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Friday, January 28, 2011

भगवान के लिए मुझे छोड़ दो

यदि कभी आपको यह लगे कि एक हिन्दी फिल्म बनानी चाहिए तो आप बिल्कुल भी घबराइएगा नहीं। हिन्दी फिल्मों को बनाना बहुत ही आसान है। यदि आपके हाथ में एक माचिस की डिब्बी है तो भी आप हिन्दी फिल्म बना सकते हैं। माचिस से एक-एक काड़ी निकालकर उसे नाम देते जाइए। एक काड़ी को हीरो, दूसरे को हिरोइन, तीसरे को विलेन,चौथे को हिरोइन का बाप, पांचवी काड़ी को हिरोइन की मां शशिकला टाइप की। छठवी काड़ी को हीरो का दोस्त... राजेंद्रनाथ या मेहमूद सरीखा। सातवी काड़ी को हिरोइन की सहेली जिस पर हीरो का राजेंद्रनाथ बना दोस्त मर मिटेगा। आठवी काड़ी को बाबुल की दुआएं लेती जा... जा तुझको सुखी संसार मिले गाने वाला गरीब बाप समझ लीजिए। बाकी जितनी काड़ी है उनसे बाग-बगीचों में गाने का काम संपन्न हो जाएगा। हीरो जब शराब पीकर भरी महफिल में बेवफाई पर गाना गाएगा तो बाकी लोगों के हाथ में शराब के गिलास भी तो थमानी है या नहीं। कुल मिलाकर माचिस की काड़ियों से भी हिन्दी फिल्में बन सकती। छत्तीसगढ़ी फिल्में बनाना तो और भी आसान है क्योंकि इस बनाने के लिए तो ज्यादा दिमाग भी नहीं लगाना पड़ता। सीधे-सीधे किसी हिन्दी या भोजपुरी की हिट फिल्म की कापी कर लो फिल्म तैयार हो जाती है। सतीश जैन की फिल्म मया स्वर्ग से सुंदर की रीमेक थी तो हाल ही में आई एक फिल्म हीरो नंबर वन स्वर्ग फिल्म की कापी थी। टुरा रिक्शावाला भी एक भोजपुरी फिल्म की टू कापी थी। खैर बात यदि हिन्दी फिल्मों की चल रही है तो मैं आपको बता दूं कि एक बेहतर हिन्दी फिल्म की कहानी कुल जमा सौ संवादों के आसपास ही घूमती है। यदि आपने इन संवादों का ठीक ढंग से रटा मार लिया है तो आपकी फिल्म को हिट होने से भी कोई नहीं रोक सकता।
यहां मैं कुछ प्रचलित संवाद से आपका परिचय करवाने जा रहा हूं। इन संवादों के साथ-साथ शरारत से भरी हुई टिप्पणी भी दे रहा हूं। पाठकों को कोई नई टिप्पणी सुझे तो वे मुझे फोन पर भी बता सकते हैं। मैं भी हंसना चाहूंगा।

संवाद---

1- मैं तुमसे प्यार करती हूं

तुम तो कल निर्माता को भी यही बोल रही थी


2- मैं तुम्हारे बिना जी नहीं सकती

साली अच्छी मुसीबत गले पड़ रही है।


3- राज... मैं तुम्हारे बच्चे की मां बनने वाली हू

साला.. ये राज हर फिल्म में हिरोइनों को मां बनाने का काम ही करता है.


4- न...ह......ही (लंबी चीख)

इस चीख के साथ दर्शक भी चीखकर कहता है- आजा


5- अरी कलमुंही... तू पैदा होते ही मर क्यों नहीं गई

दर्शक- मार साली को और मार... बहुत ऐश कर रही थी


6- भगवान के लिए मुझे छोड़ दो

भगवान के लिए छोड़ दोगे तो रणजीत क्या करेगा। चाकू हिलाएगा


7- मैं कहां हू

मछुवारे के घर में। यही तुमको पाल पोसकर जवान बनाएगा


8- मारने वाले से बचाने वाला बड़ा होता है

लेकिन पूरी फिल्म में बचाने वाले की ही वाट लगती रहती है


9- सुबह का भूला अगर शाम को घर लौट आए तो उसे भूला नहीं कहते

-यह बात पियक्कड़ों पर लागू नहीं होती है।


10- इन्हें अब दवा नहीं दुआ की जरूरत है

-चलो घंटी बजाओ और चिमटा लेकर भजन सुनाओ.. तब तक हम लोग बीड़ी पीकर आते है।


11- बेटा भगवान के घर देर हैं अंधेर नहीं

-हीरो को तो होश में लाना ही पड़ेगा बेटा... नहीं तो फिल्म की कहानी आगे कैसे बढ़ेगी


