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Sunday, November 28, 2010

शांति के नाम पर..

सियासत की अपनी अलग जुबां है
लिखा हो जो इकरार, इन्कार पढ़ना

प्रदेश के जिस किसी भी अफसर या कर्मचारी से पूछो तो वह यही कहेगा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है। प्रदेश में शांति है। जबकि हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ इन दिनों यथास्थिति के बुरे दौर से गुजर रहा है। यथास्थिति तब पैदा होती है जब चारों तरफ से यह समाचार मिलने लगता है कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। जब लोग अपने हाथों को सिकोड़कर जेब में ठूंस लेते हैं तभी अचानक बच्चों की हत्या होने लगती है। नक्सली उत्पात मचाने लगते हैं। जब लोग हस्तक्षेप करना बंद कर देते हैं और यह मान लेते हैं कि जो कुछ चल रहा है वह ठीक है तो समझिए गड़बड़ी वहीं से शुरू होने लगती है। जो लोग मुर्दाघरों में आयोजित की जाने वाली शोकसभा और उसमें दो मिनट के लिए कायम होने वाली शांति को महत्वपूर्ण मानते हैं उन्हें शायद यह मालूम नहीं होगा कि ऐसी शांति कभी भी सच्ची श्रद्धाजंलि नहीं होती। हर शोकसभा में अस्सी फीसदी लोगों के दिमाग में  मौन के समय को लेकर खींचतान चलते रहती है। यदि मौन थोड़ा लंबा हो जाता है तो लोगों को लगने लगता है, मरने वाला तो मर गया हमको जबरदस्ती परमेश्वर को याद करना पड़ रहा है। साला दो मिनट हो गया... कोई ओम.. शांति ओम क्यों नहीं बोल रहा है। शोकसभाओं में ही लोगों के मोबाइल से मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए जैसी मादक धुन सुनाई देती है। ऐसी सभाओं में ही लोगों को अपने घर के अधूरे काम याद आते हैं। श्मशान घाट में आदमी अपने अधूरे कामों को तो याद कर लेता है लेकिन उस आदमी के कामों को भूल जाता है जो उनकी आंखों के सामने ही धूं-धूं करके जल रहा होता है।

हममें से बहुत से लोग यह सोचते हैं कि क्यों किसी के फट्टे में हाथ डाले। फट्टे में साबूत हाथ तो दूर एक उंगली भी नहीं रख पाने के कारण ही कभी आदिवासियों को नक्सली मौत के घाट उतारते हैं तो कभी पुलिस। प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से बच्चे जुल्म के शिकार हो रहे हैं। कोई उन्हें घटिया प्रेम में असफल होने के कारण मौत के घाट उतार रहा है तो कोई केवल फिरौती के लिए उनका गला घोंट रहा है। बच्चों की बलि और उनके अपहरण के विरोध में हाल-फिलहाल रोज कमाकर कुंआ खोदने वाले समाज का विरोध ही देखने को मिल रहा है। इस मामले में प्रदेश के बौद्धिक समाज की चुप्पी खतरनाक है। देखा जाए तो यहां का बौद्धिक समाज बड़ा ही मामू है। इस समाज के अपने ही इतने ज्यादा टंटे है कि वह सेमिनारों के अलावा किसी और जगह अपनी प्रतिक्रिया देना पंसद ही नहीं करता है। प्रदेश के तीन बड़े लेखक संगठन अपनी आपसी लड़ाईयों में उलझे हुए हैं तो पढ़ने-लिखने के नाम पर गठित की गई छोटी-छोटी संस्थाओं को कविता पाठ से ही निजात नहीं मिल पा रही है।  

यहां अलग-अलग धड़े में बंटे विपक्ष से प्रबल विरोध की उम्मीद ही बेमानी है। विपक्ष का तगड़ा विरोध यहां तब ही शुरू होता है जब कोई उनकी नेता सोनिया गांधी को भला-बुरा कहता है। जिस मामले में सोनिया या राहुल का नाम नहीं घसीटा जाता है वहां विपक्षी लोग यह देखते हैं कि मामले को उठा कौन रहा है। यदि अजीत जोगी ने मामले को पकड़ा है तो एक धड़ा तुरन्त सरेंडर कर देगा। यदि किसी मामले में नेता प्रतिपक्ष के खेमे ने पहल की है तो समझिए उसे जोगी व अन्य खेमे का सहयोग नहीं मिलेगा। हाल-फिलहाल विपक्ष ने बच्चों के अपहरण और उनकी हत्याओं के विरोध में बंद का ऐलान कर दिया है। विपक्ष का यह विरोध प्रशासन पर कितना दबाब बना पाता है यह देखना बाकी है। 

बच्चों के संवेदनशील मसले पर संवेदनशील होने का स्वांग रचने वाले विपक्ष की एक हरकत रह-रहकर याद आ रही है। अब से लगभग छह महीने पहले एक कांग्रेस नेता की जमीनों को बचाने के लिए बनाए गए एक संगठन के कथित दलालों ने राजधानी के एक आश्रम से बच्चा चोरी किए जाने की घटना को उजागर करने का काम किया था। जब इस मामले की तफ्तीश की गई तो पता चला कि नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चों से एक मीडियाकर्मी बुरी तरह चिढ़ा बैठा था। इस आश्रम के बच्चों ने गलती से महान नेत्री मेघा पाटकर का विरोध कर दिया था और बस यही विरोध स्वयंसेवी संस्थाओं की हिमायत करने वाले शुगर पेसेंट मीडियाकर्मी को अखर गया था। बच्चों की हिमायत करने वाले विपक्ष ने तब इस मामले में विधानसभा में जोरदार हंगामा मचाया था। हंगामे के दौरान यह देखने की जहमत भी नहीं उठाई गई थी कि आश्रम में जो बच्चे मौजूद है उनके भविष्य का क्या होगा। जिन दिनों यह घटना हुई थी उन दिनों नक्सली हिंसा में अपने माता-पिता को खोने वाले बच्चे परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे थे। यह सब हो-हंगामा इसलिए हुआ था क्योंकि जिन दलालों ने मामले को तूल देने की कोशिश की थी वे रायगढ़ और मरवाही इलाके के दो कद्दावर नेताओं के करीबी थे (अब भी है) 

खैर यह मामला अब अदालत में चल रहा है और इसमें कोई महत्वपूर्ण फैसला जल्द ही आने की उम्मीद भी है। बहरहाल विपक्ष ने बच्चों के मामले में जो एक जुटता दिखाई है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। एक बात और यह कि किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है यथास्थिति। इस स्थिति में विध्वंसकारी तत्वों को गड़बड़ी करने का मौका मिलता है। ऐसे तत्व जब कुछ नहीं कर पाते हैं तो बंदर का मुखौटा पहनकर झुग्गी बस्तियों में तमाशा मचाने लगते हैं। कई बार यह लगता है कि पेन की नींब के बजाए नाखूनों को ही स्टील में बदलकर कोई नींब बना ली जाए लेकिन फिर यकायक नुसरत ग्वालियरी का यह शेर याद आ जाता है-
रात के लम्हात खूनी  दास्तां लिखते रहे
सुबह के अखबार में हालात बेहतर हो गए.

