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Sunday, February 6, 2011

.. तो क्या इन्हें तुम्हारा बाप गिरफ्तार करेगा

अभी दो रोज पहले अखबारों में एक खबर छपी है. एक नाबालिग को सिर्फ इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया क्योंकि वह किसी महिला पुलिसकर्मी को उसकी मीठी आवाज के कारण फोन किया करता था. इस खबर को पढ़ने के बाद मुझे हैरत इसलिए हुई क्योंकि मेरा मन यह मानने को तैयार ही नहीं है कि महिला पुलिसकर्मी की आवाज मीठी हो सकती है. राजधानी की महिलापुलिस कर्मियों के मुंह से किस तरह के फूल झरते हैं यह बात किसी से छिपी नहीं है. एक महिला पुलिसकर्मी तो गोला बीड़ी पी-पीकर ही लोगों की मां और बहनों से हिसाब-किताब पूरा करते रहती है. खैर... नाबालिग छबिराम का कसूर मात्र इतना था कि वह एक मजदूर का बेटा है और स्वयं भी मजदूरी किया करता था. अपनी मजदूरी की कमाई से ही उसने अंबानी के फोन को कान से लगाने की दुस्साहस दिखाया था. वैसे तो इस देश का सबसे बड़ा दुर्भाग्य ही यही है कि गरीब और मजदूर आदमी मोबाइल ही नहीं खरीद सकता. यदि किसी गरीब ने गलती से फोन खरीद लिया तो लोगों को यह लगने लगता है कि साले ने कहीं से हाथ साफ किया होगा.समाज का एक बड़ा तबका अब भी यह मानने को तैयार नहीं है कि लोग अपनी मेहनत की कमाई से गाड़ी घोड़ा खरीद सकते हैं. हवाई जहाज में यात्रा कर सकते हैं.  क्षमा करिएगा प्रदेश में एक दो अखबारों को छोड़कर ज्यादातर अखबारों के प्रबंधन का नजरिया बाबा आदम जमाने का ही बना हुआ है. बहुत से अखबार मालिक अब भी नहीं चाहते कि पत्रकारों को अच्छी तनख्वाह दी जाए.  ज्यादातर मालिक मानते हैं कि पत्रकार  गायत्री परिवार के सम्मेलनों में वितरित किए जाने वाले झोले को कंधे में टांगकर समाचारों के संकलन के लिए ही पैदा हुआ है.  इस मामले में पत्रिका ने कई मिथकों को तोड़ने का प्रयास किया है. पत्रिका ने अपने यहां कर्मचारियों एवं पत्रकारों को ठीक-ठाक वेतन देने की जो शुरूआत की है उसकी धमक अन्य जगह भी सुनाई पड़ने लगी है,  अन्य जगह भी हालात बदलेंगे इसकी उम्मीद की जानी चाहिए. मैं थोड़ा विषय से भटक रहा हूं लेकिन फिर भी मेरा यह मानना है कि पत्रकार जब तक अभावों और मुफलिसी में काम करते रहता है तब तक वह किसी न किसी बहाने लोगों के आगे हाथ फैलाने के लिए मजबूर रहता है.अखबार मालिक अपनी ठीक-ठाक स्थिति के लिए खुश जरूर हो सकते हैं लेकिन यह भी सच है  पत्रिका के आने के बाद राज्य में एक नए तरह की पत्रकारिता और कलमकारों की स्थिति सुधार को लेकर बातचीत होने लगी है.अब से कुछ समय पहले तक राज्य के पत्रकार किसी भी नेता, अफसर या अन्य किसी को अपनी तनख्वाह बताने में हिचकाचते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है.  इधर पत्रिका ने दबी और दबाई जाने वाली खबरों के प्रकाशन से एक नए मुहावरे को गढ़ने में भी कामयाबी हासिल की है. अब किसी भी संस्थान के लिए खबरों को कुर्सी के नीचे दबाकर बैठना आसान नहीं रह गया है. आवाम के हितों से जुड़ी खबरों के प्रकाशन ने पत्रिका को जनता का सर्वाधिक विश्वसनीय अखबार बना  डाला है. छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता में इन दिनों बदलाव की एक नई बयार देखने को मिल रही है. इस बयार में वे पत्रकार ठीक ढंग से सांस ले पा रहे हैं  जिनका काम  सिर्फ और सिर्फ लिखना-पढ़ना ही है.  खुद को बाबू , पीए या याचक के रूप में बदल डालने वाले पत्रकारों को बदलते समय के नए विमर्श से न पहले कोई  मतलब था न बाद में कोई मतलब होगा ऐसा भी साफ दिखाई दे रहा है.