12- मां.. मां ... तुम कहां हो.. आज मुझे नौकरी मिल गई है। अब हमारे सारे कष्ट
     दूर हो जाएंगे

- मां की आंखों में चमक... बेटा अब तू जल्दी से मुझे आशा पारेख (बहू) ला दे


13- देख मां... देख मैं तेरे लिए क्या लाया हूं।

भजिया खिलाकर मां को बेवकूफ बना रहा है साला।


14-जीते रह बेटा... आज तेरे बापू जिन्दा होते तो कितना खुश होते

-अरे कोई वायलिन बजाओ रे... आंखों से आंसू निकालना है।


15-लेडि़स एंड जैंन्टलमेन आज... बहुत ही खुशी का दिन है और इस खुशी के मौके पर मिस्टर कुमार अपनी दिलकश आवाज में एक गीत सुनाएंगे

-खुशी के मौके पर पियानो बजाकर गाओ- दिल तोड़ने वालों की महफिल में आ गया हूं


16- बाबूजी एक बात कहूं.. इन हाथों से पाल पोसकर तुमको बड़ा किया है.. इतनी पीकर मत आया करो

-अरे रामू काका.. कौन कमबख्त दिल जलाने के लिए पीता है मैं तो गम भुलाने के लिए पीता हूं। चल बे बुढ़ऊ... अब जूते निकाल।


17- सेठ मैं तेरी-तेरी पाई-पाई चुका दूंगी

-अरे कैसे चुकाओगी राधारानी.. जब कोई नहीं रहेगा तब आटा लेने आना। अभी जा नहीं चिल्लाएगी- मेरे करण-अर्जुन आएंगे।


18- अपनी जायजाद का एक पाई भी नहीं दूंगा

मत दे साले को अपन भी हर जगह नौकरी मांग-मांगकर धक्के खाएंगे


19- भगवान एक मंदिर तोड़ने वाले को तो माफ कर सकता है लेकिन किसी का दिल
तोड़ने वाले को...

(गंभीर किस्म का म्यूजिक)


20-बास पुलिस ने हमारा करोड़ों का माल पकड़ लिया है

चिंदीचोर पुलिस और क्या करेगी... सबसे आखिरी में पहुंचेगी या फिर दौड़ाएगी


21- बास.. हमारे अडडे को पुलिस ने चारों तरफ से घेर लिया है

ले आओ साले को हीरो की मां और बहन को। बांध दो खंबे से


22-खबरदार.. कोई अपनी जगह से नहीं हिलेगा

(अब--- डोंट मूव्ह)

सिवाय दर्शक के


23- अपने साथियों से कह दो कि हथियार फेंक दो

रेखा तुम सब हथियारों को बटोर लो... बहुत मटकना हो गया


24-पलट दी न बाजी... मैं कहता हूं हीरे और हिरोइन दोनों मेरे हवाले कर दो

जल्दी कर... बे.. साले सायकिल स्टैंड से सायकिल निकालना है... बाद में वहां भीड़ हो जाती है।


25-ढिशुंम.. ढिशुंम.... कुत्ते-कमीने मैं तेरा खून पी जाऊंगा

मार साले... मार साले को। फोड़ डाल साले को दे घुमाके


26-टे आऊ.. वाऊ ऊ...(पुलिस का सायरन) गिरफ्तार कर लो इनको


अब कामेडियन आएगा... आखिरी-आखिरी में अपनी होने वाली बीवी से परिचय करवाएगा। एक मां जिसने हीरो को पाला है वह एक पेड़ के नीचे खड़ी रहेगी

हीरो- मां तुने मुझे दूध नहीं पिलाया तो क्या हुआ... लेकिन मैं तेरी ही कोख से जन्म लेना चाहूंगा।