Wednesday, November 24, 2010

टोनही पर बनेगी फिल्म

 विरासत में मिली नक्सलवाद की चुनौती से किनारा करने वाले छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों ने ‘टोनही’ जैसी कुप्रथा पर भी फिल्म बनाने जहमत नहीं उठाई है। खबर है कि  इस संवेदनशील विषय पर बालीवुड के प्रसिद्ध निर्माता एवं निर्देशक रामसे ब्रदर्स फिल्म बनाने का इरादा रखते हैं। भूत, प्रेत और अंधविश्वास को बढ़ावा देने वाले रामसे बंधु टोनही जैसे विषय के साथ कितना न्याय कर पाते हैं यह देखना दिलचस्प होगा। 

छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से में अब भी टोनही जैसी कुप्रथा कायम है। गांवों के शिक्षा के प्रचार-प्रसार के बावजूद भी लोगों में यह धारणा कायम है कि गांवों में कुछ महिलाएं जादू-टोना करती है।   वैसे ग्रामीण महिलाओं को टोनही साबित करने के जितने भी मामले सामने आए हैं उनमें अक्सर षड़यंत्र और शरारत की बू ही देखने को मिली हैं। ग्रामीण अंचलों की वे महिलाएं जो बदनसीबी से बांझ, विधवा अथवा परित्यक्ता हो जाती हैं उन्हें इस कुप्रथा का शिकार बनाया जाता रहा है। अभी साल भर पहले ही छत्तीसगढ़ के राजिम के समीप  एक गांव में एक महिला को टोनही बताकर लोगों ने बुरी तरह प्रताड़ित किया था। लोगों को टोनही जैसी कुप्रथा का वास्तविक सच बताने के लिए यहां डाक्टर दिनेश मिश्रा की अगुवाई में अंधश्रद्धा निर्मूलन समिति भी काम कर रही है लेकिन बावजूद इसके गांवों की महिलाओं को टोनही के नाम पर प्रताडि़त करने का सिलसिला थमा नहीं है। 

रामसे ने उठाया बीड़ा
छत्तीसगढ़ राज्य निर्माण के बाद से लेकर अब तक यहां सौ से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित हो चुकी हैं लेकिन किसी भी फिल्मकार ने इस संवेदनशील मसले पर अपनी सृजनात्मकता का परिचय नहीं दिया है। मुंबई में रहकर दरवाजा, पुरानी हवेली, वीराना और तहखाना जैसी फिल्म बनाने वाले निर्माता तुलसी एवं श्याम रामसे ने इस विषय पर फिल्म बनाने का निर्णय लिया है। यह फिल्म टोनही जैसी कुप्रथा का सही रेखांकन कर पाएगी या नहीं यह तो आने वाला समय ही बताएगा लेकिन रामसे ब्रदर्स द्वारा की गई पहल को सराहना मिल रही है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लगातार मिल रही सफलता के बाद मुंबई के अनेक दिग्गज निर्माता निर्देशक भी छत्तीसगढ़ी फिल्मों को लेकर उत्ससाहित हैं। सन्नी देओल को लेकर गदर बनाने वाले अनिल शर्मा भी एक फिल्म की स्क्रिप्ट पर काम कर रहे हैं। रायगढ़ खरसिया के मुरली अग्रवाल भी बालीवुड के एक निर्माता के साथ बड़े बजट की फिल्म बनाने की तैयारी कर रहे हैं। महाभारत में शकुनि की भूमिका निभाकर चर्चित होने वाले गूफी पेंटल की फिल्म महतारी लगभग-लगभग पूरी हो चुकी है। भोजपुरी फिल्मों के सुपर स्टार रवि किशन यहां दीपक तिवारी के निर्देशन में निर्मित की जा रही एक फिल्म में अभिनेता प्रकाश अवस्थी के साथ नजर आने वाले हैं। राजश्री की कई फिल्मों में पिता की भूमिका निभाने वाले आलोकनाथ भी छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने के इच्छुक हैं।

टोनही प्रथा के खिलाफ विधेयक
टोनही जैसी कुप्रथा के खिलाफ रमन सरकार ने 19 जुलाई वर्ष 2005 को विधान सभा में एक विधेयक प्रस्तुत किया था। यह विधेयक ध्वनिमत से इसलिए भी पारित हुआ क्योंकि जनप्रतिनिधियों की भी यह राय रही है कि इस कुप्रथा का सर्वाधिक शिकार गरीब महिलाएं ही होती रही हैं। इस विधेयक के लिए राष्ट्रीय महिला आयोग एवं प्रदेश के महिला एवं बाल विकास विभाग को लंबी कवायद भी करनी पड़ी थी। विधेयक में यह स्पष्ट उल्लेखित है कि जो कोई भी किसी भी माध्यम से महिलाओं को टोनही करार देकर प्रताड़ित करेगा उसे तीन वर्ष का कठोर कारावास भुगतना होगा। इसके अलावा उसे जुर्माना भी देना पड़ सकता है। विधेयक में टोनही के नाम झाड़-फूंक, तंत्र-मंत्र करने वालों के लिए भी सजा का प्रावधान किया गया है। इस प्रावधान के मुताबिक काला जादू, बुरी नजर या अन्य किसी रीति से प्रचारित करने वाले को भी एक वर्ष का दंड और जुर्माना भरना होगा।  इस विधेयक के पारित हो जाने पर कुछ हद तक इस कुप्रथा पर अंकुश तो लगा लेकिन अब भी महिलाओं को प्रताड़ित करने का सिलसिला जारी है। उम्मीद की जानी चाहिए कि रामसे की फिल्म इस कुप्रथा पर कुछ चोट करेंगी।

Monday, November 22, 2010

मैं मैना हूं साहब जी...

 
अभी तो बस्तर की मैना अपने आसपास गुजरने वाले लोगों को  मैं मैना हूं साहब जी कहकर संबोधित करती है लेकिन शायद पहाड़ी मैना के किस्से अब कहानियों में ही सिमट कर रह जाने वाले हैं। मैना के संरक्षण के लिए वन विभाग ने थाईलैंड के जीव वैज्ञानिकों से मदद लेने का फैसला किया था लेकिन हाथियों के आतंक से निपटने में लगे हुए वन विभाग के अमले ने अब इस विषय पर सोचना ही बंद कर दिया है।

बस्तर की पहाड़ी मैना को छत्तीसगढ़ की सरकार ने राजकीय पक्षी का दर्जा दे रखा है। इस पक्षी के संरक्षण के लिए वन विभाग की तरफ से कई कार्ययोजना बनाई जाती रही है लेकिन किसी भी एक योजना पर ठीक ठाक तरीके से अमल नहीं किया गया। कभी मैना की गिनती के लिए बहेलियों की मदद ली गई है तो कभी उसके प्रजनन को बढ़ावा देने के लिए पिंजरे में ही प्राकृतिक वातावरण देने की कोशिशें भी हुई है। तमाम  तरह की कोशिशों के बावजूद मैना के संरक्षित प्रजनन की दिशा में विभाग को सफलता नहीं मिल पाई है। बस्तर में मैना के संरक्षण के लिए वन विद्यालय में एक बड़ा पिंजरा तैयार किया गया है लेकिन पिछले पंद्रह सालों मे यहां मैना ने एक भी अंडा नहीं दिया। मैना के संरक्षण और प्रजनन के लिए वन-विभाग द्वारा बहुतेरे उपाय किए जाने के बाद भी उनकी संख्या में बढ़ोतरी नहीं हो पाई। छत्तीसगढ़ के दक्षिणी इलाके में कभी बड़ी संख्या में पाई जाने वाली पहाड़ी मैना अब गिनती की रह गई हैं। बस्तर के एक बड़े हिस्से में माओवादी छापामारों और सुरक्षा बलों के बीच युद्ध भी चलता रहता है। पक्षियों के संरक्षण के लिए काम करने वाले विशेषज्ञों का यह मानना है कि जब-जब प्राकृतिक वातावरण अशांत होता है सबसे ज्यादा नुकसान शर्मीले पक्षियों को ही उठाना पड़ता है।


