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Monday, September 27, 2010

अब भी नहीं बदली नत्था की जिन्दगी

पूरी दुनिया से उसे बधाई संदेश मिल रहे हैं। जिसे देखो वही एक बार नत्था के दर्शन कर लेना चाहता है लेकिन आमिर खान की सर्वाधिक लोकप्रिय फिल्म पीपली लाइव का नायक ओंकारदास मानिकपुरी उर्फ नत्था अब भी गरीबी में ही जिन्दगी गुजर-बसर करने को मजबूर है। खुद नत्था को भी यह नहीं मालूम कि उसके साथ ऐसा क्यों हो रहा है? उसे उम्मीद थी कि  पीपली लाइव के हिट हो जाने के बाद उसके पास फिल्मों का अंबार लग जाएगा लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुबंई के एक-दो निर्माताओं ने उससे फोन पर बातचीत जरूर की है लेकिन उसे यह नहीं बताया है कि उसकी भूमिका क्या होगी? छत्तीसगढ़ी फिल्म बनाने वाले निर्माताओं ने भी अब तक नत्था को अनुबंधित करना जरूरी नहीं समझा है, और तो और उस भिलाई में जहां नत्था रह रहा है वहां मर्डर और काइट्स जैसी फिल्म बनाने वाले अनुराग बसु अपने स्वर्गीय पिता सुब्रत बोस को स्वप्न दृष्टा रंगकर्मी मानते हुए गत दो दिनों से एक बड़ा कार्यक्रम कर रहे हैं लेकिन इस आयोजन में शामिल होने का न्यौता भी नत्था को नहीं दिया गया है।

भले ही नत्था की पहली फिल्म देश और दुनिया में तहलका मचाने के बाद  आस्कर के लिए नामित हो गई है लेकिन उसकी जिन्दगी में कोई फर्क नहीं आया है। पीपली लाइव के इस नायक की दशा अब भी वैसी ही बनी हुई है जैसे फिल्म में प्रदर्शित की गई है। नत्था का वृंदानगर स्थित घर इतना छोटा है कि यदि दो लोग भी उससे मिलने आ जाएं तो वह उन्हें आदर के साथ घर में बैठने को नहीं कह सकता है। अपने प्रशंसकों को ठीक से सम्मान नहीं दे पाने की वजह से नत्था अपनी मौसी की लड़की के पति यानी जीजा के घर रहने को चला आया है। यहां भी चैनलवाले उसका पीछा नहीं छोड़ रहे हैं। जैसे ही यह खबर में चैनलों में प्रसारित हुई कि आमिर खान की फिल्म पीपली लाइव आस्कर के लिए नामित कर दी गई है वैसे ही चैनल वालों का रूख जामुल के उस इलाके की ओर हो गया है जहां नत्था के जीजा रहते हैं। यहां भी नत्था चैनलवालों से लगातार बात कर रहा है। अपनी फिल्म के बारे में बता रहा है। आमिर खान और अनुषा रिजवी की तारीफ कर रहा है लेकिन कोई चैनल वाला उससे यह नहीं पूछ रहा है कि भइया नत्था फिल्म के हिट हो जाने के बाद आपकी दशा में कोई सुधार आया है नहीं? उल्लेखनीय है कि नत्था का बचपन बेहद मुफलिसी में बीता है । नत्था के पिता श्यामूदास मानिकपुरी एक मजदूर थे। इधर-उधर काम की तलाश में श्यामूदास को जहां-जहां भटकना पड़ता नत्था वहां-वहां उनके साथ जाता रहा है। कभी झोपड़ी की सीलन और बदबूदार जमीन का बिछौना मिलता रहा तो कभी उस पाइव में उसे रात गुजारनी पड़ी है जो पाइव ख्वाजा अहमद अब्बास की पटकथा में अक्सर दिख जाया करती थी। कई जगह भटकने के बाद जब नत्था के पिता  यहां भिलाई नंदिनी के औद्योगिक क्षेत्र की सिम्पलेक्स कंपनी में काम करने आए तो अपने व्यवहार के चलते वे जल्द ही प्रसिद्ध मजदूर नेता शंकरगुहा नियोगी के करीबी हो गए। सिम्पलेक्स वही कंपनी है जिसके मालिकों पर शंकरगुहा नियोगी की हत्या का आरोप लग चुका है। वेतन विसंगति व अन्य मांगों को लेकर जब कंपनी में आंदोलन होने लगा तो प्रबंधन ने श्यामूदास को  आंदोलनकारी समझकर नौकरी से निकाल दिया था। पिता के बेरोजगार हो जाने पर कई बार घर में फांके की नौबत भी आती रही है। पिता को सहारा देने के लिए जब नत्था ने रोजगार की तलाश की तो उसे काम भी मिला तो जान को जोखिम में डालने वाला। जी... हां.. यह बात पूरी तरह से सच है। अपने परिवार का पेट भरने के लिए नत्था को सिर्फ एक रस्सी के सहारे मुख्य चिकित्सालय सेक्टर 9 में राजमिस्त्री का काम भी करना पड़ा है। नत्था ऊंचे से ऊंचे भवन पर जान को जोखिम में डालकर काम करता रहा है। नत्था जब पेट की आग को बुझाने के काबिल हो गया तब जाकर उसने हबीब तनवीर का ग्रुप ज्वाइन किया। यहां उसे कभी बहुत ज्यादा पैसे तो नहीं मिले लेकिन कला के प्रति समर्पण की संतुष्टि जरूर हासिल हुई।

नत्था जब तनवीर के प्रसिद्ध नाटक चरणदास चोर का सांतवा चोर बना और जब उसकी ख्याति देश-विदेश में होने लगी तब टीवी पत्रकार अनुषा रिजवी ने उसे दो लाख रुपए देकर फिल्म पीपली लाइव के लिए अनुबंधित किया था। नत्था को किस्त-किस्त में दी गई यह राशि पारिवारिक जरूरतों को पूरा करने में ही खर्च हो गई है। ऐसा भी नहीं है कि नत्था फिल्म के हिट हो जाने के बाद पूरी तरह से पैसों का ही दीवाना हो गया है। वह कहता है कि उसे सिर्फ उतने ही पैसे  चाहिए जितने में वह अपने परिवार का भरण-पोषण कर सके और बच्चों को लिखा पढ़ा सकें। नत्था अपने बच्चों को खूब पढ़ाना लिखाना चाहता है क्योंकि रोजी-रोटी का इन्तजाम करने के लिए उसके पिता शहर-दर-शहर खानाबदोश जिन्दगी जीते रहे हैं। एक शहर से दूसरे शहर पलायन करने के कारण नत्था 11 वर्ष की उम्र तक ही पहली कक्षा का छात्र रहा है। जैसे-तैसे पांचवी पास करने वाला नत्था अब अपने प्रशंसकों को आटोग्राफ तो दे रहा है लेकिन नत्था से बधाई हो कहकर मिलने वाले लोग उसके भीतर छिपी हुई एक परेशानी को पढ़ नहीं पा रहे हैं।

