल हो गया. कर्मचारी प्रियंका को अपनी समस्या बताते जा रहे थे और वह भी सबकी बात को गौर से सुन रही थी.थोड़ी ही देर में उसने सारे कर्मचारियों को लामबंद कर अपने चैनल के लिए ठीक-ठाक शाट तैयार कर लिए और माइक थामकर पीटूसी ( फेस टू कैमरा) भी कर लिया.जब उसकी नजर मुझ पर पड़ी तो उसने आश्चर्य प्रकट करते हुए कहा, अरे सर आप यहां. क्या आप कर्मचारी संगठन भी देखते है. मैंने उसे यह नहीं बताया कि मैं तुम्हें भीड़ में घिरा देखकर रूका हूं. उस रोज भी सामान्य सी बात हुई और मैं एक बार फिर अपने काम में मशगूल&amp;nbsp; हो गया. कुछ दिनों बाद वह मुझे कांग्रेस भवन में मिली. यहां भी जब उसने कांग्रेस की बनती-बिगड़ती स्थिति को लेकर चर्चा की तो मुझे लगा कि प्रियंका ने काफी कम समय में कांग्रेस की स्थिति को समझ लिया है. थोड़े ही दिनों में उसने अपने कुशाग्र होने का परिचय देते हुए प्रदेश की पत्रकारिता में अपनी खास पहचान और धमक&amp;nbsp; बना ली. विधानसभा चुनाव के दौरान उसने काफी बड़े कव्हरेज किए. प्रदेश का शायद ही कोई बड़ा नेता होगा जिसके साथ प्रियंका ने दौरा नहीं किया होगा. प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी और मुख्यमंत्री डाक्टर रमनसिंह को लेकर उसकी कव्हरेज को कम से कम मैं तो मील का पत्थर ही मानता हूं. यह मानने की वजह भी है क्योंकि उन दिनों मैं सभी चैनलों के राजनीतिक कार्यक्रमों को गौर से देख रहा था. एक चैनल के दाढ़ी वाले पत्रकार की अटक-अटककर की गई चमचाई तो काफी सुर्खियों में थी. इसके अलावा दाढ़ी वाले के यहां काम करने वाले उदय चोपड़ाओं का काम और उनकी नेतागिरी भी लोगों को नजर आ रही थी. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इन सारी बातों का यहां जिक्र करने के पीछे मेरा मतलब सिर्फ इतना है कि प्रियंका भीड़ से अलग लड़की थी. उसके काम&amp;nbsp; की खूशबू हवा में लगातार फैल रही थी.पाठक यह न समझे कि प्रियंका के साथ कुछ ऐसी- वैसी बात हो गई है.प्रियंका है ..लेकिन अब वह मेरे शहर में नहीं है. लगभग दो दिन पहले ही वह रायपुर को छोड़कर भोपाल चली गई. पता चला है कि वह किसी नए चैनल को ज्वाइन कर रही है. यह चैनल कौन सा होगा यह नहीं मालूम लेकिन जानकार बताते हैं कि कुछ लोगों ने उसे साजिशों के तहत उसे यह शहर छोड़ने के लिए मजबूर कर दिया.&amp;nbsp; कुछ जिम्मेदार लोगों की बातों पर यकीन करें तो उसके चौतरफा नाम और काम की धमक कुछ लोगों को नागवार गुजर रही थी. प्रतिभा से जलने वाले तत्व सक्रिय हो गए थे. इन तत्वों ने प्रियंका को ठिकाने लगाने का रास्ता बनाया. इसमें कुछ ऐसे लोग भी शामिल हुए जिनका एकमात्र काम लिखने-पढ़ने वालों को ठिकाने लगाने का रहा है. ऐसे लोग कहीं ओएसडी बने हुए हैं तो कहीं दशरथ के परिवार की व्यथा लिखकर अपने चमचों के जरिए उसे पांडुलिपि में छपवाकर पीएचडी करने की जुगत में लगे हुए हैं. ऐसे लोग अपने इरादों में सफल हो गए. प्रियंका के साथ खबरों के लिए दौड़-धूंप करने वाले कुछ लोगों ने बताया कि अब प्रियंका की जगह किसी ऐसे व्यक्ति को काम दे दिया गया है जिसने अपने पूर्व संस्थान में एक लड़की के साथ काफी बुरा सलूक किया था. वह लड़की जो खुद भी एक पत्रकार है, ने अपने साथ हुए घटनाक्रम की जानकारी प्रबंध संपादक को मुहैय्या कराई थी. अखबार के प्रबंध संपादक जो एक उम्दा इंसान है उन्होंने मामले में तुरंत ही एक्शन लेते हुए&amp;nbsp; लड़की के साथ भेड़िया व्यवहार करने वाले पत्रकार को पद से हटा दिया था.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खैर.. प्रियंका तो चली गई लेकिन दो-चार छोटी सी बातें मेरे जेहन में तैर रही है वह मैं आपसे शेयर कर लेता हूं. पहली बात तो यह है कि आखिरकार हम कब तक लड़कियों का आगे बढ़ना बर्दाश्त नहीं कर पाएंगे. एक लड़की यदि अपने सृजनात्मक काम से हमें चौंका देती है तो क्या हमें जलन होनी चाहिए. क्या लड़की जिंदगी भऱ सुई धागा थामकर चिड़ियां-मिठ्ठू ही बनाते रहेगी. क्यों&amp;nbsp; हम उससे राजनीतिक बहस की उम्मीद नहीं कर सकते. एक लड़की यदि बोलती है, जुबान खोलती है तो उसे ही-ही भक-भक करने वाला&amp;nbsp; ही क्यों&amp;nbsp; मान लिया जाता है. मुझे अपने शहर के उन बुद्धिजीवियों और नेताओं पर भी हैरत होती है जो कभी यह जानने की कोशिश नहीं करते कि एक अखबार में अच्छा भला चलता हुआ कालम क्यों बंद हो जाता है. क्यों एक पत्रकार काम करते हुए अचानक नौकरी से निकाल दिया जाता है. अरे भाई जो दूसरों की कविताओं को चोरी करके कालम लिखते हैं उनके बारे में तो मत पूछिए लेकिन जो अपनी मौलिकता से अपनी दस्तक दे रहे हैं कम से उनके बारे में तो यह जानिए कि ऐसा कौन सा कारण था जिसके कारण उनके लिखने पढ़ने पर रोक लगा दी गई है.प्रियंका एक बेहद खराब समय में धान घोटाला व अन्य कई जरूरी मुद्दों पर बातचीत कर रही थी, लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की कि वह क्यों इस शहर को छोड़कर चली गई. जाने से पहले उसे विधानसभा की सर्वश्रेष्ठ रिपोर्टिंग के लिए पुरस्कार भी दिया गया, लेकिन प्रियंका से एक दो को छोड़कर शायद किसी ने यह नहीं पूछा कि आखिरकार वह क्यों हमारे शहर को छोड़कर जा रही है. उन नेताओं ने भी नहीं जो छोटी सी छोटी खबर के लिए सीधे मालिकों से बात करते रहते हैं. उन अफसरों ने भी नहीं जो मालिकों को बुलाकर कहते हैं- अपने पत्रकार को भूखा-प्यासा मत भेजा करिए थाली छीनकर खाने के लिए लड़ना पड़ता है उसे. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सच तो यह है कि पकते हुए दाल की खूश्बू की तरह हर शहर में छा जाने वाली एक लड़की का नाम है प्रियंका. वह हमारे कठिन समय की सबसे कीमती संभावना है. मेरी इस बात को आप हल्के में मत लीजिए. एक दिन आप प्रियंका को चमत्कार करते हुए देखेंगे.&amp;nbsp; आंखों में बदलाव का सपना पालकर चलने वाली प्रियंका को&amp;nbsp; मैं तो हमेशा याद रखने वाला हूं. उम्मीद करता हूं आप लोग भी उसे याद रखेंगे.लड़कियां तो विदा लेती ही है लेकिन कोई लड़की मेरे शहर से इस ढंग से विदा हो जाएगी इसकी कल्पना मैंने नहीं की थी. आप जिस शहर में रहते हैं वहां भी कोई न कोई प्रियंका रहती ही होगी. मेरा आपसे निवेदन है उसे यूं ही विदा मत होने दीजिएगा.&lt;/div&gt;अब तो आप जान गए न मैं किस प्रियंका की बात कर रहा हूं...... नमस्कार.&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-7558204502887046970?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/7558204502887046970/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=7558204502887046970&amp;isPopup=true' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7558204502887046970'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7558204502887046970'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/03/blog-post_31.html' title='प्रियंका का शहर छोड़कर जाना'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/--jMEeFH0a8w/TZSUpq7iY5I/AAAAAAAAAsw/0-V1nkuk2NY/s72-c/DSC_0135.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-3980647928293584271</id><published>2011-03-23T03:47:00.000-07:00</published><updated>2011-03-23T03:47:22.115-07:00</updated><title type='text'>राख में बदल गया बारूद</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अंबरीश कुमार&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लोधी रोड के शमशान घाट में आलोक तोमर को अंतिम विदाई के लिए पहुंचा तो जाम के चलते कुछ देर हो गई थी . उनकी चिता से लपटे निकल रही थी .वही खड़ा रह गया .करीब बीस साल का गुजरा वक्त याद आ गया .जनसत्ता में प्रभाष जोशी के बाद अगर कोई दूसरा नाम सबसे ज्यादा चर्चित रहा तो वह आलोक तोमर का था .जनसत्ता ने उन्हें बनाया तो जनसत्ता को भी आलोक तोमर ने शीर्ष पर पहुँचाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई .वे जनसत्ता रूपी तोप के बारूद थे.वह भी आज वाला जनसत्ता नही दो दशक पहले का जिसकी धमक और चमक के आगे अंग्रेजी मीडिया बौना पड़ गया था .शाम को देव श्रीमाली बोले - अब न तो वैसी हेडिंग आती है न भाषा में आक्रामकता है कुछ अपवाद छोड़कर .लगता है .मेरा जवाब था -यह समय का फेर है ,प्रभाष जोशी के समय की तुलना नही की जा सकती है .उन्होंने आलोक तोमर को तलाशा और तराशा भी .प्रभाष जोशी के बाद अब आलोक तोमर भी चले गए . बीस दिन पहले ही बात हुई तो उनकी तकलीफ को देखते हुए आगे बात करने से मना किया और कहा , सुप्रिया जी को सब बता दूंगा जो आपको समझा देंगी आपको बात करने के लिए काफी जोर डालना पड़ रहा है .वे कालाहांडी की मौजूदा हालत के बारें में मेरी जानकारी पर सवाल खड़ा कर बहस कर रहे थे .अंतत मैंने हथियार डाल दिए और उन्होंने चार पांच दिन में लिखने का वादा किया . फिर आलोक से बात नही हो पाई जो कहना होता था सुप्रिया से कहा जाता और उन्ही के जरिए जवाब मिल जाता .राख में बदलते आलोक तोमर को हाथ जोड़ पीछे लौटा तो सुप्रिया देखते ही फफक कर बोली -अब हम कभी रामगढ नही जा पाएंगे .हमारा घर नही बन पाएगा .देखिए आलोक चले गए .सुनता रहा बोलने को कुछ था ही नही .शमशान घाट से घर पहुंचे तो सुप्रिया का हाल और बुरा था .आलोक की फोटों को देख बार बार उन्हें आवाज दे रही थी .कुछ देर बैठा फिर बाहर निकल आया .छतीसगढ़ के वरिष्ठ अफसर आलोक अवस्थी ,हरीश पाठक ,देव श्रीमाली ,आलोक कुमार ,मयंक सक्सेना और राहुल देव आदि थे .करीब दो घंटे बाद कृष्ण मोहन सिंह के साथ दोबारा पहुंचा तो पद्मा सचदेव ,प्रणव मुखर्जी की पुत्री शर्मिष्ठा और टीवी के कुछ पत्रकार मौजूद थे .दो अप्रैल के कार्यक्रम पर बात हो रही थी .आलोक तोमर के वेब साईट डेटलाइन इंडिया को जल्द अपडेट करने पर पर भी चर्चा हुई .आलोक तोमर का मोबाइल फोन पहले से ही बंद कर दिया गया है और सुप्रिया का फोन फिलहाल अनिल गुप्ता के पास है और वही बात भी करेंगे क्योकि सुप्रिया सभी से बात कर सके यह संभव भी नही है .कुछ कानूनी और तकनीकी पहलुओं पर बात होते होते अचानक सुप्रिया का ध्यान आलोक तोमर की फोटो पर जाता और वे फिर उन्हें पुकारने लगती .पद्मा सचदेव के सुप्रिया को गले से लगाकर कहा -आलोक कही नही गया है वह हम सबके साथ है .फिर उन्होंने आलोक तोमर के कई संस्मरण सुनाए और कहा -शादी के दौरान मैंने मजाक में कहा था मुझे बंगाली बहू नही चाहिए तो आलोक का जवाब था अब आपकी बहू तो यही बनेगी .&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सुप्रिया बोली -ज्योतिष के जानकारों को आलोक झूटा साबित कर चले गए .आखिरी तक उनकी कलम चलती रही .१७ मार्च को उन्होंने जो लेख लिखा उसी के बाद बत्रा गए और फिर हमेशा के लिए चले गए . चितरंजन खेतान पिछले महीने जब विदेश जाने से पहले मिलने आए तो एक कविता लिखी जो अंतिम कविता बन गई .इस कविता की फोटो कापी अनिल गुप्ता ने कराकर सभी को दी .रात आठ बजे जब चलने को उठा तो सुप्रिया की आँखे फिर भर आई और बोली -दो अप्रैल को आ रहे है ना , मैंने इशारे से कहा हाँ .कुछ बोला नही गया .सामने बैठे आलोक तोमर के पिताजी को नमस्कार किया और फिर कमरे से बाहर आ गया .कृष्ण मोहन सिंह और विजय शुक्ल साथ थे . कुछ समझ में नही आ रहा था .समय ही हर घाव को भरता है और यहाँ भी यही होगा यह सोचकर दिलासा दे रहा हूँ .&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-3980647928293584271?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/3980647928293584271/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=3980647928293584271&amp;isPopup=true' title='4 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3980647928293584271'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3980647928293584271'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/03/blog-post_23.html' title='राख में बदल गया बारूद'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>4</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-156008977490836184</id><published>2011-03-20T23:01:00.000-07:00</published><updated>2011-03-20T23:01:12.615-07:00</updated><title type='text'>चले जाना आलोक तोमर का</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यकीन तो नहीं होता लेकिन यकीन करना पड़ेगा. हमारे बीच अब आलोक तोमर नहीं रहे. अभी पिछले माह फरवरी को मैं अबंरीशजी के साथ उनके घर गया था. घर पहुंचने के बाद आलोकजी ने यह अहसास ही नहीं होने दिया कि वे बीमार चल रहे हैं. उनकी आवाज धीमी और फंसी हुई सी जरूर थी लेकिन चमचमाते दिनों को याद करने के दौरान उनकी आंखों में जो चमक चढ- उतर रही थी उसके बाद मुझे यकीन हो गया था कि चाहे जो भी हो आलोकजी अपनी जीवंतता के साथ लंबे समय तक हमारे बीच मौजूद रहेंगे ही. आलोकजी एक पुरानी सी शाल ओढ़कर अपने कम्पयूटर के सामने बैठे हुए थे. अबंरीशजी और उनके बीच तमाम विषयों पर बातचीत होती रही. मैं लगातार उनको देखता रहा और कमरे का मुआयना करता रहा. मेरे बेमतलब के मुआयने के बाद भी एक बात जो मुझे समझ में आयी वह यह थी कि आलोकजी ने लिखने के साथ-साथ पढ़ना भी जारी रखा था. आमतौर पर स्थापित पत्रकार जब केवल लिखते हैं तो दूसरों को पढ़ना छोड़ देते हैं लेकिन आलोकजी के साथ ऐसा नहीं था.इस बीच जब तबांखू से संबंधित एक कार्यक्रम के लिए आलोक जी ने अबंरीश जी को अपील लिखवाई तो बात ही बात में आलोकजी ने कह दिया-अरे मौत को रोज तो बुलाता हूं लेकिन उसकी हिम्मत ही नहीं होती.. मेरी घर की देहरी लांघने की. कमबख्त दरवाजे से ही लौट जाती है. भाभीजी ने यह सुन लिया था. वे रो पड़ी थी. उन्हें रोते देख आलोकजी ने उन्हें बहुत प्यार भरी डांट भी पिलाई थी. इस डांट में कहीं चुपचाप यह भी शामिल था कि आलोक की जीवन संगिनी होकर रोती हो... हिश्श.. हट.&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब हम छोटे थे और पत्रकारिता की एबीसीडी सीखने की जुगत में लगे हुए थे तभी हमारे सीनियर हमें यह बताते थे कि यदि कभी आलोकजी की रिपोर्टिंग पढ़ने मिले तो जरूर पढ़े. जब अबंरीशजी जनसत्ता छत्तीसगढ़ के संपादक बने तो एक दिन आलोकजी को प्रत्यक्ष देखने उनके साथ देर तक बातचीत करने का अवसर भी मिला. जब प्रदेश में जोगी की सरकार थी तब एक रोज उनका छत्तीसगढ़ आना हुआ था. एक होटल के कमरे में जब मैंने उन्हें श्वास लेने के लिए इनहेलर करते देखा तो तकलीफ हुई थी. बातों ही बातों में जब मैंने उन्हें टोका तो उन्होंने भी बात को टालने के लिए कह दिया- अरे राजकुमार दिल्ली में साली हवा भी कम हो गई है... बस ये समझ ले आदत हो गई है. काफी दिनों के बाद पता चला कि वे कैंसर से जूझ रहे हैं. अभी दो दिन पहले अबंरीशजी ने ही सूचना दी थी कि आलोकजी की तबीयत फिर से खराब हो गई है. होली के दिन अबंरीशजी ने मुझे फिर बताया कि ............ यह सूचना पहली सूचना से ज्यादा दुखद थी. पत्रकारिता में भाषा के स्तर पर नए मुहावरों को गढ़ने में आलोकजी ने जो भूमिका निभाई उसकी पूर्ति तो अब शायद ही पाए. मेरी श्रद्धाजंलि&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-156008977490836184?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/156008977490836184/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=156008977490836184&amp;isPopup=true' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/156008977490836184'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/156008977490836184'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/03/blog-post.html' title='चले जाना आलोक तोमर का'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-1495557808291712076</id><published>2011-02-06T08:44:00.000-08:00</published><updated>2011-02-07T00:03:48.431-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बच्चा और अपराध'/><title type='text'>.. तो क्या इन्हें तुम्हारा बाप गिरफ्तार करेगा</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी दो रोज पहले अखबारों में एक खबर छपी है. एक नाबालिग को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वह किसी महिला पुलिसकर्मी को उसकी मीठी आवाज के कारण फोन किया करता था. इस खबर को पढ़ने के बाद मुझे हैरत इसलिए हुई क्योंकि मेरा मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि महिला पुलिसकर्मी की आवाज मीठी हो सकती है. राजधानी की महिलापुलिस कर्मियों के मुंह से किस तरह के फूल झरते हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है. एक महिला पुलिसकर्मी तो गोला बीड़ी पी-पीकर ही लोगों की मां और बहनों से हिसाब-किताब पूरा करते रहती है. खैर... नाबालिग छबिराम का कसूर मात्र इतना था कि वह एक मजदूर का बेटा है और स्वयं भी मजदूरी किया करता था. अपनी मजदूरी की कमाई से ही उसने अंबानी के फोन को कान से लगाने की दुस्साहस दिखाया था. वैसे तो इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही यही है कि गरीब और मजदूर आदमी मोबाइल ही नहीं खरीद सकता. यदि किसी गरीब ने गलती से फोन खरीद लिया तो लोगों को यह लगने लगता है कि साले ने कहीं से हाथ साफ किया होगा.समाज का एक बड़ा तबका अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि लोग अपनी मेहनत की कमाई से गाड़ी घोड़ा खरीद सकते हैं. हवाई जहाज में यात्रा कर सकते हैं.&amp;nbsp; क्षमा करिएगा प्रदेश में एक दो अखबारों को छोड़कर ज्यादातर अखबारों के प्रबंधन का नजरिया बाबा आदम जमाने का ही बना हुआ है. बहुत से अखबार मालिक अब भी नहीं चाहते कि पत्रकारों को अच्छी तनख्वाह दी जाए.&amp;nbsp; ज्यादातर मालिक मानते हैं कि पत्रकार&amp;nbsp; गायत्री परिवार के सम्मेलनों में वितरित किए जाने वाले झोले को कंधे में टांगकर समाचारों के संकलन के लिए ही पैदा हुआ है.&amp;nbsp; इस मामले में पत्रिका ने कई मिथकों को तोड़ने का प्रयास किया है. पत्रिका ने अपने यहां कर्मचारियों एवं पत्रकारों को ठीक-ठाक वेतन देने की जो शुरूआत की है उसकी धमक अन्य जगह भी सुनाई पड़ने लगी है,&amp;nbsp; अन्य जगह भी हालात बदलेंगे इसकी उम्मीद की जानी चाहिए. मैं थोड़ा विषय से भटक रहा हूं लेकिन फिर भी मेरा यह मानना है कि पत्रकार जब तक अभावों और मुफलिसी में काम करते रहता है तब तक वह किसी न किसी बहाने लोगों के आगे हाथ फैलाने के लिए मजबूर रहता है.अखबार मालिक अपनी ठीक-ठाक स्थिति के लिए खुश जरूर हो सकते हैं लेकिन यह भी सच है&amp;nbsp; पत्रिका के आने के बाद राज्य में एक नए तरह की पत्रकारिता और कलमकारों की स्थिति सुधार को लेकर बातचीत होने लगी है.अब से कुछ समय पहले तक राज्य के पत्रकार किसी भी नेता, अफसर या अन्य किसी को अपनी तनख्वाह बताने में हिचकाचते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है.&amp;nbsp; इधर पत्रिका ने दबी और दबाई जाने वाली खबरों के प्रकाशन से एक नए मुहावरे को गढ़ने में भी कामयाबी हासिल की है. अब किसी भी संस्थान के लिए खबरों को कुर्सी के नीचे दबाकर बैठना आसान नहीं रह गया है. आवाम के हितों से जुड़ी खबरों के प्रकाशन ने पत्रिका को जनता का सर्वाधिक विश्वसनीय अखबार बना&amp;nbsp; डाला है. छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में इन दिनों बदलाव की एक नई बयार देखने को मिल रही है. इस बयार में वे पत्रकार ठीक ढंग से सांस ले पा रहे हैं&amp;nbsp; जिनका काम&amp;nbsp; सिर्फ और सिर्फ लिखना-पढ़ना ही है.&amp;nbsp; खुद को बाबू , पीए या याचक के रूप में बदल डालने वाले पत्रकारों को बदलते समय के नए विमर्श से न पहले कोई&amp;nbsp; मतलब था न बाद में कोई मतलब होगा ऐसा भी साफ दिखाई दे रहा है. &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;चलिए अब एक बार फिर छबिराम के प्रकरण पर लौटते हैं. तो छबिराम ने जब स्वयं का&amp;nbsp; मोबाइल खरीदने के बारे में विचार किया तब उसके एक दोस्त ने बताया कि टोलफ्री पर फोन लगाने से खुद का एक धेला भी खर्च नहीं होता है. अपने दोस्त की बात मानकर नाबालिग छबिराम ने कंट्रोल रूम फोन लगाया. वहां कार्यरत एक महिलाकर्मी ने बड़े मोहक अन्दाज में बात की. छबिराम को महिला का अन्दाज इतना पसन्द आया कि उसने दो दिन में साढ़े तीन सौ से ज्यादा फोन लगा लिए. पुलिसवालों ने नंबर ट्रेस किया और छबिराम को गिरफ्तार कर लिया. छबिराम की गिरफ्तारी के बाद किसी अखबार के महान संवाददाता ने लिखा कि उम्र 15 साल और कारनामा इतना बड़ा कि अच्छे-अच्छे शर्मा जाए. किसे कहते हैं तीन सौ अस्सी बार फोन.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे भाई कौन सा बड़ा अपराध कर दिया छबिराम ने. एक महिला पुलिसकर्मी से फोन पर हाल-चाल ही तो पूछा. गाली तो नहीं दी न. सच तो यह है कि जिन बच्चों का जीवन अभावों और तकलीफों में बीतता है वे समाज से सुरक्षा और प्यार की अपेक्षा करते ही है. पंद्रह साल के छबिराम को गिरफ्तार करने के दौरान पुलिस ने उसका यह अपराध तो देख लिया कि वह फोन लगाकर परेशान कर रहा था लेकिन उस दुकानदार का अपराध देखने की चेष्टा नहीं की जिसने उसे मोबाइल बेचा था. एक नाबालिग को मोबाइल बेचना भी तो अपराध की श्रेणी में आता है. अखबार में खबर छपी है कि छबिराम मजदूरी करता है. यदि एक पंद्रह साल का लड़का छत्तीसगढ़ में मजदूरी करने के लिए विवश है तो सरकार के शिक्षा विभाग के साथ-साथ श्रम विभाग वालों को डूब मरना चाहिए.एक नाबालिग के हाथों में किताब और कलम की जगह फावड़ा और गैती पकड़वाने वाले लोग कौन है.&lt;b style="color: red;"&gt;इन्हें क्या तुम्हारा बाप गिरफ्तार करेगा.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का ऋषि कपूर अपनी टीचर सिमी गरेवाल से प्यार कर बैठता है. यह उम्र है ही नाजुक. कुछ समय पहले शशिलाल नायर की फिल्म एक छोटी सी लव स्टोरी भी आई थी. फिल्म में मनीषा कोइराला और उसका प्रेमी जब अपने बदन की तपिश को ठंडा करते रहते हैं तो नाबालिग हीरो बिल्डिंग में आग लगने की सूचना देकर फायर बिग्रेड वालों को बुला लेता है. हो सकता है कि बहुत से लोग मेरी बातों से सहमत न हो. बहुत से लोगों को यह लग सकता है कि भाजपा शासित राज्य में सभ्यता और संस्कृति की मर्यादा का उल्लंघन करने वालों तो सजा मिलनी ही चाहिए. एक लड़के ने महिला पुलिस को फोन लगा डाला है... संस्कृति को खतरा उत्पन्न हो गया है. लड़के की हरकत ने उसकी उम्र के लड़कों को पथभ्रष्ट कर डाला है. मानव सभ्यता की चडडी फट गई है. जिस किसी ने भी सभ्यता की चड़डी उतारने की धृष्टता की है उसकी तो वाट लगनी ही चाहिए. अब मेरा सवाल यह है कि इसी राज्य में कई ऐसे छैला अफसर है जो सरकारी फोन से अपनी कथित महबूआओं को फोन लगाकर शासन को लाखों रुपए का चूना लगा चुके हैं उनका क्या किया आपने? मंत्रालय और कलेक्टर कार्यालय के सैकड़ो बाबू काम की अवधि में अपनी गर्लफ्रेंडों से फोनोसेक्स करते रहते हैं उनका क्या किया आपने? एक बच्चे ने फोन कर लिया तो छात्ती फट गई आपकी. &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं यहां नाबालिग छबिराम के पक्ष में इसलिए खड़ा हूं क्योंकि इस तरह की शरारतें उन सभी लोगों ने की है जब वे बच्चे थे. मुझे याद आता है बचपन में मेरे एक दोस्त मनोज ने अपना पहला प्रेम पत्र तब लिखा था जब वह कक्षा तीसरी में था. मनोज और मैं दोनों साथ ही स्कूल जाया करते थे। एक दिन मनोज ने बताया कि वह क्लास की लड़की चंचल को दिल दे बैठा है। मनोज की इस बात से मैं बहुत से खुश था क्योंकि चंचल के परिजनों की साइकिल की दुकान थी और मेरी खटारा साइकिल में प्रायः कोई न कोई परेशानी पैदा होते ही रहती थी. कभी साइकिल का मडगाड मिथुन चक्रवर्ती के समान डिस्को डांस करता रहता था तो कभी साइकिल के पैडल पिडलियों का बोझ उठाने से इंकार कर देते थे. मेरी भी दिली इच्छा थी कि बस किसी तरह से चंचल मनोज को दिल दे बैठे ताकि अपनी साइकिल का काम थोड़ा फ्री में होता रहे.&amp;nbsp; वर्ष 1973-74 में अध्यपकों ने पत्र लिखने की तीन-चार स्टाइल ही समझायी थी सो मनोज ने जिस शैली का उपयोग किया उसका उल्लेख यहां कर रहा हूं. मित्र ने लिखा था-&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;कुमारी चंचल गुप्ता&lt;br /&gt;कक्षा तीसरी ब&lt;br /&gt;प्राथमिक शाला क्रमांक-2&lt;br /&gt;विषय- प्रेम प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;महोदया,&lt;br /&gt;निवेदन है कि अभी हम क्लास तीसरी में हैं और आप भी क्लास तीसरी में हैं, लेकिन आप हमको अच्छी लगती है तो हम आपसे प्रेम प्राप्त करना चाहते हैं और अपना प्रेम भी प्रदान करना चाहते हैं. कृपया तीन दिनों के भीतर अपना प्रेम प्रदान करने की अनुकंपा करें ताकि हम भी अपना प्रेम प्रदान कर सकें.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;आपका आज्ञाकारी &lt;br /&gt;मनोजकुमार&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश के बहुत से मनोचिकित्सकों ने अपने अध्ययन में यह माना है कि बच्चों पर खाकी का रौब या तो उन्हें बीमार कर देता है या फिर विकृत अपराधी बना देता है. जो बच्चे लड़कियों के चित्रों को देखकर उन्हें चाकू या खीले से गोदने लगते हैं वे&amp;nbsp; किसी न किसी तरह की नफरत के ही शिकार होते हैं. पुलिस यदि चाहती तो छबिराम के घरवालों से बात कर इस समस्या का समाधान ढूंढ सकती थी लेकिन पुलिस का चेहरा संवेदनशील हो सकता है यह सोचना भी एक सवाल है. एक सवाल यह भी है कि पुलिस को अपराधियों की पैदाइश से क्या हासिल होता है. यदि कल को छबिराम एक किलर बन गया तो पुलिस क्या करेगी. शायद दस या बारह साल पुलिस फिर किसी पत्रकारवार्ता में पत्रकारों को यह बताती रहेगी कि इस शख्स को गौर से देखिए. इसकी मासू म सूरत पर मत जाइए. यह आदमी जो आपके सामने खड़ा हुआ है इस शख्स ने बचपन में अपने घर के तेजधार चाकू से ही तेरह कुत्तों की जान ले ली थी. यह शख्स जिसे आप देख रहे हैं उसने कई&amp;nbsp; महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया है. यह एक बीमार रोगी है. इसके भीतर डर फिल्म का शाहरूख खान बैठा हुआ है. &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-1495557808291712076?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/1495557808291712076/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=1495557808291712076&amp;isPopup=true' title='9 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1495557808291712076'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1495557808291712076'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/02/blog-post.html' title='.. तो क्या इन्हें तुम्हारा बाप गिरफ्तार करेगा'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>9</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-522792383484228183</id><published>2011-01-28T07:41:00.000-08:00</published><updated>2011-01-28T07:41:37.277-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='हिन्दी फिल्मों का संवाद'/><title type='text'>भगवान के लिए मुझे छोड़ दो</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यदि कभी आपको यह लगे कि एक हिन्दी फिल्म बनानी चाहिए तो आप बिल्कुल भी घबराइएगा नहीं। हिन्दी फिल्मों को बनाना बहुत ही आसान है। यदि आपके हाथ में एक माचिस की डिब्बी है तो भी आप हिन्दी फिल्म बना सकते हैं। माचिस से एक-एक काड़ी निकालकर उसे नाम देते जाइए। एक काड़ी को हीरो, दूसरे को हिरोइन, तीसरे को विलेन,चौथे को हिरोइन का बाप, पांचवी काड़ी को हिरोइन की मां शशिकला टाइप की। छठवी काड़ी को हीरो का दोस्त... राजेंद्रनाथ या मेहमूद सरीखा। सातवी काड़ी को हिरोइन की सहेली जिस पर हीरो का राजेंद्रनाथ बना दोस्त मर मिटेगा। आठवी काड़ी को बाबुल की दुआएं लेती जा... जा तुझको सुखी संसार मिले गाने वाला गरीब बाप समझ लीजिए। बाकी जितनी काड़ी है उनसे बाग-बगीचों में गाने का काम संपन्न हो जाएगा। हीरो जब शराब पीकर भरी महफिल में बेवफाई पर गाना गाएगा तो बाकी लोगों के हाथ में शराब के गिलास भी तो थमानी है या नहीं। कुल मिलाकर माचिस की काड़ियों से भी हिन्दी फिल्में बन सकती। छत्तीसगढ़ी फिल्में बनाना तो और भी आसान है क्योंकि इस बनाने के लिए तो ज्यादा दिमाग भी नहीं लगाना पड़ता। सीधे-सीधे किसी हिन्दी या भोजपुरी की हिट फिल्म की कापी कर लो फिल्म तैयार हो जाती है। सतीश जैन की फिल्म मया स्वर्ग से सुंदर की रीमेक थी तो हाल ही में आई एक फिल्म हीरो नंबर वन स्वर्ग फिल्म की कापी थी। टुरा रिक्शावाला भी एक भोजपुरी फिल्म की टू कापी थी। खैर बात यदि हिन्दी फिल्मों की चल रही है तो मैं आपको बता दूं कि एक बेहतर हिन्दी फिल्म की कहानी कुल जमा सौ संवादों के आसपास ही घूमती है। यदि आपने इन संवादों का ठीक ढंग से रटा मार लिया है तो आपकी फिल्म को हिट होने से भी कोई नहीं रोक सकता। &lt;/div&gt;यहां मैं कुछ प्रचलित संवाद से आपका परिचय करवाने जा रहा हूं। इन संवादों के साथ-साथ शरारत से भरी हुई टिप्पणी भी दे रहा हूं। पाठकों को कोई नई टिप्पणी सुझे तो वे मुझे फोन पर भी बता सकते हैं। मैं भी हंसना चाहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;संवाद---&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;1- मैं तुमसे प्यार करती हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तुम तो कल निर्माता को भी यही बोल रही थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;2- मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साली अच्छी मुसीबत गले पड़ रही है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;3- राज... मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;साला.. ये राज हर फिल्म में हिरोइनों को मां बनाने का काम ही करता है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;4- न...ह......ही (लंबी चीख)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इस चीख के साथ दर्शक भी चीखकर कहता है- आजा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;5- अरी कलमुंही... तू पैदा होते ही मर क्यों नहीं गई&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;दर्शक- मार साली को और मार... बहुत ऐश कर रही थी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;6- भगवान के लिए मुझे छोड़ दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भगवान के लिए छोड़ दोगे तो रणजीत क्या करेगा। चाकू हिलाएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;7- मैं कहां हू&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मछुवारे के घर में। यही तुमको पाल पोसकर जवान बनाएगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;8- मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;लेकिन पूरी फिल्म में बचाने वाले की ही वाट लगती रहती है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;9- सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-यह बात पियक्कड़ों पर लागू नहीं होती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;10- इन्हें अब दवा नहीं दुआ की जरूरत है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-चलो घंटी बजाओ और चिमटा लेकर भजन सुनाओ.. तब तक हम लोग बीड़ी पीकर आते है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;11- बेटा भगवान के घर देर हैं अंधेर नहीं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-हीरो को तो होश में लाना ही पड़ेगा बेटा... नहीं तो फिल्म की कहानी आगे कैसे बढ़ेगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;12- मां.. मां ... तुम कहां हो.. आज मुझे नौकरी मिल गई है। अब हमारे सारे कष्ट&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; दूर हो जाएंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;- मां की आंखों में चमक... बेटा अब तू जल्दी से मुझे आशा पारेख (बहू) ला दे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;13- देख मां... देख मैं तेरे लिए क्या लाया हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;भजिया खिलाकर मां को बेवकूफ बना रहा है साला।