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Tuesday, December 28, 2010

मिट जाएगा कड़कनाथ का नामो निशान


बलि के लिए लगातार उपयोग में लाए जाने तथा अय्याश अफसरों की मौज-मस्ती  करने की प्रवृत्ति के चलते कड़कनाथ की प्रजाति अब खत्म होने के कगार पर है।

‘कड़कनाथ’  मुर्गे की एक प्रजाति है। मुर्गे का नाम कड़कनाथ क्यों पड़ा इस बारे में कोई एक निश्चित राय नहीं है, लेकिन मांसाहार के शौकीन लोगों का मानना है कि कड़कनाथ का सेवन व्यक्ति के भीतर जोशोखरोश पैदा कर देता है। चूंकि मुर्गे के सेवन से कामोत्तेजना में वृद्धि होती है फलस्वरूप इसका नाम कड़कनाथ रखा गया है। अब से कुछ अरसा पहले छत्तीसगढ़ के बस्तर इलाके में काफी  बड़ी संख्या में कड़कनाथ के दर्शन हो जाया करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। विशिष्ट किस्म के स्वाद और औषधीय गुणों के बावजूद इनकी संख्या लगातार घटती जा रही है।

वैसे तो कड़कनाथ की प्रजाति मुख्य रूप से मध्यप्रदेश के भिंड के अलीराजपुर व झाबुआ जिले में ही पाई जाती रही है लेकिन मुर्ग-मसल्लम के शौकीन कुछ वन अफसरों ने बस्तर के सुदूर इलाकों में इसकी वंशवृद्धि को लेकर योजना बनाई थी। उत्तर बस्तर के अधीन आने वाले कुछ गांवों में आदिवासियों को कड़कनाथ के पालन की जवाबदारी सौंपी गई थी। कुछ समय तक तो आदिवासी भी इन मुर्गों का ठीक ठाक पालन पोषण करते रहे लेकिन सरकारी कामकाज से गांवों में दौरा करने वाले अफसरों की अय्याशी के चलते कड़कनाथ के अस्तित्व को लेकर संकट पैदा हो गया है। वर्ष 2000 में जब राज्य का निर्माण हो रहा था तब वन विभाग द्वारा किए गए एक सर्वे में अकेले बस्तर इलाके में ही लगभग पांच हजार कड़कनाथ मुर्गों के होने का अनुमान लगाया गया था। अब इनकी संख्या बमुश्किल हजार के आसपास ही रह गई है।

प्रजाति के घटने का कारण
जनजातीय समुदाय अपने भरण-पोषण के लिए पशुओं का पालन तो करता है लेकिन उनके पालन में वैज्ञानिक नजरिए का अभाव बना रहता है। किसी भी एक मुर्गे के वध के पीछे समय के अंतराल का आंकलन नहीं किए जाने से भी प्रजाति के पनपने की संभावना खत्म हो जाती है। सामान्य तौर पर जनजातीय समाज इस मुर्गे का पालन बलि के लिए करता है। दीपावली के बाद अन्य तीज-त्यौहार पर भी देवी-देवताओं को बलि चढ़ाने के लिए इसका उपयोग किया जाता है लेकिन इधर पिछले कुछ वर्षों से गांवों में छुटभैय्ये किस्म के नेताओं एवं अफसरों की आवाजाही भी बढ़ी है। नेता एवं अफसर अपने भोजन के लिए देसी महुए के साथ कड़कनाथ की ही मांग करते हैं। नेता और अफसरों की यह मांग जनजातीय समाज को तो भारी पड़ ही रही है कड़कनाथ को भी इस मांग का नुकसान उठाना पड़ रहा है।

कड़कनाथ की विशेषता
कड़कनाथ भारत का एकमात्र काले मांस वाला चिकन है। ऊंचा पूरा यह मुर्गा काले रंग, काले पंखों और काली टांगों वाला होता है।  माना जाता है कि कड़कनाथ के मीट में सफेद चिकन के मुकाबले कोलेस्ट्राल का स्तर कम और अमीनो एसिड का स्तर ज्यादा होता है। यह कामोत्तेजक होता है और व्यक्ति के भीतर कायम हो चुकी निराशा को ठीक करने का काम भी करता है। कड़कनाथ के रक्त से कई तरह की बीमारियों को ठीक करने का दावा किया जाता है लेकिन मोटे तौर पर इसे पुरूष हारमोन को बढ़ावा देने वाला माना जाता है। इस मुर्गे का सेवन करने वाले लोगों का यह मानना है कि कड़कनाथ के भीतर लौह तत्व की मात्रा काफी अधिक होती है। लगभग बीस हफ्ते में एक मुर्गे का वजन 950 ग्राम हो जाता है। कड़कनाथ की कम होती संख्या को लेकर कोंडागांव बस्तर के वनमंडलाधिकारी राजेश ननहोरिया  ने बताया कि उनका विभाग यूएनडीपी प्रोजेक्ट के  कड़कनाथ के पालन-पोषण पर जोर दे रहा है। उन्होंने कहा कि लोगों के द्वारा अत्यधिक सेवन की वजह से कड़कनाथ की प्रजाति कम हो रही है।

Monday, December 27, 2010

क्या सिर्फ एक बाघ मरा है...