नत्था की परेशानी यह नहीं है कि इलेक्ट्रानिक और प्रिंट मीडिया के लोग उसका पीछा कर रहे हैं। उसे सिर्फ यह तकलीफ सता रही रही है कि कहीं उसकी स्थिति भी चेन्दरू के समान न हो जाए। उल्लेखनीय है कि साठ के दशक में एक विदेशी फिल्मकार ने छत्तीसगढ़ बस्तर के अबूझमाड़ इलाके में रहने वाले चेन्दरू नामक एक बालक को अपनी फिल्म चेन्दरू द बाय एण्ड टाइगर में  काम करने का अवसर दिया था। फिल्म का नायक चेन्दरू बगैर किसी डर के शेरों के साथ घूमता था।   जब जानवरों को लेकर टारजन जैसी काल्पनिक कथा गढ़ने वाले लोगों ने चेन्दरू का यह कारनामा देखा तो उन्हें भी आश्चर्य हुआ था। चेन्दरू को रुपहले पर्दे पर एक नक्षत्र की तरह चमकता देखने वाले सभी लोगों को यह उम्मीद थी अबूझमाड़िया लड़का देश और दुनिया में छा  जाएगा और कुछ नहीं तो उसकी आर्थिक दशा सुधर जाएगी लेकिन सालों-साल बीत जाने के बाद चेन्दरू को दोबारा फिल्म में काम करने का अवसर नहीं मिला।

अभी हाल ही में चेन्दरू का घर बाढ़ की चपेट में आ गया था। घर के बर्तन और जानवरों के बह जाने के बाद भी चेन्दरू को सरकारी सहायता नहीं मिल पाई है। यहां तक वन विभाग ने उसे आशियाना बनाने के लिए बांस-बल्ली भी मुहैय्या नहीं कराई है। सब जानते हैं कि शेखर कपूर की फिल्म बैंडिट क्वीन में काम करने वाले लोक कलाकार किस दशा में जी रहे हैं। बोल्ड सीन देकर पूरी दुनिया में स्त्री विमर्श को नया आयाम देने वाली सीमा विश्वास की स्थिति भी बहुत ज्यादा अच्छी नहीं है। 27 सितम्बर को पीपली लाइव के नायक  नत्था  को मैं अपने अखबार के दफ्तर में लेता आया था। अखबार के लिए बातचीत करने के बाद मैं उसे आग्रह के साथ अपने निवास पर भी ले गया। यहां भी मैंने उससे घंटों बात की। पूरी बातचीत के बाद मैंने यह पाया कि एक सीधा-सरल लोक कलाकार बाजार के हथकंड़ों को  नहीं जानता है और इसी वजह से  अपनी मार्केटिंग  भी नहीं कर पा रहा है। पूरी दुनिया  में मौजूद खतरनाक बाजार में नत्था जैसे लोग फिट बैठ पाते हैं या नहीं यह तो भविष्य के गर्भ में है, लेकिन मैंने कल  उसे उसी सोच में डूबा हुआ देखा जिस सोच में वह फिल्म के अंतिम दृश्य में दिखाया गया है।


Thursday, September 23, 2010

शिष्य नही सहयोगी


मित्रों आज का दिन मेरी जिन्दगी का बहुत महत्वपूर्ण दिन है। मेरे गुरू अंबरीशजी में मुझे लेकर अपनी कलम चलाई है। हालांकि वे कलम नही भी चलाते तो भी यह बात मैं अच्छी तरह से जानता हूं कि कहीं न कहीं मैं उनकी चिन्ताओं का एक जरूरी हिस्सा बना हुआ हूं। जो लोग ब्रोकर है मैं उनके बारे में तो नहीं जानता लेकिन जो नहीं है वे इस बात को ठीक तरह से जानते हैं कि एक पत्रकार के लिए कोई भी नौकरी कभी पक्की नौकरी नहीं होती । एक पत्रकार यदि आज एक संस्थान में है तो कल दूसरे संस्थान में नजर आ सकता है। सच तो यह है कि अंबरीशजी इस बात को बेहद अच्छे से जानते हैं कि उनके शिष्य पर कोई न कोई तेज तलवार  हमेशा ही लटकी रहनी है, सो वे अक्सर मुझसे यह पूछते ही है कि बोलो क्या नया कर रहे हो। कही कोई परेशानी तो नहीं है। उनकी चिन्ताओं में खुद को शामिल पाकर मैं हमेशा इस बात के लिए आश्वस्त रहता हूं कि  चलो दूर होने के बाद भी मेरा कोई अपना है जिसका हाथ मेरे सिर पर है । लेकिन गुरुदेव ने गुरुदेव लिखने पर प्यार भरी झिड़की लगा दी है। उनकी झिड़की का स्वागत है, लेकिन यहां मैं अपने पाठकों से ही यह जानने के लिए उत्सुक हूं कि क्या मैंने अपने गुरुदेव को गुरुदेव लिखकर कोई गलती की है। अरे भाई जिनसे आप कुछ सीखें और सीखें भी ऐसा वैसा नहीं बल्कि ठोक बजाकर धमाका करने के लायक तो क्या उन्हें गुरू मानना उचित नहीं है। अंबरीशजी से मैंने तो बहुत कुछ सीखा है और आज भी सीख ही रहा हूं। अब आप ही फैसला करें मेरा सोचना सही है या नहीं। एक बात और मेरी दूसरी पुस्तक बस्तियां जो वीरां हो गई.. भी बहुत जल्द आने वाली है। यह पुस्तक मैंने अपने गुरुदेव को ही समर्पित की है। अब बोलिए गुरुदेव अपने जिद्दी  शिष्य को कितना रोक लेंगे आप। बेहद आदर के साथ यहां पाठकों के लिए वह लेख भी दे रहा हूं जो गुरुदेव ने मुझे मेल किया है। (राजकुमार सोनी)

अंबरीश कुमार 
अयोध्या पर एक रपट मैंने कुछ मित्रों को भेजी थी ताकि ब्लाग के माध्यम से वहां  के हालात की जानकारी मिल सके .साठ साल बाद एक फैसला आ रहा है जिसपर पूरे देश की निगाह है .ऐसे में अयोध्या से लेकर लखनऊ तक जो माहौल है उसकी कवरेज भी आसान नही है .फ़तवा वाली पत्रकारिता और सनसनी वाली ख़बरों के बीच तथ्यों के साथ लिखना काफी चुनौती भरा काम होता है .पर इंडियन एक्सप्रेस समूह में करीब बीस साल की पत्रकारिता के चलते काफी कुछ सीखने को मिला है .शब्दों से लेकर तथ्यों का भी काफी ध्यान रखना पड़ता है वर्ना अख़बारों में डेस्क पर कई खबरे पोस्मार्टम के बाद निपट जाती है .शब्दों के चयन को लेकर ही यह पोस्ट भी लिख रहा हूँ .
 कल मेरे आर्टिकल के नीचे राज कुमार सोनी  ने लिखा - अंबरीश जी जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार होने के अलावा मेरे गुरू भी है. सोनी के शब्दों पर हैरानी हुई .छत्तीसगढ़ की पत्रकारिता के खट्टे मीठे अनुभव है पर जो लोग लगातार मेरे साथ खड़े रहे उनमे राज कुमार सोनी प्रमुख है .सोनी से करीब दशक भर पुराना परिचय है .सन २०००  में मुझे इंडियन एक्सप्रेस ने छत्तीसगढ़ राज्य की कवरेज की जिम्मेदारी दी और दिल्ली से रायपुर भेजा गया .एक जिले को राजधानी बनते और एक लोकप्रिय प्रवक्ता को मैंने राज्य का  ताकतवर मुख्यमंत्री बनते देखा जो  बाद में कुछ अफसरों-पत्रकारों  के चलते वे अहंकार के  शिखर पर पहुँच गए .मै अजित जोगी की बात कर रहा हूँ .जोगी से घनिष्ठ  सम्बन्ध भी रहे और जब बिगड़े तो टकराव का लम्बा दौर चला .खैर २००१ में ही मुझे एक्सप्रेस प्रबंधन ने छत्तीसगढ़ से  जनसत्ता निकलने की जिम्मेदारी दी तो लिखित टेस्ट लेकर  करीब पचास लोगो का चयन किया गया जिसमे रायपुर से लेकर दुर्ग बिलासपुर के लोग शामिल थे .फिर साक्षात्कार में लोगों को बुलाया गया जिसमे सोनी भी आए थे . तभी उनसे पहली मुलाकात हुई  .मैंने उनकी कापी देखी और कहा - जनसत्ता में संवाददाता  के रूप में काम कर सकेंगे तो उनका जवाब था - क्या विज्ञापन भी लाना होगा .सोनी का जवाब सुनकर काफी झल्लाहट हुई क्योकि एक्सप्रेस की परम्परा अलग रही है .मेरा जवाब था - विज्ञापन का काम संवादाता नही करता है उसके लिए मार्केटिंग के लोग है .मेरे साथ उस समय छत्तीसगढ़ जनसंपर्क के निदेशक चितरंजन खेतान भी साक्षात्कार ले रहे थे .खेतान पत्रकार रहे है और उसी नाते उन्हें भी आमंत्रित किया गया था .इसी बीच रायपुर संस्करण के व्यवस्थापक मुझे अलग ले गए और बोले -यह तो पक्का कम्युनिस्ट है इसे कहा ले रहे है .मैंने कहा -अखबार निकालना  है पार्टी नहीं बनानी जो टेस्ट  में पास हो गया  है उसे लिया जाएगा.चाहे कम्युनिस्ट हो या संघी .