(गाना- हो जाता है प्यार... प्यार... किया नहीं जाता ...न बस में तुम्हारे न बस में हमारे.... द एंड)

अब चलो भी... अबे दरवाजा तो पूरा खोल। काफी अच्छी भीड़ थी... लगता है चलेगी फिल्म। हां चल जाएगी। बाथरूम इधर है न...तू सायकिल निकालकर रख मैं एक मिनट में आता हूं।


Sunday, January 23, 2011

इतना सन्नाटा क्यों है भाई

खबर आई है कि शोले के इमाम साहब की हालात खराब है। इमाम साहब ने कई फिल्मों में यादगार भूमिका निभाई है। मैंने तो उन्हें आखिरी बार आमिर खान की फिल्म लगान में देखा था। उसके बाद उनकी कोई और फिल्म आई हो मुझे इसकी जानकारी नहीं है। ऐसा नहीं है कि मैं फिल्में कम देखता हूं लेकिन यह तो मैं जानता ही हूं कि जब ईमानदार कलाकार बूढ़े हो जाते हैं तो समाज से बेदखल ही हो जाते हैं। अलबेला वाले भगवान दादा को लीजिए। पिज्जा खाने वाली पीढ़ी शायद भगवान दादा को नहीं जानती सो उनकी सहूलियत के लिए बता देता हूं कि भगवान दादा के एक डांस स्टेप की नकल सदी के महानायक अभिताभ बच्चन भी करते रहे हैं। भगवान दादा की अलबेला को देखने के बाद अभिताभ की किसी भी फिल्म को देख लीजिएगा, समझ में आ जाएगा शायद मैं गलत नहीं कह रहा हूं।

तो मैं बात कर रहा था इमाम साहब की। इमाम साहब यानी एके हंगल की।  इमाम साहब मुबंई में कहीं किराए के एक कमरे में अपने 75 वर्षीय बेटे के साथ रहते हैं और इन दिनों बीमार है। जब यह खबर अखबारों में छपी तो मुझे इस बात के लिए आश्चर्य हुआ कि इमाम साहब अपने उस बेटे के साथ रहते हैं जो खुद भी बूढ़ा है। खबर छपने के बाद से ही मैं ही इस सोच में डूबा हूं कि आखिर दो बूढ़े एक कमरे में क्या बातें करते होंगे। मैंने बूढ़े मां-बाप को जवान बेटे या बेटियों को डांटते-डपटते, सलाह देते हुए तो कई बार देखा व सुना है लेकिन दो ऐसे बूढ़ों को बात करते कभी नहीं देखा जिसमें से एक पिता है और दूसरा उसका बेटा।

 मैं इमाम साहब यानी एके हंगल से एक मर्तबा भोपाल में मिल चुका हूं। मिला क्या हूं उनसे लंबा इंटरव्यूह करने का सौभाग्य हासिल कर चुका हूं। यह तो हर कोई जानता है कि भोपाल में कौमी एकता को मजबूत बनाए ऱखने के लिए सैकड़ो संस्थाएं कार्यरत है। हर संस्थाए तिरंगे झंडे का इस्तेमाल करते हुए सरकार और उद्योगपतियों से चंदा वसूलने में लगी रहती है। ऐसे ही किसी एक कार्यक्रम में गलती से पहुंच गया था मैं। दरअसल एक  पाक्षिक पत्रिका का छत्तीसगढ़ प्रमुख होने के नाते मुझे कभी मंदसौर कभी नीमच और इंदौर की यात्रा करनी पड़ती थी सो एक रोज जब मैंने अपने परिचित रमेश अनुपमजी को बताया कि भोपाल जा रहा हूं तो उन्होंने भी खुशी-खुशी यह जानकारी दी कि वे भी कौमी एकता को मजबूत करने वाले एक कार्यक्रम में शिरकत करने के लिए भोपाल जा रहे हैं। बस वही मेरी मुलाकात हंगल साहब से हुई थी। प्रगतिशील लेखक संघ द्वारा आयोजित किए गए इस आयोजन में पूजा भट्ट के खुजली वाले पिता महेश भट्ट भी मौजूद थे। भट्ट साहब को खुजली वाला इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि एक तो वास्तव में उनको खुजा-खुजाकर बात करने की आदत है और दूसरी उन्हें विदेशी फिल्मों से आइडिया चोरी करने की बीमारी ने भी घेर रखा है। भट्ट साहब ने उन दिनों अजय देवगन को लेकर जख्म नामक  फिल्म बनाई थी सो उनका भाषण फिल्म के प्रमोशन पर ही केद्रित था।