 छत्तीसगढ़ में कवर्धा से 80 किलोमीटर दूर पंडरिया के ग्राम अमनिया में जहां बाघ को मौत के घाट उतारा गया है वह इलाका अचानकमार व कान्हा नेशनल पार्क के गलियारे का जोड़ता है। पिछले दिनों जब वन्य प्राणी बोर्ड की बैठक हुई थी तब इस क्षेत्र में मौजूद एक खदान से खनन किए जाने के प्रस्ताव पर भी विचार-विमर्श किया गया था।  हालांकि बोर्ड के दो सदस्यों ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था।  सदस्यों के विरोध के बाद भी यहां खदान से खनन किए जाने की कार्रवाई को लेकर फाइल आगे बढ़ रही थी लेकिन बाघ की मौत ने माइनिंग लीज के प्रस्ताव पर फिलहाल  मिट्टी डाल दी है।  इधर इलाके में बाघों की मौजूदगी को नजरअंदाज करने वाले अफसरों की भी घिग्गी बंध गई है। 

गौरतलब है कि 19 दिसंबर 2010 को पंडरिया के अमनिया गांव के पास एक बाघ का शव पाया गया था। प्रारंभिक जांच-पड़ताल के बाद विभाग के अफसरों ने इस शव को लकड़बघ्घे का शव बताया था लेकिन जब रायपुर के वरिष्ठ अफसर मौके का मुआयना पहुंचे तब इस बात की पुष्टि हुई कि शव किसी बाघ का ही है। इस शव के मिलने के बाद विभाग के अफसरों की सिट्टी-पिट्टी गुम है। पिछले दिनों जब राजधानी में वन्य प्राणी बोर्ड की बैठक हुई थी तब वन अफसरों ने बोर्ड के सदस्यों के सामने रेंगाखार इलाके में मौजूद एक खदान के खनन का प्रस्ताव रखा था। कांग्रेस विधायक टीएस सिंहदेव एवं बसपा विधायक सौरभ सिंह जो बोर्ड के सदस्य हैं ने इस प्रस्ताव का खुलकर विरोध किया था। सदस्यों का कहना था कि रेंगाखार इलाके में बाघों की मौजूदगी देखी गई है और यह इलाका अचानकमार अभ्यारण्य व कान्हा नेशनल पार्क के गलियारे को जोड़ता है। फलस्वरूप यहां मौजूद खदान के खनन को मंजूरी देना किसी भी दृष्टि से उचित नहीं होगा। बोर्ड के सदस्यों के द्वारा किए गए विरोध के बाद भी खनन संबंधी मामले में एक फाइल मंत्रालय के गलियारों में दौड़ लगा रही थी। लेकिन बाघ की मौत के बाद फिलहाल मामला ठंडे बस्ते में जाता दिख रहा है। इधर इस मामले में माइनिंग लीज की तरफदारी करने वाले अफसरों की सिट्टी-पिट्टी भी गुम हो गई है। खबर है कि इस मामले में अफसर अपनी चमड़ी बचाने में लगे हुए है। हालांकि लापरवाहीपूर्वक काम करने के चलते कवर्धा के डीएफओ एके श्रीवास्तव ने नेउर कक्ष क्रमांक 475 के वन कर्मी धनुष सिंह ठाकुर और बीट गार्ड बीके गंजीर को निलंबित कर दिया है। लेकिन इस निलंबन के बाद भी कुछ सुगबुगाते हुए सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे पहला सवाल तो यही है कि क्या बाघ की मौत के लिए केवल ग्रामीण और निचले स्तर पर कार्यरत वन अमला ही जिम्मेदार है?

मुआवजे की लचर प्रक्रिया
वन विभाग के ही जिम्मेदार अफसरों का यह मानना है कि मुआवजे की लचर प्रक्रिया के चलते भी ग्रामीण जानवरों को मौत के घाट उतारते हैं। जिस किसी भी ग्रामीण का मवेशी मारा जाता है यदि उसे तत्काल ही मुआवजा दे दिया जाए तो वह हिंसक जानवर को ठिकाने लगाने के उपायों को अमल में नहीं लाता। अन्यथा ग्रामीण यह मानता है कि जब हिंसक जानवर उसके एक मवेशी को मार चुका है तो फिर वह उसके दूसरे जानवरों पर भी हमला करेगा ही। अन्य मवेशियों को बचाने के लिए ही शिकार हो चुके जानवर पर जहर घोलने की प्रक्रिया अपनाई जाती है। कवर्धा के अमनिया ग्राम में घटित हुई घटना में भी यही प्रक्रिया अपनाई गई थी। जिस बाघ की मौत हुई है उसने 25 से 30 नवंबर के बीच दो बैलों और एक गाय को अपना शिकार बनाया था। ग्रामीणों ने अन्य जानवरों के बचाव के लिए बाघ को ठिकाने लगाने का काम किया।