संरक्षण का काम ठंडे बस्ते में
गत दस वर्षों में छत्तीसगढ़ की सरकार ने बस्तर की पहाड़ी मैना को संरक्षित करने के लिए काफी पैसा खर्च किया है मगर  अब तक मैना की वंश वृद्धि को लेकर सफलता नहीं मिल पाई है। जगदलपुर के वन विद्यालय में भी जो दो मैना रखी गई है उसमें से कौन सी मैना मादा है कौन सा नर इसका पता भी नहीं चल पाया है। वन विभाग ने मैना के संरक्षण के लिए थाईलैंड के राम्खन विश्वविद्यालय के जीव विशेषज्ञों से मदद मांगी थी। इस विश्वविद्यालय की जीव वैज्ञानिक मणि अर्चना ने मैना पर शोध को लेकर अपनी रूचि भी दिखाई थी लेकिन इधर विभाग के आला अफसरों को यह लगा कि मैना के संरक्षण से ज्यादा जरूरी काम हाथियों के आतंक से निपटना है। फिलहाल मैना को संरक्षित करने का काम ठंडे बस्ते में चला गया है।

बस्तर जगदलपुर के वन संरक्षक अरूण पांडे का कहना है कि थाईलैंड और बस्तर के पहाड़ों में विचरण करने वाली मैना का स्वभाव एक जैसा है। यदि थाईलैंड की मैना शर्मीली है तो बस्तर की मैना भी बहुत ऊंचे पेड़ों पर रहना पसंद करती है। मैना की घटती आबादी का एक कारण यह भी है कि वह अपने जिस साथी का चयन करती है उसके बाद फिर किसी दूसरे साथी को लेकर दिलचस्पी नहीं दिखाती। उन्होंने बताया कि मैना के संरक्षण के लिए विभाग लगातार प्रयासरत हैं। बैंकाक स्थित विश्वविद्यालय के जीव वैज्ञानिकों से पत्राचार चल रहा है। संभवत: अगले महीने विशेषज्ञों का दल छत्तीसगढ़ आ जाएगा। यह शोध दल मैना के संरक्षण के लिए क्या कर पाएगा यह देखना दिलचस्प होगा लेकिन हाल-फिलहाल पूरे बस्तर में चार सौ छह सौ पहाड़ी मैना ही जीवित रह गई है। कभी बस्तर की पहाडि़यों में मैना की सुरीली बोली गूंजा करती थी लेकिन अब वहां गोलियों की आवाज सुनाई देती है।

Sunday, November 21, 2010

कबीलों के सरदार

 सियासत की तवायफ का दुपट्टा
 किसी के आंसुओं से तर नहीं होता


क्या आपने जितेंद्र , आशा पारेख के अभिनय और राहुलदेव बर्मन के संगीत से सजी फिल्म कारवां देखी है। अरे भाई वही कारवां जिसमें पिया तू अब तो आजा, दिलबर ओ दिलबर और कितना प्यारा वादा है इन मतवाली आंखों का जैसा सुपरहिट गीत मौजूद है।  इस फिल्म में मदनपुरी को एक कबीले का सरदार बताया गया है। इस सरदार की बेटी अरूणा ईरानी जो मौका मिलते ही  आयटम  सांग प्रस्तुत करने लगती है वह ट्रक ड्रायवर जितेंद्र पर फिदा हो जाती है । इधर-उधर के झगड़े के बाद जब त्याग और बलिदान का महत्व समझाने की बारी आती है तो अरूणा ईरानी गोली खाकर टें बोल जाती है। एक साधारण सी कहानी पर बनी यह फिल्म वैसे तो  कोई संदेश नहीं देती लेकिन यह जरूर बताती है कि लड़ने-झगड़ने के लिए किसी भी तरह के ठोस कारण की जरूरत कभी नहीं पड़ती है। फिल्म के अनेक दृश्य में कबीले के लोग चाकू-छुरी निकालते हुए दिखाए गए हैं। मैं  यहां  खास तौर पर  इस फिल्म का जिक्र इसलिए भी कर रहा हूं क्योंकि छत्तीसगढ़ में विपक्ष की स्थिति भी कमोबेश इस फिल्म में मौजूद कबीलों की तरह ही है। अलग-अलग कबीलों के सरदार अपने-अपने टेंटों में ही चाकू-छुरी तेज करते रहते हैं। जैसे ही कोई एक सरदार अपने टेंट से बाहर निकलता है दूसरे टेंट में लालटेन के नीचे झींगा मछली भकोसने वाला दूसरा सरदार झींगालाला.. झींगालाला... हुर्र... हुर्र करते हुए सरदार को घेर लेता हैं और फिर अपनी सुविधा देखकर भाला घोंप देता  है। आपस में सिर फुटौव्वल की वजह से कांग्रेसी अब तक यह तय नहीं कर पाए हैं कि प्रदेश की सत्ता के खिलाफ उनका विरोध किस तरह का होना चाहिए।
छत्तीसगढ़ में नक्सलवाद, किसानों के साथ धोखे और छलावे की सैकड़ों बड़ी समस्याएं कायम है लेकिन विपक्ष की हालात को देखकर अब कोई भी यह कहने की हिम्मत नहीं जुटाता कि-भाइयों कम से कम आयोडेक्स मलने के बाद तो काम पर लग जाओ। अलग-अलग कुनबे के सरदारों का पूरा ध्यान इसी बात को लेकर लगा रहता है कि उनकी अपनी पार्टी के लोगों में से कौन दिल्ली जाकर तीन-पांच कर रहा है। कौन सोनिया गांधी से मिल रहा है। कौन  राहुल बाबा के कान में फुसफुसा रहा है।  सरदारों की दिलचस्पी इस बात में नहीं है कि सरकार क्या कर रही है। वैसे बीच-बीच में कोई-कोई सरदार खैर-खबर लेने का प्रयास करता हुआ भी दिखता है लेकिन जैसे ही कोई सरकार को ललकारने का अभिनय प्रारंभ करता है दूसरा परदा गिराने की तैयारियों में जुट जाता है। 
छत्तीसगढ़ कांग्रेस में पिछले कुछ महीनों में कुछ घटनाएं बड़ी ही मजेदार हुई है। छत्तीसगढ़ के प्रभारी नारायण सामी एक कार्यक्रम के सिलसिले में छत्तीसगढ़ आए थे तब शहर की जनता से रिश्ता रखने वाले पप्पू फरिश्ता के कुछ समर्थकों ने उन पर कालिख फेंक दी थी। इस घटना के बाद खूब हंगामा मचा। इधर-उधर की उठापटक के बाद सारे कांग्रेसी पप्पू फरिश्ता के पीछे लग गए। एक कांग्रेसी ने तो पप्पू का पता बताने वाले को पांच हजार रुपए का ईनाम देने की घोषणा भी कर डाली ।पप्पू को गब्बर सिंह साबित करने के लिए उस कांग्रेसी ने भी खासी मेहनत की जिसकी कुर्सी फिलहाल खतरे में हैं।