इसी कार्यक्रम में हंगल साहब ने मुझे दुखी होकर बताया था कि किस तरह से वे फिल्म उद्योग के द्वारा किनारे कर दिए गए हैं।  सच तो यह है कि हंगल साहब अपनी जवानी के दिनों में बूढ़े और लाचार आदमी का किरदार करते रहे। फिल्म निर्माता उन्हें हर फिल्म में बंड़ी और धोती में दिखाता रहा। यदि मैं गलत नहीं हूं तो प्रकाश मेहरा की फिल्म खून-पसीना में हंगलजी ने एक पूडि़यों को चोरी करने वाले एक गरीब आदमी की भूमिका निभाई थी। फिल्म में गांव की  पंगत  में बैठकर जब सब लोग खाना खा रहे  होते हैं तभी अचानक किसी की घड़ी चोरी चली जाती है। पंगत में बैठे हुए सब लोग अपनी जांच-पड़ताल के लिए तैयार हो जाते हैं लेकिन हंगलजी तलाशी देने से इंकार कर देते हैं। जब सारे लोग उन्हें चोर साबित करने में तुल जाते हैं तो वे अपनी जेब से पूड़ी निकालकर रख देते हैं। पूडि़यों की चोरी उन्होंने अपने परिवार का पेट भरने के लिए की थी। इस फिल्म में हंगल के द्वारा अभिनीत इस दृश्य को देखकर मैं रो पड़ा था। इसी तरह यश चोपड़ा की फिल्म दीवार का दृश्य याद करिए। शशिकपूर चोरी करके भाग रहे एक आदमी पर गोली चलाते हैं। जब वे पास जाते हैं तो पता चलता है कि आदमी रोटी लेकर भाग रहा था। खाने का सामान लेकर जब शशिकपूर हंगल साहब के घर जाते हैं तो वहां का दृश्य आपकी आंखे भिगो देता है। इस दृश्य में श्री हंगलजी ने जान डाल दी थी। दुर्भाग्य की बात है कि एकाध फिल्म शौकीन को छोड़ दे तो हंगलजी को हमेशा दरिद्र, लाचार, बीमार और मध्यवर्ग का प्रतिनिधित्व करने के लायक ही समझा गया। यह तो फिल्मी दुनिया का रिवाज है कि जब कोई बड़ा आदमी किसी भिखारी का रोल करता है तो उसे मुंहमांगी कीमत दी जाती है लेकिन जब कोई गरीब आदमी वास्तव में गरीब बनता है तो उसके कटोरे में उतने ही पैसे डाले जाते हैं जितने भिखारियों के कटोरे में डाले जाते हैं। छत्तीसगढ़ के कलाकार नत्था को ले लें। पीपली लाइव के हिट हो जाने के बाद भी नत्था को फिल्में नहीं मिल रही है। एक छत्तीसगढ़ी फिल्म किस्मत का खेल में नत्था को एक हजार रुपए प्रतिदिन के हिसाब से भुगतान किया गया है। गरीब और लाचार आदमी की भूमिका को पर्दे पर जीवंत कर देने वाले व्यक्ति को इस समाज ने अपनी मदद के लायक ही नहीं समझा है। और तो और प्रगतिशील लेखक संघ तो घोषित तौर पर श्री हंगल को अपनी कौम का  मानता है। अपनी कौम के आदमी के लिए संघ ने कोई अपील जारी नहीं की है। इस संघ से जुड़े लेखकों ने उन पर कोई आर्टिकल भी नहीं लिखा। सबको शायद उनके लुढ़कने का इन्तजार है। जैसे ही वे इस दुनिया से विदा लेंगे तब कवि जागृत हो जाएंगे और कविता लिखेंगे- हंगल/ एन्टीना और एन्टीना पर टंगी गरीबी। अखबार वालों को रविवारीय पेज के लिए मसाला मिल जाएगा और टीवी वालों को दिनभर का पुल पैकेज कार्यक्रम । हालांकि इस बीच कई नामी हस्तियों के द्वारा मदद दिए जाने की खबरें भी प्रचारित हुई है लेकिन यह भी पता चला है कि यह भी सिर्फ प्रचार ही है। ईश्वर न करें कि हंगलजी को कुछ हो लेकिन मेरा यकीन इस संवेदनहीन समाज से धीरे-धीरे उठता जा रहा है। दोस्तों... रात हो चुकी है। अभी-अभी हर महीने दस रुपए ले जाने वाले नेपाली चौकीदार ने  घर के बाहर डंडे को पटकते हुए आवाज लगाई है- जागते रहो.... जागते रहो..... मैं तो जाग रहा हूं लेकिन देख रहा हूं कि सन्नाटा  पसरा हुआ है। इस पसरे हुए सन्नाटे के बीच ही सुबह के पांच बज जाते हैं। एक मस्जिद से अजान की आवाज आने लगती है। इस अजान में ही मैं कहीं यह भी सुनता हूं- इतना सन्नाटा क्यों  है भाई। 