सोनी उस समय समाज और व्यवस्था  से नाराज  जेहादी विचारों से लैस थे .पर लिखने की कला और ख़बरों को पकड़ने की क्षमता भी गज़ब की थी जिसे एक दिशा देने की जरुरत थी .उस समय रिपोर्टिंग में सोनी और डेस्क पर भारती यादव जनसत्ता की टीम के सबसे प्रतिभाशाली लोगों में शामिल थे .बाद में अनिल पुसदकर से लेकर अनुभूति ,आकांक्षा  संजीत त्रिपाठी आदि इसी कतार  में शामिल हुए .एक बात सभी से साफ़ थी कि यहाँ पर सभी एक टीम का हिस्सा होंगे कोई छोटा बड़ा नही . सोनी को जब उनकी ख़बरों के चलते प्रमुखता मिलने लगी तो भीतर से बाहर तक  मेरा विरोध शुरू हुआ .सरकार के स्तर पर दबाव पड़ा कि सोनी को रिपोर्टिंग से हटा दिया जाए .इस दबाव  के बाद हमने सोनी  की जिम्मेदारिया और बढा दी .तब भी वे अपने सहयोगी थे शिष्य नही .एक दिन विद्याचरण शुक्ल ने मुझसे पूछा - आपका जोगी की निरंकुशता के  खिलाफ अभियान कब तक चल पाएगा. कहीं सोनी को कही हटा तो नहीं दिया जाएगा ,मैंने कहा जब तक मै रायपुर में हूँ तब तक कुछ नही होगा .पर चुनाव से पहले सरकार भारी पड़ गई। अखबार के व्यस्थापकों के खिलाफ कई आपराधिक मामले दर्ज करा दिए गए और मुझे दिल्ली बुला लिया गया .हालाँकि बाद में भाजपा के नेता प्रभात झा ने एक दिन लखनऊ में कहा -जोगी को हराने में जनसत्ता की भूमिका रही जिसने पूरे राज्य में माहौल बना दिया .लेकिन यह भी किसी अकेले का नही बल्कि उस टीम का काम था जिसके अगले दस्ते में सोनी से लेकर पुसदकर तक थे .यह सब सहयोगी रहे है शिष्य नही .और सहयोगी भी ऐसे जिन्हें सिपहसालार माना गया ,गुरू जैसा शब्द बहुत भारी लगता है  .गुरू तो हम सबके  प्रभाष जोशी रहे है जिन्होंने पत्रकारिता सिखाई .