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;14-जीते रह बेटा... आज तेरे बापू जिन्दा होते तो कितना खुश होते&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-अरे कोई वायलिन बजाओ रे... आंखों से आंसू निकालना है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;15-लेडि़स एंड जैंन्टलमेन आज... बहुत ही खुशी का दिन है और इस खुशी के मौके पर मिस्टर कुमार अपनी दिलकश आवाज में एक गीत सुनाएंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-खुशी के मौके पर पियानो बजाकर गाओ- दिल तोड़ने वालों की महफिल में आ गया हूं&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;16- बाबूजी एक बात कहूं.. इन हाथों से पाल पोसकर तुमको बड़ा किया है.. इतनी पीकर मत आया करो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-अरे रामू काका.. कौन कमबख्त दिल जलाने के लिए पीता है मैं तो गम भुलाने के लिए पीता हूं। चल बे बुढ़ऊ... अब जूते निकाल।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;17- सेठ मैं तेरी-तेरी पाई-पाई चुका दूंगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;-अरे कैसे चुकाओगी राधारानी.. जब कोई नहीं रहेगा तब आटा लेने आना। अभी जा नहीं चिल्लाएगी- मेरे करण-अर्जुन आएंगे।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;18- अपनी जायजाद का एक पाई भी नहीं दूंगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मत दे साले को अपन भी हर जगह नौकरी मांग-मांगकर धक्के खाएंगे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;19- भगवान एक मंदिर तोड़ने वाले को तो माफ कर सकता है लेकिन किसी का दिल&lt;br /&gt;तोड़ने वाले को...&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(गंभीर किस्म का म्यूजिक)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;20-बास पुलिस ने हमारा करोड़ों का माल पकड़ लिया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;चिंदीचोर पुलिस और क्या करेगी... सबसे आखिरी में पहुंचेगी या फिर दौड़ाएगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;21- बास.. हमारे अडडे को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया है&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ले आओ साले को हीरो की मां और बहन को। बांध दो खंबे से&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;22-खबरदार.. कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(अब--- डोंट मूव्ह)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;सिवाय दर्शक के&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;23- अपने साथियों से कह दो कि हथियार फेंक दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;रेखा तुम सब हथियारों को बटोर लो... बहुत मटकना हो गया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;24-पलट दी न बाजी... मैं कहता हूं हीरे और हिरोइन दोनों मेरे हवाले कर दो&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;जल्दी कर... बे.. साले सायकिल स्टैंड से सायकिल निकालना है... बाद में वहां भीड़ हो जाती है।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;25-ढिशुंम.. ढिशुंम.... कुत्ते-कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मार साले... मार साले को। फोड़ डाल साले को दे घुमाके&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;26-टे आऊ.. वाऊ ऊ...(पुलिस का सायरन) गिरफ्तार कर लो इनको&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब कामेडियन आएगा... आखिरी-आखिरी में अपनी होने वाली बीवी से परिचय करवाएगा। एक मां जिसने हीरो को पाला है वह एक पेड़ के नीचे खड़ी रहेगी&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;हीरो- मां तुने मुझे दूध नहीं पिलाया तो क्या हुआ... लेकिन मैं तेरी ही कोख से जन्म लेना चाहूंगा।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;(गाना- हो जाता है प्यार... प्यार... किया नहीं जाता ...न बस में तुम्हारे न बस में हमारे.... द एंड)&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अब चलो भी... अबे दरवाजा तो पूरा खोल। काफी अच्छी भीड़ थी... लगता है चलेगी फिल्म। हां चल जाएगी। बाथरूम इधर है न...तू सायकिल निकालकर रख मैं एक मिनट में आता हूं।&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-522792383484228183?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/522792383484228183/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=522792383484228183&amp;isPopup=true' title='6 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/522792383484228183'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/522792383484228183'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/01/blog-post_28.html' title='भगवान के लिए मुझे छोड़ दो'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>6</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6241387437331851686</id><published>2011-01-23T04:03:00.000-08:00</published><updated>2011-01-25T02:04:14.976-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एके हंगल'/><title type='text'>इतना सन्नाटा क्यों है भाई</title><content type='html'>&lt;div dir="ltr" style="text-align: left;" trbidi="on"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;खबर आई है कि शोले के इमाम साहब की हालात खराब है। इमाम साहब ने कई फिल्मों में यादगार भूमिका निभाई है। मैंने तो उन्हें आखिरी बार आमिर खान की फिल्म लगान में देखा था। उसके बाद उनकी कोई और फिल्म आई हो मुझे इसकी जानकारी नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं फिल्में कम देखता हूं लेकिन यह तो मैं जानता ही हूं कि जब ईमानदार कलाकार बूढ़े हो जाते हैं तो समाज से बेदखल ही हो जाते हैं। अलबेला वाले भगवान दादा को लीजिए। पिज्जा खाने वाली पीढ़ी शायद भगवान दादा को नहीं जानती सो उनकी सहूलियत के लिए बता देता हूं कि भगवान दादा के एक डांस स्टेप की नकल सदी के महानायक अभिताभ बच्चन भी करते रहे हैं। भगवान दादा की अलबेला को देखने के बाद अभिताभ की किसी भी फिल्म को देख लीजिएगा, समझ में आ जाएगा शायद मैं गलत नहीं कह रहा हूं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;तो मैं बात कर रहा था इमाम साहब की। इमाम साहब यानी एके हंगल की।&amp;nbsp; इमाम साहब मुबंई में कहीं किराए के एक कमरे में अपने 75 वर्षीय बेटे के साथ रहते हैं और इन दिनों बीमार है। जब यह खबर अखबारों में छपी तो मुझे इस बात के लिए आश्चर्य हुआ कि इमाम साहब अपने उस बेटे के साथ रहते हैं जो खुद भी बूढ़ा है। खबर छपने के बाद से ही मैं ही इस सोच में डूबा हूं कि आखिर दो बूढ़े एक कमरे में क्या बातें करते होंगे। मैंने बूढ़े मां-बाप को जवान बेटे या बेटियों को डांटते-डपटते, सलाह देते हुए तो कई बार देखा व सुना है लेकिन दो ऐसे बूढ़ों को बात करते कभी नहीं देखा जिसमें से एक पिता है और दूसरा उसका बेटा। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;मैं इमाम साहब यानी एके हंगल से एक मर्तबा भोपाल में मिल चुका हूं। मिला क्या हूं उनसे लंबा इंटरव्यूह करने का सौभाग्य हासिल कर चुका हूं। यह तो हर कोई जानता है कि भोपाल में कौमी एकता को मजबूत बनाए ऱखने के लिए सैकड़ो संस्थाएं कार्यरत है। हर संस्थाए तिरंगे झंडे का इस्तेमाल करते हुए सरकार और उद्योगपतियों से चंदा वसूलने में लगी रहती है। ऐसे ही किसी एक कार्यक्रम में गलती से पहुंच गया था मैं। दरअसल एक&amp;nbsp; पाक्षिक पत्रिका का छत्तीसगढ़ प्रमुख होने के नाते मुझे कभी मंदसौर कभी नीमच और इंदौर की यात्रा करनी पड़ती थी सो एक रोज जब मैंने अपने परिचित रमेश अनुपमजी को बताया कि भोपाल जा रहा हूं तो उन्होंने भी खुशी-खुशी यह जानकारी दी कि वे भी कौमी एकता को मजबूत करने वाले एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए भोपाल जा रहे हैं। बस वही मेरी मुलाकात हंगल साहब से हुई थी। प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित किए गए इस आयोजन में पूजा भट्ट के खुजली वाले पिता महेश भट्ट भी मौजूद थे। भट्ट साहब को खुजली वाला इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि एक तो वास्तव में उनको खुजा-खुजाकर बात करने की आदत है और दूसरी उन्हें विदेशी फिल्मों से आइडिया चोरी करने की बीमारी ने भी घेर रखा है। भट्ट साहब ने उन दिनों अजय देवगन को लेकर जख्म नामक&amp;nbsp; फिल्म बनाई थी सो उनका भाषण फिल्म के प्रमोशन पर ही केद्रित था।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसी कार्यक्रम में हंगल साहब ने मुझे दुखी होकर बताया था कि किस तरह से वे फिल्म उद्योग के द्वारा किनारे कर दिए गए हैं।&amp;nbsp; सच तो यह है कि हंगल साहब अपनी जवानी के दिनों में बूढ़े और लाचार आदमी का किरदार करते रहे। फिल्म निर्माता उन्हें हर फिल्म में बंड़ी और धोती में दिखाता रहा। यदि मैं गलत नहीं हूं तो प्रकाश मेहरा की फिल्म खून-पसीना में हंगलजी ने एक पूडि़यों को चोरी करने वाले एक गरीब आदमी की भूमिका निभाई थी। फिल्म में गांव की&amp;nbsp; पंगत&amp;nbsp; में बैठकर जब सब लोग खाना खा रहे&amp;nbsp; होते हैं तभी अचानक किसी की घड़ी चोरी चली जाती है। पंगत में बैठे हुए सब लोग अपनी जांच-पड़ताल के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन हंगलजी तलाशी देने से इंकार कर देते हैं। जब सारे लोग उन्हें चोर साबित करने में तुल जाते हैं तो वे अपनी जेब से पूड़ी निकालकर रख देते हैं। पूडि़यों की चोरी उन्होंने अपने परिवार का पेट भरने के लिए की थी। इस फिल्म में हंगल के द्वारा अभिनीत इस दृश्य को देखकर मैं रो पड़ा था। इसी तरह यश चोपड़ा की फिल्म दीवार का दृश्य याद करिए। शशिकपूर चोरी करके भाग रहे एक आदमी पर गोली चलाते हैं। जब वे पास जाते हैं तो पता चलता है कि आदमी रोटी लेकर भाग रहा था। खाने का सामान लेकर जब शशिकपूर हंगल साहब के घर जाते हैं तो वहां का दृश्य आपकी आंखे भिगो देता है। इस दृश्य में श्री हंगलजी ने जान डाल दी थी। दुर्भाग्य की बात है कि एकाध फिल्म शौकीन को छोड़ दे तो हंगलजी को हमेशा दरिद्र, लाचार, बीमार और मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लायक ही समझा गया। यह तो फिल्मी दुनिया का रिवाज है कि जब कोई बड़ा आदमी किसी भिखारी का रोल करता है तो उसे मुंहमांगी कीमत दी जाती है लेकिन जब कोई गरीब आदमी वास्तव में गरीब बनता है तो उसके कटोरे में उतने ही पैसे डाले जाते हैं जितने भिखारियों के कटोरे में डाले जाते हैं। छत्तीसगढ़ के कलाकार नत्था को ले लें। पीपली लाइव के हिट हो जाने के बाद भी नत्था को फिल्में नहीं मिल रही है। एक छत्तीसगढ़ी फिल्म किस्मत का खेल में नत्था को एक हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया गया है। गरीब और लाचार आदमी की भूमिका को पर्दे पर जीवंत कर देने वाले व्यक्ति को इस समाज ने अपनी मदद के लायक ही नहीं समझा है। और तो और प्रगतिशील लेखक संघ तो घोषित तौर पर श्री हंगल को अपनी कौम का&amp;nbsp; मानता है। अपनी कौम के आदमी के लिए संघ ने कोई अपील जारी नहीं की है। इस संघ से जुड़े लेखकों ने उन पर कोई आर्टिकल भी नहीं लिखा। सबको शायद उनके लुढ़कने का इन्तजार है। जैसे ही वे इस दुनिया से विदा लेंगे तब कवि जागृत हो जाएंगे और कविता लिखेंगे- हंगल/ एन्टीना और एन्टीना पर टंगी गरीबी। अखबार वालों को रविवारीय पेज के लिए मसाला मिल जाएगा और टीवी वालों को दिनभर का पुल पैकेज कार्यक्रम । हालांकि इस बीच कई नामी हस्तियों के द्वारा मदद दिए जाने की खबरें भी प्रचारित हुई है लेकिन यह भी पता चला है कि यह भी सिर्फ प्रचार ही है। ईश्वर न करें कि हंगलजी को कुछ हो लेकिन मेरा यकीन इस संवेदनहीन समाज से धीरे-धीरे उठता जा रहा है। दोस्तों... रात हो चुकी है। अभी-अभी हर महीने दस रुपए ले जाने वाले नेपाली चौकीदार ने&amp;nbsp; घर के बाहर डंडे को पटकते हुए आवाज लगाई है- जागते रहो.... जागते रहो..... मैं तो जाग रहा हूं लेकिन देख रहा हूं कि सन्नाटा&amp;nbsp; पसरा हुआ है। इस पसरे हुए सन्नाटे के बीच ही सुबह के पांच बज जाते हैं। एक मस्जिद से अजान की आवाज आने लगती है। इस अजान में ही मैं कहीं यह भी सुनता हूं- इतना सन्नाटा क्यों&amp;nbsp; है भाई।&amp;nbsp; &lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6241387437331851686?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6241387437331851686/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6241387437331851686&amp;isPopup=true' title='12 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6241387437331851686'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6241387437331851686'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/01/blog-post_23.html' title='इतना सन्नाटा क्यों है भाई'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>12</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-8373802399631943837</id><published>2011-01-17T07:29:00.000-08:00</published><updated>2011-01-17T07:34:19.056-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='समीरलाल समीर और ललित शर्मा का सम्मान'/><title type='text'>ब्लागजगत के दो धुरन्दर समीरलाल समीर और ललित शर्मा का सम्मान</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TTRfVy6R2DI/AAAAAAAAAr0/uqr4un96So4/s1600/DSC00867.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TTRfVy6R2DI/AAAAAAAAAr0/uqr4un96So4/s320/DSC00867.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;मित्रों, कल यानी 16 जनवरी को यहां छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जैतूसाव मठ में ब्लागजगत के दो धुरन्धरों का सम्मान किया गया। ब्लाग जगत में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए कनाड़ा के रहवासी किन्तु अपनी माटी से आत्मीय जुड़ाव रखने वाले समीरलाल समीर एवं देशभर में छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाने वाले ललित शर्माजी सम्मानित किए गए। समीरलालजी यहां मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से छत्तीसगढ़ आने वाले थे लेकिन किसी कार्यवश वे नहीं पहुंच सकें। उनकी गैरमौजूदगी में मेरे द्वारा यह सम्मान ग्रहण किया गया। मैं श्री समीरलालजी एवं ललित शर्माजी को बधाई देता हूं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TTRfZQT2OVI/AAAAAAAAAr4/ErXdZjj11XE/s1600/DSC00868.JPG" imageanchor="1" style="clear: right; float: right; margin-bottom: 1em; margin-left: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="240" src="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TTRfZQT2OVI/AAAAAAAAAr4/ErXdZjj11XE/s320/DSC00868.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;छत्तीसगढ़ में काफी लंबे समय से हिन्दी के लिए कार्यरत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से कई ब्लागर मित्र जुड़े हुए हैं। हम सबके आदरणीय श्री गिरीश पंकज एवं सुधीर शर्मा प्रमुख लोगों में से हैं। श्री पंकजजी एवं श्री शर्माजी को जैसे ही यह सूचना मिली थी कि ब्लागजगत के महारथी समीरलाल जी इन दिनों भारत और छत्तीसगढ़ से लगे हुए शहर जबलपुर में है तो उन्होंने श्री लालजी को ध्यान में रखकर एक भव्य कार्यक्रम की रूपरेखा ही बना डाली। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की तरफ से कल देश के प्रसिद्ध पत्रकार एवं साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत का सम्मान भी किया गया। इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार सुशील त्रिवेदी, पूर्व शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा, पुलिस महानिदेशक एवं कवि विश्वरंजन, चिंतक रमेश दवे, हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष रमेश नैय्यर, नंदकिशोर तिवारी, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति डाक्टर सच्चिदानंद जोशी, उमेश उपाध्याय, पदमश्री सुरेंद्र दुबे, कवि अशोक सिंघई, अमरनाथ त्यागी, विनोदशंकर शुक्ल, पूर्व सांसद केयूर भूषण, रवि श्रीवास्तव, शोभाकांत झा, रामकुमार बेहार, निर्मला बेहार, मंगला जोशी, रीना अधिकारी, राजेंद्र भारतीय सहित&amp;nbsp; प्रदेश के अनेक ब्लागर मित्रों एवं सुधिजन मौजूद थे। आयोजन एक ऐतिहासिक स्थान जैतूसाव मठ में किया गया। इस जगह का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस स्थान पर कभी गांधीजी ने छोटी सी संगोष्टी में हिस्सेदारी दर्ज की थी। श्री समीरजी&amp;nbsp; एवं ललितजी को एक बार पुनः बधाई।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-8373802399631943837?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/8373802399631943837/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=8373802399631943837&amp;isPopup=true' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8373802399631943837'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8373802399631943837'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/01/blog-post_17.html' title='ब्लागजगत के दो धुरन्दर समीरलाल समीर और ललित शर्मा का सम्मान'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TTRfVy6R2DI/AAAAAAAAAr0/uqr4un96So4/s72-c/DSC00867.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6505256934651116482</id><published>2011-01-15T05:12:00.000-08:00</published><updated>2011-01-16T22:08:20.175-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='चैनलों के बारे में'/><title type='text'>छत्तीसगढ़ का चैनल पुराण</title><content type='html'>यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित न होकर प्रवृतियों को समझने का एक  प्रयास मात्र है, फिर भी यदि किसी को बुरा लगता है तो मैं उससे फूलगोभी, आलू  और मटर की सब्जी के साथ घी चुपड़ी हुई दो रोटी ज्यादा खाने का आग्रह कर  सकता हूं।&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;तो भाइयों.. जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था तब सबको यही लग रहा था  कि अब उनकी निकल पड़ेगी। दो-तीन अखबार वालों की दादागिरी से त्रस्त कुछ  पत्रकार नुमा व्यापारियों को भी यह लगने लगा था कि बस थूंथने में अड़ाने  वाला माइक और कैमरा लेकर आ जाओ सरकार हिल जाएगी। शुरू-शुरू में ऐसा हुआ भी।  भिलाई में लोहे की दलाली में जुटे एक व्यापारी ने एक प्रमुख चैनल में  खबरों को भेजने के लिए कैमरा आदि को खरीद लिया। व्यापारी को इस बात से  बिल्कुल भी मतलब नहीं था कि छत्तीसगढ़ किस ढंग से आकार ले रहा है। वह तो बस  चैनल के सहारे भिलाई इस्पात संयंत्र से लोहे की अफरा-तफरी में लगा हुआ था।  दिल्ली में चैनल के प्रमुखजनों को जब इस बात की भनक लगती तब तक देर हो चुकी थी। व्यापारी अपने मतलब के हिसाब से वारा-न्यारा कर चुका था। राज्य  निर्माण के शुरूआती दिनों में एक पत्रकार गोविंद साहू के पास एएनआई की  एजेंसी थी। श्री साहू का जोर साफ्ट किस्म की स्टोरियों पर ही रहता था  क्योंकि वे जिस एजेंसी के लिए काम करते थे वह एजेंसी श्री साहू से स्टोरी  लेकर ढेर सारे चैनलों को बेचने का काम करती थी। वैसे श्री साहू बेहद मेहनती  पत्रकार थे ( हो सकता है कि वे कहीं और काम कर रहे हो) लेकिन उनके साथ ही  यहां ईटीसी से अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले उनके अपने एक रिश्तेदार की  वह इमेज नहीं बन पाई जो बननी चाहिए थी। जब पूरे देश में एनडीटीवी की  धमाकेदार शुरूआत हो रही थी तब श्री साहू के रिश्तेदार को छत्तीसगढ़ का  ब्यूरो प्रमुख बनाया गया था लेकिन खबर है कि बाद में लेन-देन संबंधी विवाद  के चलते उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़ना पड़ा। बताया जाता है कि श्री साहू के  रिश्तेदार ने अर्धशासकीय दफ्तर में कार्यरत एक महिला के कथित बयानो की सीडी  हासिल कर ली थी। इस सीडी के आधार पर वे एक प्रमुख नेता के अत्यंत करीबी को  ब्लैकमेल कर रहे थे। जब यह शिकायत नेताजी के पास पहुंची तो उन्होंने सीधे  एनडीटीवी के दफ्तर में बात की। मामले में जांच-पड़ताल हुई और श्री साहू के  रिश्तेदार को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। नौकरी गंवाने के बाद श्री साहू के  रिश्तेदार ने भोपाल के एक साप्ताहिक का संवाददाता बन अफसरों के घर में  अखबारों को फिंकवाया भी लेकिन कहते हैं न जो जलवा एक बार अपनी ईहलीला  समाप्त कर लेता है वह फिर दोबारा पैदा नहीं होता। यहां भी ऐसा ही हुआ। चैनल  के पत्रकार को दुआ सलाम करने वाले अफसरों ने अखबार को पलटना भी जरूरी नहीं  समझा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;वैसे राज्य निर्माण से कुछ पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा बोलबाला ओपन आइस  का ही था। इस चैनल को यहां शिवसेना के छत्तीसगढ़ प्रमुख धनजंय परिहार  संचालित किया करते थे। चैनल अच्छा-खासा चल रहा था कि इसमें काम करने वाले  मीडियाकर्मियों ने एक धमाकेदार करतूत कर डाली। वैसे इसे करतूत कहना ही ठीक  होगा क्योंकि जब कोई खबर प्रसारित होने के बजाए वर्सन के नाम पर किसी और  तरह की सुविधा तलाशने लगती है तो फिर गड़बड़ी हो ही जाती है।&amp;nbsp; चैनल के  कर्ताधर्ताओं ने एक रेस्ट हाउस में प्रदेश के एक मंत्री और छत्तीसगढ़ी  फिल्म की बेहद प्रतिभा संपन्न हिरोइन को कुछ ऐसे-वैसे अन्दाज में पकड़ लिया  था। बताते हैं कि मंत्री के नए तेवर को सार्वजनिक करने की धमकी-चमकी चल ही  रही थी कि चैनल के दफ्तर में छापा पड़ गया और ओपन आइस अचानक आकाश चैनल  में तब्दील हो गया। वैसे प्रदेश में आकाश चैनल की शुरूआत बहुत तामझाम के  साथ हुई थी लेकिन चैनल की ज्यादातर खबरें सरकार के पक्ष में ही प्रसारित  होती थी। थोड़े ही समय में विपक्ष का यह आरोप भी सामने आ गया कि चैनल में  कांग्रेस के प्रमुख नेता अजीत जोगी का पैसा लगा हुआ है। विपक्ष के इस आरोप  के बाद भी चैनल चलता रहा। चैनल ने अपना काम तब समेटा जब अजीत जोगी का नाम  विधायकों की खरीद-फरोख्त में सामने आया और भाजपा की सरकार काबिज हुई।  हालांकि भाजपा की सरकार काबिज होने के बाद एक मंत्री के भाई ने भी ईरा  फिल्मस के संचालक संतोष जैन के साथ मिलकर सीसीएन अभीतक नाम से एक&amp;nbsp; चैनल खोला । यह चैनल यहां रायपुर के रामसागरपारा में संचालित चलता रहा। बाद में श्री जैन ने चैनल से नाता तोड़ लिया। उनके नाता तोड़ने के बाद एम चैनल की शुरूआत हुई। बताते हैं कि अब इस चैनल ने&amp;nbsp; एक बड़े अखबार समूह&amp;nbsp; के साथ&amp;nbsp; पार्टनरशीप कर ली है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;राज्य निर्माण के शुरूआती दिनों में यहां जैन और रोजाना के पत्रकार भी  किराए का कमरा लेकर रहते थे। जैन टीवी बंद होने के साथ ही चैनल के साथ जुड़ाव रखने वाले पत्रकारों का  आशिया भी उजड़ गया। दिल्ली के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने बीएलजी नाम की  एक कंपनी खोल रखी थी। इस कंपनी के चैनल रोजाना के लिए दिल्ली के एक युवा  पत्रकार समरेंद्र खबरें बनाया करते थे। व्यवस्था से हमेशा नाराज रहने वाले  समरेंद्र ज्यादा दिनों तक छत्तीसगढ़ में नहीं रह पाए। जोगी के शासनकाल में  ही स्टार न्यूज के दिनेश आकुला ने शानदार पारी खेली थी। बताते हैं कि एक  रोज किसी नेता के पुत्र ने उनसे कह दिया यदि वे सरकार के पक्ष में खबर  दिखाएंगे तो वे सरकार से उन्हें चंदूलाल चंद्राकर की स्मृति में गठित किया  गया दो लाख रुपए का पुरस्कार दिलवा सकते हैं। वर्ष 2003 के आसपास घटित इस  वाकए को लेकर तब राजनीति के गलियारों में खूब चटखारें लगा करते थे। कुछ समय  बाद उनका भी चैनल की नौकरी से मोहभंग हो गया। बीच में यह खबर आई थी कि वे  अपना खुद का चैनल खोलने के बारे में सोच रहे हैं। इधर एक स्थानीय अखबार में  उनकी खबरें हैदराबाद डेड लाइन से कभी-कभार देखने को मिल जाती है।&amp;nbsp; ईटीवी  के लिए प्रवीण सिंह ने काफी अच्छी पारी खेली। इन दिनों वे सहारा समय में  अपनी सेवाएं दे रहे हैं।जब उन्होंने ईटीवी को अलविदा कहा तो भोपाल के एक  बड़बोले पत्रकार प्रफुल्ल पारे ने ईटीवी की जवाबदारी संभाली। वे भी लंबे  समय तक ईटीवी में नहीं रहे। श्री पारे के बाद संजय शेखर ने यहां लंबी और  अच्छी पारी खेली लेकिन जैसे ही उन्हें यह आभाष हुआ कि अब टीवी की बागडोर  राजस्थान के सेवानिवृत अफसर जगदीश कातिल संभालने वाले हैं उन्होंने साधना  का दामन थाम लिया। खबरों की विश्वसनीयता के मामले में साधना ने दो स्थानीय  चैनल सहारा और ईटीवी को पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के दूसरी बार सत्ता में  काबिज होने के कुछ दिन पहले यहां छत्तीसगढ़ में पुलिस अफसर रहे रूस्तम सिहं  ने भी एक चैनल के जरिए दस्तक दी थी। इस चैनल की कमान हिंदी के प्रसिद्ध  कवि गजानन माधवमुक्तिबोध के पुत्र दिवाकरमुक्तिबोध ने संभाली थी लेकिन कुछ  ही दिनों में चैनल ने दम तोड़ दिया। यहां काम करने वाले कर्मचारी कई दिनों  तक तनख्वाह के लिए भटकते रहे। दिल्ली के मित्तल बंधुओं&amp;nbsp; ने वाइस चैनल की  शुरूआत की थी। त्रिवेणी ग्रुप का यह चैनल न तो देश में रंग जमा पाया और न  ही छत्तीसगढ़ में। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp;प्रदेश में अब भी क्राइम न्यूज, रायपुर एक्सप्रेस, चैनल-वन, आईबीएन सेवन,  टाइम नाव, एचएम-वन, प्रखर टीवी, इंडिया टीवी, साधना चैनल, आज तक, एएनआई,  न्यूज 24, ग्रांड चैनल, इनसाइट टीवी, एवी विजन सहित लगभ दो दर्जन चैनलों की  दस्तक बनी हुई है, लेकिन अब भी कभार यह सुनने को मिल जाता है कि अमुक चैनल  में उड़ीसा के सांसद और मुख्यमंत्री&amp;nbsp; का पैसा लगा हुआ है तो किसी चैनल के रिपोर्टर के बारे  में यह कहा जाता है कि वह सिमगा के पास आरटीओ के उड़नदस्ते की फिल्म बनाने  में लगा हुआ था। एक चैनल के रिपोर्टर के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह  मात्र होली के दिन ही भांग खाता है और कपड़े फाड़-फाड़कर नाचता है। भांग खाकर तमाशे मचाने वाला रिपोर्टर जिस चैनल से जुड़ा हुआ है उस चैनल को कई पत्रकार अंतिम प्रणाम कर चुके हैं। बिलासपुर जिले में रवि वर्मा के हैलो बिलासपुर ने किसी समय खासी लोकप्रियता हासिल की थी, श्री वर्मा इन दिनों राजधानी में कार्यरत है। कोरबा जिले में एक भाजपा नेता बनवारी लाल अग्रवाल भी कुछ दिनों तक एक चैनल से जुड़े रहे तो बिलासपुर जिले के एक शराब ठेकेदार ने भी चैनल खोलकर लंबे समय तक अपनी भंडास निकालने का काम किया था। छत्तीसगढ़ की उर्वरा भूमि में मीडिया का धंधा खूब पनप रहा है।चंद मिनटों में ही दो का चार करने वाले व्यवसायी बड़ी तेजी से इस क्षेत्र में अपने पांव पसार रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6505256934651116482?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6505256934651116482/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6505256934651116482&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6505256934651116482'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6505256934651116482'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2011/01/blog-post.html' title='छत्तीसगढ़ का चैनल पुराण'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-1131482210234088583</id><published>2010-12-28T04:32:00.000-08:00</published><updated>2010-12-28T06:18:24.140-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कड़कनाथ मुर्गा'/><title type='text'>मिट जाएगा कड़कनाथ का नामो निशान</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TRnXf0PhSOI/AAAAAAAAArw/DjAPnq0WDJA/s1600/murga.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TRnXf0PhSOI/AAAAAAAAArw/DjAPnq0WDJA/s320/murga.JPG" width="284" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;बलि के लिए लगातार उपयोग में लाए जाने तथा अय्याश अफसरों की मौज-मस्ती&amp;nbsp; करने की प्रवृत्ति के चलते कड़कनाथ की प्रजाति अब खत्म होने के कगार पर है। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘कड़कनाथ’&amp;nbsp; मुर्गे की एक प्रजाति है। मुर्गे का नाम कड़कनाथ क्यों पड़ा इस बारे में कोई एक निश्चित राय नहीं है, लेकिन मांसाहार के शौकीन लोगों का मानना है कि कड़कनाथ का सेवन व्यक्ति के भीतर जोशोखरोश पैदा कर देता है। चूंकि मुर्गे के सेवन से कामोत्तेजना में वृद्धि होती है फलस्वरूप इसका नाम कड़कनाथ रखा गया है। अब से कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में काफी&amp;nbsp; बड़ी संख्या में कड़कनाथ के दर्शन हो जाया करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। विशिष्ट किस्म के स्वाद और औषधीय गुणों के बावजूद इनकी संख्या लगातार घटती जा रही है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वैसे तो कड़कनाथ की प्रजाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के भिंड के अलीराजपुर व झाबुआ जिले में ही पाई जाती रही है लेकिन मुर्ग-मसल्लम के शौकीन कुछ वन अफसरों ने बस्तर के सुदूर इलाकों में इसकी वंशवृद्धि को लेकर योजना बनाई थी। उत्तर बस्तर के अधीन आने वाले कुछ गांवों में आदिवासियों को कड़कनाथ के पालन की जवाबदारी सौंपी गई थी। कुछ समय तक तो आदिवासी भी इन मुर्गों का ठीक ठाक पालन पोषण करते रहे लेकिन सरकारी कामकाज से गांवों में दौरा करने वाले अफसरों की अय्याशी के चलते कड़कनाथ के अस्तित्व को लेकर संकट पैदा हो गया है। वर्ष 2000 में जब राज्य का निर्माण हो रहा था तब वन विभाग द्वारा किए गए एक सर्वे में अकेले बस्तर इलाके में ही लगभग पांच हजार कड़कनाथ मुर्गों के होने का अनुमान लगाया गया था। अब इनकी संख्या बमुश्किल हजार के आसपास ही रह गई है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;प्रजाति के घटने का कारण &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जनजातीय समुदाय अपने भरण-पोषण के लिए पशुओं का पालन तो करता है लेकिन उनके पालन में वैज्ञानिक नजरिए का अभाव बना रहता है। किसी भी एक मुर्गे के वध के पीछे समय के अंतराल का आंकलन नहीं किए जाने से भी प्रजाति के पनपने की संभावना खत्म हो जाती है। सामान्य तौर पर जनजातीय समाज इस मुर्गे का पालन बलि के लिए करता है। दीपावली के बाद अन्य तीज-त्यौहार पर भी देवी-देवताओं को बलि चढ़ाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों से गांवों में छुटभैय्ये किस्म के नेताओं एवं अफसरों की आवाजाही भी बढ़ी है। नेता एवं अफसर अपने भोजन के लिए देसी महुए के साथ कड़कनाथ की ही मांग करते हैं। नेता और अफसरों की यह मांग जनजातीय समाज को तो भारी पड़ ही रही है कड़कनाथ को भी इस मांग का नुकसान उठाना पड़ रहा है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;कड़कनाथ की विशेषता&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले मांस वाला चिकन है। ऊंचा पूरा यह मुर्गा काले रंग, काले पंखों और काली टांगों वाला होता है।&amp;nbsp; माना जाता है कि कड़कनाथ के मीट में सफेद चिकन के मुकाबले कोलेस्ट्राल का स्तर कम और अमीनो एसिड का स्तर ज्यादा होता है। यह कामोत्तेजक होता है और व्यक्ति के भीतर कायम हो चुकी निराशा को ठीक करने का काम भी करता है। कड़कनाथ के रक्त से कई तरह की बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता है लेकिन मोटे तौर पर इसे पुरूष हारमोन को बढ़ावा देने वाला माना जाता है। इस मुर्गे का सेवन करने वाले लोगों का यह मानना है कि कड़कनाथ के भीतर लौह तत्व की मात्रा काफी अधिक होती है। लगभग बीस हफ्ते में एक मुर्गे का वजन 950 ग्राम हो जाता है। कड़कनाथ की कम होती संख्या को लेकर कोंडागांव बस्तर के वनमंडलाधिकारी राजेश ननहोरिया&amp;nbsp; ने बताया कि उनका विभाग यूएनडीपी प्रोजेक्ट के&amp;nbsp; कड़कनाथ के पालन-पोषण पर जोर दे रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों के द्वारा अत्यधिक सेवन की वजह से कड़कनाथ की प्रजाति कम हो रही है।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-1131482210234088583?