टाइगर अभ्यारण्यों में पद रिक्त
पिछले दिनों जब विधानसभा का शीतकालीन सत्र आयोजित किया गया था तब बसपा विधायक सौरभ सिंह ने वन मंत्री विक्रम उसेंडी से टाइगर अभ्यारण्यों में रिक्त पदों के संबंध में जानकारी चाही थी। श्री सिंह के लिखित प्रश्न के उत्तर में वनमंत्री ने बताया था कि इंद्रावती, उदंती-सीतानदी और अचानकमार अभ्यारण्यों के 420 पदों में से 219 पद पूरी तरह से खाली है। विभाग के अफसर भी दबी जुबान से यह मानते हैं कि मैदानी स्तर पर अमले की कमी के चलते जंगली-जानवरों की सुरक्षा ठीक ढंग से नहीं हो पा रही है। कवर्धा में जिस बाघ की मौत हुई है उसकी भनक भी वहां मौजूद बीट गार्ड को काफी देर से हुई थी। जब शव से दुर्गंध उठने लगी तब जाकर मामले का खुलासा हुआ।
एक ही जगह पर जमे अफसर
अब से कुछ अरसा पहले गोदाबर्मन के एक प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया था कि जो वन अफसर जिस काम के लिए पदस्थ किया जाएगा उसे वही काम करना होगा, लेकिन छत्तीसगढ़ में सुप्रीम कोर्ट के इस आदेश की सीधे-सीधे अवहेलना हो रही है। नियमानुसार प्रतिनियुक्ति में नियुक्त किये गये किसी भी अफसर की पदस्थापना तीन सालों के भीतर अन्यंत्र हो जानी चाहिए लेकिन छत्तीसगढ़ में इस नियम का पालन नहीं किया जा रहा है। विभाग में प्रदीप कुमार पंत, आरके सिंग, प्रकाशचंद्र पांडे सहित अनेक अफसर ऐसे हैं जो वन विभाग के बजाए अन्य जगहों पर कार्य कर रहे हैं। वन विभाग का ही धड़ा ऐसे अफसरों की प्रतिनियुक्ति को लेकर खासा नाराज है।   धड़े के जिम्मेदार लोग यह मानते है कि कतिपय अफसर अपनी पदस्थापना अन्य मलाईदार विभागों में इसलिए भी चाहते है क्योंकि वन विभाग की रौनक घट गई है। दूरस्थ क्षेत्रों में पदस्थ अफसर यह मानते है कि वन सेवा का काम काफी दबावों के बीच होता है। ऐसे में यदि कोई प्रतिनियुक्ति पर चला जाता है तो वह सीधे-सीधे सत्ता के करीब पहुंचकर मुख्यधारा में शामिल हो जाता है। अफसर मानते हैं कि बड़े पैमाने पर की गई प्रतिनियुक्ति के चलते ही जंगल में आग लगने, जानवरों के मारे जाने और अवैध कटाई के प्रकरणों में इजाफा हो रहा है। वर्ष 2008 से लेकर वर्ष 2010 तक अवैध शिकार के लगभग 45 प्रकरण सामने आ चुके हैं। दूरस्थ अंचलों में पदस्थ अफसरों का एक बड़ा वर्ग जंगलों की कटाई और अवैध शिकार के लिए बेगारी को भी एक कारण मानता है। नाम न छापने की शर्त पर कुछ अफसरों ने बताया कि जिलों में पदस्थ वनमण्डाधिकारियों का अधिकांश समय महात्मा गांधी राष्टÑीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के तहत संचालित किए जाने वाले कामों में ही बरबाद हो रहा है। अफसरों का अधिकांश समय आडिट रिपोर्ट बनाने में ही जाया हो रहा है। अफसरों का कहना है कि  जब तक वे बेगारी करते रहेंगे तब तक वनों और वन्य प्राणियों की सुरक्षा भगवान भरोसे ही रहेगी।
.भोजन की कमी 
वन्य प्राणी बोर्ड से जुड़े एक सदस्य का मानना है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में ‘सिंग’ और खुरवाले जानवरों की कमी हो गई है। नील गाय अब सरगुजा के आसपास ही नजर आती है तो चीतल व सांभर के दर्शन दुर्लभ हो गए हैं। बारहसिंघा तो प्रदेश में है ही नहीं। जानवरों की कमी के कारण ही बाघ पालतू जानवरों को उठाकर जंगल ले आता है। सामान्य तौर पर बाघ जिस जानवर को अपना भोजन बनाता है उसे वह दो-तीन दिनों तक बड़े चाव से खाता है।  अब से कुछ अरसा पूर्व जब बाघ ग्रामीणों के मवेशियों को उठाकर ले जाया करता था तब शिकारी उसका शिकार किया करते थे लेकिन अब ग्रामीण ही उसे ठिकाने लगा देते हैं। वन्य प्राणी बोर्ड के एक सदस्य टीएस सिंहदेव बाघों को बचाने के लिए की जा रही कवायद के बीच छत्तीसगढ़ में एक बाघ की मौत को काफी दुर्भाग्यपूर्ण मानते हैं। उनका मानना है कि जब तक वाइल्ड लाइफ का सेटअप पूरी तरह से अलग नहीं होगा तब तक अवैध शिकार के मामलों में बढ़ोत्तरी होती रहेगी। कुछ ऐसे ही विचार सौरभ सिंह के भी है। श्री सिंह का कहना है कि जब तक रिक्त पदों पर भर्ती नहीं की जाएगी तब तक अवैध शिकार के प्रकरण उजागर होते रहेंगे। छत्तीसगढ़ में वैसे भी बाघों की संख्या काफी कम है। यदि विभाग के लोग मुस्तैद होते तो यह घटना टाली जा सकती थी।
मुस्तैद है वन अमला
मैं यह नहीं मानता कि वन अमला मुस्तैद नहीं है। जहां तक अफसरों की प्रतिनियुक्ति का सवाल है तो मैं यह बताना चाहूंगा कि  वन सेवा से जुड़े अफसरों के लिए भी प्रतिनियुक्ति का नियम बना हुआ है। कुछ अफसर राज्य में सेवा देते हैं तो कुछेक की नियुक्ति दीगर राज्यों में होती है। हां यह सही है कि जंगलों  की कटाई से जानवर प्रभावित होते हैं। जब जानवरों को उनके अनुकूल वातावरण नहीं मिलता तो वे गांवों और कस्बों की ओर दौड़ लगाते हैं।
रामप्रकाश
पीसीसीएफ वाइल्ड लाइफ
 