Wednesday, September 22, 2010

फिजा को फसाद में न बदल दे मीडिया


अंबरीश कुमार
अयोध्या  , सितंबर। ख्वाजा हैदर अली आतिश ,मीर  अनीस ,चकबस्त और बेगम अख्तर का   फैजाबाद फिर एक युद्ध जैसी  तैयारी में जुटा है । फैजाबाद से अयोध्या  में पहरें में विराजमान रामलला के दर्शन करते जाते हुए यही अहसास होगा कि जल्द कोई युद्ध शुरू होने वाला है । आज दूसरे दिन फिर हुए फ्लैग  मार्च ने भी रही सही कसर पूरी कर दी ।  हर चौराहे पर अर्ध सैनिक बलों के जवान ,सीआरपीएफ़-पीएसी के वाहन  और सायरन बजाती गाड़ियों का शोर किसी भी यात्री को आशंकित करने के लिए काफी है।  जिस शहर में हर यात्री का गर्मजोशी से स्वागत होता वही अजनवी चेहरे को देख लोगों के चहरे के भाव बदल जाते है  ।फूल -माला , चूड़ी, सिंदूर टिकुली ,खडाऊ  और मिठाई की दुकानों से भीड़ गायब है  । सड़क पर साधू संत कम गायों का झुंड ज्यादा नज़र आता है  । और शहर भी ऐसा जिसे शहर कहने में शर्म आए  । पिछले एक  दशक से प्रदेश से लेकर देश की राजनीति बदलने वाला फैजाबाद -अयोध्या आज भी बदहाल और याचक मुद्रा में खड़ा नज़र आता है । कांचीपुरम से लेकर तिरुपती और मदुरै जैसे धार्मिक शहर जहाँ  पूरी तरह बदल चुके है वही अयोध्या वही खड़ा है जहाँ अस्सी के दशक में था । यही   अयोध्या  जिसने उत्तर प्रदेश से लेकर दिल्ली की सरकार बदल दी पर किसी ने इसे बदलने की जहमत तक नही उठाई । न कोई उद्योग धंधा लगा न ही शिक्षा का कोई नया  केंद्र बनाया गया  । गंदगी के ढेर पर बैठे अयोध्या फैजाबाद में एक ढंग का म्यूजियम तक नही है जो इसका इतिहास बता सके । राम की जन्मभूमि यानी अयोध्या तो बहुत प्राचीन शहर है पर बाद में  इसी के पास और साथ बसे फैजाबाद का का भी रोचक इतिहास है । अंग्रेजो से अवध में जो संघर्ष हुआ उसमे भी फैजाबाद की महत्वपूर्ण भूमिका रही ।
उर्दू के शेक्सपियर यानी मीर बबर अली  अनीश जिनका जिक्र मिर्जा ग़ालिब ,मीर तकी मीर और अल्लामा इकबाल के साथ किया जाता है वे फ़ैजाबाद में ही पैदा हुए थे ।बड़ा शोर सुनते थे पहलु में दिल का ,जो चीरा तो  क़तर-ए-  खून न निकला ,जैसे नायब शेरों को  का तोहफा देने वाले ख्वाजा हैदर अली आतिश ,पंडित बृज नारायण चकबस्त और बेगम अख्तर ने भी इसी शहर में जन्म लिया । हिंदू- मुस्लिम क्रांतिकारियों की  पूरी एक जमात है जिसने इस शहर में फिरंगियों से मुकाबला किया ।
पर आज इस शहर की अपनी कोई पहचान ही नही बची है । फैजाबाद के लेखक पत्रकार केपी सिंह ने कहा - अब यह मुर्दों का शहर बन कर रह गया है ।न किसी को इस शहर के इतिहास का पता है और न सांस्कृतिक विरासत का ।  एक म्यूजियम था तो उसका सामान लखनऊ भेज दिया गया और अब उसमे एसएसपी का दफ्तर चल रहा है । जो कसर बाकी थी उसे मीडिया पूरी कर दे रहा है । प्रिंट में तो ज्यादा हेराफेरी अभी नही शुरू हुई पर चैनेल लगातार बाबरी ध्वंश की क्लिपिंग दिखाकर माहौल बनाने का प्रयास कर रहा है । जबसे अयोध्या पर फैसले की घड़ी करीब आई है लग रहा है कोई जंग शुरू होने जा रही है ।एक तरफ जहाँ नेताओं की साख ख़त्म हुई है वही  मीडिया की भूमिका पर भी सवाल खड़ा हुआ  ।
राजनैतिक दलों की साख पर हर कोई यहाँ सवाल खड़ा करता है  । इसमे भी पहले नंबर पर भाजपा है । आम राय है कि भाजपा ने राम के नाम की राजनीति कर अयोध्या मुद्दे को सत्ता में जाने का रास्ता बनाया । यही वजह है क्योकि अब भाजपा के नेताओं का यहाँ वह स्वागत नही होता जो पहले होता था । कल्याण सिंह कभी अयोध्या में नायक की तरह हाथो हाथ लिए जाते थे पर अब हनुमान गढ़ी के महंत ज्ञानदास न सिर्फ उनसे मिलने से मना करते है   बल्कि सवाल उठाते है कि कितनी बार चोला बद्लेगे कल्याण ।  विवादित ढांचा बचाने की जबान देने के बाद भी उन्होंने इसे नही बचाया । नुक्सान किसका हुआ ,हिन्दुओं का । क्या वहा नमाज पढी जाती थी वहा तो रामलला की पूजा होती थी जिसे तुडवा दिया गया । दूसरी तरफ बाबरी मस्जिद एक्शन कमेटी के नेता और बाबरी मामले के पक्षकार हाशिम अंसारी ने कहा -कल्याण सिंह खुद तो कोठी में रहते है और रामलला को तम्बू में पहुंचा दिया है ।
अंसारी सिर्फ एक ही पार्टी नही बल्की सबकी खबर लेते है । बाबरी मस्जिद - राम जन्म भूमि विवाद को वे कुर्सी और करेंसी का खेल बताते है ,धर्म का नही । इस समूचे विवाद के लिए वे कांग्रेस को जिम्मेदार बताते हुए कहते है -मूर्ति कांग्रेस के राज में रखी गई ,शिलान्यास  और दर्शन की इजाजत कांग्रेस ने दी और मस्जिद भी उसी के राज में गिरी ।हाशिम अंसारी ने कहा - जब बाबरी मस्जिद में मूर्ति रखी गई तो पंडित जवाहर लाल नेहरु संतरी थे या प्रधानमंत्री । उन्होंने तत्कालीन मुख्यमंत्री गोविन्द वल्लभ पन्त से कहा और पंत ने कानून व्यवस्था का नाम लेकर पल्ला झाड़ लिया ।यह वही कांग्रेस थी जिसे आजादी के बाद ३५ साल तक मुसलमानों ने सर पर बैठाया । जब बाबरी मस्जिद गिरी तो उस समय संसद में ८० मुस्लिम सांसद थे । दूसरी तरफ कांग्रेस के राज में बीस हजार बलवे हुए।
कांग्रेस ने तो जो किया वो किया पर मुलायम और आज़म खान ने तो ज्यादा बड़ा धोखा दिया । बाबरी मस्जिद के सवाल पर मैंने आजम खान के साथ कितने दौरे किये और समाजवादी पार्टी को सत्ता मिली । लखनऊ से बाराबंकी होते नानपारा ,बलरामपुर बस्ती बनारस तक दौरे करते थे  । पर मुलायम सिंह तो बहुत पाजी निकला आजम खान न को ले लिया और सबको छोड़ दिया । आजम खान भी जब तक मंत्री नही बना हर दूसरे महीने यहाँ आता पर मंत्री बनते ही मुलायम सिंह की पालकी उठाने लगा । एक बार भी पलट कर इधर नही आया । आजम खान चित्रकूट जाकर छह मंदिरों में दर्शन कर आया पर अब बाबरी याद नही आ रही ।
अंसारी यही नही रुके मीडिया की भी खबर ली और कहा - एक अंग्रेजी अखबार की मोहतरमा आई थी अपनी बात मेरे मुंह  में डाल रही थी  ।बार बार पूछे कि आपके पक्ष में फैसला नही आया तो क्या होगा ,मैंने तंग आकर कहा कि फिजां बदल जाएगी पर जो उन्होंने लिखा उसके चलते अब मुझे नब्बे साल की उम्र में अदालत दौड़ना पड़ रहा है । जब पत्रकार फिंजा को फसाद में बदल दे तो कौन उनसे बात करेगा ।
यह नाराजगी अयोध्या के ज्यादातर लोगों की थी । चैनेल पर ज्यादा गुस्सा था क्योकि उनके बनाए माहौल से यात्रियों की संख्या घट गई है और लोगों ने खाने का सामान इकठ्ठा करना शुरू कर दिया है । इस सबसे अयोध्या में सब्जी आदि की कीमते भी बढ़ गई है । हनुमान गढ़ी के रास्ते में करीब सत्तर साल के परस नाथ ने कहा - चैनल वालों ने आफत कर रखा है ।दिनरात दिखा रहे कि कैसे मस्जिद गिरी थी  । यह नही बताएँगे कि गिराने वाले यहाँ के नही थे आन्ध्र प्रदेश और कर्णाटक जैसे राज्यों से आए थे  । यहाँ के लोग नहीं किसी फसाद में शामिल थे न ढांचा गिराने में पर बदनाम जरुर हुए । यहाँ के लोगो की रोजी रोटी का साधन यही फूल माला ,मिठाई और चढ़ावा आदि   का व्यापार  है । यहाँ कोई कल कारखाना तो लगवाता नही तो लोग क्या करेंगे । ऐसे में दस दिन कर्फ्यू लग जाये तो भूखो मरने की नौबत आ जाती है । आदमी ही नही ये जो बन्दर देख रहे है ये भी मंदिर बंद हो जाने से परेशान हो जाते है ।करीब दर्जन भर लोगो से बात हुई तो उनका दर्द पता चला । नेताओं ने अयोध्या को मुद्दा बनाया और सत्ता में आए तो मीडिया ने अयोध्या की मार्केटिंग से अपना प्रसार से लेकर मुनाफा बढाया पर यहाँ के पिछड़ेपन और बदहाली पर कुछ नही लिखा ।  पर एक बड़ा फर्क यह आया है कि अब अयोध्या में मंदिर के मुद्दे को लेकर भावनात्मक रूप से भुनाना किसी के लिए भी आसान नही होगा  ।
 अंबरीशजी जनसत्ता के वरिष्ठ पत्रकार होने के अलावा मेरे गुरू भी है- राजकुमार सोनी 