Monday, January 17, 2011

ब्लागजगत के दो धुरन्दर समीरलाल समीर और ललित शर्मा का सम्मान


 मित्रों, कल यानी 16 जनवरी को यहां छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर के जैतूसाव मठ में ब्लागजगत के दो धुरन्धरों का सम्मान किया गया। ब्लाग जगत में उल्लेखनीय योगदान देने के लिए कनाड़ा के रहवासी किन्तु अपनी माटी से आत्मीय जुड़ाव रखने वाले समीरलाल समीर एवं देशभर में छत्तीसगढ़ का गौरव बढ़ाने वाले ललित शर्माजी सम्मानित किए गए। समीरलालजी यहां मध्यप्रदेश की संस्कारधानी जबलपुर से छत्तीसगढ़ आने वाले थे लेकिन किसी कार्यवश वे नहीं पहुंच सकें। उनकी गैरमौजूदगी में मेरे द्वारा यह सम्मान ग्रहण किया गया। मैं श्री समीरलालजी एवं ललित शर्माजी को बधाई देता हूं।

छत्तीसगढ़ में काफी लंबे समय से हिन्दी के लिए कार्यरत राष्ट्रभाषा प्रचार समिति से कई ब्लागर मित्र जुड़े हुए हैं। हम सबके आदरणीय श्री गिरीश पंकज एवं सुधीर शर्मा प्रमुख लोगों में से हैं। श्री पंकजजी एवं श्री शर्माजी को जैसे ही यह सूचना मिली थी कि ब्लागजगत के महारथी समीरलाल जी इन दिनों भारत और छत्तीसगढ़ से लगे हुए शहर जबलपुर में है तो उन्होंने श्री लालजी को ध्यान में रखकर एक भव्य कार्यक्रम की रूपरेखा ही बना डाली। राष्ट्रभाषा प्रचार समिति की तरफ से कल देश के प्रसिद्ध पत्रकार एवं साहित्यकार कैलाशचंद्र पंत का सम्मान भी किया गया। इस मौके पर वरिष्ठ साहित्यकार सुशील त्रिवेदी, पूर्व शिक्षा मंत्री सत्यनारायण शर्मा, पुलिस महानिदेशक एवं कवि विश्वरंजन, चिंतक रमेश दवे, हिन्दी ग्रंथ अकादमी के अध्यक्ष रमेश नैय्यर, नंदकिशोर तिवारी, कुशाभाऊ ठाकरे पत्रकारिता विश्वविद्यालय के कुलपति डाक्टर सच्चिदानंद जोशी, उमेश उपाध्याय, पदमश्री सुरेंद्र दुबे, कवि अशोक सिंघई, अमरनाथ त्यागी, विनोदशंकर शुक्ल, पूर्व सांसद केयूर भूषण, रवि श्रीवास्तव, शोभाकांत झा, रामकुमार बेहार, निर्मला बेहार, मंगला जोशी, रीना अधिकारी, राजेंद्र भारतीय सहित  प्रदेश के अनेक ब्लागर मित्रों एवं सुधिजन मौजूद थे। आयोजन एक ऐतिहासिक स्थान जैतूसाव मठ में किया गया। इस जगह का ऐतिहासिक महत्व इसलिए भी है क्योंकि इस स्थान पर कभी गांधीजी ने छोटी सी संगोष्टी में हिस्सेदारी दर्ज की थी। श्री समीरजी  एवं ललितजी को एक बार पुनः बधाई।