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/1131482210234088583/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=1131482210234088583&amp;isPopup=true' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1131482210234088583'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1131482210234088583'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/12/blog-post_28.html' title='मिट जाएगा कड़कनाथ का नामो निशान'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TRnXf0PhSOI/AAAAAAAAArw/DjAPnq0WDJA/s72-c/murga.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-8485342686537596008</id><published>2010-12-27T03:56:00.000-08:00</published><updated>2010-12-27T04:00:22.037-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बाघ की मौत'/><title type='text'>क्या सिर्फ एक बाघ मरा है...</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TRh_STkMPNI/AAAAAAAAArs/euEVPwfkhDQ/s1600/TIGER.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="228" src="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TRh_STkMPNI/AAAAAAAAArs/euEVPwfkhDQ/s320/TIGER.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;छत्तीसगढ़ में कवर्धा से 80 किलोमीटर दूर पंडरिया के ग्राम अमनिया में जहां बाघ को मौत के घाट उतारा गया है वह इलाका अचानकमार व कान्हा नेशनल पार्क के गलियारे का जोड़ता है। पिछले दिनों जब वन्य प्राणी बोर्ड की बैठक हुई थी तब इस क्षेत्र में मौजूद एक खदान से खनन किए जाने के प्रस्ताव पर भी विचार-विमर्श किया गया था।&amp;nbsp; हालांकि बोर्ड के दो सदस्यों ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था।&amp;nbsp; सदस्यों के विरोध के बाद भी यहां खदान से खनन किए जाने की कार्रवाई को लेकर फाइल आगे बढ़ रही थी लेकिन बाघ की मौत ने माइनिंग लीज के प्रस्ताव पर फिलहाल&amp;nbsp; मिट्टी डाल दी है।&amp;nbsp; इधर इलाके में बाघों की मौजूदगी को नजरअंदाज करने वाले अफसरों की भी घिग्गी बंध गई है।&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गौरतलब है कि 19 दिसंबर 2010 को पंडरिया के अमनिया गांव के पास एक बाघ का शव पाया गया था। प्रारंभिक जांच-पड़ताल के बाद विभाग के अफसरों ने इस शव को लकड़बघ्घे का शव बताया था लेकिन जब रायपुर के वरिष्ठ अफसर मौके का मुआयना पहुंचे तब इस बात की पुष्टि हुई कि शव किसी बाघ का ही है। इस शव के मिलने के बाद विभाग के अफसरों की सिट्टी-पिट्टी गुम है। पिछले दिनों जब राजधानी में वन्य प्राणी बोर्ड की बैठक हुई थी तब वन अफसरों ने बोर्ड के सदस्यों के सामने रेंगाखार इलाके में मौजूद एक खदान के खनन का प्रस्ताव रखा था। कांग्रेस विधायक टीएस सिंहदेव एवं बसपा विधायक सौरभ सिंह जो बोर्ड के सदस्य हैं ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था। सदस्यों का कहना था कि रेंगाखार इलाके में बाघों की मौजूदगी देखी गई है और यह इलाका अचानकमार अभ्यारण्य व कान्हा नेशनल पार्क के गलियारे को जोड़ता है। फलस्वरूप यहां मौजूद खदान के खनन को मंजूरी देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। बोर्ड के सदस्यों के द्वारा किए गए विरोध के बाद भी खनन संबंधी मामले में एक फाइल मंत्रालय के गलियारों में दौड़ लगा रही थी। लेकिन बाघ की मौत के बाद फिलहाल मामला ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है। इधर इस मामले में माइनिंग लीज की तरफदारी करने वाले अफसरों की सिट्टी-पिट्टी भी गुम हो गई है। खबर है कि इस मामले में अफसर अपनी चमड़ी बचाने में लगे हुए है। हालांकि लापरवाहीपूर्वक काम करने के चलते कवर्धा के डीएफओ एके श्रीवास्तव ने नेउर कक्ष क्रमांक 475 के वन कर्मी धनुष सिंह ठाकुर और बीट गार्ड बीके गंजीर को निलंबित कर दिया है। लेकिन इस निलंबन के बाद भी कुछ सुगबुगाते हुए सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या बाघ की मौत के लिए केवल ग्रामीण और निचले स्तर पर कार्यरत वन अमला ही जिम्मेदार है?&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;मुआवजे की लचर प्रक्रिया &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वन विभाग के ही जिम्मेदार अफसरों का यह मानना है कि मुआवजे की लचर प्रक्रिया के चलते भी ग्रामीण जानवरों को मौत के घाट उतारते हैं। जिस किसी भी ग्रामीण का मवेशी मारा जाता है यदि उसे तत्काल ही मुआवजा दे दिया जाए तो वह हिंसक जानवर को ठिकाने लगाने के उपायों को अमल में नहीं लाता। अन्यथा ग्रामीण यह मानता है कि जब हिंसक जानवर उसके एक मवेशी को मार चुका है तो फिर वह उसके दूसरे जानवरों पर भी हमला करेगा ही। अन्य मवेशियों को बचाने के लिए ही शिकार हो चुके जानवर पर जहर घोलने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। कवर्धा के अमनिया ग्राम में घटित हुई घटना में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। जिस बाघ की मौत हुई है उसने 25 से 30 नवंबर के बीच दो बैलों और एक गाय को अपना शिकार बनाया था। ग्रामीणों ने अन्य जानवरों के बचाव के लिए बाघ को ठिकाने लगाने का काम किया। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;टाइगर अभ्यारण्यों में पद रिक्त &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिछले दिनों जब विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित किया गया था तब बसपा विधायक सौरभ सिंह ने वन मंत्री विक्रम उसेंडी से टाइगर अभ्यारण्यों में रिक्त पदों के संबंध में जानकारी चाही थी। श्री सिंह के लिखित प्रश्न के उत्तर में वनमंत्री ने बताया था कि इंद्रावती, उदंती-सीतानदी और अचानकमार अभ्यारण्यों के 420 पदों में से 219 पद पूरी तरह से खाली है। विभाग के अफसर भी दबी जुबान से यह मानते हैं कि मैदानी स्तर पर अमले की कमी के चलते जंगली-जानवरों की सुरक्षा ठीक ढंग से नहीं हो पा रही है। कवर्धा में जिस बाघ की मौत हुई है उसकी भनक भी वहां मौजूद बीट गार्ड को काफी देर से हुई थी। जब शव से दुर्गंध उठने लगी तब जाकर मामले का खुलासा हुआ। &lt;/div&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;एक ही जगह पर जमे अफसर&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब से कुछ अरसा पहले गोदाबर्मन के एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जो वन अफसर जिस काम के लिए पदस्थ किया जाएगा उसे वही काम करना होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की सीधे-सीधे अवहेलना हो रही है। नियमानुसार प्रतिनियुक्ति में नियुक्त किये गये किसी भी अफसर की पदस्थापना तीन सालों के भीतर अन्यंत्र हो जानी चाहिए लेकिन छत्तीसगढ़ में इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। विभाग में प्रदीप कुमार पंत, आरके सिंग, प्रकाशचंद्र पांडे सहित अनेक अफसर ऐसे हैं जो वन विभाग के बजाए अन्य जगहों पर कार्य कर रहे हैं। वन विभाग का ही धड़ा ऐसे अफसरों की प्रतिनियुक्ति को लेकर खासा नाराज है।&amp;nbsp;&amp;nbsp; धड़े के जिम्मेदार लोग यह मानते है कि कतिपय अफसर अपनी पदस्थापना अन्य मलाईदार विभागों में इसलिए भी चाहते है क्योंकि वन विभाग की रौनक घट गई है। दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थ अफसर यह मानते है कि वन सेवा का काम काफी दबावों के बीच होता है। ऐसे में यदि कोई प्रतिनियुक्ति पर चला जाता है तो वह सीधे-सीधे सत्ता के करीब पहुंचकर मुख्यधारा में शामिल हो जाता है। अफसर मानते हैं कि बड़े पैमाने पर की गई प्रतिनियुक्ति के चलते ही जंगल में आग लगने, जानवरों के मारे जाने और अवैध कटाई के प्रकरणों में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2008 से लेकर वर्ष 2010 तक अवैध शिकार के लगभग 45 प्रकरण सामने आ चुके हैं। दूरस्थ अंचलों में पदस्थ अफसरों का एक बड़ा वर्ग जंगलों की कटाई और अवैध शिकार के लिए बेगारी को भी एक कारण मानता है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ अफसरों ने बताया कि जिलों में पदस्थ वनमण्डाधिकारियों का अधिकांश समय महात्मा गांधी राष्टÑीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत संचालित किए जाने वाले कामों में ही बरबाद हो रहा है। अफसरों का अधिकांश समय आडिट रिपोर्ट बनाने में ही जाया हो रहा है। अफसरों का कहना है कि&amp;nbsp; जब तक वे बेगारी करते रहेंगे तब तक वनों और वन्य प्राणियों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहेगी।&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;.&lt;b&gt;भोजन की कमी&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;वन्य प्राणी बोर्ड से जुड़े एक सदस्य का मानना है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में ‘सिंग’ और खुरवाले जानवरों की कमी हो गई है। नील गाय अब सरगुजा के आसपास ही नजर आती है तो चीतल व सांभर के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। बारहसिंघा तो प्रदेश में है ही नहीं। जानवरों की कमी के कारण ही बाघ पालतू जानवरों को उठाकर जंगल ले आता है। सामान्य तौर पर बाघ जिस जानवर को अपना भोजन बनाता है उसे वह दो-तीन दिनों तक बड़े चाव से खाता है।&amp;nbsp; अब से कुछ अरसा पूर्व जब बाघ ग्रामीणों के मवेशियों को उठाकर ले जाया करता था तब शिकारी उसका शिकार किया करते थे लेकिन अब ग्रामीण ही उसे ठिकाने लगा देते हैं। वन्य प्राणी बोर्ड के एक सदस्य टीएस सिंहदेव बाघों को बचाने के लिए की जा रही कवायद के बीच छत्तीसगढ़ में एक बाघ की मौत को काफी दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि जब तक वाइल्ड लाइफ का सेटअप पूरी तरह से अलग नहीं होगा तब तक अवैध शिकार के मामलों में बढ़ोत्तरी होती रहेगी। कुछ ऐसे ही विचार सौरभ सिंह के भी है। श्री सिंह का कहना है कि जब तक रिक्त पदों पर भर्ती नहीं की जाएगी तब तक अवैध शिकार के प्रकरण उजागर होते रहेंगे। छत्तीसगढ़ में वैसे भी बाघों की संख्या काफी कम है। यदि विभाग के लोग मुस्तैद होते तो यह घटना टाली जा सकती थी।&lt;/div&gt;&lt;b&gt;मुस्तैद है वन अमला &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मैं यह नहीं मानता कि वन अमला मुस्तैद नहीं है। जहां तक अफसरों की प्रतिनियुक्ति का सवाल है तो मैं यह बताना चाहूंगा कि&amp;nbsp; वन सेवा से जुड़े अफसरों के लिए भी प्रतिनियुक्ति का नियम बना हुआ है। कुछ अफसर राज्य में सेवा देते हैं तो कुछेक की नियुक्ति दीगर राज्यों में होती है। हां यह सही है कि जंगलों&amp;nbsp; की कटाई से जानवर प्रभावित होते हैं। जब जानवरों को उनके अनुकूल वातावरण नहीं मिलता तो वे गांवों और कस्बों की ओर दौड़ लगाते हैं। &lt;/div&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;रामप्रकाश &lt;br /&gt;पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ &lt;/b&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;कुछ तथ्य ऐसे भी &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;0 भारतीय वन्य प्राणी संस्था देहरादून द्वारा वर्ष 2008 में किए गए सर्वे के मुताबिक देश में कुल 1411 बाघ शेष हैं जबकि छत्तीसगढ़ में बाघों की कुल संख्या 26 बताई गई है। &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;0 नक्सलवाद के चलते प्रदेश के इंद्रावती अभ्यारण में शेरों की गिनती का काम नहीं हो पाया है। &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;0 1972 के वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत बाघ को अनुसूची एक में शामिल किया गया है। पहली बार बाघ का शिकार या उसके अंगों की तस्करी करने पर तीन से सात वर्ष तक जेल और 50 हजार से लेकर दो लाख तक जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है। दूसरी बार शिकार करने में सजा का अधिकतम समय सात वर्ष और जुर्माना पांच से पचास लाख निर्धारित है। &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;0 बिलासपुर जिले के अचानकमार अभ्यारण्य में शेरों की गिनती के लिए कैमरा लगाए जाने की तैयारी की गई थी लेकिन यह काम फाइलों में ही कहीं खोकर रह गया है।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-8485342686537596008?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/8485342686537596008/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=8485342686537596008&amp;isPopup=true' title='7 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8485342686537596008'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8485342686537596008'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/12/blog-post_27.html' title='क्या सिर्फ एक बाघ मरा है...'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TRh_STkMPNI/AAAAAAAAArs/euEVPwfkhDQ/s72-c/TIGER.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>7</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-8216617839100528454</id><published>2010-12-19T02:29:00.000-08:00</published><updated>2010-12-19T04:35:00.338-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='कविता'/><title type='text'>जरूरी काम</title><content type='html'>&lt;b&gt;सचमुच फुरसत नहीं है मेरे पास &lt;br /&gt;यकीन मानिए खाली तो बिल्कुल भी नहीं हूं&lt;br /&gt;माउथ आर्गेन बजाने वाले एक लड़के से &lt;br /&gt;जल्द ही मुलाकात करनी है मुझे &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;है अपना दिल तो आवारा&lt;br /&gt;याद किया दिल ने कहां हो तुम&lt;br /&gt;और एक प्यार का नगमा है जैसे गीतों पर झूमने के बाद&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उस जगह भी जाना है मुझे &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जहां एक बूढ़ा हर शाम &lt;br /&gt;बजाता है सेक्सोफोन&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वायलिन बजाने वाली&amp;nbsp; अम्माजी को भी तो सुनना है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि &lt;br /&gt;मैं कोई आर्केस्टा या बैंडपार्टी खोलने की तैयारी में हूं&lt;br /&gt;नहीं-नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;ये कुछ जरूरी काम है जिन्हें कई सालों से &lt;br /&gt;लगातार टालता आया हूं मैं.&lt;br /&gt;लेकिन अब इन्हें &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;हर हाल में पूरा करना है मुझे&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इसी हफ्ते मुझे&lt;br /&gt;बच्चों के लिए गर्म कपड़ों की खरीददारी भी करनी है &lt;br /&gt;और मैदान में टायर जलाकर &lt;br /&gt;आग तापने वाले लोगों से पूछना है कि&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;सुलगते हुए देश को लेकर &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;उनकी अपनी निजी राय क्या है.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;अरे हां.. सदर बाजार के उस पुराने से मकान में &lt;br /&gt;जहां अक्सर मिल जाया करते हैं ऊर्दू अदब के जानकार&lt;br /&gt;वहां भी जाना है मुझे&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वही कही जीने पर बैठकर जान पाऊंगा &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मीर, गालिब और नए शायरों का ताप &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;श्रम और पसीने की स्याही से लिखी गई&lt;br /&gt;दो किताबें भी तो खरीदनी है मुझे&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;पिछले दो हफ्तों से गृह विभाग की हेड&lt;br /&gt;यानी मेरी श्रीमतीजी ने कह रखा है कि&lt;br /&gt;मैं दफ्तर से लौटते वक्त मैथी और&lt;br /&gt;गाजर लेता आऊं&lt;br /&gt;इस बार तो पक्के में लेकर जानी है दोनों चीजें&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;स्कूली बच्चों के सालाना जलसे में&lt;br /&gt;शिरकत करनी है मुझे&lt;br /&gt;और बीड़ी पी-पीकर &lt;br /&gt;पूरे मोहल्ले की मां-बहन करने वाले&lt;br /&gt;दीनदयाल&amp;nbsp; को अस्पताल में एडमिट भी करना है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;पेड़ में बचे हुए &lt;br /&gt;कुछ अमरूदों की रखवाली करने के साथ-साथ &lt;br /&gt;&amp;nbsp;बिल्लस की शादी में भी पहुंचना है मुझे&lt;br /&gt;बिल्लस को आप नहीं जानते&lt;br /&gt;मेरे घर के आंगन में&amp;nbsp; लंगड़ी बिल्लस खेलने वाली&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;छुटकी का नाम रखा था मैंने- बिल्लस &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;आप यह जरा भी न सोचे कि&lt;br /&gt;मेरा अंतिम वक्त आ चुका है&lt;br /&gt;अभी मौत को चूमते हुए गले लगाने का&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कोई इरादा नहीं मेरा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;मरने की फुरसत भी नहीं है मेरे पास&lt;br /&gt;दुनिया के सबसे कीमती और जरूरी काम&lt;br /&gt;मेरे हिस्से आए हैं&lt;br /&gt;दोस्तों.... मुझको मेरा काम करने दिया जाए&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-8216617839100528454?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/8216617839100528454/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=8216617839100528454&amp;isPopup=true' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8216617839100528454'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8216617839100528454'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/12/blog-post_19.html' title='जरूरी काम'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6328505058476095853</id><published>2010-12-16T07:04:00.000-08:00</published><updated>2010-12-16T07:04:10.972-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='लेखक समुदाय'/><title type='text'>... तो हो गया न मामू केमिकल लोचा</title><content type='html'>&lt;!--[if gte mso 9]&gt;&lt;xml&gt;  &lt;w:WordDocument&gt;   &lt;w:View&gt;Normal&lt;/w:View&gt;   &lt;w:Zoom&gt;0&lt;/w:Zoom&gt;   &lt;w:PunctuationKerning/&gt;   &lt;w:ValidateAgainstSchemas/&gt;   &lt;w:SaveIfXMLInvalid&gt;false&lt;/w:SaveIfXMLInvalid&gt;   &lt;w:IgnoreMixedContent&gt;false&lt;/w:IgnoreMixedContent&gt;   &lt;w:AlwaysShowPlaceholderText&gt;false&lt;/w:AlwaysShowPlaceholderText&gt;   &lt;w:Compatibility&gt;    &lt;w:BreakWrappedTables/&gt;    &lt;w:SnapToGridInCell/&gt;    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style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अब से कुछ अरसा पहले जब टीवी पर इमोशनल अत्याचार जैसे कार्यक्रम की शुरूआत नहीं हुई थी तब सभी तरह के मामाओं को लोग-बाग मामा ही कहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब मामा मामू हो चुका है। इस मामू का शाब्दिक अर्थ बुद्धु या छक्का ही होता है। दादा कोंडके की शैली में कहे तो पांडु। ( बहुत ज्यादा खुलकर लिखा नहीं जा सकता इसलिए पाठक अपने हिसाब से भाषा को सुरक्षा कवच पहना सकते हैं)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;अब थोड़ा केमिकल लोचा को परिभाषित करें। केमिकल का मतलब है रसायन और लोचा का सीधा अर्थ है लफड़ा। यानी रासायनिक लफड़ा। वैसे यह बताना थोड़ा मुश्किल है कि मामू और केमिकल लोचा शब्द की उत्पति किस वजह से और कहां &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;हुई है लेकिन मोटे तौर पर यह माना जा सकता है कि उक्त शब्दों का पहला सुंदर प्रयोग थ्री इडिट्यस बनाने वाले राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में देखने को मिला था। हिरानी अपनी हर फिल्म में विद्रूपताओं को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते रहे हैं इसलिए मुझे ही क्या बहुत से लोगों को उनका काम पसन्द आता है। वैसे तो सिनेमा की अपनी एक भाषा होती है लेकिन जब भाषा एक नए मुहावरे में प्रस्तुत होती है तो दिलों-दिमाग की नसों को हिलाकर रख देने का काम करती है। हिरानी की फिल्म की तरह जिन्दगी भी बहुत सारे रसायनिक लफड़े को लेकर चलते रहती है और इस केमिकल लोचे के बावजूद बहुत से लोग मामू बने रहते हैं। अपना यह लेख मैं एक बार फिर छत्तीसगढ़ के मामू बनाम बौद्धिक समाज को समर्पित करने जा रहा हूं।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;मैं पहले भी कह चुका है कि प्रदेश का बौद्धिक समाज बड़ा ही मामू है। बड़ी सी बड़ी घटनाएं हो जाती है लेकिन यह समाज चुप्पी ओढ़े रहता है। अब से कुछ दिन पहले जब प्रदेश में बच्चों का अपहरण हो रहा था तब भी यह समाज चुप था। अभी थोड़े दिनों पहले जब राजधानी रायपुर की एक छात्रा नेहा ने छेड़छाड़ से घबराकर आत्महत्या कर ली तब भी यह समाज किताबों के विमोचन समारोह में लगा हुआ नजर आया। नेहा ने जब खुद के ऊपर मिट्टी तेल डालकर अपनी ईहलीला समाप्त करने की कोशिश की तब उसने अपने बयान में यह खुलासा किया था कि उसके स्कूल के ही दो छात्र उसे आते-जाते परेशान किया करते थे। उसने इस बात की शिकायत स्कूल प्रबंधन और छात्रों के परिजनों से भी की थी लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। छेड़छाड़ करने वाले छात्रों को जब शिकायत का पता चला तो वे छात्रा को ही धमकाने लगे। यहां तक नेहा के छोटे भाई को जान से खत्म करने की धमकी भी दी गई। डरी हुई नेहा ने आखिरकार खुदकुशी कर ली और......&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;और क्या... आपने नेहा के लिए कुछ नहीं किया। आप यह सवाल मुझसे भी पूछ सकते हैं कि इस आर्टिकल के लेखक ने क्या किया। हम समाचार बनाने वाले साथियों को इस बात का संतोष है कि हमने हस्तक्षेप किया। हमने खबरें लिखी। हमारे साथी अपनी खबरों के जरिए पुलिस पर इस बात का दबाब बनाते रहे कि आरोपियों की गिरफ्तारी हो। स्कूल प्रबंधन को सजा मिले, लेकिन मैं कविता और कहानियों के बड़े-बड़े संग्रह निकालने वाले आत्ममुग्ध लेखकों से यह तो पूछ ही सकता हूं उन्होंने क्या किया। प्रदेश में तीन बड़े लेखक संगठनों के अलावा वीणापाणी, अमृतवाणी, पत्र नहीं मित्र सहित सैकड़ों साहित्यिक संस्थाएं हैं, लेकिन किसी भी संस्था की तरफ से एक विज्ञप्ति जारी नहीं हुई । हालांकि विज्ञप्ति किसी समस्या का हल नहीं है फिर भी मुझे लगता है कि एक विज्ञप्ति जब सैकड़ों विज्ञप्ति में बदल जाती है तो ऐसी तमाम विज्ञप्तियां एक आवाज तो बन ही जाती है। प्रदेश में एक अकेली नेहा नहीं है। उस जैसी और भी लड़कियां है जो हर रोज मनचलों की हरकतों का शिकार होती है। यह बात मैं किसी प्रवचन के तहत नहीं कह रहा हूं लेकिन यह सच है कि समाज में यकीन रखने वाले लोगों की अपनी-अपनी भूमिका है। पुलिस को अपना काम करने दिया जाए तो लेखक भी अपना काम ही करें। केवल अपनी पीठ पर शाबाशी की धौल पाने के लिए किया गया लेखन ही सार्थक लेखन नहीं होता। एक सही लेखक सही समय पर हस्तक्षेप करता है। छत्तीसगढ़ में लेखकों की बिरादरी किसी भी मामले में हस्तक्षेप करते हुई नहीं दिखती। यहां का लेखक कविता और कहानियों को लेकर आयोजित किए जाने वाले विमर्श में तो नजर आता है लेकिन मजदूरों के आंदोलन में दो कदम साथ चलने में उसे शर्म आती है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;छत्तीसगढ़ में मैं कई ऐसे लेखकों को जानता हूं जो अपनी कृति को स्कूटर की डिक्की पर डालकर घूमते रहते हैं। जैसे कोई विज्ञापनदाता मिल जाता है उसे तुरन्त सौजन्य प्रति भेंट कर दी जाती है। कुछ लेखक ऐसे भी है जो सुबह-सुबह फोन के जरिए यह सूचना देते हैं कि उनकी नई कविता किस पत्रिका में छपी है और किस संपादक ने उन्हें शताब्दी का सबसे बड़ा लेखक घोषित कर दिया है। अभी कुछ दिनों मै मजदूरों की नगरी भिलाई गया हुआ था। यह शहर मुझे इसलिए भी प्रिय है क्योंकि मेरा खतरनाक बचपन यही बीता है। भिलाई में रहकर ही मैंने खूब तमाशे किए। लेखकों को जमालघोंटा पिलाया। थियेटर किया और दुनिया की सबसे सस्ती सिगरेट पनामा और विविधभारती के साथ रातें गुजारी। &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;यहां मेरी मुलाकात लोकबाबू नाम के एक कथाकार से हुई। इस कथाकार ने मुझे चहक-चहककर बताया कि अब से कुछ अरसा पहले उसने जिस बकरी को पकड़कर कहानी लिखी थी उसका अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है और अब यह कहानी कोर्स की किताबो में शामिल कर ली गई है। यह सब बताते हुए कथाकार महोदय का चेहरा तेज से भर गया। श्रीमान लेखक ने मुझसे अपने &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;नए उपन्यास और कहानियों के बारे में तो &lt;span&gt;&amp;nbsp;&lt;/span&gt;कई तरह की बातें की लेकिन अपनी पूरी बातचीत के दौरान यह नहीं बताया कि भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्य करने वाले मजदूरों की दशा क्या है। ठेका श्रमिकों के साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है। अरे भाइयों मुझे अपनी मनहूस रचनाओं के बारे में मत बताओ.. आपकी रचना यदि अच्छी होगी तो वह चुपचाप नहीं बैठेंगी। कोई न कोई समझदार फिल्मकार उसे पर्दे पर उतार ही देगा। यदि फिल्म नहीं भी बनी तब भी रचना खामोश नहीं रहने वाली। जब रचना अच्छी होती है तो वह खराब समय में ही अपनी उपस्थिति दर्ज कर देती है। एक बेहतर रचना कभी खामोश नहीं रहती। बेहतर रचना की हलचल हमेशा कायम रहती है। छत्तीसगढ़ के दो कथाकार मनोज रूपड़ा (मनोज इन दिनों नागपुर में है ) और कैलाश बनवासी ने मुझे कभी यह सूचना नहीं दी कि उनकी कहानी किस पत्रिका की शोभा बढ़ा रही है। यहां तो भाई लोग यदि मनोरमा में छप जाते हैं तो दुनिया उठा लेते हैं। लेखकों की रीढ़ की हड्डी में लचीलापन और उन्हें याचक की मुद्रा में देखकर ही कहना पड़ रहा है- मामूओं सुधर जाओ.. वरना केमिकल लोचा हो जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;span&gt;&lt;/span&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वैसे यदि कभी आपको सिर्फ कविता से ही थाने को उड़ा देने वाला लेखक मिल जाए तो मुझे सूचना जरूर दीजिएगा। मैं ऐसे लेखक के दर्शन करके धन्य होना चाहूंगा। मिलते हैं जल्द ही। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6328505058476095853?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6328505058476095853/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6328505058476095853&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6328505058476095853'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6328505058476095853'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/12/blog-post_16.html' title='... तो हो गया न मामू केमिकल लोचा'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-9086575689125010941</id><published>2010-12-12T05:33:00.000-08:00</published><updated>2010-12-12T06:56:40.840-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जय हो'/><title type='text'>कांग्रेसियों की जय हो</title><content type='html'>&lt;b style="color: red;"&gt;ये सियासत का रास्ता है बचकर निकल&lt;br /&gt;ये न तेरा हुआ और न मेरा हुआ&lt;br /&gt;(निर्मल लखनवी) &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश में जितने बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं उसके बाद तो हर कोई कांग्रेसियों की जय बोल रहा है। बात यदि छत्तीसगढ़ प्रदेश की करें तो यहां भी कांग्रेसियों की कुछ अलग ढंग से ही जय-जयकार हो रही है। अभी कुछ दिनों पहले शहर की जनता से रिश्ता रखने वाले पप्पू फरिश्ता ने छत्तीसगढ़ के प्रभारी एवं केंद्र में मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंकने-फिंकवाने की हरकत की थी। पप्पू की इस हरकत पर कांग्रेसियों ने ही खूब हो हल्ला मचाया था। जैसे-तैसे यह मामला शांत हुआ ही था कि सोनिया गांधी के जन्मदिन पर तिरंगे के रंगों बना केक काटने का मामला सामने आ गया। इस घटना ने भाजपाइयों को पुतला दहन का अवसर दिया। देशभक्तों की नई खेप ने भी इस हादसे पर लानत-मलानत भेजी। वैसे तो गांधी चौक का कांग्रेस भवन कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है लेकिन महीने-दो महीने में लगातार हुई इन दो घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और उसे जुड़े लोग पागलपन के दौर से गुजर रहे है। राजनीति में रूचि रखने वाले जिस शख्स को भी यह बताओ कि भाइयों यहां छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों पहले कांग्रेस के एक साधारण कार्यकर्ता ने नारायण सामी पर कालिख फिंकवाने का काम किया था तो वह हंसने लगता है। अभी न चुनाव का समय है न टिकट के लिए मारा-मारी मची है फिर कालिख फिंकवाने की घटना क्यों हुई लोग यही सोच-सोचकर परेशान है। सच तो यह है कि तमाम तरह की उठापटक और छानबीन के बावजूद कांग्रेसी भी इस बात का पता नहीं लगा पाए हैं कि पप्पू फरिश्ता को श्री सामी पर कालिख फिंकवाने की जरूरत क्यों पड़ी। अपने आका अरविंद नेताम के साथ कभी भाजपा तो कभी बसपा तो कभी कांग्रेस के घर में हर बार पास होकर लौटने वाला पप्पू फिलहाल फरार है। कांग्रेसियों ने उसे गब्बर सिंह बनाकर छोड़ रखा है। जी हां पप्पू का पता बताने वाले को ईनाम देने की घोषणा की गई है। पप्पू कहां है। कब लौटेंगा। इस बारे में पुलिस भी पता लगा रही है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी पुलिस को कांग्रेसियों ने एक नया काम और थमा दिया है। पुलिस वीडियों टेप के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि जिस केक को कांग्रेसियों ने सोनिया गांधी के जन्मदिन के मौके पर काटा था क्या वास्तव में उसमें तिरंगा बना हुआ था। वैसे पुलिस ने इस मामले में एक शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर लिया है। इस केक कांड में एक नई बात भी सुनने को मिल रही है। बताते हैं कि जन्मदिन पर केक काटने की योजना जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल ने बनाई थी। श्री धाड़ीवाल ने केक काटने के लिए प्रभारी महामंत्री को आमंत्रित किया। प्रभारी महामंत्री और अध्यक्ष में जरा भी नहीं बनती लेकिन मामला सोनिया गांधी के जन्मदिन का था सो केक पर छुरी चल गई और छुरी से प्रभारी महामंत्री हलाल हो गए। मीठी छुरी से हुआ हलाल गाना तो अपन ने सत्तर के दशक में कई बार सुना था लेकिन धाड़ीवाल के छुरी से बाबूजी का पट्ठा चित्त हो गया। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;इधर बात-बात पर लोगों को मां-बहन की गाली देने वाले एक नेता के बारे में एक वरिष्ट कांग्रेसी ने बड़ी बेबाक राय व्यक्त की है। नेताजी कहना है कि गाली देने वाला&amp;nbsp; नेता वैसे तो&amp;nbsp; कमजोर लोगों को ही गाली देता है, लेकिन जब ताकतवर लोग सामने&amp;nbsp; आ जाते हैं तो वह खुद को गाली देने लगता है। हां... गाली जरूर देता है। तो बात-बात मां –बहन की गाली देने वाले एक कांग्रेसी ने नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे की सीधे सोनिया गांधी से शिकायत की है। शिकायत भी ऐसी-वैसी नहीं बल्कि शपथपत्र के जरिए। विधानसभा के हर सत्र में दहाड़ मारने वाले श्री चौबे ने इस शिकायत के बाद चुप्पी ओढ़ ली है। श्री चौबे की स्थिति सांप- छछूंदर वाली हो गई है। करे तो क्या करें। यहां आपस में ही मरने कटने वाले कांग्रेसियों का एक मजेदार किस्सा याद आ रहा है। लगभग दो साल पहले एक नेता ने एक पत्रवार्ता लेकर आरोप लगाया था कि जब वीसी शुक्ल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में थे तब उनकी एक सभा को फेल करने के लिए प्रदेश के एक कद्दावर नेता ने उड़ीसा से कई सपेरों को बुलवाया था। योजना यह थी कि सभा में लोगों के बीच सपेरे भी बैठे रहेंगे और जैसे ही शुक्ल भाषण देने के लिए मंच पर आएंगे सांप छोड़ दिए जाएंगे। अब सांप काटते या न काटते इस बारे में तो सपेरे ही ज्यादा&amp;nbsp; अच्छे से&amp;nbsp; बता पाते&amp;nbsp; लेकिन इतना जरूर साफ है कि सभा में भगदड़ मचती और कई लोग बेमौत मारे जाते। कांग्रेसियों की यह सब टेक्नीक देखकर ही मैं उनकी जय-जयकार कर रहा हूं। प्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान ने भी कांग्रेसियों&amp;nbsp; के लिए एक गाना संगीतबद्ध किया था- आजा- आजा जिंदे शामियाने के तले.. आजा जर्रीवाले आशियाने की तले... जय हो। यह गाना शायद इसलिए बनाया गया था कि कांग्रेसी ही इसका इस्तेमाल कर सकें। कांग्रेस ने इसका इस्तेमाल किया भी। तो भाइयों आप भी मेरे साथ जोर से बोलिए - जय हो। अरे भाइयों जोर से....................... जय हो। हां अब ठीक। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;आदमी, आदमी का दुश्मन है&lt;br /&gt;इस सियासत की मेहरबानी से&lt;br /&gt;(मंसूर उस्मानी) &lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-9086575689125010941?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/9086575689125010941/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=9086575689125010941&amp;isPopup=true' title='11 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/9086575689125010941'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/9086575689125010941'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/12/blog-post_12.html' title='कांग्रेसियों की जय हो'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>11</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-7668001227845777581</id><published>2010-12-05T04:09:00.000-08:00</published><updated>2010-12-06T03:05:31.963-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छतीसगढ़ फिल्में'/><title type='text'>मुन्नी और शीला के बहाने</title><content type='html'>&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;सब लोग जिधर हैं वो, उधर देख रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; ( दाग) &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;शीर्षक पढ़ते ही आ गई न चेहरे पर मुस्कान। दरअसल इसमें आपकी गलती नहीं है। मुन्नी और शीला दो ऐसे नाम है जो बेहद चलताऊ है। वैसे तो मोना और मोनिका जैसे नाम भी कम भड़काऊ नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मुन्नी और शीला जैसे दो नामों से उन लोगों का अच्छा-खासा वास्ता रहा&amp;nbsp; है जो साठ-सत्तर या अस्सी के दशक में पैदा हुए थे। इन सालों में जब लोगों के घर-घर में फैशन टीवी नहीं पहुंचा था तब पीले रंग के जिल्द वाली कोकशास्त्र के भीतर चित्रों में कैद मुन्नी और शीला ही लोगों की नींद हराम किया करती थी। हो सकता है कि बहुत से लोगों को इन नामों से चिढ़ भी रही हो लेकिन यह सच है कि एक समय बहुत सारे लोग लोग मुन्नी और शीला के नाम पर रची जाने वाली कहानियों को पढ़ने के लिए टूट पड़ते थे। मजे की बात यह है कि इन दो नामों पर कहानी लिखने वाली भी कोई लेखिका ही थी। अब कोई पुरूष लेखक ही यह कारनामा करता रहा होगा तो इसकी जानकारी मुझे नहीं है लेकिन एकाध बार कुछ समझदार मित्रों ने ही मुझे नशे की रौ में बताया था कि कामिनी देवी बम फोड़ते रहती है। वैसे जो हरामी किस्म के पत्रकार&amp;nbsp; और साहित्यकार है वे इस बात को बखूबी जानते हैं कि कामिनी देवी अपने समय में किस-किस तरह के गुल खिलाती रही है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;खैर.. मैं यहां मुन्नी और शीला का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दो नामों की इन दिनों बड़ी जबरदस्त चर्चा है। मुन्नी बदनाम होने के साथ-साथ झंडुबाम भी बेच रही है। जबकि शीला को अपनी जवानी पर घमंड आ गया है। वह हर चैनल में अपनी जवानी की विशेषताओं को बताते फिर रही है। अभी दो रोज पहले ही मुझे एक विवाह समारोह में शामिल होने का अवसर मिला था। प्रदेश की राजनीति में रूचि रखने वाले कुछ लोगों के साथ मैं बात कर ही रहा था कि अचानक एक सोलह-सत्रह साल की लड़की दौड़ती हुई आई और उसने गोलगप्पे खा रहे एक आदमी से फरमाया-&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पापा.. रिशु को देखो न, मैंने मुन्नी बदनाम हुई पर डांस तैयार किया है लेकिन अब बोल रही है कि पहले वो नाचेंगी। गोलगप्पे गटकने वाले बाप ने एक लंबी सी डकार लेने के बाद लड़की को ज्ञान दिया कि बेटा पहले रिशु को नाच लेने दो... वो तुमसे बड़ी है। जब रिशु नाच लेंगी तब कुछ देर बाद अपन अनाउसमेंट करवा देंगे अब&amp;nbsp; तहलका मचाने आ रही है सक्सेना साहब की छोटी बेटी अंशु। जाओ बेटे जाओ दोनों नाच लेना। एक पिता की भयंकर किस्म की प्रगतिशीलता को देखकर आसपास खड़े सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। नतीजा यह हुआ कि राजनीति की चर्चा को विराम लग गया और मुन्नी और शीला की चर्चा शुरू हो गई। बातों ही बातों में एक पत्रकार मित्र ने बताया कि हम लोग बिलावजह ही मुबंई की मुन्नी और शीला को देखकर परेशान हो रहे हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ की फिल्म इंडस्ट्री में भी सैकड़ों मुन्नी और शीलाएं तहलका मचा रही है।&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;सब जानते हैं कि एक सुपर-डुपर छत्तीसगढ़ फिल्म की हिरोइन पर किस तरह एक मंत्री मर मिटा था। जोगी शासनकाल में हुई इस घटना को लोग आज भी चटखारा लेकर याद करते हैं। राजनांदगांव की दिव्या साहू भी यहां एक हिरोइन ही बनने आई थी। कुछ फिल्मों और एलबम में काम करने के बाद उसे एक शादी-शुदा आदमी ने हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया था। मध्यप्रदेश के भोपाल से छत्तीसगढ़ में अपने बच्चे के साथ फिल्मों में काम करने आई अंनिदता की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। कुछ रईसजादों ने अंनिदता को&amp;nbsp; टाप की हिरोइन बनाने का झांसा दिया था। लेकिन एक रोज राजधानी से कुछ किलोमीटर की दूरी पर उसकी लाश मिली थी। अंनिदतता के साथ एक नेता का पुत्र भी घायल मिला था। राज्य निर्माण के बाद जब प्रदेश में पहली बार चुनाव हुए तब एक बड़े नेता ने अचानक पार्टी बदल ली थी। बाद में पता चला कि सत्ताधारी दल के एक नेता ने किसी मुन्नी के साथ उसकी सीडी बना ली है। सीडी के सार्वजनिक होने के भय से नेताजी ने कांग्रेस में प्रवेश कर लिया था। रंगमंच की एक बूढ़ी हिरोइन अपने से छोटे उम्र के एक हीरो के साथ घर बसा चुकी है तो एक भिलाई की एक हिरोइन का मामला थाने पर जाकर खत्म हुआ है। इधर पिछले कुछ समय से राजधानी की फिजांओं में फिल्मों में काम करने की इच्छुक एक लड़की की फोटोग्राफी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।&amp;nbsp; खबर है कि फिल्म बनाने के इच्छुक कुछ रईस निर्माताओं ने लड़की को एक सस्ते से होटल में बुलाकर उसे मल्लिका शेरावत बनने का गुर सीखा डाला सच तो यह है कि बाजार ने अच्छे-अच्छे घरों की लड़कियों को मुन्नी और शीला बनने पर मजबूर कर दिया है। यह अलग बात है कि मुबंई की मुन्नी को एक गाने पर कमर मटकाने का ढाई करोड़ मिलता है। यहां की मुन्नी भी कमर हिलाकर ढाई हजार तो कमा ही लेती है। आप माने या न माने लेकिन यह सच है कि छत्तीसगढ़ में कुछ लोग बैंकाक और पटाया का आनन्द प्राप्त करने के लिए ही फिल्में बना रहे हैं। गत एक दशक में यहां सौ से ज्यादा फिल्मों का निर्माण हो चुका है लेकिन छत्तीसगढ़ की आत्मा कही जाने वाली एक भी फिल्म का प्रदर्शन अब तक नहीं हो पाया है। निसार इटावी का यह शेर शायद किसी के काम आ जाए-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;वही हकदार हैं किनारों के&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;जो बदल दे बहाव धारों के&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-7668001227845777581?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/7668001227845777581/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=7668001227845777581&amp;isPopup=true' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7668001227845777581'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7668001227845777581'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/12/blog-post.html' title='मुन्नी और शीला के बहाने'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-8894973650626440360</id><published>2010-11-28T21:27:00.000-08:00</published><updated>2010-11-29T22:46:41.193-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='शांति'/><title type='text'>शांति के नाम पर..</title><content type='html'>&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;सियासत की अपनी अलग जुबां है&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;लिखा हो जो इकरार, इन्कार पढ़ना&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;प्रदेश के जिस किसी भी अफसर या कर्मचारी से पूछो तो वह यही कहेगा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है। प्रदेश में शांति है। जबकि हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ इन दिनों यथास्थिति के बुरे दौर से गुजर रहा है। यथास्थिति तब पैदा होती है जब चारों तरफ से यह समाचार मिलने लगता है कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। जब लोग अपने हाथों को सिकोड़कर जेब में ठूंस लेते हैं तभी अचानक बच्चों की हत्या होने लगती है। नक्सली उत्पात मचाने लगते हैं। जब लोग हस्तक्षेप करना बंद कर देते हैं और यह मान लेते हैं कि जो कुछ चल रहा है वह ठीक है तो समझिए गड़बड़ी वहीं से शुरू होने लगती है। जो लोग मुर्दाघरों में आयोजित की जाने वाली शोकसभा और उसमें दो मिनट के लिए कायम होने वाली शांति को महत्वपूर्ण मानते हैं उन्हें शायद यह मालूम नहीं होगा कि ऐसी शांति कभी भी सच्ची श्रद्धाजंलि नहीं होती। हर शोकसभा में अस्सी फीसदी लोगों के दिमाग में &amp;nbsp;मौन के समय को लेकर खींचतान चलते रहती है। यदि मौन थोड़ा लंबा हो जाता है तो लोगों को लगने लगता है, मरने वाला तो मर गया हमको जबरदस्ती परमेश्वर को याद करना पड़ रहा है। साला दो मिनट हो गया... कोई ओम.. शांति ओम क्यों नहीं बोल रहा है। शोकसभाओं में ही लोगों के मोबाइल से मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए जैसी मादक धुन सुनाई देती है। ऐसी सभाओं में ही लोगों को अपने घर के अधूरे काम याद आते हैं। श्मशान घाट में आदमी अपने अधूरे कामों को तो याद कर लेता है लेकिन उस आदमी के कामों को भूल जाता है जो उनकी आंखों के सामने ही धूं-धूं करके जल रहा होता है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;हममें से बहुत से लोग यह सोचते हैं कि क्यों किसी के फट्टे में हाथ डाले। फट्टे में साबूत हाथ तो दूर एक उंगली भी नहीं रख पाने के कारण ही कभी आदिवासियों को नक्सली मौत के घाट उतारते हैं तो कभी पुलिस। प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से बच्चे जुल्म के शिकार हो रहे हैं। कोई उन्हें घटिया प्रेम में असफल होने के कारण मौत के घाट उतार रहा है तो कोई केवल फिरौती के लिए उनका गला घोंट रहा है। बच्चों की बलि और उनके अपहरण के विरोध में हाल-फिलहाल रोज कमाकर कुंआ खोदने वाले समाज का विरोध ही देखने को मिल रहा है। इस मामले में प्रदेश के बौद्धिक समाज की चुप्पी खतरनाक है। देखा जाए तो यहां का बौद्धिक समाज बड़ा ही मामू है। इस समाज के अपने ही इतने ज्यादा टंटे है कि वह सेमिनारों के अलावा किसी और जगह अपनी प्रतिक्रिया देना पंसद ही नहीं करता है। प्रदेश के तीन बड़े लेखक संगठन अपनी आपसी लड़ाईयों में उलझे हुए हैं तो पढ़ने-लिखने के नाम पर गठित की गई छोटी-छोटी संस्थाओं को कविता पाठ से ही निजात नहीं मिल पा रही है। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;यहां अलग-अलग धड़े में बंटे विपक्ष से प्रबल विरोध की उम्मीद ही बेमानी है। विपक्ष का तगड़ा विरोध यहां तब ही शुरू होता है जब कोई उनकी नेता सोनिया गांधी को भला-बुरा कहता है। जिस मामले में सोनिया या राहुल का नाम नहीं घसीटा जाता है वहां विपक्षी लोग यह देखते हैं कि मामले को उठा कौन रहा है। यदि अजीत जोगी ने मामले को पकड़ा है तो एक धड़ा तुरन्त सरेंडर कर देगा। यदि किसी मामले में नेता प्रतिपक्ष के खेमे ने पहल की है तो समझिए उसे जोगी व अन्य खेमे का सहयोग नहीं मिलेगा। हाल-फिलहाल विपक्ष ने बच्चों के अपहरण और उनकी हत्याओं के विरोध में बंद का ऐलान कर दिया है। विपक्ष का यह विरोध प्रशासन पर कितना दबाब बना पाता है यह देखना बाकी है।&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;बच्चों के संवेदनशील मसले पर संवेदनशील होने का स्वांग रचने वाले विपक्ष की एक हरकत रह-रहकर याद आ रही है। अब से लगभग छह महीने पहले एक कांग्रेस नेता की जमीनों को बचाने के लिए बनाए गए एक संगठन के कथित दलालों ने राजधानी के एक आश्रम से बच्चा चोरी किए जाने की घटना को उजागर करने का काम किया था। जब इस मामले की तफ्तीश की गई तो पता चला कि नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चों से एक मीडियाकर्मी बुरी तरह चिढ़ा बैठा था। इस आश्रम के बच्चों ने गलती से महान नेत्री मेघा पाटकर का विरोध कर दिया था और बस यही विरोध स्वयंसेवी संस्थाओं की हिमायत करने वाले शुगर पेसेंट मीडियाकर्मी को अखर गया था। बच्चों की हिमायत करने वाले विपक्ष ने तब इस मामले में विधानसभा में जोरदार हंगामा मचाया था। हंगामे के दौरान यह देखने की जहमत भी नहीं उठाई गई थी कि आश्रम में जो बच्चे मौजूद है उनके भविष्य का क्या होगा। जिन दिनों यह घटना हुई थी उन दिनों नक्सली हिंसा में अपने माता-पिता को खोने वाले बच्चे परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे थे। यह सब हो-हंगामा इसलिए हुआ था क्योंकि जिन दलालों ने मामले को तूल देने की कोशिश की थी वे रायगढ़ और मरवाही इलाके के दो कद्दावर नेताओं के करीबी थे (अब भी है)&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;खैर यह मामला अब अदालत में चल रहा है और इसमें कोई महत्वपूर्ण फैसला जल्द ही आने की उम्मीद भी है। बहरहाल विपक्ष ने बच्चों के मामले में जो एक जुटता दिखाई है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। एक बात और यह कि किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है यथास्थिति। इस स्थिति में विध्वंसकारी तत्वों को गड़बड़ी करने का मौका मिलता है। ऐसे तत्व जब कुछ नहीं कर पाते हैं तो बंदर का मुखौटा पहनकर झुग्गी बस्तियों में तमाशा मचाने लगते हैं। कई बार यह लगता है कि पेन की नींब के बजाए नाखूनों को ही स्टील में बदलकर कोई नींब बना ली जाए लेकिन फिर यकायक नुसरत ग्वालियरी का यह शेर याद आ जाता है-&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue;"&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;रात के लम्हात खूनी&amp;nbsp; दास्तां लिखते रहे&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;सुबह के अखबार में हालात बेहतर हो गए.&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-8894973650626440360?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/8894973650626440360/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=8894973650626440360&amp;isPopup=true' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8894973650626440360'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8894973650626440360'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_28.html' title='शांति के नाम पर..'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-3265626110614640467</id><published>2010-11-24T04:32:00.000-08:00</published><updated>2010-11-24T04:32:15.057-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टोना'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='टोनही'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जादू'/><title type='text'>टोनही पर बनेगी फिल्म</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TO0FW-KOaDI/AAAAAAAAArI/ZAmYHZ4RIkY/s1600/tonhi.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TO0FW-KOaDI/AAAAAAAAArI/ZAmYHZ4RIkY/s1600/tonhi.JPG" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;विरासत में मिली नक्सलवाद की चुनौती से किनारा करने वाले छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों ने ‘टोनही’ जैसी कुप्रथा पर भी फिल्म बनाने जहमत नहीं उठाई है। खबर है कि&amp;nbsp; इस संवेदनशील विषय पर बालीवुड के प्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक रामसे ब्रदर्स फिल्म बनाने का इरादा रखते हैं। भूत, प्रेत और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले रामसे बंधु टोनही जैसे विषय के साथ कितना न्याय कर पाते हैं यह देखना दिलचस्प होगा।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt; छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से में अब भी टोनही जैसी कुप्रथा कायम है। गांवों के शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद भी लोगों में यह धारणा कायम है कि गांवों में कुछ महिलाएं जादू-टोना करती है।&amp;nbsp;&amp;nbsp; वैसे ग्रामीण महिलाओं को टोनही साबित करने के जितने भी मामले सामने आए हैं उनमें अक्सर षड़यंत्र और शरारत की बू ही देखने को मिली हैं। ग्रामीण अंचलों की वे महिलाएं जो बदनसीबी से बांझ, विधवा अथवा परित्यक्ता हो जाती हैं उन्हें इस कुप्रथा का शिकार बनाया जाता रहा है। अभी साल भर पहले ही छत्तीसगढ़ के राजिम के समीप&amp;nbsp; एक गांव में एक महिला को टोनही बताकर लोगों ने बुरी तरह प्रताड़ित किया था। लोगों को टोनही जैसी कुप्रथा का वास्तविक सच बताने के लिए यहां डाक्टर दिनेश मिश्रा की अगुवाई में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति भी काम कर रही है लेकिन बावजूद इसके गांवों की महिलाओं को टोनही के नाम पर प्रताडि़त करने का सिलसिला थमा नहीं है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;रामसे ने उठाया बीड़ा&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से लेकर अब तक यहां सौ से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं लेकिन किसी भी फिल्मकार ने इस संवेदनशील मसले पर अपनी सृजनात्मकता का परिचय नहीं दिया है। मुंबई में रहकर दरवाजा, पुरानी हवेली, वीराना और तहखाना जैसी फिल्म बनाने वाले निर्माता तुलसी एवं श्याम रामसे ने इस विषय पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया है। यह फिल्म टोनही जैसी कुप्रथा का सही रेखांकन कर पाएगी या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन रामसे ब्रदर्स द्वारा की गई पहल को सराहना मिल रही है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लगातार मिल रही सफलता के बाद मुंबई के अनेक दिग्गज निर्माता निर्देशक भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लेकर उत्ससाहित हैं। सन्नी देओल को लेकर गदर बनाने वाले अनिल शर्मा भी एक फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं। रायगढ़ खरसिया के मुरली अग्रवाल भी बालीवुड के एक निर्माता के साथ बड़े बजट की फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं। महाभारत में शकुनि की भूमिका निभाकर चर्चित होने वाले गूफी पेंटल की फिल्म महतारी लगभग-लगभग पूरी हो चुकी है। भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार रवि किशन यहां दीपक तिवारी के निर्देशन में निर्मित की जा रही एक फिल्म में अभिनेता प्रकाश अवस्थी के साथ नजर आने वाले हैं। राजश्री की कई फिल्मों में पिता की भूमिका निभाने वाले आलोकनाथ भी छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने के इच्छुक हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;टोनही प्रथा के खिलाफ विधेयक&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;टोनही जैसी कुप्रथा के खिलाफ रमन सरकार ने 19 जुलाई वर्ष 2005 को विधान सभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया था। यह विधेयक ध्वनिमत से इसलिए भी पारित हुआ क्योंकि जनप्रतिनिधियों की भी यह राय रही है कि इस कुप्रथा का सर्वाधिक शिकार गरीब महिलाएं ही होती रही हैं। इस विधेयक के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग एवं प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग को लंबी कवायद भी करनी पड़ी थी। विधेयक में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि जो कोई भी किसी भी माध्यम से महिलाओं को टोनही करार देकर प्रताड़ित करेगा उसे तीन वर्ष का कठोर कारावास भुगतना होगा। इसके अलावा उसे जुर्माना भी देना पड़ सकता है। विधेयक में टोनही के नाम झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान के मुताबिक काला जादू, बुरी नजर या अन्य किसी रीति से प्रचारित करने वाले को भी एक वर्ष का दंड और जुर्माना भरना होगा।&amp;nbsp; इस विधेयक के पारित हो जाने पर कुछ हद तक इस कुप्रथा पर अंकुश तो लगा लेकिन अब भी महिलाओं को प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि रामसे की फिल्म इस कुप्रथा पर कुछ चोट करेंगी। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-3265626110614640467?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/3265626110614640467/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=3265626110614640467&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3265626110614640467'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3265626110614640467'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_24.html' title='टोनही पर बनेगी फिल्म'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TO0FW-KOaDI/AAAAAAAAArI/ZAmYHZ4RIkY/s72-c/tonhi.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-334238448854244800</id><published>2010-11-22T22:52:00.000-08:00</published><updated>2010-11-22T22:52:18.842-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मैना'/><title type='text'>मैं मैना हूं साहब जी...</title><content type='html'>&amp;nbsp; &lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOti0N96urI/AAAAAAAAArE/Kah9PBPb4Bo/s1600/maina+copy.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOti0N96urI/AAAAAAAAArE/Kah9PBPb4Bo/s1600/maina+copy.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;अभी तो बस्तर की मैना अपने आसपास गुजरने वाले लोगों को&amp;nbsp; मैं मैना हूं साहब जी कहकर संबोधित करती है लेकिन शायद पहाड़ी मैना के किस्से अब कहानियों में ही सिमट कर रह जाने वाले हैं। मैना के संरक्षण के लिए वन विभाग ने थाईलैंड के जीव वैज्ञानिकों से मदद लेने का फैसला किया था लेकिन हाथियों के आतंक से निपटने में लगे हुए वन विभाग के अमले ने अब इस विषय पर सोचना ही बंद कर दिया है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बस्तर की पहाड़ी मैना को छत्तीसगढ़ की सरकार ने राजकीय पक्षी का दर्जा दे रखा है। इस पक्षी के संरक्षण के लिए वन विभाग की तरफ से कई कार्ययोजना बनाई जाती रही है लेकिन किसी भी एक योजना पर ठीक ठाक तरीके से अमल नहीं किया गया। कभी मैना की गिनती के लिए बहेलियों की मदद ली गई है तो कभी उसके प्रजनन को बढ़ावा देने के लिए पिंजरे में ही प्राकृतिक वातावरण देने की कोशिशें भी हुई है। तमाम&amp;nbsp; तरह की कोशिशों के बावजूद मैना के संरक्षित प्रजनन की दिशा में विभाग को सफलता नहीं मिल पाई है। बस्तर में मैना के संरक्षण के लिए वन विद्यालय में एक बड़ा पिंजरा तैयार किया गया है लेकिन पिछले पंद्रह सालों मे यहां मैना ने एक भी अंडा नहीं दिया। मैना के संरक्षण और प्रजनन के लिए वन-विभाग द्वारा बहुतेरे उपाय किए जाने के बाद भी उनकी संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। छत्तीसगढ़ के दक्षिणी इलाके में कभी बड़ी संख्या में पाई जाने वाली पहाड़ी मैना अब गिनती की रह गई हैं। बस्तर के एक बड़े हिस्से में माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच युद्ध भी चलता रहता है। पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करने वाले विशेषज्ञों का यह मानना है कि जब-जब प्राकृतिक वातावरण अशांत होता है सबसे ज्यादा नुकसान शर्मीले पक्षियों को ही उठाना पड़ता है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;संरक्षण का काम ठंडे बस्ते में &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;गत दस वर्षों में छत्तीसगढ़ की सरकार ने बस्तर की पहाड़ी मैना को संरक्षित करने के लिए काफी पैसा खर्च किया है मगर&amp;nbsp; अब तक मैना की वंश वृद्धि को लेकर सफलता नहीं मिल पाई है। जगदलपुर के वन विद्यालय में भी जो दो मैना रखी गई है उसमें से कौन सी मैना मादा है कौन सा नर इसका पता भी नहीं चल पाया है। वन विभाग ने मैना के संरक्षण के लिए थाईलैंड के राम्खन विश्वविद्यालय के जीव विशेषज्ञों से मदद मांगी थी। इस विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक मणि अर्चना ने मैना पर शोध को लेकर अपनी रूचि भी दिखाई थी लेकिन इधर विभाग के आला अफसरों को यह लगा कि मैना के संरक्षण से ज्यादा जरूरी काम हाथियों के आतंक से निपटना है। फिलहाल मैना को संरक्षित करने का काम ठंडे बस्ते में चला गया है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बस्तर जगदलपुर के वन संरक्षक अरूण पांडे का कहना है कि थाईलैंड और बस्तर के पहाड़ों में विचरण करने वाली मैना का स्वभाव एक जैसा है। यदि थाईलैंड की मैना शर्मीली है तो बस्तर की मैना भी बहुत ऊंचे पेड़ों पर रहना पसंद करती है। मैना की घटती आबादी का एक कारण यह भी है कि वह अपने जिस साथी का चयन करती है उसके बाद फिर किसी दूसरे साथी को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाती। उन्होंने बताया कि मैना के संरक्षण के लिए विभाग लगातार प्रयासरत हैं। बैंकाक स्थित विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिकों से पत्राचार चल रहा है। संभवत: अगले महीने विशेषज्ञों का दल छत्तीसगढ़ आ जाएगा। यह शोध दल मैना के संरक्षण के लिए क्या कर पाएगा यह देखना दिलचस्प होगा लेकिन हाल-फिलहाल पूरे बस्तर में चार सौ छह सौ पहाड़ी मैना ही जीवित रह गई है। कभी बस्तर की पहाडि़यों में मैना की सुरीली बोली गूंजा करती थी लेकिन अब वहां गोलियों की आवाज सुनाई देती है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-334238448854244800?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/334238448854244800/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=334238448854244800&amp;isPopup=true' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/334238448854244800'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/334238448854244800'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_22.html' title='मैं मैना हूं साहब जी...'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOti0N96urI/AAAAAAAAArE/Kah9PBPb4Bo/s72-c/maina+copy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-7148221351263645029</id><published>2010-11-21T01:31:00.000-08:00</published><updated>2010-11-21T06:10:13.249-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ कांग्रेस'/><title type='text'>कबीलों के सरदार</title><content type='html'>&lt;b style="color: blue;"&gt;&amp;nbsp;सियासत की तवायफ का दुपट्टा&lt;br /&gt;&amp;nbsp;किसी के आंसुओं से तर नहीं होता&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;क्या आपने जितेंद्र , आशा पारेख के अभिनय और राहुलदेव बर्मन के संगीत से सजी फिल्म कारवां देखी है। अरे भाई वही कारवां जिसमें पिया तू अब तो आजा, दिलबर ओ दिलबर और कितना प्यारा वादा है इन मतवाली आंखों का जैसा सुपरहिट गीत मौजूद है।&amp;nbsp; इस फिल्म में मदनपुरी को एक कबीले का सरदार बताया गया है। इस सरदार की बेटी अरूणा ईरानी जो मौका मिलते ही&amp;nbsp; आयटम&amp;nbsp; सांग प्रस्तुत करने लगती है वह ट्रक ड्रायवर जितेंद्र पर फिदा हो जाती है । इधर-उधर के झगड़े के बाद जब त्याग और बलिदान का महत्व समझाने की बारी आती है तो अरूणा ईरानी गोली खाकर टें बोल जाती है। एक साधारण सी कहानी पर बनी यह फिल्म वैसे तो&amp;nbsp; कोई संदेश नहीं देती लेकिन यह जरूर बताती है कि लड़ने-झगड़ने के लिए किसी भी तरह के ठोस कारण की जरूरत कभी नहीं पड़ती है। फिल्म के अनेक दृश्य में कबीले के लोग चाकू-छुरी निकालते हुए दिखाए गए हैं। मैं&amp;nbsp; यहां&amp;nbsp; खास तौर पर&amp;nbsp; इस फिल्म का जिक्र इसलिए भी कर रहा हूं क्योंकि छत्तीसगढ़ में विपक्ष की स्थिति भी कमोबेश इस फिल्म में मौजूद कबीलों की तरह ही है। अलग-अलग कबीलों के सरदार अपने-अपने टेंटों में ही चाकू-छुरी तेज करते रहते हैं। जैसे ही कोई एक सरदार अपने टेंट से बाहर निकलता है दूसरे टेंट में लालटेन के नीचे झींगा मछली भकोसने वाला दूसरा सरदार झींगालाला.. झींगालाला... हुर्र... हुर्र करते हुए सरदार को घेर लेता हैं और फिर अपनी सुविधा देखकर भाला घोंप देता&amp;nbsp; है। आपस में सिर फुटौव्वल की वजह से कांग्रेसी अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि प्रदेश की सत्ता के खिलाफ उनका विरोध किस तरह का होना चाहिए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद, किसानों के साथ धोखे और छलावे की सैकड़ों बड़ी समस्याएं कायम है लेकिन विपक्ष की हालात को देखकर अब कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं जुटाता कि-भाइयों कम से कम आयोडेक्स मलने के बाद तो काम पर लग जाओ। अलग-अलग कुनबे के सरदारों का पूरा ध्यान इसी बात को लेकर लगा रहता है कि उनकी अपनी पार्टी के लोगों में से कौन दिल्ली जाकर तीन-पांच कर रहा है। कौन सोनिया गांधी से मिल रहा है। कौन&amp;nbsp; राहुल बाबा के कान में फुसफुसा रहा है।&amp;nbsp; सरदारों की दिलचस्पी इस बात में नहीं है कि सरकार क्या कर रही है। वैसे बीच-बीच में कोई-कोई सरदार खैर-खबर लेने का प्रयास करता हुआ भी दिखता है लेकिन जैसे ही कोई सरकार को ललकारने का अभिनय प्रारंभ करता है दूसरा परदा गिराने की तैयारियों में जुट जाता है।&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पिछले कुछ महीनों में कुछ घटनाएं बड़ी ही मजेदार हुई है। छत्तीसगढ़ के प्रभारी नारायण सामी एक कार्यक्रम के सिलसिले में छत्तीसगढ़ आए थे तब शहर की जनता से रिश्ता रखने वाले पप्पू फरिश्ता के कुछ समर्थकों ने उन पर कालिख फेंक दी थी। इस घटना के बाद खूब हंगामा मचा। इधर-उधर की उठापटक के बाद सारे कांग्रेसी पप्पू फरिश्ता के पीछे लग गए। एक कांग्रेसी ने तो पप्पू का पता बताने वाले को पांच हजार रुपए का ईनाम देने की घोषणा भी कर डाली ।पप्पू को गब्बर सिंह साबित करने के लिए उस कांग्रेसी ने भी खासी मेहनत की जिसकी कुर्सी फिलहाल खतरे में हैं। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;वैसे तो यह घोषित तौर पर साफ है कि श्री फरिश्ता आदिवासी नेता अरविंद नेताम के करीबी है लेकिन सियासत की बाजीगरी में माहिर लोगों ने पहले तो इस प्रकरण में कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा को लपेटना चाहा लेकिन जब बात घूम-फिरकर एक व्यक्ति पर ठींकरा फोड़ने की आई तो जूदेव और विधायकों की खरीद-फरोख्त कांड को याद करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को भी घसीट लिया गया। श्री जोगी के बारे में यह बात प्रचारित हुई कि उन्होंने श्री फरिश्ता के कांग्रेस प्रवेश को लेकर अपनी खास रूचि दिखाई थी। यहां यह बताना लाजिमी है कि शहर की जनता से रिश्ता कायम रखने का दावा करने वाले श्री फरिश्ता को पार्टी कई बार बाहर का रास्ता दिखा चुकी है, लेकिन हर बार वे अपने आकाओं की बदौलत कांग्रेस प्रवेश पाने में सफल होते रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि श्री फरिश्ता जिला अध्यक्ष बनने के इच्छुक थे और इसके लिए उन्होंने कुछ बड़े नेताओं को भारी-भरकम सूटकेस पहुंचाकर मामला अपने पक्ष में भी कर लिया था.. बस नारायण सामी सेट नहीं हो पा रहे थे फलस्वरुप कैमल का इंक फेंकने की मजबूरी सामने आ गई।