Monday, September 20, 2010

नई राजधानी में नत्था ही नत्था





 सब कुछ पत्रकारिता के फटीचर समय को दर्शाने वाली फिल्म ‘पीपली लाइव’ के समान है। बस फर्क सिर्फ इतना है कि पीपली लाइव का नायक नत्था जहां अपनी पुश्तैनी जमीन को बचाने के चक्कर में मुआवजा पाने के लिए मरने को तत्पर दिखता है तो छत्तीसगढ़ की  नई राजधानी के नत्था (किसान) मुआवजा हासिल कर लेने के बाद उपजी विसंगतियों के चलते ‘आत्मघाती कदम’ उठा लेने की शपथ लेने को मजबूर नजर आते हैं। भले ही खेती-किसानी में आंकड़ों की बाजीगरी करने वाले सरकारी नुमांइदे यह स्वीकार नहीं करेंगे कि यहां का किसान मौत को गले लगाने के बारे में विचार कर रहा है। लेकिन यह एक बड़ी सच्चाई है। खेती-बाड़ी से महरूम होने वाले ‘नई राजधानी के नत्थाओं’ ने अपने भीतर आत्महत्या के खतरनाक बीज का रोपण शुरू कर दिया है।

नई राजधानी पहुंचने के लिए आपको वह टेम्पो भी नहीं मिलेगी जो पीपली लाइव में दिखाई गई थी। यहां पहुंचने के लिए आपको ‘कार-मोटर-सायकिल’ या दूसरे माध्यमों का उपयोग करना पड़ेगा। यदि आप उड़नखटोले के मालिक है तो रायपुर से ब-मुश्किल दस मिनट में आपकी यात्रा पूरी हो सकती है, अन्यथा किसी भी अन्य माध्यम से पहुंचने में एक घंटा जाया करना पड़ सकता है। हालांकि पुरानी राजधानी से नई राजधानी में पहुंच को सुगम बनाने का दावा वर्ष 2002 से किया जा रहा है क्योंकि इसी साल आवास एवं पर्यावरण विभाग ने नई राजधानी के निर्माण के लिए अधिसूचना जारी की थी। ग्राम पलौद में इंटरनेशनल स्टेडियम आपका स्वागत करता हुआ मिलेगा। स्टेडियम को देखकर आपको लगेगा- भई वाह जब स्टेडियम इतना शानदार है तो नई राजधानी खूबसूरत होगी ही लेकिन जैसे-जैसे उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर आप गांव पहुंचते जाएंगे, वैसे-वैसे आपको ‘पीपली लाइव’ का सच नजर आने लगेगा। कहीं आपको खड़खड़ करती हुई जीप नजर आएगी तो कही कोई धनिया कंडे थापते मिलेगी। देसी भभके के बीच बीड़ी सुलगाते हुए सैकड़ों नत्था भी आपको मिल ही जाएंगे।

मैं कोटराभाठा में एक किसान जयराम यादव के घर के सामने खड़ा हूं। जयराम जैसे-तैसे चर्चा करने को तैयार हुआ। बातचीत के दौरान उसने बताया कि उसके पास कुल पांच एकड़ खेती की जमीन थी। दबाव के चलते उसने अपनी जमीन एनआरडीए (न्यू रायपुर डेव्लपमेंट अथॉरिटी) को सौंप तो दी लेकिन अब वह पछता रहा है। जयराम को मुआवजे में कुल 28 लाख रुपए मिले थे। पांच एकड़ जमीन का मालिक जब जमीन खरीदने के लिए अपने इलाके से बाहर निकला तो उसे बैरंग लौटना पड़ा क्योंकि गांव से सौ-डेढ़ सौ किलोमीटर भीतर-बाहर के दायरे में कोई भी उसे 15 लाख रुपए एकड़ में जमीन देने को तैयार नहीं हुआ। मंदिर हसौद में जमीन की कीमत एक करोड़ रुपए प्रति एकड़ हो चुकी थी तो नई राजधानी से कुछ दूरी पर स्थित ग्राम लखौली में जमीन 75 लाख एकड़ में बिक रही थी। यही हाल ग्राम गनौद और धमनी का भी था। जमीन से महरूम हो जाने के बाद बैलगाड़ी पर चलने वाले जयराम ने अपने बच्चों के लिए हीरो होंडा व स्कूटी खरीद ली। मिट्टी के घर को पक्का बना लिया। मुआवजे का पैसा कब खत्म हो गया उसे पता नहीं चला। अब वह खुद मानता है कि उसके सामने भूखों मरने की नौबत आन खड़ी हुई है। कुछ ऐसी ही स्थिति कोटराभाठा के एक दूसरे किसान गंगाराम की भी है। गंगाराम ने मुआवजे में मिली रकम से राजिम पोखरा में खेती के लिए जमीन तो खरीद ली है लेकिन वहां उसका अपना घर नहीं है। एक बड़े परिवार का मुखिया होने के कारण वह भी मुआवजे का सही उपयोग नहीं कर पाया। गंगाराम की स्थिति भी दयनीय हो चली है। निरन्तर खराब हो रही आर्थिक स्थिति से परेशान गंगाराम ने कहा कि वह कभी भी आत्मघाती कदम उठा सकता है।

किसान संघर्ष समिति के बैनर तले नई राजधानी का विरोध करने वाले सरजूदास मानिकपुरी के पास मात्र 2 एकड़ जमीन थी। इसमें से कुछ जमीन एनआरडीए अधिगृहीत कर चुका है। सरजू का मानना है कि सरकार ने सोची-समझी योजना के तहत किसानों से पांच-छह लाख रुपए प्रति एकड़ में जमीनों की खरीदी की है। उन्होंने कहा कि किसानों से सस्ते दर पर जमीन खरीद कर सरकार अब उसी जमीन को मंहगे दर पर बेच रही है। सरकार की इस कार्रवाई से लगता है कि वह ‘व्यवसाय’ करने पर आमादा है।

सरजू गांव-गांव में अवैध ढंग से बेची जा रही शराब को भी षड़यंत्र का एक हिस्सा मानते हैं। उन्होंने बताया कि किसान मुआवजे में मिली रकम का एक बड़ा हिस्सा शराब में खर्च कर रहे हैं। किसान भूख-गरीबी और मुफलिसी से जब मरेगा तब मरेगा, अभी तो हालात यह है कि वह पी-पीकर ही दम तोड़ रहा है। सरजू ने बताया कि गत दो सालों में 26 गांवों के 20 से ज्यादा किसान शराब पीकर मौत के घाट उतर चुके हैं। कुछ दिनों पूर्व बहरूराम के लड़के चोवा की मौत भी शराब सेवन के बाद एक दुर्घटना में हुई थी। नवागांव के एक किसान डेरहाराम ने बताया कि उनके गांव के किसान सरकार को जमीन देने के पक्ष में नहीं थे लेकिन एनआरडीए से जुड़े लोगों ने ऐसा दबाव बनाया कि किसानों को जमीन देनी ही पड़ी। शादी-ब्याह तथा अन्य कारणों से कर्ज में दबे किसानों को लगा कि यदि   मुआवजा मिलेगा तो राहत मिल जाएगी लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। मुआवजे की रकम खत्म हो गई है और अब किसानों के सामने कटोरा लेकर भीख मांगने के अलावा और कोई चारा नहीं बचा है। इसी गांव के एक नेत्रहीन किसान बलराम यादव की जमीन भी नई राजधानी के निर्माण की भेंट चढ़ चुकी है। बलराम की दशा भी बहुत अच्छी नहीं है। जबकि रेवाराम सिन्हा को जमीन के चले जाने से ज्यादा भाई से अलग हो जाने का दुख है। रेवाराम ने बताया कि पहले वह अपने भाई देवनाथ के साथ ही रहता था लेकिन मुआवजे की रकम मिल जाने के बाद भाई को हसदा में जमीन लेनी पड़ी तो उसे राजिम के पास पांडुका में किसी तरह जमीन मिल पाई। इलाके के दुर्गापाल, कार्तिकराम, श्रवण कुमार, भगतराम, मेहतरू यादव सहित कई किसान ऐसे हैं जो मानते हैं कि नई राजधानी में स्थिति विस्फोटक है। किसानों का कहना है कि भले ही उनकी लाशों पर सरकार मंत्रालय व अन्य भवनों का निर्माण कर लेगी लेकिन उनकी रूहें वहीं-कहीं मंडराती मिलेगी। यह रूहें एक न एक दिन उन सबसे हिसाब मांगेंगीं जो मामूली से फायदे के लिए साजिशों को प्रश्रय देते रहे हैं।