Saturday, January 15, 2011

छत्तीसगढ़ का चैनल पुराण

यह लेख किसी व्यक्ति विशेष पर केंद्रित न होकर प्रवृतियों को समझने का एक प्रयास मात्र है, फिर भी यदि किसी को बुरा लगता है तो मैं उससे फूलगोभी, आलू और मटर की सब्जी के साथ घी चुपड़ी हुई दो रोटी ज्यादा खाने का आग्रह कर सकता हूं।

तो भाइयों.. जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था तब सबको यही लग रहा था कि अब उनकी निकल पड़ेगी। दो-तीन अखबार वालों की दादागिरी से त्रस्त कुछ पत्रकार नुमा व्यापारियों को भी यह लगने लगा था कि बस थूंथने में अड़ाने वाला माइक और कैमरा लेकर आ जाओ सरकार हिल जाएगी। शुरू-शुरू में ऐसा हुआ भी। भिलाई में लोहे की दलाली में जुटे एक व्यापारी ने एक प्रमुख चैनल में खबरों को भेजने के लिए कैमरा आदि को खरीद लिया। व्यापारी को इस बात से बिल्कुल भी मतलब नहीं था कि छत्तीसगढ़ किस ढंग से आकार ले रहा है। वह तो बस चैनल के सहारे भिलाई इस्पात संयंत्र से लोहे की अफरा-तफरी में लगा हुआ था। दिल्ली में चैनल के प्रमुखजनों को जब इस बात की भनक लगती तब तक देर हो चुकी थी। व्यापारी अपने मतलब के हिसाब से वारा-न्यारा कर चुका था। राज्य निर्माण के शुरूआती दिनों में एक पत्रकार गोविंद साहू के पास एएनआई की एजेंसी थी। श्री साहू का जोर साफ्ट किस्म की स्टोरियों पर ही रहता था क्योंकि वे जिस एजेंसी के लिए काम करते थे वह एजेंसी श्री साहू से स्टोरी लेकर ढेर सारे चैनलों को बेचने का काम करती थी। वैसे श्री साहू बेहद मेहनती पत्रकार थे ( हो सकता है कि वे कहीं और काम कर रहे हो) लेकिन उनके साथ ही यहां ईटीसी से अपने कैरियर की शुरूआत करने वाले उनके अपने एक रिश्तेदार की वह इमेज नहीं बन पाई जो बननी चाहिए थी। जब पूरे देश में एनडीटीवी की धमाकेदार शुरूआत हो रही थी तब श्री साहू के रिश्तेदार को छत्तीसगढ़ का ब्यूरो प्रमुख बनाया गया था लेकिन खबर है कि बाद में लेन-देन संबंधी विवाद के चलते उन्हें छत्तीसगढ़ छोड़ना पड़ा। बताया जाता है कि श्री साहू के रिश्तेदार ने अर्धशासकीय दफ्तर में कार्यरत एक महिला के कथित बयानो की सीडी हासिल कर ली थी। इस सीडी के आधार पर वे एक प्रमुख नेता के अत्यंत करीबी को ब्लैकमेल कर रहे थे। जब यह शिकायत नेताजी के पास पहुंची तो उन्होंने सीधे एनडीटीवी के दफ्तर में बात की। मामले में जांच-पड़ताल हुई और श्री साहू के रिश्तेदार को नौकरी से हाथ धोना पड़ा। नौकरी गंवाने के बाद श्री साहू के रिश्तेदार ने भोपाल के एक साप्ताहिक का संवाददाता बन अफसरों के घर में अखबारों को फिंकवाया भी लेकिन कहते हैं न जो जलवा एक बार अपनी ईहलीला समाप्त कर लेता है वह फिर दोबारा पैदा नहीं होता। यहां भी ऐसा ही हुआ। चैनल के पत्रकार को दुआ सलाम करने वाले अफसरों ने अखबार को पलटना भी जरूरी नहीं समझा।