&amp;nbsp; अब यह बात कितनी सच है और कितनी झूठ लेकिन अंदरखाने से जो खबर छनकर आई है उसके मुताबिक इधर श्री सामी ने भी पप्पू को माफ कर दिया है। इस माफी के बाद पप्पू पुलिस के हत्थे चढे़गा या नहीं यह समय के गर्भ में है लेकिन कांग्रेस अपने आपको कालिख कांड से बाहर नहीं निकाल पा रही है। कालिख कांड की आड़ में जनता के मुद्दों से किनारा कर लिया गया है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुछ दिनों पहले ही जब राज्य निर्माण का दस वर्ष पूरा हुआ था तब रमन सरकार ने नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे को भी न्यौता दिया था। उत्सव के उदघाटन समारोह में श्री चौबे के मुंह से अचानक यह निकल गया- सरकार द्वारा किए जाने वाले विकास में विपक्ष भी सहभागी है। बस... कुनबे के सरदारों को मौका मिल गया। हमला प्रारंभ हो गया। इस कांड का सच भी यही है कि एक पूर्व मंत्री की निगाहें नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर लगी हुई है। इस पूर्व मंत्री ने अपनी तगड़ी लाबिग के जरिए प्रदेश अध्यक्ष को खिसका देने का पूरा इन्तजाम कर भी लिया था कि कालिख फेंकने की घटना हो गई। कालिख कांड में जोगी को लपेट देने से फिलहाल धनेद्र साहू की कुर्सी पर नजर आता खतरा टल गया है। खबर है कि दिल्ली में बैठे एक बुर्जुग नेता ने श्री साहू को दूसरी पारी के लिए अपना आशीष दे दिया है। श्री साहू की गद्दी में फेवीकोल का पक्का जोड़ लगता देख&amp;nbsp; इधर नहीं तो उधर सही वाले अन्दाज में नेता प्रतिपक्ष को हटाने की मुहिम तेज हो गई है। इस मुहिम में दुर्ग जिले के दो विधायक भी शामिल है लेकिन जानकारों का कहना है कि इन विधायकों के खिलाफ भी कांग्रेस आलाकमान के पास एक&amp;nbsp; मजबूत धड़े ने लंबी-चौड़ी शिकायत भेज दी है। एक विधायक के बारे में यह कहा गया है कि वह अवैध बसों का संचालन करने के साथ-साथ छोटी सी छोटी बात में मां-बहन की गाली देता है। गंदी गालियों से कांग्रेस की छवि को बट्टा लग रहा है तो दूसरे विधायक के बारे में यह जानकारी दी गई है कि उसने सरकार से हाथ मिलाकर अपने स्कूल के लिए लगभग 15 करोड़ रुपए की जमीन कौड़ी के दामों में हासिल कर ली है। &lt;br /&gt;कृष्ण बिहारी नूर ने भी क्या खूब कहा है-&lt;/div&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;इन हवस वालों की नीयत का भरोसा क्या है&lt;br /&gt;कब बदल जाए, सियासत का भरोसा क्या है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;www.sonirajkumar.blogspot.com&amp;nbsp;&amp;nbsp; 98271-93988&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-7148221351263645029?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/7148221351263645029/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=7148221351263645029&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7148221351263645029'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7148221351263645029'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_21.html' title='कबीलों के सरदार'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-133387441522871263</id><published>2010-11-20T23:02:00.000-08:00</published><updated>2010-11-20T23:02:42.062-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नक्सलवाद'/><title type='text'>नक्सलवाद... अरे बाप रे</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOjDfpNOxeI/AAAAAAAAArA/QsNXwA8-ZVc/s1600/india-maoist-reading+copy.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="217" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOjDfpNOxeI/AAAAAAAAArA/QsNXwA8-ZVc/s320/india-maoist-reading+copy.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&amp;nbsp;पूरे देश को झकझोर कर रख देने वाली नक्सलवाद की समस्या पर&amp;nbsp; तेलगु, बांग्ला और मुंबईया फिल्मकार लगातार रिसर्च कर रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों ने इस विषय को अछूत मानते हुए फिल्म बनाने की जहमत नहीं उठाई है। राज्य निर्माण के दौरान सतीश जैन की फिल्म मोर छइंहा भुइंहा ने रिकार्ड तोड़ सफलता हासिल की थी। इस फिल्म की सफलता के परचम फहराने के बाद अब तक सौ से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित भी हो चुकी है लेकिन किसी भी फिल्म में नक्सलवाद जैसी समस्या को लेकर कुछ नहीं कहा गया है। हिन्दी और भोजपुरी की सफलतम फिल्मों को जस का तस परोसने वाले निर्माता-निर्देशकों ने विरासत में मिली इस चुनौती को समझने की चेष्टा ही नहीं की है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब यहां मंडला और बालाघाट के आसपास लाल सलाम नामक फिल्म की शूटिंग की गई थी। इस फिल्म को महाराष्ट्र के इगतपुरी में रहने वाले फिल्मकार संजीव करबेलकर ने बनाया था। फिल्म में प्रसिद्ध चित्रकार जतिन दास की पुत्री नंदिता दास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस फिल्म के प्रदर्शन के काफी दिनों बाद अनंत महादेवन की फिल्म ‘रेड अलर्ट’ प्रदर्शित हुई। फिल्म में तेलंगाना के संघर्ष को चित्रित किया गया था लेकिन इसमें भी छत्तीसगढ़ गायब था। अभी हाल ही में सरफरोश बनाने वाले फिल्मकार जॉन मैथ्यू ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र का दौरा कर लाल आतंक पर फिल्म बनाने को लेकर रूचि दिखाई है। खबर है कि श्री मैथ्यू ने अपनी फिल्म के लिए अभिनेता आमिर खान को अनुबंधित किया है। फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या को लेकर फिल्म बनाने के इच्छुक हैं। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOjDZqIpbYI/AAAAAAAAAq8/T1Jw30d5gZA/s1600/cpi-maoist.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOjDZqIpbYI/AAAAAAAAAq8/T1Jw30d5gZA/s320/cpi-maoist.jpg" width="233" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOjDZqIpbYI/AAAAAAAAAq8/T1Jw30d5gZA/s1600/cpi-maoist.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;लोकप्रिय सिनेमा का निर्माण करने वाले फिल्मकारों को हमेशा से यह लगता रहा है कि यदि उन्होंने नक्सलवाद जैसे विषय को छूआ तो कोई न कोई खतरा उत्पन्न हो सकता है। यदि फिल्म में नक्सलियों का पक्ष उभर गया तो सरकार नाराज हो सकती है और यदि दमदार तरीके से सरकार की बात सामने आ गई तो नक्सली मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। सच तो यह है कि नक्सली समस्या की जांच-पड़ताल के लिए एक निरपेक्ष दृष्टि की जरूरत होगी। यह दृष्टि तभी हासिल हो सकती है जब फिल्मकार सामाजिक सरोकारों को महत्व देंगे। छत्तीसगढ़ में फिल्म का निर्माण करने वाले किसी भी एक निर्माता-निर्देशक ने अब तक ऐसी फिल्म नहीं बनाई हैं जिसे छत्तीसगढ़ की आत्मा का दर्जा दिया जा सके। फिल्मकारों का सारा जोर ऐसी कहानियों को बढ़ावा देने में ही लगा हुआ है जिसके चलते तगड़ा मुनाफा हासिल हो। ऐसा भी नहीं है कि कुछ फिल्मकार इस विषय पर फिल्म नहीं बनाना चाहते लेकिन ऐसे फिल्मकारों को भी नौकरशाही, सत्ता, दमन और शोषण की पड़ताल करने में खतरा नजर आता है।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;नक्सली समस्या पर बनी फिल्में &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नक्सली समस्या पर बांग्ला और तेलगु के फिल्मकारों ने काफी फिल्में बनाई है। बंगाल के फिल्मकार अशोक विश्वनाथन की फिल्म शून्यों थेके शुरू (शून्य से आरंभ) और सतरूपा सान्याल की फिल्म अनु में माकपा की छद्मवाम राजनीति को उजागर करने का प्रयास किया गया था। दोनों ही फिल्मों में नक्सली विचारधारा को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए गए थे। मृणाल सेन की फिल्म कलकत्ता 71 में भी नक्सलबाड़ी आंदोलन को&amp;nbsp; समझने की चेष्टा की गई थी। तेलंगाना के किसान संघर्ष पर गौतम घोष हंग्री आटम&amp;nbsp; नामक एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्मित की थी। फिल्म में किसानों के बहादुराना संघर्ष को तो दर्शाया ही गया था लेकिन यह भी बताया गया था कि नक्सलबाड़ी विचारधारा को आत्मावलोकन की जरूरत क्यों हैं। 1980 के दशक में बनी उत्पलेंदु चक्रवर्ती की फिल्म चोख बेहद गंभीर तरीके से नक्सलवादी आंदोलन की पड़ताल करती है। बुद्धदेव दासगुप्ता की फिल्म गृहजुद्ध में भी नक्सली समस्या का उभार देखने को मिला था। तेलगु फिल्म युद्धानोवका गदर और मां भूमि में भी नक्सलवाद की जड़ें तलाशने की कोशिश की गई थी। सुधीर मिश्रा की हजारों ख्वाहिशें ऐसी और मणिरत्नम की फिल्म युवा भी नक्सलबाड़ी आंदोलन को संबोधित करती है। महाश्वेता देवी के उपन्यास पर फिल्मकार गोविंद निहलानी ने हजार चौरासी की मां नामक फिल्म बनाई है। यह फिल्म कई समारोहों में पुरस्कृत हो चुकी है। मोर छंइया-भुईयां जैसी हिट फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक सतीश जैन नक्सली समस्या को एक संवेदनशील मुद्दा मानते हैं। उनका कहना है कि नक्सलियों के गुस्से को समझने के लिए गहन अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि बंबई के फिल्मकार पैसा कमाने के लिए संवेदनशील मुद्दों पर फिल्म तो बना डालते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं है कि हर संवेदनशील मुद्दा टिकट खिड़की पर पैसों की बरसात करने वाला साबित होगा। नक्सली समस्या पर बनी फिल्म रेड अलर्ट दम तोड़ चुकी है। भांवर जैसी फिल्म बनाने वाले फिल्मकार क्षमानिधि मिश्रा का कहना है कि&amp;nbsp; नक्सलवाद की समस्या छत्तीसगढ़ की बड़ी समस्या है लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर बस्तर और सरगुजा में ही देखने को मिलता है। दुर्भाग्य से यहां छत्तीसगढ़ी बोली का प्रभाव कम है। यदि किसी ने फिल्म बनाई तो वह फ्लाप हो जाएगी। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-133387441522871263?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/133387441522871263/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=133387441522871263&amp;isPopup=true' title='1 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/133387441522871263'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/133387441522871263'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_20.html' title='नक्सलवाद... अरे बाप रे'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOjDfpNOxeI/AAAAAAAAArA/QsNXwA8-ZVc/s72-c/india-maoist-reading+copy.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>1</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-1512879164125433751</id><published>2010-11-18T01:21:00.000-08:00</published><updated>2010-11-18T01:52:22.744-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जसम का सम्मेलन'/><title type='text'>जसम के सम्मेलन में दरबारी लेखकों को लताड़</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOT3KgdX0RI/AAAAAAAAAqk/mRdKpaBa1R4/s1600/Image%2528626%2529.tif.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="226" src="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOT3KgdX0RI/AAAAAAAAAqk/mRdKpaBa1R4/s320/Image%2528626%2529.tif.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;श्रम और सौंदर्य की नगरी भिलाई में संपन्न हुए जन संस्कृति मंच के 12वें राष्ट्रीय&amp;nbsp; सम्मेलन में सत्ता की जय-जयकार करने वाले लेखक संगठनों और उससे जुड़े लेखकों की जमकर क्लास ली गई। सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से शिरकत करने आए लेखकों ने लूट और दमन की संस्कृति के खिलाफ प्रतिरोध जारी रखने का फैसला किया।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पिछले दिनों यहां संपन्न हुए जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन में साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लगभग दो सौ लेखकों, कलाकारों और संस्कृति कर्मियों ने अपनी हिस्सेदारी दर्ज की। सम्मेलन में देश की प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के पुत्र नवारुण भट्टाचार्य, आलोचक मैनेजर पांडे, वीरेन डंगवाल, मदन कश्यप, शिरीष मौर्य, पंकज चतुर्वेदी, अशोक भौमिक, रामजी राय, प्रोफेसर सियाराम शर्मा, कथाकार कैलाश बनवासी सहित अन्य लेखकों एवं कलाकारों ने यह माना कि भारतीय शासक वर्ग अमेरिका से हाथ मिलाकर सार्वजनिक संसाधनों की लूट में लगा हुआ है। सम्मेलन में बर्बर सैन्य हमलों, पुलिसिया दमन और मीडिया के जरिए उपभोक्तावादी आत्म केन्द्रित प्रचार पर चर्चा के साथ ही लेखक संगठनों और उससे जुड़े लेखकों की भूमिका को लेकर भी गहन विचार विमर्श किया गया। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;लेखकों ने यह माना कि ‘प्रगतिशील’ होकर ‘जनवाद’ का कंबल ओढ़ने वाले संगठनों ने बड़े सामाजिक मुद्दों पर चुप्पी साध ली। ऐसे संगठन गैर लेखकों के जेबी संगठन बन गए हैं और वे तब ही सक्रिय होते हैं जब किसी लेखक की मृत्यु होती है। लेखक की मौत के बाद संगठनों द्वारा शोकसभा का आयोजन किया जाता है और कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है। मुद्दों को लेकर लेखकों ने मिलना-जुलना ही बंद कर दिया है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि संगठनों को जेब में रखकर घूमने वाले लोगों का सारा जोर ‘उत्सव’ पर जाकर सिमट गया है। सांगठनिक व अन्य चर्चा के दौरान लेखकों ने यह माना कि जो लोग प्रगतिशीलता का ढोंग करते हैं उन्हें अपने संगठनों को एक सिंडिकेट की तरह आपरेट करने से बचना होगा। विरोधियों को ठिकाने लगाने की प्रवृत्ति किसी भी लेखक संगठन को साहित्यिक सरोकारों से विमुख कर देती है। सम्मेलन में जनवाद के चूल्हे पर स्वार्थ की हांडी चढ़ाकर खिचड़ी पकाने वाले लेखकों की भूमिका को लेकर भी बातचीत की गई। लेखकों ने यह माना कि वैचारिकता के अभाव में कुछ लेखक पद और पुरस्कार पाने की होड़ में लग गए हैं। बहस-मुबाहिसे के दौरान प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान को भी आड़े हाथों लिया गया। लेखकों ने छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन द्वारा किए गए आयोजन को सरकारी उत्सव करार देते हुए यह माना कि इस आयोजन के जरिए लेखकों को याचक बनाने का प्रयास किया गया था। सम्मेलन में प्रसिद्ध कवि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, फैज अहमद फैज और अज्ञेय की कविताओं पर राधिका-अर्जुन, हरिसेन, सुनीता वर्मा द्वारा बनाई गई पोस्टरों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-1512879164125433751?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/1512879164125433751/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=1512879164125433751&amp;isPopup=true' title='10 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1512879164125433751'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1512879164125433751'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_3845.html' title='जसम के सम्मेलन में दरबारी लेखकों को लताड़'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOT3KgdX0RI/AAAAAAAAAqk/mRdKpaBa1R4/s72-c/Image%2528626%2529.tif.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>10</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-4020845886149308830</id><published>2010-11-18T01:11:00.000-08:00</published><updated>2010-11-18T02:07:27.374-08:00</updated><title type='text'>बालीबुड के दिग्गजों ने खींचा हाथ</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TOT31kvKp3I/AAAAAAAAAqs/7Sn5Lp52EGo/s1600/aadesh+shrivastav.tif.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;/a&gt;छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से जुड़े कुछ बिल्डरों ने हाल के दिनों में बड़े ही सोचे-समझे ढंग से&amp;nbsp; यह प्रचारित किया है कि&amp;nbsp; फिल्म स्टार शाहरुख खान की कंपनी केसरा-सरा एक शापिंग काम्प्लेक्स का निर्माण करने जा रही है। कंपनी का शापिंग काम्प्लेक्स निर्मित हो पाएगा या नहीं यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन हकीकत यह है कि स्टूडियों व अन्य निर्माण के लिए जमीन की खरीद-फरोख्त में लगे रहने वाले बालीबुड के कुछ दिग्गजों ने फिलहाल&amp;nbsp; अपना कदम पीछे हटा लिया है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से में इन दिनों&amp;nbsp; शापिंग काम्प्लेक्स और मॉल तैयार हो रहे है। कार्पोरेट सेक्टर से जुड़े लोगों का यह दावा है कि छत्तीसगढ़ में विदेशी कंपनियों के साथ ही बालीबुड की दिग्गज हस्तियां भी पूंजी निवेश करने में रूचि दिखा रही है। कार्पोरेट सेक्टर से जुड़े लोगों का यह दावा कुछ हद तक सही भी हो सकता है। बालीबुड की दिग्गज हस्तियों ने छत्तीसगढ़ में स्टूडियों व अन्य निर्माण के लिए जमीनों की खरीदी में रूचि तो दिखाई थी लेकिन विवादों के चलते अमूमन सभी दिग्गजों ने अपना हाथ खींच लिया है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के चलन के बाद भाजपा नेता एवं प्रसिद्ध फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा यहां पुराने धमतरी मार्ग पर स्थित एक बेशकीमती जमीन पर स्टूडियों बनाना चाहते थे। स्टूडियों के निर्माण के लिए प्रोजेक्ट तैयार हो ही रहा था कि इस बीच जमीन के कारोबार से जुड़े कतिपय लोगों की आपत्ति सामने आ गई। विवाद के बाद श्री सिन्हा ने स्टूडियों के निर्माण का फैसला बदल दिया। चर्चित सिने अभिनेत्री श्रीदेवी और उनके पति बोनी कपूर ने भी आरंग मार्ग पर स्टूडियों के निर्माण के लिए एक जमीन खरीदने का फैसला कर लिया था। इससे पहले की बात आगे बढ़ पाती जमीन से जुड़े एक अन्य कारोबारी का अड़ंगा सामने आ गया। विवाद के बाद कपूर दंपत्ति को भी पीछे हटना पड़ा। प्रसिद्ध संगीतकार और विजयेता पंडित के पति आदेश श्रीवास्तव के रिश्तेदार यहां रायपुर के समता कालोनी में निवास करते हैं। रिश्तेदारों के सुझाव के बाद श्री श्रीवास्तव ने भी धमतरी मार्ग पर दस एकड़ जमीन खरीदने का मन बना लिया था लेकिन खबर है कि जो जमीन उन्होंने देखी थी उसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विवाद के बाद श्री श्रीवास्तव ने भी स्टूडियों निर्माण का विचार त्याग दिया है। सिने कलाकार अन्नु कपूर ने भी कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के साथ साझेदारी में बिलासपुर चांपा मार्ग पर जमीन खरीदने का फैसला किया था। जमीन खरीदने की पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए श्री कपूर की करीबी सीमा कपूर लगातार छत्तीसगढ़ आती-जाती रही लेकिन इधर खबर है कि स्टूडियों के प्रोजेक्ट में उनकी रूचि भी कम हो गई है। कुछ समय पहले फिल्म अभिनेता मुकेश खन्ना ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात कर यहां सिलतरा के पास जमीन देने की मांग की थी। उनका प्रोजेक्ट भी अभी मूर्तरूप नहीं ले पाया है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;भू-माफियाओं का रोड़ा&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह सच है कि राजधानी और उसके आसपास इलाके की तस्वीर बड़ी तेजी से बदल रही है। राष्ष्ट्रीय राजमार्ग पर टे्जर&amp;nbsp; आईलैण्ड का निर्माण किया जा रहा है तो किसी क्षेत्र में सर्वसुविधायुक्त बिजनेस सेंटर भी निर्मित हो रहा है। राज्य निर्माण के बाद से ही यहां जमीन का कारोबार करने वाले लोगों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। इस प्रतिस्पर्धा के चलते उनमें आपस में ही मनमुटाव भी होता है। छत्तीसगढ़ में निवेश करने वाले लोग यदि किसी एक कारोबारी के जरिए आगे बढ़ते है तो दूसरा कारोबारी प्रोजेक्ट में अड़ंगा लगाना शुरू कर देता है। बालीबुड के वे दिग्गज जो छत्तीसगढ़ में स्टूडियों का निर्माण करना चाहते थे उनका प्रोजेक्ट अड़ंगों के चलते ही ठंडे बस्ते में चला गया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-4020845886149308830?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/4020845886149308830/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=4020845886149308830&amp;isPopup=true' title='2 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/4020845886149308830'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/4020845886149308830'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_18.html' title='बालीबुड के दिग्गजों ने खींचा हाथ'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>2</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6071810510277789685</id><published>2010-11-17T05:01:00.000-08:00</published><updated>2010-11-17T05:01:02.945-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='बिग बास का घर'/><title type='text'>क्या बिग बास का घर एक सामाजिक मंच है</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;&amp;nbsp;मेरे एक लेख पर बगैर प्रोफाइल वाले किसी अंबिगुट्टी नामक शख्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। श्री गुट्टी क्या करते हैं और क्या नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे लगता है कि&amp;nbsp; श्री गुट्टी को थोड़ी घुट्टी पिला ही देनी चाहिए। पहले पाठक उनकी टिप्पणी पढ़ लें। &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;लेख पढ़ा और दुबारा पढ़ा फिर सोचा कहा तक तर्कसांगत है आपका ये लेख, &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;फिर सोचा की कुछ जरुरी बातें यहाँ लिखता जाऊं जो की शायद आप जैसे दर्शन ज्ञानी की नजरो से चुक गयी है और नजाने आपकी कोण सी नाराजगी बिग बॉस मैं बैठे कुछ लोग जो वहाँ अपने स्वयम से लड़ रहे है से है जिसने आपको इतना भिभ्त्श लिखने पर मजबूर कर दिया. ये तो ज़ाहिर सी बात है की हमारे समाज में अगर बिन ब्याही वधूवों का कोई स्थान है तो ये सिर्फ हमारे समाज की वजह से है, एक शिष्ट समाज की पराकास्ठा एक कोठे से शुरू होती है ये कहने में मुझे कोई अतिशय्योक्ति नहीं लगती visheshkar ye baat mujhe nagwaar guzri , aapko koi haq nahi banta kisi kay prati ashist hone ki. khair aise hi kuch aayam vyakti se vyakti vishesh banate hai. बिग बॉस ऐसा ही एक सामाजिक मंच है जहाँ आपकी लड़ाई दो तरफ़ा हैं एक तो खुद से दूसरा उनसे जिनकी स्थिति बिलकुल आप जैसी है. अगर आप गलत देखना चाहते है तो बिग बॉस आपको वोही दिखाता है , सही देखना चाहे काफी सही बातें भी दिखेंगी आपको. एक चोर भी दिन के उजाले में चोरी नहीं करता और बिग बॉस में जितने भी भागिदार है उन्हें ये पता है की पूरी दुनिया उन्हें देख रही है , आप बताये कितनी हिमत आप में या हम में से किसी और में है एक चुनौती देने की पूरे समाज को की देखो मैं तो तैयार हूँ तुम्हारी प्रतिक्रिया के लिए. आप कहेंगे की उन्हें फर्क नहीं पड़ता , तो भाई फर्क क्यूँ पड़े ? वो जहाँ भी है आपकी या किसी और की वजह से नहीं खुद की वजह से है और उनकी राह में रोड़े पड़े या फूल राह तो उन्ही की है , बाकि बची सीख लेने की बात तो ये आप कितने ज्यादा परिपक्व है और haan अगर आपकी परिपक्वता की parakashta ऐसे लेखो पर समाप्त होती है तो रेमोते कण्ट्रोल है आपके हाथों में. कोई नहीं रोकेगा आपको अपनी ही हार से मुहं छुपाने में.&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;हां तो गुट्टी साहब सबसे पहले आपने जिस ढंग से चेहरा छिपाकर अपनी प्रतिक्रिया दी उस कथित बहादुरी के लिए मैं आपको बधाई देता हूं। गुट्टी साहब मैं तो चोर को चोर और डाकू को डाकू कहने में ही यकीन रखता हूं। आपको शायद पता नहीं है कि भारतीय बाजार में मनोरंजन के नाम पर एक नया तमाशा चल पड़ा है। कुछ नवधनाढ्य बाजार में कपड़ा उतारने का खेल कर रहे हैं। उन्हें नंगा होता देख दूसरे लोग भी कपड़े उतारने लगते हैं। जब सारे लोग कपड़े उतार लेते हैं तो कोई एक मनोरंजन करने वालों को तो कपड़े मुहैय्या करा देता है लेकिन वह बाकी लोगों का कपड़ा लेकर भाग खड़ा होता है। अब यदि आपको नंगा दिखने से बचना है तो उस शापिग काम्पलेक्स में जाना ही होगा जहां चड्डी और बनियान की कीमत ही पांच हजार रुपए हैं। बिग बास के घर में जितने भी पहलवानों ने प्रवेश किया है उनका नंगा बदन मध्यवर्ग को जिम जाने के लिए प्रेरित करता है। इस देश का मध्यवर्ग जब-जब अपने बदन को कसरती बनाने के लिए जिम की तरफ दौड़ा है तब-तब वह सिर के नीचे एक छत्त और दो जून की रोटी से महरुम होता चला गया है। बिग बास के घर मौजूद सारा खाना अपनी शादी में सिर्फ इसलिए रो पड़ी थी क्योंकि बिग बास ने जो लंहगा उसे पहनने के लिए भेजा था उसमें कुछ तकनीकी दिक्कतें आ गई थी। बातों ही बातों में सारा खान ने बताया कि उसका लंहगा तीन लाख रुपयों का है। तीन लाख रुपयों का लंहगा.... बाप रे... इतने पैसों में कोई एक बेरोजगार अपना खुद का रोजगार ही खोल सकता है। गुट्टी साहब आपको पता है या नहीं केंद्र की प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत भी बेरोजगारों को जो लोन दिया जाता है वह एक या डेढ़ लाख का ही होता है। गरीबों के सपनों का मजाक उड़ाने यह शो किसी भी छोर से आम आदमी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। बिग बास के घर में कभी भी कोई भूख, गरीबी, बेकारी, बीमारी, देश के राजनैतिक हालात को लेकर चर्चा नहीं करता। बिग बास के घर में तमाम लोगों की बातचीत सेक्स, नफरत और हिंसा के आसपास ही घूमती है। गुट्टी साहब को शायद आपके पास गरीबों का खून चूसकर कमाया गया बहुत सा कालाधन हो... इसलिए आपको बिग बास का घर एक सामाजिक मंच लगता है। मुझे तो यह घऱ कोठा ही लगता है जिसमें बाजार की जरूरतों के मद्देनजर कुछ वेश्याओं को उछलकूद मचाने के लिए भेज दिया गया है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6071810510277789685?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6071810510277789685/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6071810510277789685&amp;isPopup=true' title='8 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6071810510277789685'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6071810510277789685'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_17.html' title='क्या बिग बास का घर एक सामाजिक मंच है'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>8</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6342984867017732424</id><published>2010-11-14T01:54:00.000-08:00</published><updated>2010-11-14T04:15:15.408-08:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='रंडियां'/><title type='text'>बाजार की रंडियां</title><content type='html'>&lt;div class="MsoNormal"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TN-xmDDYeAI/AAAAAAAAAqc/QqeKiAdhOxI/s1600/BIG-BOSS.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="180" src="http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TN-xmDDYeAI/AAAAAAAAAqc/QqeKiAdhOxI/s320/BIG-BOSS.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;आधुनिक सुविधाओं से सज्जित बिग बास के घर को यदि आप घर मानते हैं मुझे आपसे कुछ नहीं कहना है। मैं इस घर को एक कोठा मानता हूं। ऐसा कोठा जिसमें बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखकर कुछ पुरुष और महिला वेश्याओं को&amp;nbsp; उछलकूद मचाने के लिए कैद कर दिया गया है। इस कोठे में शामिल सभी वेश्याओं को यह&amp;nbsp; पता है कि उनकी किस हरकत पर पिज्जा खाने वाली पीढ़ी की लार टपकेंगी और किस हरकत पर उन्हें नापंसद किया जाएगा। &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&amp;nbsp;बहुत से लोगों को रंडी, वेश्या जैसे ठेठ देशज शब्दों से परहेज हो सकता है। कई लोग यह आपत्ति भी उठा सकते हैं कि हमें किसी को भी रंडी या वेश्या कहकर अपमानित करने का हक नहीं है। निजी तौर पर मेरा भी यह मानना है कि रंडी या वेश्या जैसे शब्दों का प्रयोग आत्मा को छलनी-छलनी करने का काम ही करता है। इसके अलावा इस शब्द का खतरनाक प्रयोग वही लोग करते हैं जो स्त्री विरोधी होते हैं। मैं कभी भी स्त्री विरोधी नहीं रहा लेकिन क्या किया जाए पिछले कुछ दिनों से जो कुछ मैं बिग बास के घर पर देख रहा हूं उसके बाद मैं यह कहने को मजबूर हुआ हूं कि इस बार बिग बास का घर एक कोठे में तब्दील हो गया है। इस कथित घर में हर कोई मां-बहन की गाली देने के लिए आजाद है। जब जिसकी मर्जी होती है वह पिछवाड़े में डंडा डालकर मुंह तक निकाल देने की धमकी देता है। हर दूसरे मिनट में अस्मित पटेल और वीना मलिक एक दूसरे को चूमने-चाटते नजर आते हैं। कोई रजाई ओढ़कर सुहागरात मनाता नजर आता है तो किसी को स्वीमिंग पुल के पास तेल मालिश करवाने&amp;nbsp; में मजा आ रहा है। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;यदि आप बिग बास के द्वारा चयनित पात्रों पर ही गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस कार्यक्रम में बेहद चालाकी से सेक्स परोसने की योजना को अन्जाम दिया गया है। वैसे तो कार्यक्रम में धीरे-धीरे बहुत से लोगों को देर-सबेर बाहर निकलना ही है लेकिन सबसे पहले वे ही लोग बाहर हुए हैं जो सेक्स परोसने में ज्यादा कामयाब नहीं हुए। कसाब मामले से जुड़े वकील के चेहरे पर न तो सेक्स अपील थी और&amp;nbsp; न ही वे पेशे के मद्देनजर वे सेक्सी बातें कर सकते थे फलस्वरुप उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ताले तोड़ने की कला में माहिर बंटी चोर को चर्म चोरी पर यकीन हीं नहीं था, सो उसे भी रुखसत होना पड़ा। एक बेगम थी जो कुछ दिनों तक सिर्फ इसलिए चल पाई क्योंकि बिग बास को यह मालूम था कि देश में समलैंगिकों का भी एक वर्ग है जो उन्हें पंसद करेगा। जब समलैंगिकों ने बेगम के पक्ष में एसएमएस करना बंद कर दिया तब उन्हें भी यह कह दिया गया कि आपको घर से बाहर जाने के लिए सिर्फ पांच मिनट का समय दिया जाता है। तिरपट होने के बावजूद अपने खुजली वाले बाप (महेश भट्ट)&amp;nbsp; की बदौलत&amp;nbsp; अभिनेता बनने का ख्वाब देखने वाले&amp;nbsp; राहुल भट्ट को भी &amp;nbsp;मर्द जैसी आवाज की मालकिन आंचलकुमार से प्रेम की पींगे बढ़ाने का खामियाजा भुगतना पड़ा। राहुल के घर से बाहर होने के बाद आंचलकुमार सही ढंग से अपने जिस्म की नुमांइश नहीं कर पा रही थी सो उन्हें भी सलमान खान ने मिलने के लिए बाहर बुलवा लिया है। अब घर में जो कोई भी शेष हैं वे खुलकर मैदान में आ गए हैं। कई डकैती को अन्जाम देने वाली सीमा परिहार अपना लोक सुधारने में लगी है इसलिए वह अपनी दुखभरी कहानी सुनाने के साथ-साथ बीच में बेहोश हो जाती है। खली जैसा विशालकाय मानव बरमूड़ा पहने घर में घूमता रहता है। छरहरी लड़कियों को उसके बदन पर लटककर मजा आ रहा है ऐसा चैनल में दिखाई तो देता है। दर्शक भी खली के प्रेम की शैली को देखकर तालियां बजा रहा है। बिग बास ने डाली बिंद्रा नामक एक मोटी औरत भी घर पनाह दी है। इस महिला की हंसी अर्चना पूरनसिंह से भी ज्यादा खतरनाक है और वह सबकी बैंड बजाने और डंडा डालने की बात कहते रहती है। इस कद्दावर महिला की गंदी बातें अपसंस्कृति को बढ़ावा देने वाले लोगों का खासा मनोरंजन कर रही है। बिग बास के घर में मनोज तिवारी, श्वेता तिवारी और समीर सोनी जैसे कुंठित भी मौजूद है। शराफत के लबादे में तीनों की कुठाएं भी बाहर निकल रही है। बिग बास के कोठे में सेक्स बम पामेला एंडरसन की इंट्री भी होने जा रही है। पेट के लिए जिस्मफरोशी करने वाली मजबूर लड़कियों की कहानियां तो मैंने खूब पढ़ी है, लेकिन पहली बार मैं ऐसी रंडियों का तमाशा देख रहा हूं जो बाजार की जरूरतों&amp;nbsp; के मद्देनजर कोठे में पहुंचाई गई है। बिग बास सीजन-4 में शामिल लोगों की&amp;nbsp; हरकतें यह बताती है कि आने वाला समय काफी संकट से भरा रहने वाला है। बिग बास सीजन-5 में यदि दर्शक सीधे संभोग का प्रसारण देखें तो कोई हैरत नहीं होनी चाहिए। बिग बास आपका थोबड़ा तो उन लोगों ने भी नहीं देखा जो आपके अनुबंध से कोठे के भीतर पहुंचे हैं लेकिन आप महान है। आपकी जय हो बिग बास। &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6342984867017732424?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6342984867017732424/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6342984867017732424&amp;isPopup=true' title='18 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6342984867017732424'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6342984867017732424'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/11/blog-post_14.html' title='बाजार की रंडियां'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TN-xmDDYeAI/AAAAAAAAAqc/QqeKiAdhOxI/s72-c/BIG-BOSS.