कुछ तथ्य ऐसे भी
0 भारतीय वन्य प्राणी संस्था देहरादून द्वारा वर्ष 2008 में किए गए सर्वे के मुताबिक देश में कुल 1411 बाघ शेष हैं जबकि छत्तीसगढ़ में बाघों की कुल संख्या 26 बताई गई है।
0 नक्सलवाद के चलते प्रदेश के इंद्रावती अभ्यारण में शेरों की गिनती का काम नहीं हो पाया है।
0 1972 के वन्य जीव संरक्षण कानून के तहत बाघ को अनुसूची एक में शामिल किया गया है। पहली बार बाघ का शिकार या उसके अंगों की तस्करी करने पर तीन से सात वर्ष तक जेल और 50 हजार से लेकर दो लाख तक जुर्माने का प्रावधान तय किया गया है। दूसरी बार शिकार करने में सजा का अधिकतम समय सात वर्ष और जुर्माना पांच से पचास लाख निर्धारित है।
0 बिलासपुर जिले के अचानकमार अभ्यारण्य में शेरों की गिनती के लिए कैमरा लगाए जाने की तैयारी की गई थी लेकिन यह काम फाइलों में ही कहीं खोकर रह गया है।

Sunday, December 19, 2010

जरूरी काम

सचमुच फुरसत नहीं है मेरे पास
यकीन मानिए खाली तो बिल्कुल भी नहीं हूं
माउथ आर्गेन बजाने वाले एक लड़के से
जल्द ही मुलाकात करनी है मुझे


है अपना दिल तो आवारा
याद किया दिल ने कहां हो तुम
और एक प्यार का नगमा है जैसे गीतों पर झूमने के बाद

उस जगह भी जाना है मुझे
जहां एक बूढ़ा हर शाम
बजाता है सेक्सोफोन


वायलिन बजाने वाली  अम्माजी को भी तो सुनना है.

कहीं आप यह तो नहीं सोच रहे कि
मैं कोई आर्केस्टा या बैंडपार्टी खोलने की तैयारी में हूं
नहीं-नहीं ऐसा कुछ भी नहीं है.

ये कुछ जरूरी काम है जिन्हें कई सालों से
लगातार टालता आया हूं मैं.
लेकिन अब इन्हें

हर हाल में पूरा करना है मुझे


इसी हफ्ते मुझे
बच्चों के लिए गर्म कपड़ों की खरीददारी भी करनी है
और मैदान में टायर जलाकर
आग तापने वाले लोगों से पूछना है कि

सुलगते हुए देश को लेकर
उनकी अपनी निजी राय क्या है.

अरे हां.. सदर बाजार के उस पुराने से मकान में
जहां अक्सर मिल जाया करते हैं ऊर्दू अदब के जानकार
वहां भी जाना है मुझे

वही कही जीने पर बैठकर जान पाऊंगा
मीर, गालिब और नए शायरों का ताप

श्रम और पसीने की स्याही से लिखी गई
दो किताबें भी तो खरीदनी है मुझे

पिछले दो हफ्तों से गृह विभाग की हेड
यानी मेरी श्रीमतीजी ने कह रखा है कि
मैं दफ्तर से लौटते वक्त मैथी और
गाजर लेता आऊं
इस बार तो पक्के में लेकर जानी है दोनों चीजें


स्कूली बच्चों के सालाना जलसे में
शिरकत करनी है मुझे
और बीड़ी पी-पीकर
पूरे मोहल्ले की मां-बहन करने वाले
दीनदयाल  को अस्पताल में एडमिट भी करना है


पेड़ में बचे हुए
कुछ अमरूदों की रखवाली करने के साथ-साथ
 बिल्लस की शादी में भी पहुंचना है मुझे
बिल्लस को आप नहीं जानते
मेरे घर के आंगन में  लंगड़ी बिल्लस खेलने वाली

छुटकी का नाम रखा था मैंने- बिल्लस


आप यह जरा भी न सोचे कि
मेरा अंतिम वक्त आ चुका है
अभी मौत को चूमते हुए गले लगाने का 

कोई इरादा नहीं मेरा

मरने की फुरसत भी नहीं है मेरे पास
दुनिया के सबसे कीमती और जरूरी काम
मेरे हिस्से आए हैं
दोस्तों.... मुझको मेरा काम करने दिया जाए

Thursday, December 16, 2010

... तो हो गया न मामू केमिकल लोचा



अब से कुछ अरसा पहले जब टीवी पर इमोशनल अत्याचार जैसे कार्यक्रम की शुरूआत नहीं हुई थी तब सभी तरह के मामाओं को लोग-बाग मामा ही कहते थे, लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब मामा मामू हो चुका है। इस मामू का शाब्दिक अर्थ बुद्धु या छक्का ही होता है। दादा कोंडके की शैली में कहे तो पांडु। ( बहुत ज्यादा खुलकर लिखा नहीं जा सकता इसलिए पाठक अपने हिसाब से भाषा को सुरक्षा कवच पहना सकते हैं) 