वैसे तो यह घोषित तौर पर साफ है कि श्री फरिश्ता आदिवासी नेता अरविंद नेताम के करीबी है लेकिन सियासत की बाजीगरी में माहिर लोगों ने पहले तो इस प्रकरण में कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा को लपेटना चाहा लेकिन जब बात घूम-फिरकर एक व्यक्ति पर ठींकरा फोड़ने की आई तो जूदेव और विधायकों की खरीद-फरोख्त कांड को याद करते हुए पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी को भी घसीट लिया गया। श्री जोगी के बारे में यह बात प्रचारित हुई कि उन्होंने श्री फरिश्ता के कांग्रेस प्रवेश को लेकर अपनी खास रूचि दिखाई थी। यहां यह बताना लाजिमी है कि शहर की जनता से रिश्ता कायम रखने का दावा करने वाले श्री फरिश्ता को पार्टी कई बार बाहर का रास्ता दिखा चुकी है, लेकिन हर बार वे अपने आकाओं की बदौलत कांग्रेस प्रवेश पाने में सफल होते रहे हैं। कहा तो यह भी जा रहा है कि श्री फरिश्ता जिला अध्यक्ष बनने के इच्छुक थे और इसके लिए उन्होंने कुछ बड़े नेताओं को भारी-भरकम सूटकेस पहुंचाकर मामला अपने पक्ष में भी कर लिया था.. बस नारायण सामी सेट नहीं हो पा रहे थे फलस्वरुप कैमल का इंक फेंकने की मजबूरी सामने आ गई।  अब यह बात कितनी सच है और कितनी झूठ लेकिन अंदरखाने से जो खबर छनकर आई है उसके मुताबिक इधर श्री सामी ने भी पप्पू को माफ कर दिया है। इस माफी के बाद पप्पू पुलिस के हत्थे चढे़गा या नहीं यह समय के गर्भ में है लेकिन कांग्रेस अपने आपको कालिख कांड से बाहर नहीं निकाल पा रही है। कालिख कांड की आड़ में जनता के मुद्दों से किनारा कर लिया गया है।
कुछ दिनों पहले ही जब राज्य निर्माण का दस वर्ष पूरा हुआ था तब रमन सरकार ने नेता प्रतिपक्ष रविंद्र चौबे को भी न्यौता दिया था। उत्सव के उदघाटन समारोह में श्री चौबे के मुंह से अचानक यह निकल गया- सरकार द्वारा किए जाने वाले विकास में विपक्ष भी सहभागी है। बस... कुनबे के सरदारों को मौका मिल गया। हमला प्रारंभ हो गया। इस कांड का सच भी यही है कि एक पूर्व मंत्री की निगाहें नेता प्रतिपक्ष की कुर्सी पर लगी हुई है। इस पूर्व मंत्री ने अपनी तगड़ी लाबिग के जरिए प्रदेश अध्यक्ष को खिसका देने का पूरा इन्तजाम कर भी लिया था कि कालिख फेंकने की घटना हो गई। कालिख कांड में जोगी को लपेट देने से फिलहाल धनेद्र साहू की कुर्सी पर नजर आता खतरा टल गया है। खबर है कि दिल्ली में बैठे एक बुर्जुग नेता ने श्री साहू को दूसरी पारी के लिए अपना आशीष दे दिया है। श्री साहू की गद्दी में फेवीकोल का पक्का जोड़ लगता देख  इधर नहीं तो उधर सही वाले अन्दाज में नेता प्रतिपक्ष को हटाने की मुहिम तेज हो गई है। इस मुहिम में दुर्ग जिले के दो विधायक भी शामिल है लेकिन जानकारों का कहना है कि इन विधायकों के खिलाफ भी कांग्रेस आलाकमान के पास एक  मजबूत धड़े ने लंबी-चौड़ी शिकायत भेज दी है। एक विधायक के बारे में यह कहा गया है कि वह अवैध बसों का संचालन करने के साथ-साथ छोटी सी छोटी बात में मां-बहन की गाली देता है। गंदी गालियों से कांग्रेस की छवि को बट्टा लग रहा है तो दूसरे विधायक के बारे में यह जानकारी दी गई है कि उसने सरकार से हाथ मिलाकर अपने स्कूल के लिए लगभग 15 करोड़ रुपए की जमीन कौड़ी के दामों में हासिल कर ली है।
कृष्ण बिहारी नूर ने भी क्या खूब कहा है-
इन हवस वालों की नीयत का भरोसा क्या है
कब बदल जाए, सियासत का भरोसा क्या है

www.sonirajkumar.blogspot.com   98271-93988

Saturday, November 20, 2010

नक्सलवाद... अरे बाप रे

 पूरे देश को झकझोर कर रख देने वाली नक्सलवाद की समस्या पर  तेलगु, बांग्ला और मुंबईया फिल्मकार लगातार रिसर्च कर रहे हैं लेकिन छत्तीसगढ़ के फिल्मकारों ने इस विषय को अछूत मानते हुए फिल्म बनाने की जहमत नहीं उठाई है। राज्य निर्माण के दौरान सतीश जैन की फिल्म मोर छइंहा भुइंहा ने रिकार्ड तोड़ सफलता हासिल की थी। इस फिल्म की सफलता के परचम फहराने के बाद अब तक सौ से ज्यादा फिल्में प्रदर्शित भी हो चुकी है लेकिन किसी भी फिल्म में नक्सलवाद जैसी समस्या को लेकर कुछ नहीं कहा गया है। हिन्दी और भोजपुरी की सफलतम फिल्मों को जस का तस परोसने वाले निर्माता-निर्देशकों ने विरासत में मिली इस चुनौती को समझने की चेष्टा ही नहीं की है।

जब छत्तीसगढ़ अविभाजित मध्यप्रदेश का हिस्सा था तब यहां मंडला और बालाघाट के आसपास लाल सलाम नामक फिल्म की शूटिंग की गई थी। इस फिल्म को महाराष्ट्र के इगतपुरी में रहने वाले फिल्मकार संजीव करबेलकर ने बनाया था। फिल्म में प्रसिद्ध चित्रकार जतिन दास की पुत्री नंदिता दास ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी। इस फिल्म के प्रदर्शन के काफी दिनों बाद अनंत महादेवन की फिल्म ‘रेड अलर्ट’ प्रदर्शित हुई। फिल्म में तेलंगाना के संघर्ष को चित्रित किया गया था लेकिन इसमें भी छत्तीसगढ़ गायब था। अभी हाल ही में सरफरोश बनाने वाले फिल्मकार जॉन मैथ्यू ने छत्तीसगढ़ के बस्तर क्षेत्र का दौरा कर लाल आतंक पर फिल्म बनाने को लेकर रूचि दिखाई है। खबर है कि श्री मैथ्यू ने अपनी फिल्म के लिए अभिनेता आमिर खान को अनुबंधित किया है। फिल्म निर्माता महेश भट्ट भी छत्तीसगढ़ की नक्सली समस्या को लेकर फिल्म बनाने के इच्छुक हैं।