 वैसे राज्य निर्माण से कुछ पहले प्रदेश में सबसे ज्यादा बोलबाला ओपन आइस का ही था। इस चैनल को यहां शिवसेना के छत्तीसगढ़ प्रमुख धनजंय परिहार संचालित किया करते थे। चैनल अच्छा-खासा चल रहा था कि इसमें काम करने वाले मीडियाकर्मियों ने एक धमाकेदार करतूत कर डाली। वैसे इसे करतूत कहना ही ठीक होगा क्योंकि जब कोई खबर प्रसारित होने के बजाए वर्सन के नाम पर किसी और तरह की सुविधा तलाशने लगती है तो फिर गड़बड़ी हो ही जाती है।  चैनल के कर्ताधर्ताओं ने एक रेस्ट हाउस में प्रदेश के एक मंत्री और छत्तीसगढ़ी फिल्म की बेहद प्रतिभा संपन्न हिरोइन को कुछ ऐसे-वैसे अन्दाज में पकड़ लिया था। बताते हैं कि मंत्री के नए तेवर को सार्वजनिक करने की धमकी-चमकी चल ही रही थी कि चैनल के दफ्तर में छापा पड़ गया और ओपन आइस अचानक आकाश चैनल में तब्दील हो गया। वैसे प्रदेश में आकाश चैनल की शुरूआत बहुत तामझाम के साथ हुई थी लेकिन चैनल की ज्यादातर खबरें सरकार के पक्ष में ही प्रसारित होती थी। थोड़े ही समय में विपक्ष का यह आरोप भी सामने आ गया कि चैनल में कांग्रेस के प्रमुख नेता अजीत जोगी का पैसा लगा हुआ है। विपक्ष के इस आरोप के बाद भी चैनल चलता रहा। चैनल ने अपना काम तब समेटा जब अजीत जोगी का नाम विधायकों की खरीद-फरोख्त में सामने आया और भाजपा की सरकार काबिज हुई। हालांकि भाजपा की सरकार काबिज होने के बाद एक मंत्री के भाई ने भी ईरा फिल्मस के संचालक संतोष जैन के साथ मिलकर सीसीएन अभीतक नाम से एक  चैनल खोला । यह चैनल यहां रायपुर के रामसागरपारा में संचालित चलता रहा। बाद में श्री जैन ने चैनल से नाता तोड़ लिया। उनके नाता तोड़ने के बाद एम चैनल की शुरूआत हुई। बताते हैं कि अब इस चैनल ने  एक बड़े अखबार समूह  के साथ  पार्टनरशीप कर ली है।