अब थोड़ा केमिकल लोचा को परिभाषित करें। केमिकल का मतलब है रसायन और लोचा का सीधा अर्थ है लफड़ा। यानी रासायनिक लफड़ा। वैसे यह बताना थोड़ा मुश्किल है कि मामू और केमिकल लोचा शब्द की उत्पति किस वजह से और कहां  हुई है लेकिन मोटे तौर पर यह माना जा सकता है कि उक्त शब्दों का पहला सुंदर प्रयोग थ्री इडिट्यस बनाने वाले राजकुमार हिरानी की फिल्म मुन्ना भाई एमबीबीएस में देखने को मिला था। हिरानी अपनी हर फिल्म में विद्रूपताओं को मनोरंजक ढंग से प्रस्तुत करते रहे हैं इसलिए मुझे ही क्या बहुत से लोगों को उनका काम पसन्द आता है। वैसे तो सिनेमा की अपनी एक भाषा होती है लेकिन जब भाषा एक नए मुहावरे में प्रस्तुत होती है तो दिलों-दिमाग की नसों को हिलाकर रख देने का काम करती है। हिरानी की फिल्म की तरह जिन्दगी भी बहुत सारे रसायनिक लफड़े को लेकर चलते रहती है और इस केमिकल लोचे के बावजूद बहुत से लोग मामू बने रहते हैं। अपना यह लेख मैं एक बार फिर छत्तीसगढ़ के मामू बनाम बौद्धिक समाज को समर्पित करने जा रहा हूं।

मैं पहले भी कह चुका है कि प्रदेश का बौद्धिक समाज बड़ा ही मामू है। बड़ी सी बड़ी घटनाएं हो जाती है लेकिन यह समाज चुप्पी ओढ़े रहता है। अब से कुछ दिन पहले जब प्रदेश में बच्चों का अपहरण हो रहा था तब भी यह समाज चुप था। अभी थोड़े दिनों पहले जब राजधानी रायपुर की एक छात्रा नेहा ने छेड़छाड़ से घबराकर आत्महत्या कर ली तब भी यह समाज किताबों के विमोचन समारोह में लगा हुआ नजर आया। नेहा ने जब खुद के ऊपर मिट्टी तेल डालकर अपनी ईहलीला समाप्त करने की कोशिश की तब उसने अपने बयान में यह खुलासा किया था कि उसके स्कूल के ही दो छात्र उसे आते-जाते परेशान किया करते थे। उसने इस बात की शिकायत स्कूल प्रबंधन और छात्रों के परिजनों से भी की थी लेकिन किसी ने उसकी बात पर ध्यान नहीं दिया। छेड़छाड़ करने वाले छात्रों को जब शिकायत का पता चला तो वे छात्रा को ही धमकाने लगे। यहां तक नेहा के छोटे भाई को जान से खत्म करने की धमकी भी दी गई। डरी हुई नेहा ने आखिरकार खुदकुशी कर ली और......

और क्या... आपने नेहा के लिए कुछ नहीं किया। आप यह सवाल मुझसे भी पूछ सकते हैं कि इस आर्टिकल के लेखक ने क्या किया। हम समाचार बनाने वाले साथियों को इस बात का संतोष है कि हमने हस्तक्षेप किया। हमने खबरें लिखी। हमारे साथी अपनी खबरों के जरिए पुलिस पर इस बात का दबाब बनाते रहे कि आरोपियों की गिरफ्तारी हो। स्कूल प्रबंधन को सजा मिले, लेकिन मैं कविता और कहानियों के बड़े-बड़े संग्रह निकालने वाले आत्ममुग्ध लेखकों से यह तो पूछ ही सकता हूं उन्होंने क्या किया। प्रदेश में तीन बड़े लेखक संगठनों के अलावा वीणापाणी, अमृतवाणी, पत्र नहीं मित्र सहित सैकड़ों साहित्यिक संस्थाएं हैं, लेकिन किसी भी संस्था की तरफ से एक विज्ञप्ति जारी नहीं हुई । हालांकि विज्ञप्ति किसी समस्या का हल नहीं है फिर भी मुझे लगता है कि एक विज्ञप्ति जब सैकड़ों विज्ञप्ति में बदल जाती है तो ऐसी तमाम विज्ञप्तियां एक आवाज तो बन ही जाती है। प्रदेश में एक अकेली नेहा नहीं है। उस जैसी और भी लड़कियां है जो हर रोज मनचलों की हरकतों का शिकार होती है। यह बात मैं किसी प्रवचन के तहत नहीं कह रहा हूं लेकिन यह सच है कि समाज में यकीन रखने वाले लोगों की अपनी-अपनी भूमिका है। पुलिस को अपना काम करने दिया जाए तो लेखक भी अपना काम ही करें। केवल अपनी पीठ पर शाबाशी की धौल पाने के लिए किया गया लेखन ही सार्थक लेखन नहीं होता। एक सही लेखक सही समय पर हस्तक्षेप करता है। छत्तीसगढ़ में लेखकों की बिरादरी किसी भी मामले में हस्तक्षेप करते हुई नहीं दिखती। यहां का लेखक कविता और कहानियों को लेकर आयोजित किए जाने वाले विमर्श में तो नजर आता है लेकिन मजदूरों के आंदोलन में दो कदम साथ चलने में उसे शर्म आती है। 