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>18</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-3118339724104295109</id><published>2010-11-05T03:10:00.000-07:00</published><updated>2010-11-05T03:10:11.528-07:00</updated><title type='text'>बोलो तुमको क्या चाहिए</title><content type='html'>&lt;b&gt;पलक झपकते ही वे कुछ भी नहीं बनाती&lt;br /&gt;उनकी आंखों में नाचने वाली पुतलियां&amp;nbsp; &lt;br /&gt;खुद-ब-खुद यह तय कर लेती है कि&lt;br /&gt;कब क्या बनाना है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;घर के बाहर रंगोली की थाली लेकर बैठने वाली लड़कियां&lt;br /&gt;जब भरती है तोते की चोंच पर लाल रंग&lt;br /&gt;तो यकीन मानिए एक बासी सा लगने वाला सपना&lt;br /&gt;&amp;nbsp;एकायक हो जाता है चटख&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;नदी बनाते- बनाते एक लड़की&lt;br /&gt;झरने में बदल सकती है&lt;br /&gt;और आप जहां नहीं पहुंच सकते&lt;br /&gt;उससे ऊपर जाकर भी कुलांचे भर सकता है&lt;br /&gt;उनके भीतर बैठा हुआ हिरण&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;पहाड़ के पीछे सूरज उगाने वाली लड़कियां&lt;br /&gt;कभी अकेले नहीं उड़ती&lt;br /&gt;उनके साथ उड़ती है कई रंग-बिरंगी तितलियां&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;पेड़/फल/फूल/पत्तियों को जमाकर &lt;br /&gt;एक मकान को घर में &lt;br /&gt;बदल डालने वाली लड़कियों को&lt;br /&gt;बहुत कम लोग दे पाते हैं शाबाशी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;सबको लगता है-&lt;br /&gt;लड़कियों का काम है&lt;br /&gt;लड़कियां तो कर ही लेती है&lt;br /&gt;मैं आज अपने घर में पायल बजाने वाली&lt;br /&gt;एक लड़की की ठुंडी उठाकर &lt;br /&gt;यह पूछने जा रहा हूं-&lt;br /&gt;बोलो तुमको क्या चाहिए&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-3118339724104295109?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/3118339724104295109/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' 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टपकाता है और तालियां बजाता है। अभी दो रोज पहले ही गलती से मैं इंडिया टीवी देख बैठा। भूत-प्रेत की खबरें दिखाने वाले इस चैनल में श्रीमान रजत शर्मा साहब मल्लिका शेरावत का इंटरव्यूह कर रहे थे। रजत साहब ने अपने सिर के नंगेपन को छिपाते हुए मल्लिका से पूछा- आपके कपड़े कम क्यों होते जाते हैं। जवाब में मल्लिका ने बताया कि ईश्वर ने उसे खूबसूरत बदन दिया है। फलस्वरूप वह ईश्वर द्वारा दिए गए तोहफे का सम्मान करते हुए अपने बदन की नुमांइश करती है। शायद मल्लिका का कहना ठीक हो क्योंकि ईश्वर के इस प्रसाद को हर कोई प्राप्त करना चाहता है। इसी इंटरव्यूह में मल्लिका से यह पूछा गया कि आप किस हीरो के साथ काम करना चाहेंगी। जवाब में मल्लिका ने बताया कि उसे सलमान के साथ काम करके खुशी होगी क्योंकि सलमान और उनका स्वभाव मिलता-जुलता है। सलमान भी अपनी शर्ट उतारकर फेंकने पर यकीन रखते हैं और कपड़ों के मामले में वह भी.......&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="MsoNormal" style="text-align: justify;"&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;खैर... मैं यहां सलमान की बात इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मंगलवार 26 अक्टूबर की शाम हमारे छत्तीसगढ़ में बदन उघांडू सलमान खान का आगमन हो रहा है। छत्तीसगढ़ सरकार की तरफ से अभी यह दावा सामने नहीं आया है कि उसने विधिवत तरीके से सलमान को बुलाया है या नहीं क्योंकि यह पता चला कि उसके आने-जाने का व्यय सरकार को वहन नहीं करना पड़ रहा है । सलमान एक एक निजी कंपनी के खर्चें पर यहां प्रारंभ होने वाले राज्योत्सव में पधार रहे हैं। उनके आगमन को लेकर काफी तैयारियां की गई है। शहर के चप्पे-चप्पे में पुलिस तैनात है। पूरा शहर दो हिस्सों में बंट गया है। एक हिस्से में लग रहा है कि उधमपात मचाने वाले लोग एक जगह इक्कठा हो रहे हैं तो दूसरी ओर ऐसा प्रतीत हो रहा है कि&amp;nbsp; दंगे के बाद सड़कें विधवा की मांग की तरह सूनी हो गई है। लफंडर सलमान खान को देखने में मेरी कोई रूचि नहीं है लेकिन दोपहर जब मैं एक सरकारी दफ्तर में कार्यरत अपने मित्र से मिलने गया तो उसने मुझसे एक विशेष प्रवेश पत्र की मांग की। मित्र के जरिए ही मुझे पता चला कि सलमान की एक झलक पाने के लिए सरकारी लोगों ने हरा, पीला, नीला और भगवा रंग में तीन- चार तरह का पास जारी किया है। हर कोई सलमान.. सलमान करने में जुटा हुआ है। इस बीच यह जानकारी भी मिली कि सलमान को वीडियोकान नामक कंपनी डेढ़ करोड़ रुपए का भुगतान कर रही है। यदि कंपनी सलमान से किसी एक गाने पर नृत्य करवाना चाहेंगी तो उसका 25 लाख अलग से देना होगा। इस तरह दो गाने पर सलमान 50 लाख रुपए लेंगे। अच्छा है... एक तरफ देश में असंख्य लोग है जिन्हें एक वक्त का खाना नहीं मिलता दूसरी तरफ एक आदमी केवल अपने ठुमके लगाने के ही पचास लाख वसूल रहा है। असमानता की खाई क्यों है और किसलिए है इस पर फिर कभी बात हो सकती है। सबसे ज्यादा हैरत इस बात पर हो रही है कि सलमान को छत्तीसगढ़ निर्माण के एक दशक पूरा करने के अवसर पर बुलाया गया है। छत्तीसगढ़ में यह उत्सव एक सप्ताह तक चलने वाला है। मैं उम्मीद कर रहा था कि किसी एक जगह इस बात की गोष्टी जरूर होगी कि आखिर छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण क्यों हुआ। दस सालों का यह सफर राजनैतिक-सामाजिक और आर्थिक नजरिए से कितना महत्वपूर्ण रहा, लेकिन दुर्भाग्य से कहीं किसी हाल में इस तरह की परिचर्चा का आयोजन नहीं किया जा रहा है। दस सालों में हमारी सफलता यह है कि हम सलमान को बुलाने सफल हो गए। उस सलमान को जिसने मुन्नी को बदनाम नहीं होने देने का ठेका ले रखा है। &amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-1479519897079132120?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/1479519897079132120/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=1479519897079132120&amp;isPopup=true' title='14 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1479519897079132120'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/1479519897079132120'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/10/blog-post.html' title='सलमान के बहाने'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>14</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6954933052155586335</id><published>2010-09-27T06:26:00.000-07:00</published><updated>2010-09-27T10:35:27.393-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नत्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='पीपली लाइव'/><title type='text'>अब भी नहीं बदली नत्था की जिन्दगी</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TKCZF55NVtI/AAAAAAAAAp4/bzKein3nktY/s1600/DSC_3063.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TKCZF55NVtI/AAAAAAAAAp4/bzKein3nktY/s320/DSC_3063.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पूरी दुनिया से उसे बधाई संदेश मिल रहे हैं। जिसे देखो वही एक बार नत्था के दर्शन कर लेना चाहता है लेकिन आमिर खान की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म पीपली लाइव का नायक ओंकारदास मानिकपुरी उर्फ नत्था अब भी गरीबी में ही जिन्दगी गुजर-बसर करने को मजबूर है। खुद नत्था को भी यह नहीं मालूम कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? उसे उम्मीद थी कि&amp;nbsp; पीपली लाइव के हिट हो जाने के बाद उसके पास फिल्मों का अंबार लग जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुबंई के एक-दो निर्माताओं ने उससे फोन पर बातचीत जरूर की है लेकिन उसे यह नहीं बताया है कि उसकी भूमिका क्या होगी? छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले निर्माताओं ने भी अब तक नत्था को अनुबंधित करना जरूरी नहीं समझा है, और तो और उस भिलाई में जहां नत्था रह रहा है वहां मर्डर और काइट्स जैसी फिल्म बनाने वाले अनुराग बसु अपने स्वर्गीय पिता सुब्रत बोस को स्वप्न दृष्टा रंगकर्मी मानते हुए गत दो दिनों से एक बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं लेकिन इस आयोजन में शामिल होने का न्यौता भी नत्था को नहीं दिया गया है।&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TKConvhcgGI/AAAAAAAAAqU/psmXjeGV7mw/s1600/DSC_3078.JPG" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="212" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TKConvhcgGI/AAAAAAAAAqU/psmXjeGV7mw/s320/DSC_3078.JPG" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;भले ही नत्था की पहली फिल्म देश और दुनिया में तहलका मचाने के बाद&amp;nbsp; आस्कर के लिए नामित हो गई है लेकिन उसकी जिन्दगी में कोई फर्क नहीं आया है। पीपली लाइव के इस नायक की दशा अब भी वैसी ही बनी हुई है जैसे फिल्म में प्रदर्शित की गई है। नत्था का वृंदानगर स्थित घर इतना छोटा है कि यदि दो लोग भी उससे मिलने आ जाएं तो वह उन्हें आदर के साथ घर में बैठने को नहीं कह सकता है। अपने प्रशंसकों को ठीक से सम्मान नहीं दे पाने की वजह से नत्था अपनी मौसी की लड़की के पति यानी जीजा के घर रहने को चला आया है। यहां भी चैनलवाले उसका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। जैसे ही यह खबर में चैनलों में प्रसारित हुई कि आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव आस्कर के लिए नामित कर दी गई है वैसे ही चैनल वालों का रूख जामुल के उस इलाके की ओर हो गया है जहां नत्था के जीजा रहते हैं। यहां भी नत्था चैनलवालों से लगातार बात कर रहा है। अपनी फिल्म के बारे में बता रहा है। आमिर खान और अनुषा रिजवी की तारीफ कर रहा है लेकिन कोई चैनल वाला उससे यह नहीं पूछ रहा है कि भइया नत्था फिल्म के हिट हो जाने के बाद आपकी दशा में कोई सुधार आया है नहीं? उल्लेखनीय है कि नत्था का बचपन बेहद मुफलिसी में बीता है । नत्था के पिता श्यामूदास मानिकपुरी एक मजदूर थे। इधर-उधर काम की तलाश में श्यामूदास को जहां-जहां भटकना पड़ता नत्था वहां-वहां उनके साथ जाता रहा है। कभी झोपड़ी की सीलन और बदबूदार जमीन का बिछौना मिलता रहा तो कभी उस पाइव में उसे रात गुजारनी पड़ी है जो पाइव ख्वाजा अहमद अब्बास की पटकथा में अक्सर दिख जाया करती थी। कई जगह भटकने के बाद जब नत्था के पिता&amp;nbsp; यहां भिलाई नंदिनी के औद्योगिक क्षेत्र की सिम्पलेक्स कंपनी में काम करने आए तो अपने व्यवहार के चलते वे जल्द ही प्रसिद्ध मजदूर नेता शंकरगुहा नियोगी के करीबी हो गए। सिम्पलेक्स वही कंपनी है जिसके मालिकों पर शंकरगुहा नियोगी की हत्या का आरोप लग चुका है। वेतन विसंगति व अन्य मांगों को लेकर जब कंपनी में आंदोलन होने लगा तो प्रबंधन ने श्यामूदास को&amp;nbsp; आंदोलनकारी समझकर नौकरी से निकाल दिया था। पिता के बेरोजगार हो जाने पर कई बार घर में फांके की नौबत भी आती रही है। पिता को सहारा देने के लिए जब नत्था ने रोजगार की तलाश की तो उसे काम भी मिला तो जान को जोखिम में डालने वाला। जी... हां.. यह बात पूरी तरह से सच है। अपने परिवार का पेट भरने के लिए नत्था को सिर्फ एक रस्सी के सहारे मुख्य चिकित्सालय सेक्टर 9 में राजमिस्त्री का काम भी करना पड़ा है। नत्था ऊंचे से ऊंचे भवन पर जान को जोखिम में डालकर काम करता रहा है। नत्था जब पेट की आग को बुझाने के काबिल हो गया तब जाकर उसने हबीब तनवीर का ग्रुप ज्वाइन किया। यहां उसे कभी बहुत ज्यादा पैसे तो नहीं मिले लेकिन कला के प्रति समर्पण की संतुष्टि जरूर हासिल हुई। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नत्था जब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर का सांतवा चोर बना और जब उसकी ख्याति देश-विदेश में होने लगी तब टीवी पत्रकार अनुषा रिजवी ने उसे दो लाख रुपए देकर फिल्म पीपली लाइव के लिए अनुबंधित किया था। नत्था को किस्त-किस्त में दी गई यह राशि पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में ही खर्च हो गई है। ऐसा भी नहीं है कि नत्था फिल्म के हिट हो जाने के बाद पूरी तरह से पैसों का ही दीवाना हो गया है। वह कहता है कि उसे सिर्फ उतने ही पैसे&amp;nbsp; चाहिए जितने में वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके और बच्चों को लिखा पढ़ा सकें। नत्था अपने बच्चों को खूब पढ़ाना लिखाना चाहता है क्योंकि रोजी-रोटी का इन्तजाम करने के लिए उसके पिता शहर-दर-शहर खानाबदोश जिन्दगी जीते रहे हैं। एक शहर से दूसरे शहर पलायन करने के कारण नत्था 11 वर्ष की उम्र तक ही पहली कक्षा का छात्र रहा है। जैसे-तैसे पांचवी पास करने वाला नत्था अब अपने प्रशंसकों को आटोग्राफ तो दे रहा है लेकिन नत्था से बधाई हो कहकर मिलने वाले लोग उसके भीतर छिपी हुई एक परेशानी को पढ़ नहीं पा रहे हैं। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;नत्था की परेशानी यह नहीं है कि इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के लोग उसका पीछा कर रहे हैं। उसे सिर्फ यह तकलीफ सता रही रही है कि कहीं उसकी स्थिति भी चेन्दरू के समान न हो जाए। उल्लेखनीय है कि साठ के दशक में एक विदेशी फिल्मकार ने छत्तीसगढ़ बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में रहने वाले चेन्दरू नामक एक बालक को अपनी फिल्म चेन्दरू द बाय एण्ड टाइगर में&amp;nbsp; काम करने का अवसर दिया था। फिल्म का नायक चेन्दरू बगैर किसी डर के शेरों के साथ घूमता था।&amp;nbsp;&amp;nbsp; जब जानवरों को लेकर टारजन जैसी काल्पनिक कथा गढ़ने वाले लोगों ने चेन्दरू का यह कारनामा देखा तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ था। चेन्दरू को रुपहले पर्दे पर एक नक्षत्र की तरह चमकता देखने वाले सभी लोगों को यह उम्मीद थी अबूझमाड़िया लड़का देश और दुनिया में छा&amp;nbsp; जाएगा और कुछ नहीं तो उसकी आर्थिक दशा सुधर जाएगी लेकिन सालों-साल बीत जाने के बाद चेन्दरू को दोबारा फिल्म में काम करने का अवसर नहीं मिला। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अभी हाल ही में चेन्दरू का घर बाढ़ की चपेट में आ गया था। घर के बर्तन और जानवरों के बह जाने के बाद भी चेन्दरू को सरकारी सहायता नहीं मिल पाई है। यहां तक वन विभाग ने उसे आशियाना बनाने के लिए बांस-बल्ली भी मुहैय्या नहीं कराई है। सब जानते हैं कि शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में काम करने वाले लोक कलाकार किस दशा में जी रहे हैं। बोल्ड सीन देकर पूरी दुनिया में स्त्री विमर्श को नया आयाम देने वाली सीमा विश्वास की स्थिति भी बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है। 27 सितम्बर को पीपली लाइव के नायक&amp;nbsp; नत्था&amp;nbsp; को मैं अपने अखबार के दफ्तर में लेता आया था। अखबार के लिए बातचीत करने के बाद मैं उसे आग्रह के साथ अपने निवास पर भी ले गया। यहां भी मैंने उससे घंटों बात की। पूरी बातचीत के बाद मैंने यह पाया कि एक सीधा-सरल लोक कलाकार बाजार के हथकंड़ों को&amp;nbsp; नहीं जानता है और इसी वजह से&amp;nbsp; अपनी मार्केटिंग&amp;nbsp; भी नहीं कर पा रहा है। पूरी दुनिया&amp;nbsp; में मौजूद खतरनाक बाजार में नत्था जैसे लोग फिट बैठ पाते हैं या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन मैंने कल&amp;nbsp; उसे उसी सोच में डूबा हुआ देखा जिस सोच में वह फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाया गया है। &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6954933052155586335?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6954933052155586335/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6954933052155586335&amp;isPopup=true' title='26 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6954933052155586335'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6954933052155586335'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post_27.html' title='अब भी नहीं बदली नत्था की जिन्दगी'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TKCZF55NVtI/AAAAAAAAAp4/bzKein3nktY/s72-c/DSC_3063.JPG' height='72' width='72'/><thr:total>26</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6385676224440780531</id><published>2010-09-23T00:38:00.000-07:00</published><updated>2010-09-23T06:46:32.038-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='गुरुदेव'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='जनसत्ता'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अंबरीशजी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़'/><title type='text'>शिष्य नही सहयोगी</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;मित्रों आज का दिन मेरी जिन्दगी का बहुत महत्वपूर्ण दिन है। मेरे गुरू अंबरीशजी में मुझे लेकर अपनी कलम चलाई है। हालांकि वे कलम नही भी चलाते तो भी यह बात मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि कहीं न कहीं मैं उनकी चिन्ताओं का एक जरूरी हिस्सा बना हुआ हूं। जो लोग ब्रोकर है मैं उनके बारे में तो नहीं जानता लेकिन जो नहीं है वे इस बात को ठीक तरह से जानते हैं कि एक पत्रकार के लिए कोई भी नौकरी कभी पक्की नौकरी नहीं होती । एक पत्रकार यदि आज एक संस्थान में है तो कल दूसरे संस्थान में नजर आ सकता है। सच तो यह है कि अंबरीशजी इस बात को बेहद अच्छे से जानते हैं कि उनके शिष्य पर कोई न कोई तेज तलवार&amp;nbsp; हमेशा ही लटकी रहनी है, सो वे अक्सर मुझसे यह पूछते ही है कि बोलो क्या नया कर रहे हो। कही कोई परेशानी तो नहीं है। उनकी चिन्ताओं में खुद को शामिल पाकर मैं हमेशा इस बात के लिए आश्वस्त रहता हूं कि&amp;nbsp; चलो दूर होने के बाद भी मेरा कोई अपना है जिसका हाथ मेरे सिर पर है । लेकिन गुरुदेव ने गुरुदेव लिखने पर प्यार भरी झिड़की लगा दी है। उनकी झिड़की का स्वागत है, लेकिन यहां मैं अपने पाठकों से ही यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि क्या मैंने अपने गुरुदेव को गुरुदेव लिखकर कोई गलती की है। अरे भाई जिनसे आप कुछ सीखें और सीखें भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि ठोक बजाकर धमाका करने के लायक तो क्या उन्हें गुरू मानना उचित नहीं है। अंबरीशजी से मैंने तो बहुत कुछ सीखा है और आज भी सीख ही रहा हूं। अब आप ही फैसला करें मेरा सोचना सही है या नहीं। एक बात और मेरी दूसरी पुस्तक बस्तियां जो वीरां हो गई.. भी बहुत जल्द आने वाली है। यह पुस्तक मैंने अपने गुरुदेव को ही समर्पित की है। अब बोलिए गुरुदेव अपने जिद्दी&amp;nbsp; शिष्य को कितना रोक लेंगे आप। बेहद आदर के साथ यहां पाठकों के लिए वह लेख भी दे रहा हूं जो गुरुदेव ने मुझे मेल किया है। &lt;span style="color: red; font-weight: normal;"&gt;(राजकुमार सोनी) &lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;अंबरीश कुमार&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;अयोध्या पर एक रपट मैंने कुछ मित्रों को भेजी थी ताकि ब्लाग के माध्यम से&amp;nbsp;वहां&amp;nbsp; के हालात की जानकारी मिल सके .साठ साल बाद एक फैसला आ रहा है जिसपर पूरे देश की निगाह है&amp;nbsp;.ऐसे में अयोध्या से लेकर लखनऊ तक जो माहौल है उसकी कवरेज भी आसान नही है .फ़तवा वाली पत्रकारिता और&amp;nbsp;सनसनी वाली ख़बरों के बीच तथ्यों के साथ लिखना काफी चुनौती भरा काम होता है .पर इंडियन एक्सप्रेस समूह में करीब बीस साल की पत्रकारिता के चलते काफी कुछ सीखने को मिला है .शब्दों से लेकर तथ्यों का भी काफी ध्यान रखना पड़ता है वर्ना अख़बारों में&amp;nbsp;डेस्क पर कई खबरे पोस्मार्टम के बाद निपट जाती है .शब्दों के चयन को लेकर ही यह पोस्ट भी लिख रहा हूँ .&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJsvfB7HHhI/AAAAAAAAApk/lYcrTWf2Ugk/s1600/Jogi+with+JS%283%29.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJsvfB7HHhI/AAAAAAAAApk/lYcrTWf2Ugk/s320/Jogi+with+JS%283%29.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&amp;nbsp;कल मेरे आर्टिकल के नीचे राज कुमार सोनी&amp;nbsp;&amp;nbsp;ने&amp;nbsp;लिखा -&lt;span style="color: #222222; font-family: Arial,Tahoma,Helvetica,FreeSans,sans-serif; font-size: 15px; line-height: 21px;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;अंबरीश जी जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार होने के अलावा मेरे गुरू भी है. सोनी के शब्दों पर हैरानी हुई .छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के खट्टे मीठे अनुभव है पर जो लोग लगातार मेरे साथ खड़े रहे उनमे राज कुमार सोनी प्रमुख है .&lt;/span&gt;&lt;span style="color: #222222; font-family: Arial,Tahoma,Helvetica,FreeSans,sans-serif; font-size: 15px; line-height: 21px;"&gt;सोनी से करीब दशक भर पुराना परिचय है .सन २०००&amp;nbsp; में मुझे इंडियन एक्सप्रेस ने छत्तीसगढ़ राज्य की कवरेज की जिम्मेदारी दी और दिल्ली से रायपुर भेजा गया .एक जिले को राजधानी बनते और एक लोकप्रिय प्रवक्ता को मैंने राज्य का&amp;nbsp; ताकतवर मुख्यमंत्री बनते देखा जो &amp;nbsp;बाद में कुछ अफसरों-पत्रकारों&amp;nbsp; के चलते वे&amp;nbsp;अहंकार के&amp;nbsp; शिखर पर पहुँच&amp;nbsp;गए .मै अजित जोगी की बात कर रहा हूँ .जोगी से&amp;nbsp;घनिष्ठ &amp;nbsp;सम्बन्ध भी रहे और जब बिगड़े तो टकराव का लम्बा दौर चला .खैर २००१ में ही मुझे एक्सप्रेस प्रबंधन ने छत्तीसगढ़ से&amp;nbsp;&amp;nbsp;जनसत्ता निकलने की जिम्मेदारी दी तो लिखित टेस्ट लेकर &amp;nbsp;करीब पचास लोगो का चयन किया गया जिसमे रायपुर से लेकर दुर्ग बिलासपुर के लोग शामिल थे .फिर साक्षात्कार में लोगों को बुलाया गया जिसमे सोनी भी आए थे . तभी उनसे पहली मुलाकात हुई &amp;nbsp;.मैंने उनकी कापी देखी और कहा - जनसत्ता में संवाददाता &amp;nbsp;के रूप में काम कर सकेंगे तो उनका जवाब था - क्या विज्ञापन भी लाना होगा .सोनी का जवाब सुनकर काफी झल्लाहट हुई क्योकि एक्सप्रेस की परम्परा अलग रही है .मेरा जवाब था - विज्ञापन का काम संवादाता नही करता है उसके लिए मार्केटिंग के लोग है .मेरे साथ उस समय छत्तीसगढ़ जनसंपर्क के निदेशक चितरंजन खेतान भी साक्षात्कार ले रहे थे .खेतान पत्रकार रहे है और उसी नाते उन्हें भी आमंत्रित किया गया था .इसी बीच रायपुर संस्करण&amp;nbsp;के व्यवस्थापक मुझे अलग ले गए और बोले -यह तो पक्का&amp;nbsp;कम्युनिस्ट है इसे कहा ले रहे है .मैंने कहा -अखबार निकालना&amp;nbsp; है पार्टी नहीं बनानी जो टेस्ट&amp;nbsp; में पास हो गया&amp;nbsp; है उसे लिया जाएगा.चाहे कम्युनिस्ट हो या संघी .&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;span style="color: #222222; font-family: Arial,Tahoma,Helvetica,FreeSans,sans-serif; font-size: 15px; line-height: 21px;"&gt;सोनी उस समय समाज और व्यवस्था&amp;nbsp; से नाराज &amp;nbsp;जेहादी विचारों से लैस थे .पर लिखने की कला और ख़बरों को पकड़ने की क्षमता भी गज़ब की थी जिसे एक दिशा देने की जरुरत थी .उस समय रिपोर्टिंग में सोनी और डेस्क पर भारती यादव जनसत्ता की टीम के सबसे प्रतिभाशाली लोगों में शामिल थे .बाद में अनिल पुसदकर से लेकर अनुभूति ,आकांक्षा&amp;nbsp; संजीत त्रिपाठी आदि इसी कतार &amp;nbsp;में शामिल हुए .एक बात सभी से साफ़ थी कि यहाँ पर सभी एक टीम का हिस्सा होंगे कोई छोटा बड़ा नही . सोनी को जब उनकी ख़बरों के चलते प्रमुखता मिलने लगी तो भीतर से बाहर तक &amp;nbsp;मेरा विरोध शुरू हुआ .सरकार के स्तर पर दबाव पड़ा कि सोनी को रिपोर्टिंग से हटा दिया जाए .इस दबाव&amp;nbsp; के बाद हमने सोनी&amp;nbsp; की जिम्मेदारिया और बढा दी .तब भी वे अपने सहयोगी थे शिष्य नही .एक दिन विद्याचरण शुक्ल ने मुझसे पूछा - आपका जोगी की निरंकुशता के&amp;nbsp; खिलाफ अभियान कब तक चल पाएगा. कहीं सोनी को कही हटा तो नहीं दिया जाएगा ,मैंने कहा जब तक मै रायपुर में हूँ तब तक कुछ नही होगा .पर चुनाव से पहले सरकार भारी पड़ गई। अखबार के व्यस्थापकों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए&amp;nbsp;और मुझे दिल्ली बुला लिया गया .हालाँकि बाद में भाजपा के नेता प्रभात झा ने एक दिन लखनऊ में कहा -जोगी को हराने में जनसत्ता की भूमिका रही जिसने पूरे राज्य में माहौल बना दिया .लेकिन यह भी किसी अकेले का नही बल्कि उस टीम का काम था जिसके अगले दस्ते में सोनी से लेकर पुसदकर तक थे .यह सब सहयोगी&amp;nbsp;रहे है शिष्य नही&amp;nbsp;.और सहयोगी भी ऐसे जिन्हें सिपहसालार माना गया ,गुरू जैसा शब्द बहुत भारी लगता है &amp;nbsp;.गुरू तो हम सबके&amp;nbsp; प्रभाष जोशी रहे है जिन्होंने पत्रकारिता सिखाई .&lt;/span&gt;&lt;/span&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;span style="font-family: Arial,Helvetica,sans-serif; font-size: medium; line-height: 28px;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6385676224440780531?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6385676224440780531/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6385676224440780531&amp;isPopup=true' title='23 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6385676224440780531'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6385676224440780531'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post_23.html' title='शिष्य नही सहयोगी'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJsvfB7HHhI/AAAAAAAAApk/lYcrTWf2Ugk/s72-c/Jogi+with+JS%283%29.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>23</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-71577716078056209</id><published>2010-09-22T02:47:00.000-07:00</published><updated>2010-09-23T03:48:50.977-07:00</updated><title type='text'>फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;अंबरीश कुमार&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अयोध्या &amp;nbsp;, सितंबर। ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर &amp;nbsp;अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का &amp;nbsp; फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी &amp;nbsp;तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या &amp;nbsp;में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग &amp;nbsp;मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी । &amp;nbsp;हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन &amp;nbsp;और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है। &amp;nbsp;जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है &amp;nbsp;।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ &amp;nbsp;और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है &amp;nbsp;। सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है &amp;nbsp;। और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए &amp;nbsp;। पिछले एक &amp;nbsp;दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ &amp;nbsp;पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही &amp;nbsp; अयोध्या &amp;nbsp;जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया &amp;nbsp;केंद्र बनाया गया &amp;nbsp;। गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में &amp;nbsp;इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।&lt;/div&gt;&lt;div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली &amp;nbsp;अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो &amp;nbsp;क़तर-ए- &amp;nbsp;खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को &amp;nbsp;का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की &amp;nbsp;पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का । &amp;nbsp;एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही &amp;nbsp;मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ &amp;nbsp;।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है &amp;nbsp;। इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है &amp;nbsp; बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण । &amp;nbsp;विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास &amp;nbsp;और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे &amp;nbsp;। पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह &amp;nbsp;में डाल रही थी &amp;nbsp;।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी &amp;nbsp;। यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे &amp;nbsp;। यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि &amp;nbsp; का व्यापार &amp;nbsp;है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा । &amp;nbsp;पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा &amp;nbsp;।&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red; text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;अंबरीशजी जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार होने के अलावा मेरे गुरू भी है-&lt;span style="color: blue;"&gt; राजकुमार सोनी&lt;/span&gt;&amp;nbsp; &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-71577716078056209?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/71577716078056209/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=71577716078056209&amp;isPopup=true' title='13 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/71577716078056209'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/71577716078056209'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post_22.html' title='फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>13</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-3116895130928674245</id><published>2010-09-20T07:28:00.000-07:00</published><updated>2010-09-20T07:55:06.022-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='मजबूर नत्था'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='नई राजधानी'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='किसान'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़'/><title type='text'>नई राजधानी में नत्था ही नत्था</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyjdo3reI/AAAAAAAAAo8/Ty3zDCaoOSU/s1600/rill-+final.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="75" src="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyjdo3reI/AAAAAAAAAo8/Ty3zDCaoOSU/s400/rill-+final.jpg" width="400" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;सब कुछ पत्रकारिता के फटीचर समय को दर्शाने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ के समान है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि पीपली लाइव का नायक नत्था जहां अपनी पुश्तैनी जमीन को बचाने के चक्कर में मुआवजा पाने के लिए मरने को तत्पर दिखता है तो छत्तीसगढ़ की&amp;nbsp; नई राजधानी के नत्था (किसान) मुआवजा हासिल कर लेने के बाद उपजी विसंगतियों के चलते ‘आत्मघाती कदम’ उठा लेने की शपथ लेने को मजबूर नजर आते हैं। भले ही खेती-किसानी में आंकड़ों की बाजीगरी करने वाले सरकारी नुमांइदे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि यहां का किसान मौत को गले लगाने के बारे में विचार कर रहा है। लेकिन यह एक बड़ी सच्चाई है। खेती-बाड़ी से महरूम होने वाले ‘नई राजधानी के नत्थाओं’ ने अपने भीतर आत्महत्या के खतरनाक बीज का रोपण शुरू कर दिया है। &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyPNFMbPI/AAAAAAAAAos/0LqKIt8G89s/s1600/DSC_2800.