मुआवजा दिया गया

एनआरडीए के महाप्रबंधक महादेव कांवरे ने बताया कि मुआवजे का निर्धारण सबकी सहमति से किया गया है। इसलिए यह कहना सही नहीं है कि किसी भी ग्रामीण को कम मुआवजा दिया गया है। मुआवजे की रकम का किस किसान ने क्या उपयोग किया यह  तो वे ही ठीक तरीके से बता सकते हैं।

 किसान निशाने पर
छत्तीसगढ़ एग्रीकान के प्रदेश अध्यक्ष संकेत ठाकुर ने बताया कि  प्रदेश के हर कोने से किसानों द्वारा आत्महत्या कर लेने की खबरें आ रही हैं। कुछ समय पहले हमने जब सूचना के अधिकार के तहत थानों से जानकारी मांगी थी तब चौंकाने वाले आंकड़े सामने आए थे। कर्नाटक, आंध्र और महाराष्टÑ के बाद छत्तीसगढ़ में सर्वाधिक किसान मौत को गले लगा रहे हैं। जब हम लोग इस बारे में तथ्यात्मक ढंग से अपनी बात रखने का प्रयास करते है तो कह दिया जाता है कि हमारा नजरिया अलग हैं।


आत्महत्या की बात गलत
छत्तीसगढ़ के कृषि मंत्री चंद्रशेखर साहू किसानों  द्वारा आत्महत्या किए जाने की खबर को असत्य बताते हैं। उनका कहना है कि छत्तीसगढ़ का सामाजिक ताना-बाना ऐसा नहीं है कि किसी को आत्मघाती कदम उठाने की जरूरत पड़े। उन्होंने कहा कि जो  लोग किसानों के द्वारा आत्महत्या कर लेने की बात प्रचारित करते हैं वे भी अब तक किसी तरह का प्रमाण नहीं दे पाए हैं। प्रदेश में कृषि विभाग द्वारा संचालित योजनाओं से किसानों की आर्थिक स्थिति में लगातार सुधार हो रहा है। नई राजधानी के किसान भी खुशहाल जीवन जी रहे हैं। जबकि प्रदेश कांग्रेस कमेटी के कार्यकारी अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा का कहना है कि नई राजधानी के किसानों को सही ढंग से न्याय नहीं मिल पाया है। उनकी जमीनें बेहद सस्ते दर पर खरीदी गई और बाद में उसे मंहगे दर पर बेचने का काम किया गया। यहां का किसान जहर खाकर मर जाने की बात कहता है। सरकार को चाहिए कि वह किसानों के वक्तव्य को समय रहते गंभीरता से लें।

मामला लोक आयोग में
अपने गठन के प्रारंभिक दिनों से ही एनआरडीए विवादों में घिरा रहा है। वैसे जब जोगी शासनकाल में नई राजधानी बनाने की बात सामने आई थी तब विपक्ष ने पौता और चेरिया जैसे गांवों के चयन को गलत ठहराया था। विपक्ष का यह आरोप था कि सरकार भू-माफियाओं को बढ़ावा देने के लिए तरह-तरह के हथकंडे अपना रही है। विपक्ष का यह आरोप सही साबित भी हुआ क्योंकि उन दिनों जमीन के कारोबार से जुड़े लोगों ने किसानों की जमीनों को औने-पौने दामों में खरीदने का खेल प्रारंभ कर दिया था। जब भाजपा सत्ता में आई तो उसने नई राजधानी के स्थल में परिवर्तन कर दिया। कुछ समय पहले मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने एनआरडीए में व्याप्त अनियमितताओं को लेकर लोक आयोग में शिकायत की है। कांग्रेस के एक प्रमुख पदाधिकारी राजेश बिस्सा का आरोप है कि नारडा ने दिल्ली की एक कंपनी आईएलएंडएफएस से मिलकर एक नई कंपनी बनाने का खेल भी रचा था। बिस्सा का यह भी आरोप है कि नारडा दक्षिण भारत के एक ठेकेदार बी सिनैय्या से लगभग तीन सौ करोड़ की सड़कों का निर्माण करवा रहा है। यह सड़कें गुणवत्ताविहीन हैं। श्री बिस्सा ने सड़कों की गुणवत्ता के संबंध में सूचना के अधिकार के तहत सेम्पल की मांग भी की है। इधर नई राजधानी में जिस मंद गति से निर्माण कार्य चल रहा है उसे देखते हुए यह लगता नहीं है कि पुरानी राजधानी  आने वाले पांच सालो में वहां शिफ्ट की जा सकती है। छेरीखेड़ी में जिस फ्लाईओवर को ढाई साल पहले बन जाना था वह अब तक नहीं बन पाया।
भटक रहे किसान
भू-अर्जन और मुआवजे से संबंधित कामकाज के निपटारे के लिए एनआरडीए ने पहले पुराने आरटीओ के पीछे एक कार्यालय खोला था। अब यह दफ्तर न्यू राजेंद्र नगर के एक काम्पलेक्स में शिफ्ट हो गया है। इस दफ्तर में अब भी किसानों को भटकते हुए देखा जा सकता है। कामकाज को देखने के लिए पदस्थ किए गए एक तहसीलदार  के काम काज को लेकर भी ग्रामीणो में आक्रोश देखा गया।

Friday, September 17, 2010

नहीं चलेगी काली लड़की

 ‘‘वे घृणा करते हैं हमसे/हमारे कालेपन से
हंसते हैं, व्यंग्य करते हैं हम पर,
हमारे अनगढ़पन पर कसते हैं, फब्तियां 

मजाक उड़ाते हैं हमारी भाषा का हमारे चाल-चलन का
रीति-रिवाज कुछ भी पसन्द नहीं हैं उन्हें
पसन्द नहीं है हमारा पहनावा-ओढ़ावा
जंगली/असभ्य/पिछड़ा कहकर हिकारत से
देखते हैं हमें  और अपने को सभ्य/श्रेष्ठ
समझकर नकारते हैं हमारी चीजों को।’’


‘मेरा सब कुछ अप्रिय है उनकी नजर में’ शीर्षक से लिखी गई निर्मला पुतुल की यह कविता छत्तीसगढ़  प्रदेश की उन आदिवासी बालाओं पर सौ फीसदी सच बैठती है जो एयर होस्टेस का प्रशिक्षण ले चुकी हैं या फिर लेने जा रही है। जी हां.. यह सच है। एयर होस्टेस बनाने के नाम पर आदिवासी बालाओं के साथ लगातार मजाक किया जा रहा है। प्रदेश के आदिम जाति कल्याण विभाग ने जब वर्ष 2006 में यह योजना लांच की तब उसका उद्देश्य यही था कि आदिवासी इलाकों की लड़कियों को आत्मनिर्भर बनाते हुए उन्हें ‘रोजगार’ प्राप्त करने की दिशा में ठीक-ठाक कूबत रखने के लायक बनाया जाएगा, लेकिन योजना में प्रशिक्षण लेने वाली किसी भी एक लड़की को अब तक एयर होस्टेस की नौकरी नहीं मिल पाई है।
इंडियन एयर लाइंस ने गत दस सालों से होस्टेस की नई भर्ती का दरवाजा बंद रखा है, जिन निजी कंपनियों ने भर्ती चालू रखी है उन्हें ‘गोरे रंग पर गुमान’ करने वाली लड़कियों की जरूरत हैं। आदिवासी मामलों के एक जानकार एसआर शर्मा का कहना है कि देश और दुनिया के तमाम आदिवासी इलाकों में रहने वाले पुरूषों और महिलाओं की हाइट कम ही होती है और रंग काला। बाजारवाद के इस दौर में जाहिर सी बात है कि जिस किसी भी लड़की की हाइट कम होगी और उसका रंग काला होगा तो वे निजी एयर लांइस की सेवाओं के लिए उपयुक्त नहीं मानी जाएंगी। हालांकि देश के किसी भी कानून में यह नहीं लिखा है कि काली लड़कियां योग्य नहीं होती या उनमें प्रतिभा नहीं होती, लेकिन यह भी एक बड़ी सच्चाई है कि सुंदर नाक-नक्श और साफ रंग रखने वाली लड़कियां, कम से कम निजी संस्थाओं में, नौकरी हासिल करने के मामले में ज्यादा बाजी मारती रही है।