छत्तीसगढ़ में मैं कई ऐसे लेखकों को जानता हूं जो अपनी कृति को स्कूटर की डिक्की पर डालकर घूमते रहते हैं। जैसे कोई विज्ञापनदाता मिल जाता है उसे तुरन्त सौजन्य प्रति भेंट कर दी जाती है। कुछ लेखक ऐसे भी है जो सुबह-सुबह फोन के जरिए यह सूचना देते हैं कि उनकी नई कविता किस पत्रिका में छपी है और किस संपादक ने उन्हें शताब्दी का सबसे बड़ा लेखक घोषित कर दिया है। अभी कुछ दिनों मै मजदूरों की नगरी भिलाई गया हुआ था। यह शहर मुझे इसलिए भी प्रिय है क्योंकि मेरा खतरनाक बचपन यही बीता है। भिलाई में रहकर ही मैंने खूब तमाशे किए। लेखकों को जमालघोंटा पिलाया। थियेटर किया और दुनिया की सबसे सस्ती सिगरेट पनामा और विविधभारती के साथ रातें गुजारी।  यहां मेरी मुलाकात लोकबाबू नाम के एक कथाकार से हुई। इस कथाकार ने मुझे चहक-चहककर बताया कि अब से कुछ अरसा पहले उसने जिस बकरी को पकड़कर कहानी लिखी थी उसका अनुवाद कई भाषाओं में हो चुका है और अब यह कहानी कोर्स की किताबो में शामिल कर ली गई है। यह सब बताते हुए कथाकार महोदय का चेहरा तेज से भर गया। श्रीमान लेखक ने मुझसे अपने  नए उपन्यास और कहानियों के बारे में तो  कई तरह की बातें की लेकिन अपनी पूरी बातचीत के दौरान यह नहीं बताया कि भिलाई इस्पात संयंत्र में कार्य करने वाले मजदूरों की दशा क्या है। ठेका श्रमिकों के साथ किस तरह का व्यवहार हो रहा है। अरे भाइयों मुझे अपनी मनहूस रचनाओं के बारे में मत बताओ.. आपकी रचना यदि अच्छी होगी तो वह चुपचाप नहीं बैठेंगी। कोई न कोई समझदार फिल्मकार उसे पर्दे पर उतार ही देगा। यदि फिल्म नहीं भी बनी तब भी रचना खामोश नहीं रहने वाली। जब रचना अच्छी होती है तो वह खराब समय में ही अपनी उपस्थिति दर्ज कर देती है। एक बेहतर रचना कभी खामोश नहीं रहती। बेहतर रचना की हलचल हमेशा कायम रहती है। छत्तीसगढ़ के दो कथाकार मनोज रूपड़ा (मनोज इन दिनों नागपुर में है ) और कैलाश बनवासी ने मुझे कभी यह सूचना नहीं दी कि उनकी कहानी किस पत्रिका की शोभा बढ़ा रही है। यहां तो भाई लोग यदि मनोरमा में छप जाते हैं तो दुनिया उठा लेते हैं। लेखकों की रीढ़ की हड्डी में लचीलापन और उन्हें याचक की मुद्रा में देखकर ही कहना पड़ रहा है- मामूओं सुधर जाओ.. वरना केमिकल लोचा हो जाएगा। वैसे यदि कभी आपको सिर्फ कविता से ही थाने को उड़ा देने वाला लेखक मिल जाए तो मुझे सूचना जरूर दीजिएगा। मैं ऐसे लेखक के दर्शन करके धन्य होना चाहूंगा। मिलते हैं जल्द ही।

Sunday, December 12, 2010

कांग्रेसियों की जय हो

ये सियासत का रास्ता है बचकर निकल
ये न तेरा हुआ और न मेरा हुआ
(निर्मल लखनवी)


देश में जितने बड़े घोटाले सामने आ रहे हैं उसके बाद तो हर कोई कांग्रेसियों की जय बोल रहा है। बात यदि छत्तीसगढ़ प्रदेश की करें तो यहां भी कांग्रेसियों की कुछ अलग ढंग से ही जय-जयकार हो रही है। अभी कुछ दिनों पहले शहर की जनता से रिश्ता रखने वाले पप्पू फरिश्ता ने छत्तीसगढ़ के प्रभारी एवं केंद्र में मंत्री वी नारायण सामी पर कालिख फेंकने-फिंकवाने की हरकत की थी। पप्पू की इस हरकत पर कांग्रेसियों ने ही खूब हो हल्ला मचाया था। जैसे-तैसे यह मामला शांत हुआ ही था कि सोनिया गांधी के जन्मदिन पर तिरंगे के रंगों बना केक काटने का मामला सामने आ गया। इस घटना ने भाजपाइयों को पुतला दहन का अवसर दिया। देशभक्तों की नई खेप ने भी इस हादसे पर लानत-मलानत भेजी। वैसे तो गांधी चौक का कांग्रेस भवन कई ऐतिहासिक घटनाओं का साक्षी रहा है लेकिन महीने-दो महीने में लगातार हुई इन दो घटनाओं ने यह साबित कर दिया है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेस और उसे जुड़े लोग पागलपन के दौर से गुजर रहे है। राजनीति में रूचि रखने वाले जिस शख्स को भी यह बताओ कि भाइयों यहां छत्तीसगढ़ में कुछ दिनों पहले कांग्रेस के एक साधारण कार्यकर्ता ने नारायण सामी पर कालिख फिंकवाने का काम किया था तो वह हंसने लगता है। अभी न चुनाव का समय है न टिकट के लिए मारा-मारी मची है फिर कालिख फिंकवाने की घटना क्यों हुई लोग यही सोच-सोचकर परेशान है। सच तो यह है कि तमाम तरह की उठापटक और छानबीन के बावजूद कांग्रेसी भी इस बात का पता नहीं लगा पाए हैं कि पप्पू फरिश्ता को श्री सामी पर कालिख फिंकवाने की जरूरत क्यों पड़ी। अपने आका अरविंद नेताम के साथ कभी भाजपा तो कभी बसपा तो कभी कांग्रेस के घर में हर बार पास होकर लौटने वाला पप्पू फिलहाल फरार है। कांग्रेसियों ने उसे गब्बर सिंह बनाकर छोड़ रखा है। जी हां पप्पू का पता बताने वाले को ईनाम देने की घोषणा की गई है। पप्पू कहां है। कब लौटेंगा। इस बारे में पुलिस भी पता लगा रही है।
अभी पुलिस को कांग्रेसियों ने एक नया काम और थमा दिया है। पुलिस वीडियों टेप के जरिए यह पता लगाने में जुटी है कि जिस केक को कांग्रेसियों ने सोनिया गांधी के जन्मदिन के मौके पर काटा था क्या वास्तव में उसमें तिरंगा बना हुआ था। वैसे पुलिस ने इस मामले में एक शिकायत के आधार पर मामला दर्ज कर लिया है। इस केक कांड में एक नई बात भी सुनने को मिल रही है। बताते हैं कि जन्मदिन पर केक काटने की योजना जिला कांग्रेस कमेटी के अध्यक्ष इंदरचंद धाड़ीवाल ने बनाई थी। श्री धाड़ीवाल ने केक काटने के लिए प्रभारी महामंत्री को आमंत्रित किया। प्रभारी महामंत्री और अध्यक्ष में जरा भी नहीं बनती लेकिन मामला सोनिया गांधी के जन्मदिन का था सो केक पर छुरी चल गई और छुरी से प्रभारी महामंत्री हलाल हो गए। मीठी छुरी से हुआ हलाल गाना तो अपन ने सत्तर के दशक में कई बार सुना था लेकिन धाड़ीवाल के छुरी से बाबूजी का पट्ठा चित्त हो गया।