चलिए अब एक बार फिर छबिराम के प्रकरण पर लौटते हैं. तो छबिराम ने जब स्वयं का  मोबाइल खरीदने के बारे में विचार किया तब उसके एक दोस्त ने बताया कि टोलफ्री पर फोन लगाने से खुद का एक धेला भी खर्च नहीं होता है. अपने दोस्त की बात मानकर नाबालिग छबिराम ने कंट्रोल रूम फोन लगाया. वहां कार्यरत एक महिलाकर्मी ने बड़े मोहक अन्दाज में बात की. छबिराम को महिला का अन्दाज इतना पसन्द आया कि उसने दो दिन में साढ़े तीन सौ से ज्यादा फोन लगा लिए. पुलिसवालों ने नंबर ट्रेस किया और छबिराम को गिरफ्तार कर लिया. छबिराम की गिरफ्तारी के बाद किसी अखबार के महान संवाददाता ने लिखा कि उम्र 15 साल और कारनामा इतना बड़ा कि अच्छे-अच्छे शर्मा जाए. किसे कहते हैं तीन सौ अस्सी बार फोन.

अरे भाई कौन सा बड़ा अपराध कर दिया छबिराम ने. एक महिला पुलिसकर्मी से फोन पर हाल-चाल ही तो पूछा. गाली तो नहीं दी न. सच तो यह है कि जिन बच्चों का जीवन अभावों और तकलीफों में बीतता है वे समाज से सुरक्षा और प्यार की अपेक्षा करते ही है. पंद्रह साल के छबिराम को गिरफ्तार करने के दौरान पुलिस ने उसका यह अपराध तो देख लिया कि वह फोन लगाकर परेशान कर रहा था लेकिन उस दुकानदार का अपराध देखने की चेष्टा नहीं की जिसने उसे मोबाइल बेचा था. एक नाबालिग को मोबाइल बेचना भी तो अपराध की श्रेणी में आता है. अखबार में खबर छपी है कि छबिराम मजदूरी करता है. यदि एक पंद्रह साल का लड़का छत्तीसगढ़ में मजदूरी करने के लिए विवश है तो सरकार के शिक्षा विभाग के साथ-साथ श्रम विभाग वालों को डूब मरना चाहिए.एक नाबालिग के हाथों में किताब और कलम की जगह फावड़ा और गैती पकड़वाने वाले लोग कौन है.इन्हें क्या तुम्हारा बाप गिरफ्तार करेगा.

राजकपूर की फिल्म मेरा नाम जोकर का ऋषि कपूर अपनी टीचर सिमी गरेवाल से प्यार कर बैठता है. यह उम्र है ही नाजुक. कुछ समय पहले शशिलाल नायर की फिल्म एक छोटी सी लव स्टोरी भी आई थी. फिल्म में मनीषा कोइराला और उसका प्रेमी जब अपने बदन की तपिश को ठंडा करते रहते हैं तो नाबालिग हीरो बिल्डिंग में आग लगने की सूचना देकर फायर बिग्रेड वालों को बुला लेता है. हो सकता है कि बहुत से लोग मेरी बातों से सहमत न हो. बहुत से लोगों को यह लग सकता है कि भाजपा शासित राज्य में सभ्यता और संस्कृति की मर्यादा का उल्लंघन करने वालों तो सजा मिलनी ही चाहिए. एक लड़के ने महिला पुलिस को फोन लगा डाला है... संस्कृति को खतरा उत्पन्न हो गया है. लड़के की हरकत ने उसकी उम्र के लड़कों को पथभ्रष्ट कर डाला है. मानव सभ्यता की चडडी फट गई है. जिस किसी ने भी सभ्यता की चड़डी उतारने की धृष्टता की है उसकी तो वाट लगनी ही चाहिए. अब मेरा सवाल यह है कि इसी राज्य में कई ऐसे छैला अफसर है जो सरकारी फोन से अपनी कथित महबूआओं को फोन लगाकर शासन को लाखों रुपए का चूना लगा चुके हैं उनका क्या किया आपने? मंत्रालय और कलेक्टर कार्यालय के सैकड़ो बाबू काम की अवधि में अपनी गर्लफ्रेंडों से फोनोसेक्स करते रहते हैं उनका क्या किया आपने? एक बच्चे ने फोन कर लिया तो छात्ती फट गई आपकी.