आदिवासी बालाओं को एयर होस्टेस योजना के तहत प्रशिक्षण दे चुके अनूप वर्मा भी योजना की सबसे बड़ी खामी आदिवासी क्षेत्रों से लड़कियों के चयन को ही मानते हैं। श्री वर्मा का कहना है कि आदिवासी लड़कियों को अंग्रेजी सीखाने के लिए काफी परिश्रम करना पड़ता है। इसके अलावा किसी लड़की की हाइट पांच फीट दो इंच से कम हुई, चेहरे पर दाग या रंग काला हुआ तो तय है कि उसका बहुत भला नहीं होता। श्री वर्मा एयर होस्टेस का प्रशिक्षण देने के बजाए एयरपोर्ट प्रबंधन का कोर्स चलाने की वकालत करते हुए आदिम जाति कल्याण मंत्री केदार कश्यप से मुलाकात कर चुके हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार ठीक ढंग से एविएशन का प्रशिक्षण  देगी तो लड़कियों का उपयोग एयर टिकिटिंग व अन्य जगहों पर किया जा सकता है। आदिवासी लड़कियों को एयरहोस्टेस का काम नहीं मिल पाने के सवाल पर आदिम जाति कल्याण विभाग के सचिव आरपी मंडल का कहना है कि अभी शुरूआत है। श्री मंडल मानते है कि एक न एक दिन प्रदेश की आदिवासी लड़कियां ऊंची उड़ान भरेंगी। उन्होंने यह स्वीकार किया कि भले ही लड़कियां प्रशिक्षण लेने के बाद एयरहोस्टेस नहीं बन पाई हैं लेकिन उन्हें प्रबंधन के क्षेत्र में रोजगार मिला है।
  नहीं मिला रिस्पांस 
  एक लड़की के प्रशिक्षण पर विभाग नब्बे हजार रुपए खर्च करता है। जिस किसी भी संस्था को प्रशिक्षण का काम सौंपा जाता है उसे अनुसूचित जाति-जनजाति की कुल 90 लड़कियों को प्रशिक्षित करना होता है, लेकिन वर्ष 2006 से लेकर अब तक मात्र 40-42 लड़कियों ने ही प्रशिक्षण हासिल किया है। सूत्रों का कहना है कि प्रशिक्षण लेने के लिए काफी लड़कियों ने आवेदन लगाया था लेकिन मापदंडों का हवाला देकर अधिकांश का चयन ही नहीं किया गया। जो लड़कियां प्रशिक्षण के लिए चयनित की गई थीं उनमें से कुछ ने सत्र पूरा किए बगैर घर लौटना जरूरी समझा। जो लड़कियां वापस  लौट गई उनके बारे में विभाग ने कभी यह जानने की कोशिश भी नहीं की, कि वे क्यों लौटी! लड़कियों को प्रशिक्षण देने का काम एक एयर होस्टेस अकादमी ने किया था। जिन लड़कियों ने इस संस्थान से प्रशिक्षण प्राप्त किया था उन्हें अपने रहने-खाने की व्यवस्था स्वयं देखनी पड़ी थी। प्रशिक्षण के उपरांत लड़कियों को एयर होस्टेस की नौकरी तो नहीं मिली अलबत्ता कुछ लड़कियां इधर-उधर की होटलों में रिसेप्शनिस्ट बनकर काम करने के लिए मजबूर जरूर हो गई है। बस्तर की एक लड़की इन दिनों हैदराबाद स्थित फिल्मसिटी द्वारा संचालित होटल में कार्यरत है।  

बेहतरी के लिए मंथन जारी
 इस बारे में आदिमजाति कल्याण मंत्री केदार कश्यप से चर्चा की गई तो उन्हों ने कहा कि आदिवासी बालाओं को एयर होस्टेस का प्रशिक्षण देने की योजना इसलिए प्रारंभ की गई थी ताकि युवतियां आत्मनिर्भर होकर अपने पैरों पर खड़ी हो सकें। उन्होंने योजना को विफल मानने से इंकार किया। श्री कश्यप ने कहा कि योजना को और अधिक दुरुस्त बनाने के लिए  मंथन जारी है। उन्होंने बताया कि  कुछ दिनों पूर्व ही  विमानन विभाग के अफसरों से चर्चा कर यह जानने की कोशिश की है कि इसे और कैसे बेहतर बनाया जा सकता है। युवतियां ठीक-ठाक अंग्रेजी बोल सकें इस पर जोर दिया जा रहा है। इसके अलावा उनमें आत्मविश्वास पैदा हों इसका पूरा प्रयास किया जा रहा है।

Saturday, September 11, 2010

गुजिया

दिन और रात
पानी की एक बूंद चखे बगैर
मां ने बनाई थी
हमारे लिए गुजिया

एक झूले में
पूरे सम्मान के साथ
बिठाए गए
भोले बाबा को खिला देने के बाद
जब भी थमाई गई
मेरे हाथों में गुजिया
तो मुझे हमेशा यही लगा
बस पूरी दुनिया जीत ली है मैंने

एक बड़े से बिस्कुट के पीपे में
जब कभी सबके हिसाब से
गिनकर रखी गुजिया
तो सच कहूं...
पूरी ताकत लगाकर
मैंने सभी भाइयों का हिस्सा मारा

मैं यह कभी नहीं जान पाया कि
गुजिया कैसे बनती है
और स्वाद के लिए
क्या-क्या चीजें डाली जाती है उसमें
 

मुझे सिर्फ इतना पता है कि
मां.. इस बात को अच्छी तरह से जानती थी कि
ठीक नहीं होता किसी भी चीज का कच्चा होना
अपनी आंखो के सामने कढ़ाई में 
गुजिया को खूब लाल होता हुआ देखने वाली मां
भगवान को तो कच्चा खिला सकती थी
लेकिन मुझे नहीं
 
गुजिया को एक स्थानीय व्यंजन मानने वालों से
मुझे सिर्फ इतना कहना है कि
गुजिया दुनिया का

क्षमा करें दुनिया का क्यों
अंतरिक्ष का सर्वश्रेष्ठ पकवान है

इस एक पकवान की खूशबू के सहारे 
पहुंच सकता हूं मैं उस अंतरिक्ष में
जहां मां रहती है