इधर बात-बात पर लोगों को मां-बहन की गाली देने वाले एक नेता के बारे में एक वरिष्ट कांग्रेसी ने बड़ी बेबाक राय व्यक्त की है। नेताजी कहना है कि गाली देने वाला  नेता वैसे तो  कमजोर लोगों को ही गाली देता है, लेकिन जब ताकतवर लोग सामने  आ जाते हैं तो वह खुद को गाली देने लगता है। हां... गाली जरूर देता है। तो बात-बात मां –बहन की गाली देने वाले एक कांग्रेसी ने नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे की सीधे सोनिया गांधी से शिकायत की है। शिकायत भी ऐसी-वैसी नहीं बल्कि शपथपत्र के जरिए। विधानसभा के हर सत्र में दहाड़ मारने वाले श्री चौबे ने इस शिकायत के बाद चुप्पी ओढ़ ली है। श्री चौबे की स्थिति सांप- छछूंदर वाली हो गई है। करे तो क्या करें। यहां आपस में ही मरने कटने वाले कांग्रेसियों का एक मजेदार किस्सा याद आ रहा है। लगभग दो साल पहले एक नेता ने एक पत्रवार्ता लेकर आरोप लगाया था कि जब वीसी शुक्ल राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी में थे तब उनकी एक सभा को फेल करने के लिए प्रदेश के एक कद्दावर नेता ने उड़ीसा से कई सपेरों को बुलवाया था। योजना यह थी कि सभा में लोगों के बीच सपेरे भी बैठे रहेंगे और जैसे ही शुक्ल भाषण देने के लिए मंच पर आएंगे सांप छोड़ दिए जाएंगे। अब सांप काटते या न काटते इस बारे में तो सपेरे ही ज्यादा  अच्छे से  बता पाते  लेकिन इतना जरूर साफ है कि सभा में भगदड़ मचती और कई लोग बेमौत मारे जाते। कांग्रेसियों की यह सब टेक्नीक देखकर ही मैं उनकी जय-जयकार कर रहा हूं। प्रसिद्ध संगीतकार एआर रहमान ने भी कांग्रेसियों  के लिए एक गाना संगीतबद्ध किया था- आजा- आजा जिंदे शामियाने के तले.. आजा जर्रीवाले आशियाने की तले... जय हो। यह गाना शायद इसलिए बनाया गया था कि कांग्रेसी ही इसका इस्तेमाल कर सकें। कांग्रेस ने इसका इस्तेमाल किया भी। तो भाइयों आप भी मेरे साथ जोर से बोलिए - जय हो। अरे भाइयों जोर से....................... जय हो। हां अब ठीक।


आदमी, आदमी का दुश्मन है
इस सियासत की मेहरबानी से
(मंसूर उस्मानी)

Sunday, December 5, 2010

मुन्नी और शीला के बहाने

सब लोग जिधर हैं वो, उधर देख रहे हैं
हम देखने वालों की नजर देख रहे हैं
                       ( दाग)
शीर्षक पढ़ते ही आ गई न चेहरे पर मुस्कान। दरअसल इसमें आपकी गलती नहीं है। मुन्नी और शीला दो ऐसे नाम है जो बेहद चलताऊ है। वैसे तो मोना और मोनिका जैसे नाम भी कम भड़काऊ नहीं है लेकिन मुझे लगता है कि मुन्नी और शीला जैसे दो नामों से उन लोगों का अच्छा-खासा वास्ता रहा  है जो साठ-सत्तर या अस्सी के दशक में पैदा हुए थे। इन सालों में जब लोगों के घर-घर में फैशन टीवी नहीं पहुंचा था तब पीले रंग के जिल्द वाली कोकशास्त्र के भीतर चित्रों में कैद मुन्नी और शीला ही लोगों की नींद हराम किया करती थी। हो सकता है कि बहुत से लोगों को इन नामों से चिढ़ भी रही हो लेकिन यह सच है कि एक समय बहुत सारे लोग लोग मुन्नी और शीला के नाम पर रची जाने वाली कहानियों को पढ़ने के लिए टूट पड़ते थे। मजे की बात यह है कि इन दो नामों पर कहानी लिखने वाली भी कोई लेखिका ही थी। अब कोई पुरूष लेखक ही यह कारनामा करता रहा होगा तो इसकी जानकारी मुझे नहीं है लेकिन एकाध बार कुछ समझदार मित्रों ने ही मुझे नशे की रौ में बताया था कि कामिनी देवी बम फोड़ते रहती है। वैसे जो हरामी किस्म के पत्रकार  और साहित्यकार है वे इस बात को बखूबी जानते हैं कि कामिनी देवी अपने समय में किस-किस तरह के गुल खिलाती रही है।