लोकप्रिय सिनेमा का निर्माण करने वाले फिल्मकारों को हमेशा से यह लगता रहा है कि यदि उन्होंने नक्सलवाद जैसे विषय को छूआ तो कोई न कोई खतरा उत्पन्न हो सकता है। यदि फिल्म में नक्सलियों का पक्ष उभर गया तो सरकार नाराज हो सकती है और यदि दमदार तरीके से सरकार की बात सामने आ गई तो नक्सली मुसीबत खड़ी कर सकते हैं। सच तो यह है कि नक्सली समस्या की जांच-पड़ताल के लिए एक निरपेक्ष दृष्टि की जरूरत होगी। यह दृष्टि तभी हासिल हो सकती है जब फिल्मकार सामाजिक सरोकारों को महत्व देंगे। छत्तीसगढ़ में फिल्म का निर्माण करने वाले किसी भी एक निर्माता-निर्देशक ने अब तक ऐसी फिल्म नहीं बनाई हैं जिसे छत्तीसगढ़ की आत्मा का दर्जा दिया जा सके। फिल्मकारों का सारा जोर ऐसी कहानियों को बढ़ावा देने में ही लगा हुआ है जिसके चलते तगड़ा मुनाफा हासिल हो। ऐसा भी नहीं है कि कुछ फिल्मकार इस विषय पर फिल्म नहीं बनाना चाहते लेकिन ऐसे फिल्मकारों को भी नौकरशाही, सत्ता, दमन और शोषण की पड़ताल करने में खतरा नजर आता है।


नक्सली समस्या पर बनी फिल्में
नक्सली समस्या पर बांग्ला और तेलगु के फिल्मकारों ने काफी फिल्में बनाई है। बंगाल के फिल्मकार अशोक विश्वनाथन की फिल्म शून्यों थेके शुरू (शून्य से आरंभ) और सतरूपा सान्याल की फिल्म अनु में माकपा की छद्मवाम राजनीति को उजागर करने का प्रयास किया गया था। दोनों ही फिल्मों में नक्सली विचारधारा को लेकर कुछ महत्वपूर्ण सवाल भी उठाए गए थे। मृणाल सेन की फिल्म कलकत्ता 71 में भी नक्सलबाड़ी आंदोलन को  समझने की चेष्टा की गई थी। तेलंगाना के किसान संघर्ष पर गौतम घोष हंग्री आटम  नामक एक डॉक्यूमेंट्री फिल्म निर्मित की थी। फिल्म में किसानों के बहादुराना संघर्ष को तो दर्शाया ही गया था लेकिन यह भी बताया गया था कि नक्सलबाड़ी विचारधारा को आत्मावलोकन की जरूरत क्यों हैं। 1980 के दशक में बनी उत्पलेंदु चक्रवर्ती की फिल्म चोख बेहद गंभीर तरीके से नक्सलवादी आंदोलन की पड़ताल करती है। बुद्धदेव दासगुप्ता की फिल्म गृहजुद्ध में भी नक्सली समस्या का उभार देखने को मिला था। तेलगु फिल्म युद्धानोवका गदर और मां भूमि में भी नक्सलवाद की जड़ें तलाशने की कोशिश की गई थी। सुधीर मिश्रा की हजारों ख्वाहिशें ऐसी और मणिरत्नम की फिल्म युवा भी नक्सलबाड़ी आंदोलन को संबोधित करती है। महाश्वेता देवी के उपन्यास पर फिल्मकार गोविंद निहलानी ने हजार चौरासी की मां नामक फिल्म बनाई है। यह फिल्म कई समारोहों में पुरस्कृत हो चुकी है। मोर छंइया-भुईयां जैसी हिट फिल्म बनाने वाले निर्माता-निर्देशक सतीश जैन नक्सली समस्या को एक संवेदनशील मुद्दा मानते हैं। उनका कहना है कि नक्सलियों के गुस्से को समझने के लिए गहन अध्ययन की आवश्यकता है। उन्होंने कहा कि बंबई के फिल्मकार पैसा कमाने के लिए संवेदनशील मुद्दों पर फिल्म तो बना डालते हैं लेकिन यह जरूरी नहीं है कि हर संवेदनशील मुद्दा टिकट खिड़की पर पैसों की बरसात करने वाला साबित होगा। नक्सली समस्या पर बनी फिल्म रेड अलर्ट दम तोड़ चुकी है। भांवर जैसी फिल्म बनाने वाले फिल्मकार क्षमानिधि मिश्रा का कहना है कि  नक्सलवाद की समस्या छत्तीसगढ़ की बड़ी समस्या है लेकिन इसका सबसे ज्यादा असर बस्तर और सरगुजा में ही देखने को मिलता है। दुर्भाग्य से यहां छत्तीसगढ़ी बोली का प्रभाव कम है। यदि किसी ने फिल्म बनाई तो वह फ्लाप हो जाएगी।

Thursday, November 18, 2010

जसम के सम्मेलन में दरबारी लेखकों को लताड़

श्रम और सौंदर्य की नगरी भिलाई में संपन्न हुए जन संस्कृति मंच के 12वें राष्ट्रीय  सम्मेलन में सत्ता की जय-जयकार करने वाले लेखक संगठनों और उससे जुड़े लेखकों की जमकर क्लास ली गई। सम्मेलन में देश के विभिन्न हिस्सों से शिरकत करने आए लेखकों ने लूट और दमन की संस्कृति के खिलाफ प्रतिरोध जारी रखने का फैसला किया।

पिछले दिनों यहां संपन्न हुए जसम के राष्ट्रीय सम्मेलन में साहित्य, कला और संस्कृति से जुड़े लगभग दो सौ लेखकों, कलाकारों और संस्कृति कर्मियों ने अपनी हिस्सेदारी दर्ज की। सम्मेलन में देश की प्रसिद्ध लेखिका महाश्वेता देवी के पुत्र नवारुण भट्टाचार्य, आलोचक मैनेजर पांडे, वीरेन डंगवाल, मदन कश्यप, शिरीष मौर्य, पंकज चतुर्वेदी, अशोक भौमिक, रामजी राय, प्रोफेसर सियाराम शर्मा, कथाकार कैलाश बनवासी सहित अन्य लेखकों एवं कलाकारों ने यह माना कि भारतीय शासक वर्ग अमेरिका से हाथ मिलाकर सार्वजनिक संसाधनों की लूट में लगा हुआ है। सम्मेलन में बर्बर सैन्य हमलों, पुलिसिया दमन और मीडिया के जरिए उपभोक्तावादी आत्म केन्द्रित प्रचार पर चर्चा के साथ ही लेखक संगठनों और उससे जुड़े लेखकों की भूमिका को लेकर भी गहन विचार विमर्श किया गया।

