सियासत की अपनी अलग जुबां है
लिखा हो जो इकरार, इन्कार पढ़ना
प्रदेश के जिस किसी भी अफसर या कर्मचारी से पूछो तो वह यही कहेगा कि सब ठीक-ठाक चल रहा है। प्रदेश में शांति है। जबकि हकीकत यह है कि छत्तीसगढ़ इन दिनों यथास्थिति के बुरे दौर से गुजर रहा है। यथास्थिति तब पैदा होती है जब चारों तरफ से यह समाचार मिलने लगता है कि कहीं कोई गड़बड़ नहीं है। जब लोग अपने हाथों को सिकोड़कर जेब में ठूंस लेते हैं तभी अचानक बच्चों की हत्या होने लगती है। नक्सली उत्पात मचाने लगते हैं। जब लोग हस्तक्षेप करना बंद कर देते हैं और यह मान लेते हैं कि जो कुछ चल रहा है वह ठीक है तो समझिए गड़बड़ी वहीं से शुरू होने लगती है। जो लोग मुर्दाघरों में आयोजित की जाने वाली शोकसभा और उसमें दो मिनट के लिए कायम होने वाली शांति को महत्वपूर्ण मानते हैं उन्हें शायद यह मालूम नहीं होगा कि ऐसी शांति कभी भी सच्ची श्रद्धाजंलि नहीं होती। हर शोकसभा में अस्सी फीसदी लोगों के दिमाग में मौन के समय को लेकर खींचतान चलते रहती है। यदि मौन थोड़ा लंबा हो जाता है तो लोगों को लगने लगता है, मरने वाला तो मर गया हमको जबरदस्ती परमेश्वर को याद करना पड़ रहा है। साला दो मिनट हो गया... कोई ओम.. शांति ओम क्यों नहीं बोल रहा है। शोकसभाओं में ही लोगों के मोबाइल से मुन्नी बदनाम हुई डार्लिंग तेरे लिए जैसी मादक धुन सुनाई देती है। ऐसी सभाओं में ही लोगों को अपने घर के अधूरे काम याद आते हैं। श्मशान घाट में आदमी अपने अधूरे कामों को तो याद कर लेता है लेकिन उस आदमी के कामों को भूल जाता है जो उनकी आंखों के सामने ही धूं-धूं करके जल रहा होता है।
हममें से बहुत से लोग यह सोचते हैं कि क्यों किसी के फट्टे में हाथ डाले। फट्टे में साबूत हाथ तो दूर एक उंगली भी नहीं रख पाने के कारण ही कभी आदिवासियों को नक्सली मौत के घाट उतारते हैं तो कभी पुलिस। प्रदेश में पिछले कुछ दिनों से बच्चे जुल्म के शिकार हो रहे हैं। कोई उन्हें घटिया प्रेम में असफल होने के कारण मौत के घाट उतार रहा है तो कोई केवल फिरौती के लिए उनका गला घोंट रहा है। बच्चों की बलि और उनके अपहरण के विरोध में हाल-फिलहाल रोज कमाकर कुंआ खोदने वाले समाज का विरोध ही देखने को मिल रहा है। इस मामले में प्रदेश के बौद्धिक समाज की चुप्पी खतरनाक है। देखा जाए तो यहां का बौद्धिक समाज बड़ा ही मामू है। इस समाज के अपने ही इतने ज्यादा टंटे है कि वह सेमिनारों के अलावा किसी और जगह अपनी प्रतिक्रिया देना पंसद ही नहीं करता है। प्रदेश के तीन बड़े लेखक संगठन अपनी आपसी लड़ाईयों में उलझे हुए हैं तो पढ़ने-लिखने के नाम पर गठित की गई छोटी-छोटी संस्थाओं को कविता पाठ से ही निजात नहीं मिल पा रही है।
यहां अलग-अलग धड़े में बंटे विपक्ष से प्रबल विरोध की उम्मीद ही बेमानी है। विपक्ष का तगड़ा विरोध यहां तब ही शुरू होता है जब कोई उनकी नेता सोनिया गांधी को भला-बुरा कहता है। जिस मामले में सोनिया या राहुल का नाम नहीं घसीटा जाता है वहां विपक्षी लोग यह देखते हैं कि मामले को उठा कौन रहा है। यदि अजीत जोगी ने मामले को पकड़ा है तो एक धड़ा तुरन्त सरेंडर कर देगा। यदि किसी मामले में नेता प्रतिपक्ष के खेमे ने पहल की है तो समझिए उसे जोगी व अन्य खेमे का सहयोग नहीं मिलेगा। हाल-फिलहाल विपक्ष ने बच्चों के अपहरण और उनकी हत्याओं के विरोध में बंद का ऐलान कर दिया है। विपक्ष का यह विरोध प्रशासन पर कितना दबाब बना पाता है यह देखना बाकी है।
बच्चों के संवेदनशील मसले पर संवेदनशील होने का स्वांग रचने वाले विपक्ष की एक हरकत रह-रहकर याद आ रही है। अब से लगभग छह महीने पहले एक कांग्रेस नेता की जमीनों को बचाने के लिए बनाए गए एक संगठन के कथित दलालों ने राजधानी के एक आश्रम से बच्चा चोरी किए जाने की घटना को उजागर करने का काम किया था। जब इस मामले की तफ्तीश की गई तो पता चला कि नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चों से एक मीडियाकर्मी बुरी तरह चिढ़ा बैठा था। इस आश्रम के बच्चों ने गलती से महान नेत्री मेघा पाटकर का विरोध कर दिया था और बस यही विरोध स्वयंसेवी संस्थाओं की हिमायत करने वाले शुगर पेसेंट मीडियाकर्मी को अखर गया था। बच्चों की हिमायत करने वाले विपक्ष ने तब इस मामले में विधानसभा में जोरदार हंगामा मचाया था। हंगामे के दौरान यह देखने की जहमत भी नहीं उठाई गई थी कि आश्रम में जो बच्चे मौजूद है उनके भविष्य का क्या होगा। जिन दिनों यह घटना हुई थी उन दिनों नक्सली हिंसा में अपने माता-पिता को खोने वाले बच्चे परीक्षाओं की तैयारियों में जुटे थे। यह सब हो-हंगामा इसलिए हुआ था क्योंकि जिन दलालों ने मामले को तूल देने की कोशिश की थी वे रायगढ़ और मरवाही इलाके के दो कद्दावर नेताओं के करीबी थे (अब भी है)
खैर यह मामला अब अदालत में चल रहा है और इसमें कोई महत्वपूर्ण फैसला जल्द ही आने की उम्मीद भी है। बहरहाल विपक्ष ने बच्चों के मामले में जो एक जुटता दिखाई है उसका स्वागत किया जाना चाहिए। एक बात और यह कि किसी भी सरकार के लिए सबसे खतरनाक स्थिति होती है यथास्थिति। इस स्थिति में विध्वंसकारी तत्वों को गड़बड़ी करने का मौका मिलता है। ऐसे तत्व जब कुछ नहीं कर पाते हैं तो बंदर का मुखौटा पहनकर झुग्गी बस्तियों में तमाशा मचाने लगते हैं। कई बार यह लगता है कि पेन की नींब के बजाए नाखूनों को ही स्टील में बदलकर कोई नींब बना ली जाए लेकिन फिर यकायक नुसरत ग्वालियरी का यह शेर याद आ जाता है-
रात के लम्हात खूनी दास्तां लिखते रहे
सुबह के अखबार में हालात बेहतर हो गए.