खैर.. मैं यहां मुन्नी और शीला का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि इन दो नामों की इन दिनों बड़ी जबरदस्त चर्चा है। मुन्नी बदनाम होने के साथ-साथ झंडुबाम भी बेच रही है। जबकि शीला को अपनी जवानी पर घमंड आ गया है। वह हर चैनल में अपनी जवानी की विशेषताओं को बताते फिर रही है। अभी दो रोज पहले ही मुझे एक विवाह समारोह में शामिल होने का अवसर मिला था। प्रदेश की राजनीति में रूचि रखने वाले कुछ लोगों के साथ मैं बात कर ही रहा था कि अचानक एक सोलह-सत्रह साल की लड़की दौड़ती हुई आई और उसने गोलगप्पे खा रहे एक आदमी से फरमाया-

पापा.. रिशु को देखो न, मैंने मुन्नी बदनाम हुई पर डांस तैयार किया है लेकिन अब बोल रही है कि पहले वो नाचेंगी। गोलगप्पे गटकने वाले बाप ने एक लंबी सी डकार लेने के बाद लड़की को ज्ञान दिया कि बेटा पहले रिशु को नाच लेने दो... वो तुमसे बड़ी है। जब रिशु नाच लेंगी तब कुछ देर बाद अपन अनाउसमेंट करवा देंगे अब  तहलका मचाने आ रही है सक्सेना साहब की छोटी बेटी अंशु। जाओ बेटे जाओ दोनों नाच लेना। एक पिता की भयंकर किस्म की प्रगतिशीलता को देखकर आसपास खड़े सभी लोगों को आश्चर्य हुआ। नतीजा यह हुआ कि राजनीति की चर्चा को विराम लग गया और मुन्नी और शीला की चर्चा शुरू हो गई। बातों ही बातों में एक पत्रकार मित्र ने बताया कि हम लोग बिलावजह ही मुबंई की मुन्नी और शीला को देखकर परेशान हो रहे हैं। इन दिनों छत्तीसगढ़ की फिल्म इंडस्ट्री में भी सैकड़ों मुन्नी और शीलाएं तहलका मचा रही है।
सब जानते हैं कि एक सुपर-डुपर छत्तीसगढ़ फिल्म की हिरोइन पर किस तरह एक मंत्री मर मिटा था। जोगी शासनकाल में हुई इस घटना को लोग आज भी चटखारा लेकर याद करते हैं। राजनांदगांव की दिव्या साहू भी यहां एक हिरोइन ही बनने आई थी। कुछ फिल्मों और एलबम में काम करने के बाद उसे एक शादी-शुदा आदमी ने हमेशा-हमेशा के लिए मौत की नींद सुला दिया था। मध्यप्रदेश के भोपाल से छत्तीसगढ़ में अपने बच्चे के साथ फिल्मों में काम करने आई अंनिदता की कहानी भी कुछ अलग नहीं है। कुछ रईसजादों ने अंनिदता को  टाप की हिरोइन बनाने का झांसा दिया था। लेकिन एक रोज राजधानी से कुछ किलोमीटर की दूरी पर उसकी लाश मिली थी। अंनिदतता के साथ एक नेता का पुत्र भी घायल मिला था। राज्य निर्माण के बाद जब प्रदेश में पहली बार चुनाव हुए तब एक बड़े नेता ने अचानक पार्टी बदल ली थी। बाद में पता चला कि सत्ताधारी दल के एक नेता ने किसी मुन्नी के साथ उसकी सीडी बना ली है। सीडी के सार्वजनिक होने के भय से नेताजी ने कांग्रेस में प्रवेश कर लिया था। रंगमंच की एक बूढ़ी हिरोइन अपने से छोटे उम्र के एक हीरो के साथ घर बसा चुकी है तो एक भिलाई की एक हिरोइन का मामला थाने पर जाकर खत्म हुआ है। इधर पिछले कुछ समय से राजधानी की फिजांओं में फिल्मों में काम करने की इच्छुक एक लड़की की फोटोग्राफी को लेकर चर्चाओं का बाजार गर्म है।  खबर है कि फिल्म बनाने के इच्छुक कुछ रईस निर्माताओं ने लड़की को एक सस्ते से होटल में बुलाकर उसे मल्लिका शेरावत बनने का गुर सीखा डाला सच तो यह है कि बाजार ने अच्छे-अच्छे घरों की लड़कियों को मुन्नी और शीला बनने पर मजबूर कर दिया है। यह अलग बात है कि मुबंई की मुन्नी को एक गाने पर कमर मटकाने का ढाई करोड़ मिलता है। यहां की मुन्नी भी कमर हिलाकर ढाई हजार तो कमा ही लेती है। आप माने या न माने लेकिन यह सच है कि छत्तीसगढ़ में कुछ लोग बैंकाक और पटाया का आनन्द प्राप्त करने के लिए ही फिल्में बना रहे हैं। गत एक दशक में यहां सौ से ज्यादा फिल्मों का निर्माण हो चुका है लेकिन छत्तीसगढ़ की आत्मा कही जाने वाली एक भी फिल्म का प्रदर्शन अब तक नहीं हो पाया है। निसार इटावी का यह शेर शायद किसी के काम आ जाए-
वही हकदार हैं किनारों के
जो बदल दे बहाव धारों के