लेखकों ने यह माना कि ‘प्रगतिशील’ होकर ‘जनवाद’ का कंबल ओढ़ने वाले संगठनों ने बड़े सामाजिक मुद्दों पर चुप्पी साध ली। ऐसे संगठन गैर लेखकों के जेबी संगठन बन गए हैं और वे तब ही सक्रिय होते हैं जब किसी लेखक की मृत्यु होती है। लेखक की मौत के बाद संगठनों द्वारा शोकसभा का आयोजन किया जाता है और कर्तव्यों की इतिश्री कर ली जाती है। मुद्दों को लेकर लेखकों ने मिलना-जुलना ही बंद कर दिया है। सबसे शर्मनाक बात यह है कि संगठनों को जेब में रखकर घूमने वाले लोगों का सारा जोर ‘उत्सव’ पर जाकर सिमट गया है। सांगठनिक व अन्य चर्चा के दौरान लेखकों ने यह माना कि जो लोग प्रगतिशीलता का ढोंग करते हैं उन्हें अपने संगठनों को एक सिंडिकेट की तरह आपरेट करने से बचना होगा। विरोधियों को ठिकाने लगाने की प्रवृत्ति किसी भी लेखक संगठन को साहित्यिक सरोकारों से विमुख कर देती है। सम्मेलन में जनवाद के चूल्हे पर स्वार्थ की हांडी चढ़ाकर खिचड़ी पकाने वाले लेखकों की भूमिका को लेकर भी बातचीत की गई। लेखकों ने यह माना कि वैचारिकता के अभाव में कुछ लेखक पद और पुरस्कार पाने की होड़ में लग गए हैं। बहस-मुबाहिसे के दौरान प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान को भी आड़े हाथों लिया गया। लेखकों ने छत्तीसगढ़ के पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन द्वारा किए गए आयोजन को सरकारी उत्सव करार देते हुए यह माना कि इस आयोजन के जरिए लेखकों को याचक बनाने का प्रयास किया गया था। सम्मेलन में प्रसिद्ध कवि नागार्जुन, केदारनाथ अग्रवाल, शमशेर बहादुर सिंह, फैज अहमद फैज और अज्ञेय की कविताओं पर राधिका-अर्जुन, हरिसेन, सुनीता वर्मा द्वारा बनाई गई पोस्टरों की प्रदर्शनी भी लगाई गई थी।

बालीबुड के दिग्गजों ने खींचा हाथ

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से जुड़े कुछ बिल्डरों ने हाल के दिनों में बड़े ही सोचे-समझे ढंग से  यह प्रचारित किया है कि  फिल्म स्टार शाहरुख खान की कंपनी केसरा-सरा एक शापिंग काम्प्लेक्स का निर्माण करने जा रही है। कंपनी का शापिंग काम्प्लेक्स निर्मित हो पाएगा या नहीं यह भविष्य के गर्भ में है लेकिन हकीकत यह है कि स्टूडियों व अन्य निर्माण के लिए जमीन की खरीद-फरोख्त में लगे रहने वाले बालीबुड के कुछ दिग्गजों ने फिलहाल  अपना कदम पीछे हटा लिया है।

छत्तीसगढ़ के एक बड़े हिस्से में इन दिनों  शापिंग काम्प्लेक्स और मॉल तैयार हो रहे है। कार्पोरेट सेक्टर से जुड़े लोगों का यह दावा है कि छत्तीसगढ़ में विदेशी कंपनियों के साथ ही बालीबुड की दिग्गज हस्तियां भी पूंजी निवेश करने में रूचि दिखा रही है। कार्पोरेट सेक्टर से जुड़े लोगों का यह दावा कुछ हद तक सही भी हो सकता है। बालीबुड की दिग्गज हस्तियों ने छत्तीसगढ़ में स्टूडियों व अन्य निर्माण के लिए जमीनों की खरीदी में रूचि तो दिखाई थी लेकिन विवादों के चलते अमूमन सभी दिग्गजों ने अपना हाथ खींच लिया है। छत्तीसगढ़ी फिल्मों के चलन के बाद भाजपा नेता एवं प्रसिद्ध फिल्म स्टार शत्रुघ्न सिन्हा यहां पुराने धमतरी मार्ग पर स्थित एक बेशकीमती जमीन पर स्टूडियों बनाना चाहते थे। स्टूडियों के निर्माण के लिए प्रोजेक्ट तैयार हो ही रहा था कि इस बीच जमीन के कारोबार से जुड़े कतिपय लोगों की आपत्ति सामने आ गई। विवाद के बाद श्री सिन्हा ने स्टूडियों के निर्माण का फैसला बदल दिया। चर्चित सिने अभिनेत्री श्रीदेवी और उनके पति बोनी कपूर ने भी आरंग मार्ग पर स्टूडियों के निर्माण के लिए एक जमीन खरीदने का फैसला कर लिया था। इससे पहले की बात आगे बढ़ पाती जमीन से जुड़े एक अन्य कारोबारी का अड़ंगा सामने आ गया। विवाद के बाद कपूर दंपत्ति को भी पीछे हटना पड़ा। प्रसिद्ध संगीतकार और विजयेता पंडित के पति आदेश श्रीवास्तव के रिश्तेदार यहां रायपुर के समता कालोनी में निवास करते हैं। रिश्तेदारों के सुझाव के बाद श्री श्रीवास्तव ने भी धमतरी मार्ग पर दस एकड़ जमीन खरीदने का मन बना लिया था लेकिन खबर है कि जो जमीन उन्होंने देखी थी उसे लेकर विवाद खड़ा हो गया है। विवाद के बाद श्री श्रीवास्तव ने भी स्टूडियों निर्माण का विचार त्याग दिया है। सिने कलाकार अन्नु कपूर ने भी कांग्रेस के एक दिग्गज नेता के साथ साझेदारी में बिलासपुर चांपा मार्ग पर जमीन खरीदने का फैसला किया था। जमीन खरीदने की पूरी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के लिए श्री कपूर की करीबी सीमा कपूर लगातार छत्तीसगढ़ आती-जाती रही लेकिन इधर खबर है कि स्टूडियों के प्रोजेक्ट में उनकी रूचि भी कम हो गई है। कुछ समय पहले फिल्म अभिनेता मुकेश खन्ना ने भी मुख्यमंत्री से मुलाकात कर यहां सिलतरा के पास जमीन देने की मांग की थी। उनका प्रोजेक्ट भी अभी मूर्तरूप नहीं ले पाया है।

भू-माफियाओं का रोड़ा
यह सच है कि राजधानी और उसके आसपास इलाके की तस्वीर बड़ी तेजी से बदल रही है। राष्ष्ट्रीय राजमार्ग पर टे्जर  आईलैण्ड का निर्माण किया जा रहा है तो किसी क्षेत्र में सर्वसुविधायुक्त बिजनेस सेंटर भी निर्मित हो रहा है। राज्य निर्माण के बाद से ही यहां जमीन का कारोबार करने वाले लोगों के बीच आपसी प्रतिस्पर्धा बढ़ गई है। इस प्रतिस्पर्धा के चलते उनमें आपस में ही मनमुटाव भी होता है। छत्तीसगढ़ में निवेश करने वाले लोग यदि किसी एक कारोबारी के जरिए आगे बढ़ते है तो दूसरा कारोबारी प्रोजेक्ट में अड़ंगा लगाना शुरू कर देता है। बालीबुड के वे दिग्गज जो छत्तीसगढ़ में स्टूडियों का निर्माण करना चाहते थे उनका प्रोजेक्ट अड़ंगों के चलते ही ठंडे बस्ते में चला गया है।