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyPNFMbPI/AAAAAAAAAos/0LqKIt8G89s/s320/DSC_2800.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;नई राजधानी पहुंचने के लिए आपको वह टेम्पो भी नहीं मिलेगी जो पीपली लाइव में दिखाई गई थी। यहां पहुंचने के लिए आपको ‘कार-मोटर-सायकिल’ या दूसरे माध्यमों का उपयोग करना पड़ेगा। यदि आप उड़नखटोले के मालिक है तो रायपुर से ब-मुश्किल दस मिनट में आपकी यात्रा पूरी हो सकती है, अन्यथा किसी भी अन्य माध्यम से पहुंचने में एक घंटा जाया करना पड़ सकता है। हालांकि पुरानी राजधानी से नई राजधानी में पहुंच को सुगम बनाने का दावा वर्ष 2002 से किया जा रहा है क्योंकि इसी साल आवास एवं पर्यावरण विभाग ने नई राजधानी के निर्माण के लिए अधिसूचना जारी की थी। ग्राम पलौद में इंटरनेशनल स्टेडियम आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा। स्टेडियम को देखकर आपको लगेगा- भई वाह जब स्टेडियम इतना शानदार है तो नई राजधानी खूबसूरत होगी ही लेकिन जैसे-जैसे उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर आप गांव पहुंचते जाएंगे, वैसे-वैसे आपको ‘पीपली लाइव’ का सच नजर आने लगेगा। कहीं आपको खड़खड़ करती हुई जीप नजर आएगी तो कही कोई धनिया कंडे थापते मिलेगी। देसी भभके के बीच बीड़ी सुलगाते हुए सैकड़ों नत्था भी आपको मिल ही जाएंगे। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyaePT4HI/AAAAAAAAAo0/UAvfFayPSbM/s1600/DSC_2815.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyaePT4HI/AAAAAAAAAo0/UAvfFayPSbM/s320/DSC_2815.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;मैं कोटराभाठा &lt;/b&gt;में एक किसान जयराम यादव के घर के सामने खड़ा हूं। जयराम जैसे-तैसे चर्चा करने को तैयार हुआ। बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसके पास कुल पांच एकड़ खेती की जमीन थी। दबाव के चलते उसने अपनी जमीन एनआरडीए (न्यू रायपुर डेव्लपमेंट अथॉरिटी) को सौंप तो दी लेकिन अब वह पछता रहा है। जयराम को मुआवजे में कुल 28 लाख रुपए मिले थे। पांच एकड़ जमीन का मालिक जब जमीन खरीदने के लिए अपने इलाके से बाहर निकला तो उसे बैरंग लौटना पड़ा क्योंकि गांव से सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर भीतर-बाहर के दायरे में कोई भी उसे 15 लाख रुपए एकड़ में जमीन देने को तैयार नहीं हुआ। मंदिर हसौद में जमीन की कीमत एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ हो चुकी थी तो नई राजधानी से कुछ दूरी पर स्थित ग्राम लखौली में जमीन 75 लाख एकड़ में बिक रही थी। यही हाल ग्राम गनौद और धमनी का भी था। जमीन से महरूम हो जाने के बाद बैलगाड़ी पर चलने वाले जयराम ने अपने बच्चों के लिए हीरो होंडा व स्कूटी खरीद ली। मिट्टी के घर को पक्का बना लिया। मुआवजे का पैसा कब खत्म हो गया उसे पता नहीं चला। अब वह खुद मानता है कि उसके सामने भूखों मरने की नौबत आन खड़ी हुई है। कुछ ऐसी ही स्थिति कोटराभाठा के एक दूसरे किसान गंगाराम की भी है। गंगाराम ने मुआवजे में मिली रकम से राजिम पोखरा में खेती के लिए जमीन तो खरीद ली है लेकिन वहां उसका अपना घर नहीं है। एक बड़े परिवार का मुखिया होने के कारण वह भी मुआवजे का सही उपयोग नहीं कर पाया। गंगाराम की स्थिति भी दयनीय हो चली है। निरन्तर खराब हो रही आर्थिक स्थिति से परेशान गंगाराम ने कहा कि वह कभी भी आत्मघाती कदम उठा सकता है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;किसान संघर्ष समिति के बैनर तले नई राजधानी का विरोध करने वाले सरजूदास मानिकपुरी के पास मात्र 2 एकड़ जमीन थी। इसमें से कुछ जमीन एनआरडीए अधिगृहीत कर चुका है। सरजू का मानना है कि सरकार ने सोची-समझी योजना के तहत किसानों से पांच-छह लाख रुपए प्रति एकड़ में जमीनों की खरीदी की है। उन्होंने कहा कि किसानों से सस्ते दर पर जमीन खरीद कर सरकार अब उसी जमीन को मंहगे दर पर बेच रही है। सरकार की इस कार्रवाई से लगता है कि वह ‘व्यवसाय’ करने पर आमादा है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;सरजू गांव-गांव में अवैध ढंग से बेची जा रही शराब को भी षड़यंत्र का एक हिस्सा मानते हैं। उन्होंने बताया कि किसान मुआवजे में मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा शराब में खर्च कर रहे हैं। किसान भूख-गरीबी और मुफलिसी से जब मरेगा तब मरेगा, अभी तो हालात यह है कि वह पी-पीकर ही दम तोड़ रहा है। सरजू ने बताया कि गत दो सालों में 26 गांवों के 20 से ज्यादा किसान शराब पीकर मौत के घाट उतर चुके हैं। कुछ दिनों पूर्व बहरूराम के लड़के चोवा की मौत भी शराब सेवन के बाद एक दुर्घटना में हुई थी। नवागांव के एक किसान डेरहाराम ने बताया कि उनके गांव के किसान सरकार को जमीन देने के पक्ष में नहीं थे लेकिन एनआरडीए से जुड़े लोगों ने ऐसा दबाव बनाया कि किसानों को जमीन देनी ही पड़ी। शादी-ब्याह तथा अन्य कारणों से कर्ज में दबे किसानों को लगा कि यदि&amp;nbsp;&amp;nbsp; मुआवजा मिलेगा तो राहत मिल जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। मुआवजे की रकम खत्म हो गई है और अब किसानों के सामने कटोरा लेकर भीख मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। इसी गांव के एक नेत्रहीन किसान बलराम यादव की जमीन भी नई राजधानी के निर्माण की भेंट चढ़ चुकी है। बलराम की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है। जबकि रेवाराम सिन्हा को जमीन के चले जाने से ज्यादा भाई से अलग हो जाने का दुख है। रेवाराम ने बताया कि पहले वह अपने भाई देवनाथ के साथ ही रहता था लेकिन मुआवजे की रकम मिल जाने के बाद भाई को हसदा में जमीन लेनी पड़ी तो उसे राजिम के पास पांडुका में किसी तरह जमीन मिल पाई। इलाके के दुर्गापाल, कार्तिकराम, श्रवण कुमार, भगतराम, मेहतरू यादव सहित कई किसान ऐसे हैं जो मानते हैं कि नई राजधानी में स्थिति विस्फोटक है। किसानों का कहना है कि भले ही उनकी लाशों पर सरकार मंत्रालय व अन्य भवनों का निर्माण कर लेगी लेकिन उनकी रूहें वहीं-कहीं मंडराती मिलेगी। यह रूहें एक न एक दिन उन सबसे हिसाब मांगेंगीं जो मामूली से फायदे के लिए साजिशों को प्रश्रय देते रहे हैं।&lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="color: blue;"&gt;मुआवजा दिया गया &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;एनआरडीए के महाप्रबंधक महादेव कांवरे ने बताया कि मुआवजे का निर्धारण सबकी सहमति से किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि किसी भी ग्रामीण को कम मुआवजा दिया गया है। मुआवजे की रकम का किस किसान ने क्या उपयोग किया यह&amp;nbsp; तो वे ही ठीक तरीके से बता सकते हैं।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;span style="background-color: red;"&gt;&amp;nbsp;किसान निशाने पर &lt;/span&gt;&lt;span style="background-color: black;"&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;&lt;span style="color: black;"&gt;छत्तीसगढ़ एग्रीकान के प्रदेश अध्यक्ष संकेत ठाकुर ने बताया कि&amp;nbsp; प्रदेश के&lt;/span&gt; &lt;/span&gt;हर कोने से किसानों द्वारा आत्महत्या कर लेने की खबरें आ रही हैं। कुछ समय पहले हमने जब सूचना के अधिकार के तहत थानों से जानकारी मांगी थी तब चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए थे। कर्नाटक, आंध्र और महाराष्टÑ के बाद छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक किसान मौत को गले लगा रहे हैं। जब हम लोग इस बारे में तथ्यात्मक ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास करते है तो कह दिया जाता है कि हमारा नजरिया अलग हैं। &lt;/div&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आत्महत्या की बात गलत &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू किसानों&amp;nbsp; द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर को असत्य बताते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ का सामाजिक ताना-बाना ऐसा नहीं है कि किसी को आत्मघाती कदम उठाने की जरूरत पड़े। उन्होंने कहा कि जो&amp;nbsp; लोग किसानों के द्वारा आत्महत्या कर लेने की बात प्रचारित करते हैं वे भी अब तक किसी तरह का प्रमाण नहीं दे पाए हैं। प्रदेश में कृषि विभाग द्वारा संचालित योजनाओं से किसानों की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। नई राजधानी के किसान भी खुशहाल जीवन जी रहे हैं। जबकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा का कहना है कि नई राजधानी के किसानों को सही ढंग से न्याय नहीं मिल पाया है। उनकी जमीनें बेहद सस्ते दर पर खरीदी गई और बाद में उसे मंहगे दर पर बेचने का काम किया गया। यहां का किसान जहर खाकर मर जाने की बात कहता है। सरकार को चाहिए कि वह किसानों के वक्तव्य को समय रहते गंभीरता से लें। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;मामला लोक आयोग में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अपने गठन के प्रारंभिक दिनों से ही एनआरडीए विवादों में घिरा रहा है। वैसे जब जोगी शासनकाल में नई राजधानी बनाने की बात सामने आई थी तब विपक्ष ने पौता और चेरिया जैसे गांवों के चयन को गलत ठहराया था। विपक्ष का यह आरोप था कि सरकार भू-माफियाओं को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है। विपक्ष का यह आरोप सही साबित भी हुआ क्योंकि उन दिनों जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों ने किसानों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदने का खेल प्रारंभ कर दिया था। जब भाजपा सत्ता में आई तो उसने नई राजधानी के स्थल में परिवर्तन कर दिया। कुछ समय पहले मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने एनआरडीए में व्याप्त अनियमितताओं को लेकर लोक आयोग में शिकायत की है। कांग्रेस के एक प्रमुख पदाधिकारी राजेश बिस्सा का आरोप है कि नारडा ने दिल्ली की एक कंपनी आईएलएंडएफएस से मिलकर एक नई कंपनी बनाने का खेल भी रचा था। बिस्सा का यह भी आरोप है कि नारडा दक्षिण भारत के एक ठेकेदार बी सिनैय्या से लगभग तीन सौ करोड़ की सड़कों का निर्माण करवा रहा है। यह सड़कें गुणवत्ताविहीन हैं। श्री बिस्सा ने सड़कों की गुणवत्ता के संबंध में सूचना के अधिकार के तहत सेम्पल की मांग भी की है। इधर नई राजधानी में जिस मंद गति से निर्माण कार्य चल रहा है उसे देखते हुए यह लगता नहीं है कि पुरानी राजधानी&amp;nbsp; आने वाले पांच सालो में वहां शिफ्ट की जा सकती है। छेरीखेड़ी में जिस फ्लाईओवर को ढाई साल पहले बन जाना था वह अब तक नहीं बन पाया। &lt;/div&gt;&lt;b style="color: magenta;"&gt;भटक रहे किसान&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;भू-अर्जन और मुआवजे से संबंधित कामकाज के निपटारे के लिए एनआरडीए ने पहले पुराने आरटीओ के पीछे एक कार्यालय खोला था। अब यह दफ्तर न्यू राजेंद्र नगर के एक काम्पलेक्स में शिफ्ट हो गया है। इस दफ्तर में अब भी किसानों को भटकते हुए देखा जा सकता है। कामकाज को देखने के लिए पदस्थ किए गए एक तहसीलदार&amp;nbsp; के काम काज को लेकर भी ग्रामीणो में आक्रोश देखा गया।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-3116895130928674245?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/3116895130928674245/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=3116895130928674245&amp;isPopup=true' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3116895130928674245'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3116895130928674245'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post_20.html' title='नई राजधानी में नत्था ही नत्था'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJdyjdo3reI/AAAAAAAAAo8/Ty3zDCaoOSU/s72-c/rill-+final.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-7551179286482624897</id><published>2010-09-17T05:54:00.000-07:00</published><updated>2010-09-17T06:52:26.618-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='एयर होस्टेस'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='काली लड़की'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='छत्तीसगढ़ सरकार'/><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='आदिवासी लड़की'/><title type='text'>नहीं चलेगी काली लड़की</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJNyPPuXsBI/AAAAAAAAAok/nQ22AXXALFA/s1600/t-7.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJNyPPuXsBI/AAAAAAAAAok/nQ22AXXALFA/s320/t-7.jpg" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&amp;nbsp;‘&lt;b&gt;‘वे घृणा करते हैं हमसे/हमारे कालेपन से &lt;br /&gt;हंसते हैं, व्यंग्य करते हैं हम पर, &lt;br /&gt;हमारे अनगढ़पन पर कसते हैं, फब्तियां&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मजाक उड़ाते हैं हमारी भाषा का हमारे चाल-चलन का&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; रीति-रिवाज कुछ भी पसन्द नहीं हैं उन्हें&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt; पसन्द नहीं है हमारा पहनावा-ओढ़ावा &lt;br /&gt;जंगली/असभ्य/पिछड़ा कहकर हिकारत से &lt;br /&gt;देखते हैं हमें&amp;nbsp; और अपने को सभ्य/श्रेष्ठ &lt;br /&gt;समझकर नकारते हैं हमारी चीजों को।’’&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;‘मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर में’ शीर्षक से लिखी गई निर्मला पुतुल की यह कविता छत्तीसगढ़&amp;nbsp; प्रदेश की उन आदिवासी बालाओं पर सौ फीसदी सच बैठती है जो एयर होस्टेस का प्रशिक्षण ले चुकी हैं या फिर लेने जा रही है। जी हां.. यह सच है। एयर होस्टेस बनाने के नाम पर आदिवासी बालाओं के साथ लगातार मजाक किया जा रहा है। प्रदेश के आदिम जाति कल्याण विभाग ने जब वर्ष 2006 में यह योजना लांच की तब उसका उद्देश्य यही था कि आदिवासी इलाकों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्हें ‘रोजगार’ प्राप्त करने की दिशा में ठीक-ठाक कूबत रखने के लायक बनाया जाएगा, लेकिन योजना में प्रशिक्षण लेने वाली किसी भी एक लड़की को अब तक एयर होस्टेस की नौकरी नहीं मिल पाई है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इंडियन एयर लाइंस ने गत दस सालों से होस्टेस की नई भर्ती का दरवाजा बंद रखा है, जिन निजी कंपनियों ने भर्ती चालू रखी है उन्हें ‘गोरे रंग पर गुमान’ करने वाली लड़कियों की जरूरत हैं। आदिवासी मामलों के एक जानकार एसआर शर्मा का कहना है कि देश और दुनिया के तमाम आदिवासी इलाकों में रहने वाले पुरूषों और महिलाओं की हाइट कम ही होती है और रंग काला। बाजारवाद के इस दौर में जाहिर सी बात है कि जिस किसी भी लड़की की हाइट कम होगी और उसका रंग काला होगा तो वे निजी एयर लांइस की सेवाओं के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाएंगी। हालांकि देश के किसी भी कानून में यह नहीं लिखा है कि काली लड़कियां योग्य नहीं होती या उनमें प्रतिभा नहीं होती, लेकिन यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि सुंदर नाक-नक्श और साफ रंग रखने वाली लड़कियां, कम से कम निजी संस्थाओं में, नौकरी हासिल करने के मामले में ज्यादा बाजी मारती रही है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;आदिवासी बालाओं को एयर होस्टेस योजना के तहत प्रशिक्षण दे चुके अनूप वर्मा भी योजना की सबसे बड़ी खामी आदिवासी क्षेत्रों से लड़कियों के चयन को ही मानते हैं। श्री वर्मा का कहना है कि आदिवासी लड़कियों को अंग्रेजी सीखाने के लिए काफी परिश्रम करना पड़ता है। इसके अलावा किसी लड़की की हाइट पांच फीट दो इंच से कम हुई, चेहरे पर दाग या रंग काला हुआ तो तय है कि उसका बहुत भला नहीं होता। श्री वर्मा एयर होस्टेस का प्रशिक्षण देने के बजाए एयरपोर्ट प्रबंधन का कोर्स चलाने की वकालत करते हुए आदिम जाति कल्याण मंत्री केदार कश्यप से मुलाकात कर चुके हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार ठीक ढंग से एविएशन का प्रशिक्षण&amp;nbsp; देगी तो लड़कियों का उपयोग एयर टिकिटिंग व अन्य जगहों पर किया जा सकता है। आदिवासी लड़कियों को एयरहोस्टेस का काम नहीं मिल पाने के सवाल पर आदिम जाति कल्याण विभाग के सचिव आरपी मंडल का कहना है कि अभी शुरूआत है। श्री मंडल मानते है कि एक न एक दिन प्रदेश की आदिवासी लड़कियां ऊंची उड़ान भरेंगी। उन्होंने यह स्वीकार किया कि भले ही लड़कियां प्रशिक्षण लेने के बाद एयरहोस्टेस नहीं बन पाई हैं लेकिन उन्हें प्रबंधन के क्षेत्र में रोजगार मिला है।&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp; नहीं मिला रिस्पांस&lt;/b&gt;&amp;nbsp;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&amp;nbsp; एक लड़की के प्रशिक्षण पर विभाग नब्बे हजार रुपए खर्च करता है। जिस किसी भी संस्था को प्रशिक्षण का काम सौंपा जाता है उसे अनुसूचित जाति-जनजाति की कुल 90 लड़कियों को प्रशिक्षित करना होता है, लेकिन वर्ष 2006 से लेकर अब तक मात्र 40-42 लड़कियों ने ही प्रशिक्षण हासिल किया है। सूत्रों का कहना है कि प्रशिक्षण लेने के लिए काफी लड़कियों ने आवेदन लगाया था लेकिन मापदंडों का हवाला देकर अधिकांश का चयन ही नहीं किया गया। जो लड़कियां प्रशिक्षण के लिए चयनित की गई थीं उनमें से कुछ ने सत्र पूरा किए बगैर घर लौटना जरूरी समझा। जो लड़कियां वापस&amp;nbsp; लौट गई उनके बारे में विभाग ने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की, कि वे क्यों लौटी! लड़कियों को प्रशिक्षण देने का काम एक एयर होस्टेस अकादमी ने किया था। जिन लड़कियों ने इस संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया था उन्हें अपने रहने-खाने की व्यवस्था स्वयं देखनी पड़ी थी। प्रशिक्षण के उपरांत लड़कियों को एयर होस्टेस की नौकरी तो नहीं मिली अलबत्ता कुछ लड़कियां इधर-उधर की होटलों में रिसेप्शनिस्ट बनकर काम करने के लिए मजबूर जरूर हो गई है। बस्तर की एक लड़की इन दिनों हैदराबाद स्थित फिल्मसिटी द्वारा संचालित होटल में कार्यरत है। &lt;b style="color: blue;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;बेहतरी के लिए मंथन जारी&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b style="color: blue;"&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;इस बारे में आदिमजाति कल्याण मंत्री केदार कश्यप से चर्चा की गई तो उन्हों ने कहा कि आदिवासी बालाओं को एयर होस्टेस का प्रशिक्षण देने की योजना इसलिए प्रारंभ की गई थी ताकि युवतियां आत्मनिर्भर होकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उन्होंने योजना को विफल मानने से इंकार किया। श्री कश्यप ने कहा कि योजना को और अधिक दुरुस्त बनाने के लिए&amp;nbsp; मंथन जारी है। उन्होंने बताया कि&amp;nbsp; कुछ दिनों पूर्व ही&amp;nbsp; विमानन विभाग के अफसरों से चर्चा कर यह जानने की कोशिश की है कि इसे और कैसे बेहतर बनाया जा सकता है। युवतियां ठीक-ठाक अंग्रेजी बोल सकें इस पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा उनमें आत्मविश्वास पैदा हों इसका पूरा प्रयास किया जा रहा है। &lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-7551179286482624897?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/7551179286482624897/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=7551179286482624897&amp;isPopup=true' title='20 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7551179286482624897'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7551179286482624897'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post_17.html' title='नहीं चलेगी काली लड़की'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TJNyPPuXsBI/AAAAAAAAAok/nQ22AXXALFA/s72-c/t-7.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>20</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-5691765372911874307</id><published>2010-09-11T05:11:00.000-07:00</published><updated>2010-09-11T05:11:10.318-07:00</updated><title type='text'>गुजिया</title><content type='html'>&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b&gt;दिन और रात &lt;br /&gt;पानी की एक बूंद चखे बगैर &lt;br /&gt;मां ने बनाई थी &lt;br /&gt;हमारे लिए गुजिया&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक झूले में&lt;br /&gt;पूरे सम्मान के साथ &lt;br /&gt;बिठाए गए &lt;br /&gt;भोले बाबा को खिला देने के बाद &lt;br /&gt;जब भी थमाई गई &lt;br /&gt;मेरे हाथों में गुजिया&lt;br /&gt;तो मुझे हमेशा यही लगा &lt;br /&gt;बस पूरी दुनिया जीत ली है मैंने &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;एक बड़े से बिस्कुट के पीपे में&lt;br /&gt;जब कभी सबके हिसाब से&lt;br /&gt;गिनकर रखी गुजिया&lt;br /&gt;तो सच कहूं...&lt;br /&gt;पूरी ताकत लगाकर&lt;br /&gt;मैंने सभी भाइयों का हिस्सा मारा &lt;br /&gt;&lt;br /&gt;मैं यह कभी नहीं जान पाया कि &lt;br /&gt;गुजिया कैसे बनती है&lt;br /&gt;और स्वाद के लिए &lt;br /&gt;क्या-क्या चीजें डाली जाती है उसमें&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b&gt;मुझे सिर्फ इतना पता है कि&lt;br /&gt;मां.. इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि&lt;br /&gt;ठीक नहीं होता किसी भी चीज का कच्चा होना &lt;br /&gt;अपनी आंखो के सामने कढ़ाई में&amp;nbsp; &lt;br /&gt;गुजिया को खूब लाल होता हुआ देखने वाली मां&lt;br /&gt;भगवान को तो कच्चा खिला सकती थी&lt;br /&gt;लेकिन मुझे नहीं&lt;br /&gt;&amp;nbsp; &lt;br /&gt;गुजिया को एक स्थानीय व्यंजन मानने वालों से &lt;br /&gt;मुझे सिर्फ इतना कहना है कि&lt;br /&gt;गुजिया दुनिया का&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;क्षमा करें दुनिया का क्यों&lt;br /&gt;अंतरिक्ष का सर्वश्रेष्ठ पकवान है&lt;/b&gt;&lt;/span&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;इस एक पकवान की खूशबू के सहारे&amp;nbsp;&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;पहुंच सकता हूं मैं उस अंतरिक्ष में&lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;span lang="HI" style="font-family: Mangal;"&gt;&lt;b&gt;जहां मां रहती है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;/span&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-5691765372911874307?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/5691765372911874307/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=5691765372911874307&amp;isPopup=true' title='24 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/5691765372911874307'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/5691765372911874307'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post_11.html' title='गुजिया'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>24</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-5508938953899905764</id><published>2010-09-01T06:54:00.000-07:00</published><updated>2010-09-01T07:01:01.537-07:00</updated><title type='text'>बचाओ.. बचाओ.. अस्मत के लुटेरों से</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TH5cYS4M4tI/AAAAAAAAAoU/FMbS9pM0wec/s1600/s-1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="264" src="http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TH5cYS4M4tI/AAAAAAAAAoU/FMbS9pM0wec/s320/s-1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;कोई उन्हें अपनी कार में घर छोड़ना चाहता है तो कोई देर रात तक दफ्तर में काम करने के लिए दबाव डालता है। किसी की पत्नी बीमार है तो किसी को सपने में स्टेनो टायपिस्ट दिखाई देती है। हर किसी का अंदाज निराला है। सच तो यह है कि गंदी नीयत रखने वाले प्रदेश के मनचले सरकारी मुलाजिमों के चलते कामकाजी महिलाओं का जीना मुहाल हो गया है। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देश के अमूमन हर सरकारी दफ्तर में कामकाजी महिलाओं को वासना की चाश्नी में डूबी हुई भेड़िया नजरों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ दफ्तरों में तो कार्यरत लोगों ने मर्यादाओं की सीमाएं ही लांघ दी है। जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था तब दो प्रकरण प्रदेश की फिज़ां में बेहद खतरनाक ढंग से तैरते हुए नजर आए थे। जशपुर में कलेक्टर रहे श्री सारथी और लिली कुजूर के मामले ने तत्कालीन जोगी सरकार को दाएं-बाएं झांकने के लिए मजबूर होना पड़ा था। एक कार्यालय में कार्यरत लिली कुजूर ने कलेक्टर पर यह आरोप लगाया था कि वे उनसे अनुचित तरह की मांग करते थे। राज्य निर्माण के दौरान ही एक डीएफओ के प्रकरण से भी काफी तहलका मचा था। कुछ समय पहले तक नारायणपुर में पदस्थ रहने के बाद यहां राजधानी में अटैच किए गए डीएफओ गोंविदराव पर एक महिला कर्मी ने दैहिक शोषण का आरोप लगाया था। त्रिपुरा कैडर के एक दूसरे वन अफसर दिनेश उपाध्याय पर उन्हीं के निवास पर रहने वाली एक महिला ने आरोप लगाया था कि श्री उपाध्याय ने पढ़ाई-लिखाई और नौकरी लगाने के एवज में उसके शरीर के साथ लगातार खिलवाड़ किया। मामले की शिकायत मुख्यमंत्री और राज्यपाल से भी की गई थी।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;दुर्ग में पदस्थ रहे एक अपर कलेक्टर का प्रकरण भी राजनीतिक हलकों में खासा चर्चित रहा है। इस अपर कलेक्टर को लेकर कामकाजी महिलाओं ने अपने-अपने विभागों में कई मर्तबा शिकायत की थी, लेकिन मामला तब उलझा जब भिलाई के एक होटल में एक चर्चित महिला नेत्री के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ा। कुछ साल पहले ही राजधानी की एक सरकारी लाइब्रेरी में काम करने वाली एक महिला कर्मी ने लैलूंगा के एक शिक्षक को लेकर यह शिकायत की थी कि जब वह लाइब्रेरी में अकेली बैठी थी तभी शिक्षक ने उसे बुरी नीयत से दबोच लिया था। लैलूंगा का यह शिक्षक राजनीतिक प्रभाव भी रखता था, फलस्वरूप उसने महिला कर्मी को धमकाने का प्रयास भी किया था। लेकिन महिला कर्मी ने अपने साथ हुए अत्याचार की शिकायत न केवल पुलिस थाने में की बल्कि शिक्षक को कोर्ट में भी घसीटा। &lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर विनोद कटेला का प्रकरण भी अजीबो-गरीब रंग लिए हुए है। बिलासपुर में पदस्थ रहे इस अफसर का प्रेम आदिम जाति कल्याण विभाग में कार्यरत एक महिला से चल रहा था। शादीशुदा होने के बाद भी श्री कटेला ने महिला से दूसरी शादी करने का वचन दिया था। एक रोज वे अपने महिला मित्र के साथ रतनपुर के मंदिर गए और वहां उन्होंने उसकी मांग में सिंदूर भर दिया। जब वे एक रेस्टहाउस में हनीमून मना रहे थे तब उन्होंने महिला को आश्वस्त किया की वे जीवन भर साथ निभाने का वचन लिखित में दे सकते हैं। महिला ने भी अफसर को कोरा कागज थमा दिया और कहा कि जो बात वे कह रहे हैं उसे लिखकर दे दें। लिखा-पढ़ी के नाम पर विवाद हुआ तो महिला ने अफसर के सारे कपड़े छिपा दिए और प्रेस वालों को इतला दे दी। प्रकरण में काफी दिनों तक जवाब-तलब चलने के बाद श्री कटेला को पुलिस ने गिरफ्तार किया। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ देना ही ठीक समझा। कुछ साल पहले धमतरी जिले में कार्यरत एक बड़े अफसर के निवास पर वहां कार्यरत एक महिला कर्मी ने आत्महत्या कर ली थी। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में अब भी इस आत्महत्या के संबंध में कई तरह की बातें कही-सुनी जाती है। कांकेर से यहां मंत्रालय में अटैच किए गए एक आईएएस अफसर का मामला भी अभी खत्म नहीं हुआ है। कांकेर जिले के एक प्रमुख पद में पदस्थ रहे अफसर पर वहां कार्यरत एक महिला कर्मी ने यह आरोप लगाया था कि जब अफसर की पत्नी गर्भवती थी तब उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया गया। मामले की शिकायत जब मुख्य सचिव तक पहुंची तो जबरदस्त ढंग से बवंडर मचा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कामकाजी महिलाओं को कमजोर और बेबस समझने वाले सरकारी मुलाजिमों ने अपने पद और गरिमा के साथ भी जबरदस्त ढंग खिलवाड़ किया है। कुछ समय पहले ही महिला आयोग के पास महासमुंद जिले की छात्राओं ने एक शिकायत भेजी है। वनों की रक्षा के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रही छात्राओं ने खुद की रक्षा के संबंध में गुहार लगाई है। छात्राओं का आरोप कि वन विद्यालय के अनुदेशक एलके चौधरी उसने जबरिया ही यौन संबंध कायम करने की चेष्टा करते रहते हैं। छात्राओं के इस आरोप के बाद मामले में सनसनी फैल गई है। आयोग ने भी अपनी तरफ से अनुदेशक पर कार्रवाई की अनुशंसा की है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग बिलासपुर में पदस्थ एक अधीक्षक सूरजभान पाटिल का मामला भी हाल-फिलहाल आयोग के समक्ष पहुंचा है। श्री पाटिल के साथ कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने कहा है कि जब वह घर में अकेली थी तब अधीक्षक ने सूनेपन का फायदा उठाते हुए उसके साथ अश्लील हरकत की है। इधर राजधानी के लोक शिक्षण संचालनालय में कार्यरत एक महिला भृत्य ने भी सहायक ग्रेड-2 के पद पर पदस्थ   एक कर्मचारी महबूब खान पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। मंत्रालय में पदस्थ एक कर्मचारी नेता कीर्ति वर्धन उपाध्याय पर भी एक महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि जब वह घर में अकेली रहती थी तो श्री उपाध्याय उनसे मिलने के लिए मिठाई का डिब्बा लेकर चले आते थे। एक रोज कर्मचारी नेता ने महिला की अस्मत से खिलवाड़ करने का प्रयास किया। मामले की शिकायत के बाद जांच के लिए गठित की गई कमेटी ने श्री उपाध्याय की दो वेतन वृद्धि रोकने की अनुशंसा की है। सच तो यह है कि महिलाओं के साथ उत्पीड़न के मामले में लगातार इजाफा होता जा रहा हैं। प्रदेश के महिला आयोग समक्ष ही बलात्कार के कुल 44 मामले लंबित है। दैहिक शोषण के 83 और प्रताड़ना के 589 मामले विचाराधीन हैं। ज्यादातर प्रकरण सरकारी कर्मचारियों से जुड़े हुए है।&lt;br /&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;कानून हुआ लाचार&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;केन्द्र के निर्देश के बाद अमूमन सभी प्रदेशों ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कमेटी बनाने की अनुशंसा की है। इस अनुशंसा के बाद छत्तीसगढ़ ने भी पहल तो की है लेकिन यह पहल अपर्याप्त दिखती है। महिला एवं बाल विकास विभाग की तरफ से सभी जिले के कलेक्टरों को पत्र के जरिए यह सूचित किया गया है कि वे अपने क्षेत्रों में यौन शोषण रोकने के लिए कमेटियां गठित करें। कई जिलों में तो इन कमेटियों का पता ही नहीं है। जबकि कुछ जिलों में कमेटियां खुल तो गई है लेकिन उसमें कौन लोग हैं और शिकायत कहां करनी है इसकी जानकारी महिला कर्मियों को नहीं मिल पाई है।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इधर महिला एवं बाल विकास मंत्री लता उसेंडी का कहना है कि जिस किसी भी महिला कर्मचारी को यह लगता है कि उसका बॉस उसे  प्रताड़ित कर रहा है या अनुचित मांग करते हुए परेशान कर रहा है वह अपनी शिकायत सीधे मुझे भेज सकती हैं। जो दोषी होगा उसे किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। जबकि महिला आयोग की अध्यक्ष विभाराव का यह कहना है कि आयोग यह नहीं देखता कि कौन सा प्रकरण सरकारी महिलाओं से संबंधित है और कौन सा गैर-सरकारी महिलाओं से जुड़ा हुआ है। महिला तो महिला होती है। यदि किसी ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया है तो वह अपनी शिकायत हम तक भेज सकती हैं। यदि प्रदेश के थानों में महिलाओं की सुनवाई सही ढंग से हो पाती तो हमारे पास शिकायतें ही क्यों आती। निश्चित तौर पर प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न की शिकायतों में इजाफा हुआ है। लेकिन यह भी सच है अब महिलाएं निर्भीक तरीके से शिकायतें भी कर रही हैं।