मैं यहां नाबालिग छबिराम के पक्ष में इसलिए खड़ा हूं क्योंकि इस तरह की शरारतें उन सभी लोगों ने की है जब वे बच्चे थे. मुझे याद आता है बचपन में मेरे एक दोस्त मनोज ने अपना पहला प्रेम पत्र तब लिखा था जब वह कक्षा तीसरी में था. मनोज और मैं दोनों साथ ही स्कूल जाया करते थे। एक दिन मनोज ने बताया कि वह क्लास की लड़की चंचल को दिल दे बैठा है। मनोज की इस बात से मैं बहुत से खुश था क्योंकि चंचल के परिजनों की साइकिल की दुकान थी और मेरी खटारा साइकिल में प्रायः कोई न कोई परेशानी पैदा होते ही रहती थी. कभी साइकिल का मडगाड मिथुन चक्रवर्ती के समान डिस्को डांस करता रहता था तो कभी साइकिल के पैडल पिडलियों का बोझ उठाने से इंकार कर देते थे. मेरी भी दिली इच्छा थी कि बस किसी तरह से चंचल मनोज को दिल दे बैठे ताकि अपनी साइकिल का काम थोड़ा फ्री में होता रहे.  वर्ष 1973-74 में अध्यपकों ने पत्र लिखने की तीन-चार स्टाइल ही समझायी थी सो मनोज ने जिस शैली का उपयोग किया उसका उल्लेख यहां कर रहा हूं. मित्र ने लिखा था-

कुमारी चंचल गुप्ता
कक्षा तीसरी ब
प्राथमिक शाला क्रमांक-2
विषय- प्रेम प्राप्त करने के लिए आवेदन पत्र.


महोदया,
निवेदन है कि अभी हम क्लास तीसरी में हैं और आप भी क्लास तीसरी में हैं, लेकिन आप हमको अच्छी लगती है तो हम आपसे प्रेम प्राप्त करना चाहते हैं और अपना प्रेम भी प्रदान करना चाहते हैं. कृपया तीन दिनों के भीतर अपना प्रेम प्रदान करने की अनुकंपा करें ताकि हम भी अपना प्रेम प्रदान कर सकें.


आपका आज्ञाकारी
मनोजकुमार


देश के बहुत से मनोचिकित्सकों ने अपने अध्ययन में यह माना है कि बच्चों पर खाकी का रौब या तो उन्हें बीमार कर देता है या फिर विकृत अपराधी बना देता है. जो बच्चे लड़कियों के चित्रों को देखकर उन्हें चाकू या खीले से गोदने लगते हैं वे  किसी न किसी तरह की नफरत के ही शिकार होते हैं. पुलिस यदि चाहती तो छबिराम के घरवालों से बात कर इस समस्या का समाधान ढूंढ सकती थी लेकिन पुलिस का चेहरा संवेदनशील हो सकता है यह सोचना भी एक सवाल है. एक सवाल यह भी है कि पुलिस को अपराधियों की पैदाइश से क्या हासिल होता है. यदि कल को छबिराम एक किलर बन गया तो पुलिस क्या करेगी. शायद दस या बारह साल पुलिस फिर किसी पत्रकारवार्ता में पत्रकारों को यह बताती रहेगी कि इस शख्स को गौर से देखिए. इसकी मासू म सूरत पर मत जाइए. यह आदमी जो आपके सामने खड़ा हुआ है इस शख्स ने बचपन में अपने घर के तेजधार चाकू से ही तेरह कुत्तों की जान ले ली थी. यह शख्स जिसे आप देख रहे हैं उसने कई  महिलाओं को मौत के घाट उतार दिया है. यह एक बीमार रोगी है. इसके भीतर डर फिल्म का शाहरूख खान बैठा हुआ है.