Wednesday, November 17, 2010

क्या बिग बास का घर एक सामाजिक मंच है

 मेरे एक लेख पर बगैर प्रोफाइल वाले किसी अंबिगुट्टी नामक शख्स ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। श्री गुट्टी क्या करते हैं और क्या नहीं मुझे नहीं मालूम लेकिन मुझे लगता है कि  श्री गुट्टी को थोड़ी घुट्टी पिला ही देनी चाहिए। पहले पाठक उनकी टिप्पणी पढ़ लें।


लेख पढ़ा और दुबारा पढ़ा फिर सोचा कहा तक तर्कसांगत है आपका ये लेख,
फिर सोचा की कुछ जरुरी बातें यहाँ लिखता जाऊं जो की शायद आप जैसे दर्शन ज्ञानी की नजरो से चुक गयी है और नजाने आपकी कोण सी नाराजगी बिग बॉस मैं बैठे कुछ लोग जो वहाँ अपने स्वयम से लड़ रहे है से है जिसने आपको इतना भिभ्त्श लिखने पर मजबूर कर दिया. ये तो ज़ाहिर सी बात है की हमारे समाज में अगर बिन ब्याही वधूवों का कोई स्थान है तो ये सिर्फ हमारे समाज की वजह से है, एक शिष्ट समाज की पराकास्ठा एक कोठे से शुरू होती है ये कहने में मुझे कोई अतिशय्योक्ति नहीं लगती visheshkar ye baat mujhe nagwaar guzri , aapko koi haq nahi banta kisi kay prati ashist hone ki. khair aise hi kuch aayam vyakti se vyakti vishesh banate hai. बिग बॉस ऐसा ही एक सामाजिक मंच है जहाँ आपकी लड़ाई दो तरफ़ा हैं एक तो खुद से दूसरा उनसे जिनकी स्थिति बिलकुल आप जैसी है. अगर आप गलत देखना चाहते है तो बिग बॉस आपको वोही दिखाता है , सही देखना चाहे काफी सही बातें भी दिखेंगी आपको. एक चोर भी दिन के उजाले में चोरी नहीं करता और बिग बॉस में जितने भी भागिदार है उन्हें ये पता है की पूरी दुनिया उन्हें देख रही है , आप बताये कितनी हिमत आप में या हम में से किसी और में है एक चुनौती देने की पूरे समाज को की देखो मैं तो तैयार हूँ तुम्हारी प्रतिक्रिया के लिए. आप कहेंगे की उन्हें फर्क नहीं पड़ता , तो भाई फर्क क्यूँ पड़े ? वो जहाँ भी है आपकी या किसी और की वजह से नहीं खुद की वजह से है और उनकी राह में रोड़े पड़े या फूल राह तो उन्ही की है , बाकि बची सीख लेने की बात तो ये आप कितने ज्यादा परिपक्व है और haan अगर आपकी परिपक्वता की parakashta ऐसे लेखो पर समाप्त होती है तो रेमोते कण्ट्रोल है आपके हाथों में. कोई नहीं रोकेगा आपको अपनी ही हार से मुहं छुपाने में. 

हां तो गुट्टी साहब सबसे पहले आपने जिस ढंग से चेहरा छिपाकर अपनी प्रतिक्रिया दी उस कथित बहादुरी के लिए मैं आपको बधाई देता हूं। गुट्टी साहब मैं तो चोर को चोर और डाकू को डाकू कहने में ही यकीन रखता हूं। आपको शायद पता नहीं है कि भारतीय बाजार में मनोरंजन के नाम पर एक नया तमाशा चल पड़ा है। कुछ नवधनाढ्य बाजार में कपड़ा उतारने का खेल कर रहे हैं। उन्हें नंगा होता देख दूसरे लोग भी कपड़े उतारने लगते हैं। जब सारे लोग कपड़े उतार लेते हैं तो कोई एक मनोरंजन करने वालों को तो कपड़े मुहैय्या करा देता है लेकिन वह बाकी लोगों का कपड़ा लेकर भाग खड़ा होता है। अब यदि आपको नंगा दिखने से बचना है तो उस शापिग काम्पलेक्स में जाना ही होगा जहां चड्डी और बनियान की कीमत ही पांच हजार रुपए हैं। बिग बास के घर में जितने भी पहलवानों ने प्रवेश किया है उनका नंगा बदन मध्यवर्ग को जिम जाने के लिए प्रेरित करता है। इस देश का मध्यवर्ग जब-जब अपने बदन को कसरती बनाने के लिए जिम की तरफ दौड़ा है तब-तब वह सिर के नीचे एक छत्त और दो जून की रोटी से महरुम होता चला गया है। बिग बास के घर मौजूद सारा खाना अपनी शादी में सिर्फ इसलिए रो पड़ी थी क्योंकि बिग बास ने जो लंहगा उसे पहनने के लिए भेजा था उसमें कुछ तकनीकी दिक्कतें आ गई थी। बातों ही बातों में सारा खान ने बताया कि उसका लंहगा तीन लाख रुपयों का है। तीन लाख रुपयों का लंहगा.... बाप रे... इतने पैसों में कोई एक बेरोजगार अपना खुद का रोजगार ही खोल सकता है। गुट्टी साहब आपको पता है या नहीं केंद्र की प्रधानमंत्री रोजगार योजना के तहत भी बेरोजगारों को जो लोन दिया जाता है वह एक या डेढ़ लाख का ही होता है। गरीबों के सपनों का मजाक उड़ाने यह शो किसी भी छोर से आम आदमी का प्रतिनिधित्व नहीं करता। बिग बास के घर में कभी भी कोई भूख, गरीबी, बेकारी, बीमारी, देश के राजनैतिक हालात को लेकर चर्चा नहीं करता। बिग बास के घर में तमाम लोगों की बातचीत सेक्स, नफरत और हिंसा के आसपास ही घूमती है। गुट्टी साहब को शायद आपके पास गरीबों का खून चूसकर कमाया गया बहुत सा कालाधन हो... इसलिए आपको बिग बास का घर एक सामाजिक मंच लगता है। मुझे तो यह घऱ कोठा ही लगता है जिसमें बाजार की जरूरतों के मद्देनजर कुछ वेश्याओं को उछलकूद मचाने के लिए भेज दिया गया है।