 राज्य निर्माण के शुरूआती दिनों में यहां जैन और रोजाना के पत्रकार भी किराए का कमरा लेकर रहते थे। जैन टीवी बंद होने के साथ ही चैनल के साथ जुड़ाव रखने वाले पत्रकारों का आशिया भी उजड़ गया। दिल्ली के एक प्रमुख कांग्रेसी नेता ने बीएलजी नाम की एक कंपनी खोल रखी थी। इस कंपनी के चैनल रोजाना के लिए दिल्ली के एक युवा पत्रकार समरेंद्र खबरें बनाया करते थे। व्यवस्था से हमेशा नाराज रहने वाले समरेंद्र ज्यादा दिनों तक छत्तीसगढ़ में नहीं रह पाए। जोगी के शासनकाल में ही स्टार न्यूज के दिनेश आकुला ने शानदार पारी खेली थी। बताते हैं कि एक रोज किसी नेता के पुत्र ने उनसे कह दिया यदि वे सरकार के पक्ष में खबर दिखाएंगे तो वे सरकार से उन्हें चंदूलाल चंद्राकर की स्मृति में गठित किया गया दो लाख रुपए का पुरस्कार दिलवा सकते हैं। वर्ष 2003 के आसपास घटित इस वाकए को लेकर तब राजनीति के गलियारों में खूब चटखारें लगा करते थे। कुछ समय बाद उनका भी चैनल की नौकरी से मोहभंग हो गया। बीच में यह खबर आई थी कि वे अपना खुद का चैनल खोलने के बारे में सोच रहे हैं। इधर एक स्थानीय अखबार में उनकी खबरें हैदराबाद डेड लाइन से कभी-कभार देखने को मिल जाती है।  ईटीवी के लिए प्रवीण सिंह ने काफी अच्छी पारी खेली। इन दिनों वे सहारा समय में अपनी सेवाएं दे रहे हैं।जब उन्होंने ईटीवी को अलविदा कहा तो भोपाल के एक बड़बोले पत्रकार प्रफुल्ल पारे ने ईटीवी की जवाबदारी संभाली। वे भी लंबे समय तक ईटीवी में नहीं रहे। श्री पारे के बाद संजय शेखर ने यहां लंबी और अच्छी पारी खेली लेकिन जैसे ही उन्हें यह आभाष हुआ कि अब टीवी की बागडोर राजस्थान के सेवानिवृत अफसर जगदीश कातिल संभालने वाले हैं उन्होंने साधना का दामन थाम लिया। खबरों की विश्वसनीयता के मामले में साधना ने दो स्थानीय चैनल सहारा और ईटीवी को पीछे छोड़ दिया है। भाजपा के दूसरी बार सत्ता में काबिज होने के कुछ दिन पहले यहां छत्तीसगढ़ में पुलिस अफसर रहे रूस्तम सिहं ने भी एक चैनल के जरिए दस्तक दी थी। इस चैनल की कमान हिंदी के प्रसिद्ध कवि गजानन माधवमुक्तिबोध के पुत्र दिवाकरमुक्तिबोध ने संभाली थी लेकिन कुछ ही दिनों में चैनल ने दम तोड़ दिया। यहां काम करने वाले कर्मचारी कई दिनों तक तनख्वाह के लिए भटकते रहे। दिल्ली के मित्तल बंधुओं  ने वाइस चैनल की शुरूआत की थी। त्रिवेणी ग्रुप का यह चैनल न तो देश में रंग जमा पाया और न ही छत्तीसगढ़ में।

 प्रदेश में अब भी क्राइम न्यूज, रायपुर एक्सप्रेस, चैनल-वन, आईबीएन सेवन, टाइम नाव, एचएम-वन, प्रखर टीवी, इंडिया टीवी, साधना चैनल, आज तक, एएनआई, न्यूज 24, ग्रांड चैनल, इनसाइट टीवी, एवी विजन सहित लगभ दो दर्जन चैनलों की दस्तक बनी हुई है, लेकिन अब भी कभार यह सुनने को मिल जाता है कि अमुक चैनल में उड़ीसा के सांसद और मुख्यमंत्री  का पैसा लगा हुआ है तो किसी चैनल के रिपोर्टर के बारे में यह कहा जाता है कि वह सिमगा के पास आरटीओ के उड़नदस्ते की फिल्म बनाने में लगा हुआ था। एक चैनल के रिपोर्टर के बारे में तो यह कहा जाता है कि वह मात्र होली के दिन ही भांग खाता है और कपड़े फाड़-फाड़कर नाचता है। भांग खाकर तमाशे मचाने वाला रिपोर्टर जिस चैनल से जुड़ा हुआ है उस चैनल को कई पत्रकार अंतिम प्रणाम कर चुके हैं। बिलासपुर जिले में रवि वर्मा के हैलो बिलासपुर ने किसी समय खासी लोकप्रियता हासिल की थी, श्री वर्मा इन दिनों राजधानी में कार्यरत है। कोरबा जिले में एक भाजपा नेता बनवारी लाल अग्रवाल भी कुछ दिनों तक एक चैनल से जुड़े रहे तो बिलासपुर जिले के एक शराब ठेकेदार ने भी चैनल खोलकर लंबे समय तक अपनी भंडास निकालने का काम किया था। छत्तीसगढ़ की उर्वरा भूमि में मीडिया का धंधा खूब पनप रहा है।चंद मिनटों में ही दो का चार करने वाले व्यवसायी बड़ी तेजी से इस क्षेत्र में अपने पांव पसार रहे हैं।