&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-5508938953899905764?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/5508938953899905764/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=5508938953899905764&amp;isPopup=true' title='22 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/5508938953899905764'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/5508938953899905764'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/09/blog-post.html' title='बचाओ.. बचाओ.. अस्मत के लुटेरों से'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://2.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TH5cYS4M4tI/AAAAAAAAAoU/FMbS9pM0wec/s72-c/s-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>22</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-8925675097593046052</id><published>2010-08-30T20:33:00.000-07:00</published><updated>2010-08-30T20:33:09.192-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='विद्या सिन्हा  रंजीता'/><title type='text'>रजनीगंधा और अंखियों के झरोखों से</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THx2nEMtd2I/AAAAAAAAAn8/3jY5kHRPEmI/s1600/ak-2.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="297" src="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THx2nEMtd2I/AAAAAAAAAn8/3jY5kHRPEmI/s320/ak-2.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;अविभाजित मध्यप्रदेश में सिंचाई और वित्त मंत्री रहे रामचंद्र सिंहदेव ने कभी सत्यजीत रे के साथ किया था। उन्होंने कई बंगला फिल्मों के लिए भी फोटोग्राफी की। श्री सिंहदेव फिल्म अभिनेत्री नरगिस को काफी पसन्द करते थे। उन्होंने फिल्मी दुनिया में फोटोग्राफी का काम करते हुए नरगिस की एक से बढ़कर एक सुन्दर तस्वीरें खींची। खैर.. मैं यहां रामचंद्र सिंहदेवजी के बारे में बताने नहीं आया। मैं आपको जानकारी देना चाहता हूं कि निजी तौर पर यदि कभी कोई मुझसे पूछेगा&amp;nbsp; कि आपकी पंसदीदा हिरोइन कौन है तो मैं उससे यह जरूर कहना चाहूंगा कि मैं रजनीगंधा की विद्या सिन्हा और अंखियों की झरोखों की रंजीता पर मरता हूं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;मन्नू भंडारी एक प्रसिद्ध कहानी यही सच है बासु चटर्जी ने वर्ष 1974 में फिल्म रजनीगंधा बनाई थी। यही सच है यदि अपनी जटिल भावभूमि और सघन किस्म की संवेदना के चलते जहां हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियों में शुमार की गई थी तो रजनीगंधा ने हिन्दी सिनेमा की कलात्मक और कामर्शियल विभाजन की सीमा को पहली बार तोड़ा था। रजनीगंधा पहली ऐसी फिल्म है जिसे फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला और क्रिटीक अवार्ड भी। योगेश के गीतों और सलिल दा के संगीत से सजी इस फिल्म में एक मध्यवर्गीय लड़की के मानसिक द्वंद को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया था। यह लड़की दो प्रेमियों के बंटी हुई थी। बहुत सारे लोग इस बात को नहीं जानते होंगे लेकिन यह हकीकत है कि जब फिल्म बन गई तो लगभग साल भर तक फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था। बाद में इस फिल्म का अधिकार ताराचंद बडजात्या ने खरीदा। फिल्म में अमोल पालेकर ने जो कमाल किया था सो किया था लेकिन विद्या सिन्हा ने जो कयामत ढाई थी वह गजब थी। सादगी सौंदर्य क्या होता है यदि आप इस रहस्य को जानना चाहते हैं तो आपको रजनीगंधा जरूर देखनी चाहिए। फिल्म में अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से विद्या सिन्हा ने जिस ढंग से प्यार उड़ेला है कि बस लगता है अभी और इसी वक्त जिन्दगी से कह दिया जाए-प्यारे मंजिल मिल गई। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;इसी तरह राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म अंखियों की झरोखों को भी जब आप देखेंगे तो पाएंगे कि आप कही शांत तरीके से बहते चले जा रहे हैं। फिल्म बेहद हल्के-फुल्के ढंग से कालेज के एक परिसर से शुरू होती है लेकिन जब अंत होता है तो दर्शक का दिल बैठ जाता है। फिल्म में रंजीता ने एक ईसाई लड़की की भूमिका अदा की थी। इस लड़की के प्यार में पागल हीरो कब जिन्दगी की सच्चाईयों से सामना करने लगता है उसे पता ही नहीं चलता। फिल्म के अंत में वह जिस सच्चाई का सामना करता है वह है अपने सबसे प्रिय के दूर चले जाने का। जिन दिनों यह फिल्म आई थी मैं नया-नया ही कालेज पहुंचा था। कालेज पहुंचने के मैंने सबसे पहला काम रंजीता को खोजने का ही किया था लेकिन रंजीता नहीं मिली। जिन दो-चार लड़कियों से दोस्ती हुई वे सिर्फ इसलिए दोस्त बनी क्योंकि उन्हें कालेज के ड्रामे में रोल चाहिए था। कालेज में मेरा ड्रामे का एक ग्रुप था। बाद में यही ग्रुप कोरस भिलाई के नाम से जाना गया। अब इसे मेरे साथी चला रहे हैं। एक सच्चाई आपको और बताता हूं और वह यह कि मुझे जब कभी भी सर्दी-जुकाम होता है तो मैं विद्या सिन्हा और रंजीता को याद करता हूं। दोनों फिल्म में इन अभिनेत्रियों को सर्दी नहीं लगती लेकिन सर्दी-जुकाम के बाद लड़कियां कितनी खूबसूरत दिखती है, उस खूबसूरती का अहसास दिलाती है दोनों फिल्में। बहरहाल दोनों फिल्मों के गीतों का एक मुखड़ा यहां दे रहा हूं। गुनगुना लेंगे तो भी आपकी बेचैन रूह को रूह-आफजा मिल जाने का अनुभव होगा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूं ही जीवन में&lt;br /&gt;जैसे महके प्रीत पिया के मेरे अनुरागी मन में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;हर पल मेरी इन आंखों में बस रहते हैं सपने उनके&lt;br /&gt;मन कहता है मैं रंगों की एक प्यार भरी बदली बनके&lt;br /&gt;बरसूं उनके जीवन में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अधिकार ये जबसे साजन का हर धड़कन पर माना मैंने&lt;br /&gt;मैं जब से उनके साथ बंधी ये भेद तभी जाना मैंने &lt;br /&gt;कितना सुख है बंधन में&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;--------------------------------------------------------------------- &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;a href="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THx29phcZXI/AAAAAAAAAoM/g01J-K93k6I/s1600/ak-1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="186" src="http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THx29phcZXI/AAAAAAAAAoM/g01J-K93k6I/s320/ak-1.jpg" width="320" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अंखियों के झरोखों से&lt;br /&gt;मैंने देखा जो सांवरे&lt;br /&gt;तुम दूर नजर आए&lt;br /&gt;बड़ी दूर नजर आए&lt;br /&gt;बंद करके झरोखों को&lt;br /&gt;जरा बैठी जो सोचने&lt;br /&gt;मन में तुम्ही मुस्काए&lt;br /&gt;अंखियों के झरोखों से..&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;मैं जबसे तेरे प्यार के &lt;br /&gt;रंगों में रंगी हूं&lt;br /&gt;जगते हुए सोई रही&lt;br /&gt;नींदों में जगी हूं&lt;br /&gt;मेरे प्यार भरे सपने&lt;br /&gt;कहीं कोई न छीन ले&lt;br /&gt;दिल सोचके घबराए&lt;br /&gt;अंखियों के झरोखों से..&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-8925675097593046052?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/8925675097593046052/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=8925675097593046052&amp;isPopup=true' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8925675097593046052'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/8925675097593046052'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/08/blog-post_30.html' title='रजनीगंधा और अंखियों के झरोखों से'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THx2nEMtd2I/AAAAAAAAAn8/3jY5kHRPEmI/s72-c/ak-2.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-3716360171775859730</id><published>2010-08-28T10:31:00.000-07:00</published><updated>2010-08-28T10:44:21.240-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='सपनें'/><title type='text'>सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;संगीता स्वरुप जी अक्सर अपने ब्लाग पर ख्वाबों को लेकर कुछ न कुछ बेहतर लिखती है। मुझे उनमें एक बात जो सबसे अच्छी लगती है वह यह कि उनका यकीन अब भी ख्वाब देखने को लेकर बना हुआ है। सच तो यह है कि जो आदमी सपना नहीं देखता वह जिन्दा रहने के पहले ही अपने आपको खत्म&amp;nbsp; कर लेता है। पंजाबी के प्रसिद्ध कवि अवतार सिंह पाश ने भी कहा है कि&lt;span style="color: red;"&gt; &lt;/span&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना।&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कवि पाश की यह बात पूरी तरह से सच है क्योंकि एक सपना ही है जो हमें आगे बढ़ाता है, पीछे धकेलता है और रास्ता भी बताता है। अब सवाल यह है कि सपनों को हकीकत में बदलने के लिए क्या किया जाए। अव्वल तो पहले वही सपना देखना चाहिए जिस सपने से आपका आत्मीय रिश्ता कायम हो सकें। अब हेमामालिनी का सपना देखकर कोई यह सोचे कि उसकी बिटिया से ब्याह कर लेगा तो इसे सपना मानना भी गलत है। हर वह सपना जिसका उदेश्य पवित्र नहीं होता वह कभी पूरा नहीं होता। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है लेकिन हकीकत है कि डिस्को डांसर मिथुन चक्रवर्ती ने जब फिल्मों में प्रवेश किया था तब उन्होंने यह तय कर लिया था कि वे एक न एक दिन योगिताबाली से शादी करेंगे। बंगाली दादा का यह सपना कुछ सालों में ही पूरा हो गया।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जब कभी भी सपनों की बात की जाती है तो उसमें चुपके से लड़की का प्रवेश जरूर होता है। जैसा इस समय मैं कर रहा हूं,लेकिन अपने को बेहतर मुकाम तक पहुंचाने वाले मेरे मित्र का मानना है कि&amp;nbsp; जिस सपने कोई लड़की लिपिस्टिक की मांग के बजाए आपके आगे बढ़ने का इरादा लेकर प्रवेश करती है उसी दिन सपना पूरा हो जाता है। सपनों के पूरे होने को कुछ लोग मन्नत का पूरा होना भी कहते हैं। इसलिए सपनों को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि आप बंद और खुली दोनों आंखों से सपना देखते रहिए । हां एक बात और सपना केवल आंखों से नहीं दिमाग में लगे लैस से भी देखा&amp;nbsp; जाता है। किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;ख्वाब जिने जवान होते हैं&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;वो बड़े भाग्यवान होते हैं.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: red;"&gt;&lt;b&gt;जानिसार अख्तर ने भी क्या गजब ढाया है-&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुजरी&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मैं चंद ख्वाब जमाने में छोड़ आया था.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: blue;"&gt;&lt;b&gt;डाक्टर राहत इंदौरी फरमाते हैं- &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;अपनी ताबीर के चक्कर में मेरा जागता ख्वाब&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;रोज सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: magenta;"&gt;&lt;b&gt;कुमार ललित का यह शेर भी बड़े काम का है-&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;इस जलती धूप में चलने का मजा लो&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;चाहो तो कोई ख्वाब नया फिर से सजा लो.&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="color: purple;"&gt;&lt;b&gt;दारा बानों ने क्या गजब लिखा है-&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;मैंने ये सोच के बोए नहीं ख्वाबों के दरख्त&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;कौन जंगल में लगे पेड़ों को पानी देगा&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;तो मित्रों ख्वाबों को कोसना बेकार है। ख्वाब जब कभी भी आए उसके साथ बैठकर दो बातें जरूर करें। कम से कम इतना तो जरूर पूछ सकते हैं- क्यों आते हो दोस्त जब तुमको ये मालूम है कि मेरी नींद किसी मालिक ने गिरवी रख ली है। अब आ ही गए तो बता दो पानी के साथ गुड़ लोगे या बताशा. &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-3716360171775859730?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/3716360171775859730/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=3716360171775859730&amp;isPopup=true' title='17 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3716360171775859730'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/3716360171775859730'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/08/blog-post_28.html' title='सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><thr:total>17</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6417970623290078794</id><published>2010-08-26T19:35:00.000-07:00</published><updated>2010-08-26T19:35:46.667-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='परिन्दें'/><title type='text'>एक पोस्ट परिन्दों पर...</title><content type='html'>&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THckCOE2L1I/AAAAAAAAAn0/pHXGpaYg6h0/s1600/parenda-1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="320" src="http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THckCOE2L1I/AAAAAAAAAn0/pHXGpaYg6h0/s320/parenda-1.jpg" width="308" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;परिन्दें किसे अच्छे नहीं लगते। जो लोग कुदरत के इस अनमोल उपहार को पसन्द नहीं करते उनसे बड़ा बेवकूफ इस दुनिया में नहीं है। अभी हाल के दिनों में किसी मुंबईयां निर्माता ने लंफगे परिन्दे नामक फिल्म बनाई है। अव्वल तो मुझे लंफगे निर्माता की इस लंफगी हरकत पर ही आपत्ति है। भला बताइए अब कोई परिन्दा इधर-उधर उड़ रहा है। इस डाल से उस डाल पर बैठ रहा है तो क्या लंफगा हो जाएगा। लंफगे निर्माता को चाहिए था कि वह फिल्म का टाइटल रखने के पहले कम से कम नूर-तकी-नूर का शेर जरूर पढ़ लेता। नूर साहब ने क्या खूब लिखा है-&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b style="color: red;"&gt;परिन्दों में तो ये फिरकापरस्ती भी नहीं देखी&lt;br /&gt;कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे।&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;परिन्दों को लेकर शायरों ने एक से बढ़कर एक बातें लिखी है। परिन्दों को लेकर जितनी भी बातें कही गई है उनमें कहीं न कही मनुष्य अपना दर्द भी खोजता है। कभी एकांत में यदि आप कवि प्रदीप का गीत -&lt;b style="color: blue;"&gt;पिंजरे के पंछी रे... तेरा दर्द न जाने कोई &lt;/b&gt;सुनेंगे तो दिल भर आएगा। रफी साहब का गाया हुआ यह गीत भी कम दर्दनाक नहीं है-&lt;b style="color: purple;"&gt; याद न जाए बीतों दिनों की... इसमें एक लाइन है- दिन जो पखेरू होते, पिंजरे में मैं रख लेता। पालता उनको जतन से मोती के दाने देता। सीने से रहता लगाए। &lt;/b&gt;सच तो यह है कि परिन्दें मनुष्य की हर हरकत के साथ खड़े हैं। मनुष्य की असीम जिजीविषा के परिचायक भी है परिन्दें। कुछ पंसदीदा शेर यहां दे रहा हूं। शायद आपको अच्छा लगे।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जाने कितनी उड़ान बाकी है&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;इस परिन्दें में जान बाकी है.&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;b&gt;(राजेश रेड्डी)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;हारे हुए परिन्दें जरा उड़ के देख तो&lt;br /&gt;आ जाएगी जमीन पे छत्त आसमान की.&lt;br /&gt;(नीरज)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;छत्त पर नए परिन्दों से जब खुलकर बातें करनी हो&lt;br /&gt;एक कटोरे में पानी दूजे में दाने रख देना&lt;br /&gt;(अशोक वर्मा)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&lt;br /&gt;अनाज अपनी छत्तों पर जो सुखाना छोड़ देते है&lt;br /&gt;परिन्दें उनके घर में आना-जाना छोड़ देते हैं&lt;br /&gt;(रामप्रसाद बेखुद)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;अंजाम उनके हाथ है आगाज करके देख&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;भीगे हुए परों से ही परवाज करके देख &lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;( नवाज देवबंदी)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&lt;b&gt;हो ललक जिनमें जरा सी भी गगन छूने की&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;हौसला ऐसे परिन्दों का बढ़ाते रहिए&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;( नाज) &lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;ये किस अजीब सी दुनिया में आ गए हैं हम&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;जहां परिन्दें तो होते हैं, पर नहीं होते&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;(राजेश रेड्डी) &lt;br /&gt;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आबो-दाना किसी बिगड़े हुए बच्चे की तरह&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;मैं जहां शाख पै बैठूं कि उड़ाता है मुझे&lt;br /&gt;&amp;nbsp;( राहत इंदौरी)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;परों में सिमटा, तो ठोकर में था, जमाने की&lt;br /&gt;&amp;nbsp; उड़ा तो सारा जमाना मेरी उड़ान में था&lt;br /&gt;&amp;nbsp; (वसीम बरेलवी)&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;हर शाख पे सहमे हुए बैठे हैं परिन्दे&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;क्या कह के गई होगी हवा सोच रहा हूं&lt;br /&gt;&amp;nbsp;&amp;nbsp; (ताजदार ताज)&amp;nbsp;&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;दो परिन्दें उड़े आंख नम हो गई&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;आज समझा कि मैं तुझको भूला नहीं&lt;/b&gt;&lt;br /&gt;&lt;b&gt;&amp;nbsp;( खुमार बाराबंकवी)&lt;/b&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-6417970623290078794?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/6417970623290078794/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=6417970623290078794&amp;isPopup=true' title='29 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6417970623290078794'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/6417970623290078794'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/08/blog-post_26.html' title='एक पोस्ट परिन्दों पर...'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://4.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THckCOE2L1I/AAAAAAAAAn0/pHXGpaYg6h0/s72-c/parenda-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>29</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-7743108051671498094</id><published>2010-08-25T11:56:00.000-07:00</published><updated>2010-08-26T03:48:24.825-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='उदय चोपड़ा'/><title type='text'>जय हो उदय चोपड़ाओं की</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;div class="separator" style="clear: both; text-align: center;"&gt;&lt;a href="http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THVnESDavOI/AAAAAAAAAns/m6iZyHOHxpU/s1600/ud-1.jpg" imageanchor="1" style="clear: left; float: left; margin-bottom: 1em; margin-right: 1em;"&gt;&lt;img border="0" height="187" src="http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THVnESDavOI/AAAAAAAAAns/m6iZyHOHxpU/s200/ud-1.jpg" width="200" /&gt;&lt;/a&gt;&lt;/div&gt;अपनी हर दूसरी फिल्म में पंजाबी गानों के साथ लाल-पीले/ हरे-नीले फूलों का बगीचा दिखाने वाले यश चोपड़ा के &lt;b style="color: red;"&gt;सबसे छोटे बेटे का नाम है-उदय चोपड़ा। &lt;/b&gt;आज जब मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि वह उदय चोपड़ा पर कविता लिखने जा रहा है तो थोड़ी देर के लिए तो मैं भी चौक गया।&amp;nbsp; भला कोई उदय चोपड़ा पर कैसे वक्त बरबाद कर सकता है, लेकिन जब मित्र ने बताया कि हम सब उदय चोपड़ाओं के युग में सांस लेकर जीने के लिए मजबूर है तो मैं भी सोच में पड़ गया। मित्र जब यह बात कह रहा था तो उसका सारा जोर चोपड़ाओं को लेकर था। मैंने चोपड़ाओं को&amp;nbsp; बेहद पावरफुल तरीके से अभिव्यक्त करने का कारण पूछा तो उसने कहा कि जब मोहब्बत जैसा पवित्र शब्द मोहब्बतें हो सकता है तो फिर एक चोपड़ा &lt;b style="color: blue;"&gt;बहुवचन &lt;/b&gt;में क्यों नहीं बदल सकता। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;देखा जाए तो &lt;b style="color: red;"&gt;एक अमीर परिवार की बड़ी नाकामी का नाम है उदय चोपड़ा, &lt;/b&gt;लेकिन जब लोगों के पास पैसा होता है। बगैर दाढ़ी-मूंछ के थोड़ी सा कसरती बदन होता है&amp;nbsp; तो वे अपनी नाकामी को दबाने की भरपूर कोशिश करते रहते हैं।&amp;nbsp; सुपारी, मेरे यार की शादी है, नील एंड निक्की, प्यार इम्पासिबल, मुझसे दोस्ती करोगे जैसी कुछ फ्लाप फिल्मों में काम करने वाले उदय चोपड़ा को अब तक मात्र मोहब्बतें और धूम फिल्म में सफलता मिली है, लेकिन यह सफलता उसकी न होकर किसी और के खाते में ही गई है। मोहब्बतें में सारा श्रेय जहां शाहरूख खान और अभिताभ बच्चन ने ले लिया था तो धूम वन और टू में अभिषेक बच्चन, जान अब्राहम और रितिक रोशन ने बाजी मारी थी। हीरो मटेरियल न होने की वजह से उदय ने अब एक्टिंग के बजाए डायरेक्शन के क्षेत्र में भाग्य आजमाने का फैसला किया है। चर्चा है कि वे फिल्म धूम-थ्री का निर्देशन करने जा रहे हैं। वैसे उदय चोपड़ा ने&amp;nbsp; इससे पहले कहानी और पटकथा के क्षेत्र में भी भाग्य आजमाया था लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। प्यार इम्पासिबल नामक वाहियात सी फिल्म की कहानी उन्होंने ही लिखी थी और दुर्भाग्य की बात है कि इस फिल्म को दर्शकों का प्यार मिलना भी इम्पासिबल साबित हुआ। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;br /&gt;&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;अब बात मित्र द्वारा लिखी जाने वाली कविता को लेकर हो जाए। मेरा मित्र एक प्रसिद्ध कवि है। उसकी कविता अमूमन देश की सभी बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। मुझे लगता है कि मित्र उदय चोपड़ा के बहाने पूंजी के खेल को लेकर कोई सार्थक रचना करने वाला है। सच तो यही है कि आज&amp;nbsp; जिस किसी के पास भी&amp;nbsp; थोड़ा सा धन है वह रचनात्मक काम करने का शानदार ढोंग तो कर ही कर सकता है। हो सकता है कि मेरा मित्र&amp;nbsp; कम प्रतिभाशाली लोगों की चापलूसी के बाद&amp;nbsp; हासिल होने वाली पद और प्रतिष्ठा के बारे में कुछ लिखे।&amp;nbsp; मेरे मित्र ने&amp;nbsp; काफी पहले करिश्मा कपूर को लेकर भी एक कविता लिखी थी। कविता में जब उसने यह लिखा था कि और लोगों की तरह करिश्मा कपूर ने भी तय किया है कि वह रक्तदान करेंगी तो मुझे खूब हंसी आई थी। देखा जाए तो वाकई यह पूरा देश उदय चोपड़ाओं सरीखे लोगों के चलते ही बर्बाद हो रहा है। उदय चोपड़ा पर बात करते-करते मुझे याद आया कि मेरा एक कथित मित्र भी अपने आर्टिकल में दूसरों की कविता को ठूंस-ठूंसकर उसे अपना साबित करने का ढोंग करता रहा है। उसकी इस चौर्य प्रतिभा का जब&amp;nbsp; खुलासा&amp;nbsp; हो गया तो उसने लिखना ही बंद कर दिया। भले ही दूसरों ने यह भ्रम नहीं पाला कि वह एक अच्छा रायटर है लेकिन मित्र इस आत्ममुग्धता का शिकार तो है ही कि उससे बढि़या लेखक कोई और नहीं है। सचमुच उदय चोपड़ाओं की कमी नहीं है देश में। पर क्या उदय चोपड़ा ही है इस देश में। यह देश नवीन निश्चल, विजय अरोड़ा, धीरज कुमार, किरणकुमार और अनिल धवनों से भी&amp;nbsp; भरा पड़ा है। शायद चोपड़ाओं में इसी तरह के लोग आते होंगे। &lt;b&gt;&lt;span style="color: red;"&gt;जय हो उदय चोपड़ाओं की। &lt;/span&gt;&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;div class="blogger-post-footer"&gt;&lt;img width='1' height='1' src='https://blogger.googleusercontent.com/tracker/1484985172010065289-7743108051671498094?l=sonirajkumar.blogspot.com' alt='' /&gt;&lt;/div&gt;</content><link rel='replies' type='application/atom+xml' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/feeds/7743108051671498094/comments/default' title='Post Comments'/><link rel='replies' type='text/html' href='http://www.blogger.com/comment.g?blogID=1484985172010065289&amp;postID=7743108051671498094&amp;isPopup=true' title='16 Comments'/><link rel='edit' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7743108051671498094'/><link rel='self' type='application/atom+xml' href='http://www.blogger.com/feeds/1484985172010065289/posts/default/7743108051671498094'/><link rel='alternate' type='text/html' href='http://sonirajkumar.blogspot.com/2010/08/blog-post_25.html' title='जय हो उदय चोपड़ाओं की'/><author><name>राजकुमार सोनी</name><uri>http://www.blogger.com/profile/07846559374575071494</uri><email>noreply@blogger.com</email><gd:image rel='http://schemas.google.com/g/2005#thumbnail' width='26' height='32' src='http://1.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/TD2wlunjxBI/AAAAAAAAAlI/rVlkp3v2Zv0/S220/rajkumar+soni-f.jpg'/></author><media:thumbnail xmlns:media='http://search.yahoo.com/mrss/' url='http://3.bp.blogspot.com/_JUH7j5vELqA/THVnESDavOI/AAAAAAAAAns/m6iZyHOHxpU/s72-c/ud-1.jpg' height='72' width='72'/><thr:total>16</thr:total></entry><entry><id>tag:blogger.com,1999:blog-1484985172010065289.post-6725658493912674771</id><published>2010-08-21T20:39:00.000-07:00</published><updated>2010-08-21T20:47:39.526-07:00</updated><category scheme='http://www.blogger.com/atom/ns#' term='अखबार लाइन'/><title type='text'>अखबार लाइन की कुछ मजेदार बातें</title><content type='html'>&lt;div style="text-align: justify;"&gt;&lt;b&gt;मित्रों आज मैं आपको अखबार लाइन की कुछ मजेदार बातों के बारे में बताने जा रहा हूं। इन मजेदार बातों से आप अपना मनोरंजन तो कर सकते हैं लेकिन यह सोचने के लिए भी स्वतंत्र है कि पीपली लाइव में जो कुछ दिखाया गया है वह गलत नहीं है। हकीकत तो यही है कि दूसरों के चेहरों पर तमाचा मारने वाला मीडिया कभी अपने चेहरे पर तमाचा मारकर खुद को जगाने का प्रयास नहीं करता है। &lt;/b&gt;&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;1-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; मेरे एक परिचित बड़ी मुसीबतों में अखबार निकालते थे। एक रोज उन्होंने अपने एक संवाददाता को एक झोलाझाप डाक्टर के पास विज्ञापन लाने के लिए भेजा। अखबार छोटा था इसलिए संवाददाता को केवल पेट्रोल का खर्चा दिया जाता था। संवाददाता भी खुशी-खुशी विज्ञापन लाने चला गया। जब वह डाक्टर के पास पहुंचा तो उसे सबसे पहले इस सवाल का सामना करना पड़ा कि तुम्हारा अखबार निकलता कहां से है। संवाददाता ने अखबार के प्रकाशन की जगह के साथ उसकी प्रसार संख्या भी बता दी। लंबी बहस के बाद डाक्टर ने संवाददाता को यह कहकर भगा दिया कि जो संवाददाता अखबार में खबर से ज्यादा प्रसार संख्या का ख्याल रखता है उसके अखबार में विज्ञापन नहीं देना है। संवाददाता ने लौटकर अपने संपादक को नमक-मिर्च लगाकर यह बात बताई। अगले दिन अखबार में डाक्टर के निधन का समाचार उसके फोन नंबर के साथ छपा हुआ था। लोगों ने डाक्टर के घर फोन लगाना शुरू किया कि भाई डाक्टर कब अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़कर चला गया है। जब डाक्टर लगातार हो रही पूछताछ से परेशान हो गया तो उसने संपादक को झूठी खबर छापने के लिए फोन लगाया। डाक्टर का फोन आने के बाद संपादक ने क्या जवाब दिया जानते हैं।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;जो डाक्टर हमारे अखबार को एक विज्ञापन के लायक नहीं समझता &lt;b style="color: blue;"&gt;वह हमारे लिए मर ही गया है।&lt;/b&gt;&lt;/div&gt;दूसरे दिन डाक्टर को अपने जीवित होने का एक विज्ञापन अखबार को देना पड़ा.&lt;br /&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;2-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; धमाकेदार खबर छापने के लिए मशहूर एक संवाददाता पर उसका संपादक इस बात के लिए शक करता था कि हो न हो संवाददाता इधर-उधर से कमाता जरूर है। इस ऊपरी कमाई का पता लगाने के लिए उसने प्रेस के दूसरे संवाददाताओं के उसके पीछे लगा रखा था। दूसरे संवाददाता भी संपादक को धमाकेदार खबर छापने वाले संवाददाता के बारे में उल्टी-सीधी जानकारी दिया करते थे। एक रोज एक बेवकूफ किस्म के संवाददाता ने संपादक को समझाया- सर... अब तो हद हो गई है राजेश की। सीधे-सीधे प्रेस मे ही पैसा लेने लगा है। ये नहीं कि कहीं डील हो तो बाहर कर लें। बस सब कुछ आपकी आंख के नीचे हो रहा है और आप खामोश है। संपादक ने बेककूफ संवाददाता से पूछा कि हम प्रमाणित कैसे करेंगे कि राजेश पैसे खाता है। &lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;कुछ नहीं सर जो लोग भी राजेश का नाम लेकर मिलने आते हैं बस उनसे बोलिए कि मैं ही राजेश हूं वे ही आपको पैसा निकालकर दे देंगे। संपादक को यह बात जंच गई। इस बीच राजेश से जलने वाले संवाददाताओं ने तय किया कि अपने परिचित के हाथों राजेश के नाम का एक लिफाफा संपादक के पास भेज देंगे। योजना अन्जाम तक पहुंचती इससे पहले कुछ लोग बड़ी शालीनता के साथ प्रेस पहुंचे और उन्होंने आते ही संपादक से पूछा- राजेश कहां मिलेगा। संपादक भरा बैठा था उसने भी आगुन्तकों से पूछा बताइए.. मैं ही हूं राजेश. क्या कुछ देना है राजेश को।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;बस इतना सुनते ही एक शरीफ आदमी चिल्लाया- तो तू ही है राजेश। साले बहुत उल्टा-सीधा छापता है। तेरे को तो &lt;b style="color: red;"&gt;खुराक पानी &lt;/b&gt;देना ही है। बस फिर क्या था राजेश बनकर बात करने वाले संपादक की वो धुनाई हुई कि ... मामला पहले अस्पताल और बाद में पुलिस तक जा पहुंचा।&lt;/div&gt;&lt;br /&gt;&lt;div style="text-align: justify;"&gt;3-&amp;nbsp;&amp;nbsp;&amp;nbsp; अखबार लाइन में जितनी प्रतिस्पर्धा बाहर चलती है उससे कहीं ज्यादा भीतरी हिस्सों में जारी रहती है। एक बार एक वरिष्ठ संवाददाता की अपने संपादक से ठन गई। संपादक ने भी तय किया कि वह जूनियर से जूनियर रिपोर्टर की खबर को नाम देकर छापेगा और वरिष्ठ को मजा चखाकर रहेगा। बस जंग शुरू हो गई। जूनियर रिपोर्टर नाली-कचरे की भी खबर लेकर आते तो उनके नाम से छपती लेकिन वरिष्ठ संवाददाता की खबर को कहीं किसी कोने में फेंक दिया जाता था। सीनियर ने भी अपने संपादक को मजा चखाने का पक्का प्रबंध किया। एक बार इलाके में किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ। जूनियर रिपोर्टर खबर लेकर आया- सर... बलात्कार हो गया है। खबर छपी- महिला के साथ बलात्कार........ लेकिन यह क्या खबर में यह भी छपा था कि इस मौके पर प्रदेश के गृहमंत्री भी अपने दलबल के साथ मौजूद थे। दरअसल वरिष्ठ संवाददाता ने जूनियर की कापी के अंत में एक गृहमंत्री के स्वागत समारोह का एक पन्ना कहीं से चिपका दिया था। बंवडर मचा और गृहमंत्री के दबाव के बाद संपादक को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।&lt;/div&gt;&lt;div style="text-align: j