Sunday, November 14, 2010

बाजार की रंडियां


आधुनिक सुविधाओं से सज्जित बिग बास के घर को यदि आप घर मानते हैं मुझे आपसे कुछ नहीं कहना है। मैं इस घर को एक कोठा मानता हूं। ऐसा कोठा जिसमें बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखकर कुछ पुरुष और महिला वेश्याओं को  उछलकूद मचाने के लिए कैद कर दिया गया है। इस कोठे में शामिल सभी वेश्याओं को यह  पता है कि उनकी किस हरकत पर पिज्जा खाने वाली पीढ़ी की लार टपकेंगी और किस हरकत पर उन्हें नापंसद किया जाएगा।
 बहुत से लोगों को रंडी, वेश्या जैसे ठेठ देशज शब्दों से परहेज हो सकता है। कई लोग यह आपत्ति भी उठा सकते हैं कि हमें किसी को भी रंडी या वेश्या कहकर अपमानित करने का हक नहीं है। निजी तौर पर मेरा भी यह मानना है कि रंडी या वेश्या जैसे शब्दों का प्रयोग आत्मा को छलनी-छलनी करने का काम ही करता है। इसके अलावा इस शब्द का खतरनाक प्रयोग वही लोग करते हैं जो स्त्री विरोधी होते हैं। मैं कभी भी स्त्री विरोधी नहीं रहा लेकिन क्या किया जाए पिछले कुछ दिनों से जो कुछ मैं बिग बास के घर पर देख रहा हूं उसके बाद मैं यह कहने को मजबूर हुआ हूं कि इस बार बिग बास का घर एक कोठे में तब्दील हो गया है। इस कथित घर में हर कोई मां-बहन की गाली देने के लिए आजाद है। जब जिसकी मर्जी होती है वह पिछवाड़े में डंडा डालकर मुंह तक निकाल देने की धमकी देता है। हर दूसरे मिनट में अस्मित पटेल और वीना मलिक एक दूसरे को चूमने-चाटते नजर आते हैं। कोई रजाई ओढ़कर सुहागरात मनाता नजर आता है तो किसी को स्वीमिंग पुल के पास तेल मालिश करवाने  में मजा आ रहा है।

यदि आप बिग बास के द्वारा चयनित पात्रों पर ही गौर करेंगे तो पाएंगे कि इस कार्यक्रम में बेहद चालाकी से सेक्स परोसने की योजना को अन्जाम दिया गया है। वैसे तो कार्यक्रम में धीरे-धीरे बहुत से लोगों को देर-सबेर बाहर निकलना ही है लेकिन सबसे पहले वे ही लोग बाहर हुए हैं जो सेक्स परोसने में ज्यादा कामयाब नहीं हुए। कसाब मामले से जुड़े वकील के चेहरे पर न तो सेक्स अपील थी और  न ही वे पेशे के मद्देनजर वे सेक्सी बातें कर सकते थे फलस्वरुप उन्हें बाहर का रास्ता दिखा दिया गया। ताले तोड़ने की कला में माहिर बंटी चोर को चर्म चोरी पर यकीन हीं नहीं था, सो उसे भी रुखसत होना पड़ा। एक बेगम थी जो कुछ दिनों तक सिर्फ इसलिए चल पाई क्योंकि बिग बास को यह मालूम था कि देश में समलैंगिकों का भी एक वर्ग है जो उन्हें पंसद करेगा। जब समलैंगिकों ने बेगम के पक्ष में एसएमएस करना बंद कर दिया तब उन्हें भी यह कह दिया गया कि आपको घर से बाहर जाने के लिए सिर्फ पांच मिनट का समय दिया जाता है। तिरपट होने के बावजूद अपने खुजली वाले बाप (महेश भट्ट)  की बदौलत  अभिनेता बनने का ख्वाब देखने वाले  राहुल भट्ट को भी  मर्द जैसी आवाज की मालकिन आंचलकुमार से प्रेम की पींगे बढ़ाने का खामियाजा भुगतना पड़ा। राहुल के घर से बाहर होने के बाद आंचलकुमार सही ढंग से अपने जिस्म की नुमांइश नहीं कर पा रही थी सो उन्हें भी सलमान खान ने मिलने के लिए बाहर बुलवा लिया है। अब घर में जो कोई भी शेष हैं वे खुलकर मैदान में आ गए हैं। कई डकैती को अन्जाम देने वाली सीमा परिहार अपना लोक सुधारने में लगी है इसलिए वह अपनी दुखभरी कहानी सुनाने के साथ-साथ बीच में बेहोश हो जाती है। खली जैसा विशालकाय मानव बरमूड़ा पहने घर में घूमता रहता है। छरहरी लड़कियों को उसके बदन पर लटककर मजा आ रहा है ऐसा चैनल में दिखाई तो देता है। दर्शक भी खली के प्रेम की शैली को देखकर तालियां बजा रहा है। बिग बास ने डाली बिंद्रा नामक एक मोटी औरत भी घर पनाह दी है। इस महिला की हंसी अर्चना पूरनसिंह से भी ज्यादा खतरनाक है और वह सबकी बैंड बजाने और डंडा डालने की बात कहते रहती है। इस कद्दावर महिला की गंदी बातें अपसंस्कृति को बढ़ावा देने वाले लोगों का खासा मनोरंजन कर रही है। बिग बास के घर में मनोज तिवारी, श्वेता तिवारी और समीर सोनी जैसे कुंठित भी मौजूद है। शराफत के लबादे में तीनों की कुठाएं भी बाहर निकल रही है। बिग बास के कोठे में सेक्स बम पामेला एंडरसन की इंट्री भी होने जा रही है। पेट के लिए जिस्मफरोशी करने वाली मजबूर लड़कियों की कहानियां तो मैंने खूब पढ़ी है, लेकिन पहली बार मैं ऐसी रंडियों का तमाशा देख रहा हूं जो बाजार की जरूरतों  के मद्देनजर कोठे में पहुंचाई गई है। बिग बास सीजन-4 में शामिल लोगों की  हरकतें यह बताती है कि आने वाला समय काफी संकट से भरा रहने वाला है। बिग बास सीजन-5 में यदि दर्शक सीधे संभोग का प्रसारण देखें तो कोई हैरत नहीं होनी चाहिए। बिग बास आपका थोबड़ा तो उन लोगों ने भी नहीं देखा जो आपके अनुबंध से कोठे के भीतर पहुंचे हैं लेकिन आप महान है। आपकी जय हो बिग बास।

Friday, November 5, 2010

बोलो तुमको क्या चाहिए

पलक झपकते ही वे कुछ भी नहीं बनाती
उनकी आंखों में नाचने वाली पुतलियां 
खुद-ब-खुद यह तय कर लेती है कि
कब क्या बनाना है


घर के बाहर रंगोली की थाली लेकर बैठने वाली लड़कियां
जब भरती है तोते की चोंच पर लाल रंग
तो यकीन मानिए एक बासी सा लगने वाला सपना
 एकायक हो जाता है चटख 


नदी बनाते- बनाते एक लड़की
झरने में बदल सकती है
और आप जहां नहीं पहुंच सकते
उससे ऊपर जाकर भी कुलांचे भर सकता है
उनके भीतर बैठा हुआ हिरण


पहाड़ के पीछे सूरज उगाने वाली लड़कियां
कभी अकेले नहीं उड़ती
उनके साथ उड़ती है कई रंग-बिरंगी तितलियां


पेड़/फल/फूल/पत्तियों को जमाकर
एक मकान को घर में
बदल डालने वाली लड़कियों को
बहुत कम लोग दे पाते हैं शाबाशी


सबको लगता है-
लड़कियों का काम है
लड़कियां तो कर ही लेती है
मैं आज अपने घर में पायल बजाने वाली
एक लड़की की ठुंडी उठाकर
यह पूछने जा रहा हूं-
बोलो तुमको क्या चाहिए