Wednesday, September 1, 2010

बचाओ.. बचाओ.. अस्मत के लुटेरों से

कोई उन्हें अपनी कार में घर छोड़ना चाहता है तो कोई देर रात तक दफ्तर में काम करने के लिए दबाव डालता है। किसी की पत्नी बीमार है तो किसी को सपने में स्टेनो टायपिस्ट दिखाई देती है। हर किसी का अंदाज निराला है। सच तो यह है कि गंदी नीयत रखने वाले प्रदेश के मनचले सरकारी मुलाजिमों के चलते कामकाजी महिलाओं का जीना मुहाल हो गया है।

देश के अमूमन हर सरकारी दफ्तर में कामकाजी महिलाओं को वासना की चाश्नी में डूबी हुई भेड़िया नजरों का सामना करना पड़ रहा है। कुछ दफ्तरों में तो कार्यरत लोगों ने मर्यादाओं की सीमाएं ही लांघ दी है। जब छत्तीसगढ़ राज्य का निर्माण हुआ था तब दो प्रकरण प्रदेश की फिज़ां में बेहद खतरनाक ढंग से तैरते हुए नजर आए थे। जशपुर में कलेक्टर रहे श्री सारथी और लिली कुजूर के मामले ने तत्कालीन जोगी सरकार को दाएं-बाएं झांकने के लिए मजबूर होना पड़ा था। एक कार्यालय में कार्यरत लिली कुजूर ने कलेक्टर पर यह आरोप लगाया था कि वे उनसे अनुचित तरह की मांग करते थे। राज्य निर्माण के दौरान ही एक डीएफओ के प्रकरण से भी काफी तहलका मचा था। कुछ समय पहले तक नारायणपुर में पदस्थ रहने के बाद यहां राजधानी में अटैच किए गए डीएफओ गोंविदराव पर एक महिला कर्मी ने दैहिक शोषण का आरोप लगाया था। त्रिपुरा कैडर के एक दूसरे वन अफसर दिनेश उपाध्याय पर उन्हीं के निवास पर रहने वाली एक महिला ने आरोप लगाया था कि श्री उपाध्याय ने पढ़ाई-लिखाई और नौकरी लगाने के एवज में उसके शरीर के साथ लगातार खिलवाड़ किया। मामले की शिकायत मुख्यमंत्री और राज्यपाल से भी की गई थी।

दुर्ग में पदस्थ रहे एक अपर कलेक्टर का प्रकरण भी राजनीतिक हलकों में खासा चर्चित रहा है। इस अपर कलेक्टर को लेकर कामकाजी महिलाओं ने अपने-अपने विभागों में कई मर्तबा शिकायत की थी, लेकिन मामला तब उलझा जब भिलाई के एक होटल में एक चर्चित महिला नेत्री के साथ पुलिस के हत्थे चढ़ा। कुछ साल पहले ही राजधानी की एक सरकारी लाइब्रेरी में काम करने वाली एक महिला कर्मी ने लैलूंगा के एक शिक्षक को लेकर यह शिकायत की थी कि जब वह लाइब्रेरी में अकेली बैठी थी तभी शिक्षक ने उसे बुरी नीयत से दबोच लिया था। लैलूंगा का यह शिक्षक राजनीतिक प्रभाव भी रखता था, फलस्वरूप उसने महिला कर्मी को धमकाने का प्रयास भी किया था। लेकिन महिला कर्मी ने अपने साथ हुए अत्याचार की शिकायत न केवल पुलिस थाने में की बल्कि शिक्षक को कोर्ट में भी घसीटा।

राज्य प्रशासनिक सेवा के एक अफसर विनोद कटेला का प्रकरण भी अजीबो-गरीब रंग लिए हुए है। बिलासपुर में पदस्थ रहे इस अफसर का प्रेम आदिम जाति कल्याण विभाग में कार्यरत एक महिला से चल रहा था। शादीशुदा होने के बाद भी श्री कटेला ने महिला से दूसरी शादी करने का वचन दिया था। एक रोज वे अपने महिला मित्र के साथ रतनपुर के मंदिर गए और वहां उन्होंने उसकी मांग में सिंदूर भर दिया। जब वे एक रेस्टहाउस में हनीमून मना रहे थे तब उन्होंने महिला को आश्वस्त किया की वे जीवन भर साथ निभाने का वचन लिखित में दे सकते हैं। महिला ने भी अफसर को कोरा कागज थमा दिया और कहा कि जो बात वे कह रहे हैं उसे लिखकर दे दें। लिखा-पढ़ी के नाम पर विवाद हुआ तो महिला ने अफसर के सारे कपड़े छिपा दिए और प्रेस वालों को इतला दे दी। प्रकरण में काफी दिनों तक जवाब-तलब चलने के बाद श्री कटेला को पुलिस ने गिरफ्तार किया। बाद में उन्होंने नौकरी छोड़ देना ही ठीक समझा। कुछ साल पहले धमतरी जिले में कार्यरत एक बड़े अफसर के निवास पर वहां कार्यरत एक महिला कर्मी ने आत्महत्या कर ली थी। प्रशासनिक और राजनीतिक गलियारों में अब भी इस आत्महत्या के संबंध में कई तरह की बातें कही-सुनी जाती है। कांकेर से यहां मंत्रालय में अटैच किए गए एक आईएएस अफसर का मामला भी अभी खत्म नहीं हुआ है। कांकेर जिले के एक प्रमुख पद में पदस्थ रहे अफसर पर वहां कार्यरत एक महिला कर्मी ने यह आरोप लगाया था कि जब अफसर की पत्नी गर्भवती थी तब उसके साथ सम्मानजनक व्यवहार नहीं किया गया। मामले की शिकायत जब मुख्य सचिव तक पहुंची तो जबरदस्त ढंग से बवंडर मचा।

कामकाजी महिलाओं को कमजोर और बेबस समझने वाले सरकारी मुलाजिमों ने अपने पद और गरिमा के साथ भी जबरदस्त ढंग खिलवाड़ किया है। कुछ समय पहले ही महिला आयोग के पास महासमुंद जिले की छात्राओं ने एक शिकायत भेजी है। वनों की रक्षा के लिए प्रशिक्षण प्राप्त कर रही छात्राओं ने खुद की रक्षा के संबंध में गुहार लगाई है। छात्राओं का आरोप कि वन विद्यालय के अनुदेशक एलके चौधरी उसने जबरिया ही यौन संबंध कायम करने की चेष्टा करते रहते हैं। छात्राओं के इस आरोप के बाद मामले में सनसनी फैल गई है। आयोग ने भी अपनी तरफ से अनुदेशक पर कार्रवाई की अनुशंसा की है। लोक स्वास्थ्य यांत्रिकीय विभाग बिलासपुर में पदस्थ एक अधीक्षक सूरजभान पाटिल का मामला भी हाल-फिलहाल आयोग के समक्ष पहुंचा है। श्री पाटिल के साथ कार्यरत एक महिला कर्मचारी ने कहा है कि जब वह घर में अकेली थी तब अधीक्षक ने सूनेपन का फायदा उठाते हुए उसके साथ अश्लील हरकत की है। इधर राजधानी के लोक शिक्षण संचालनालय में कार्यरत एक महिला भृत्य ने भी सहायक ग्रेड-2 के पद पर पदस्थ एक कर्मचारी महबूब खान पर यौन शोषण का आरोप लगाया है। मंत्रालय में पदस्थ एक कर्मचारी नेता कीर्ति वर्धन उपाध्याय पर भी एक महिला कर्मचारी ने आरोप लगाया था कि जब वह घर में अकेली रहती थी तो श्री उपाध्याय उनसे मिलने के लिए मिठाई का डिब्बा लेकर चले आते थे। एक रोज कर्मचारी नेता ने महिला की अस्मत से खिलवाड़ करने का प्रयास किया। मामले की शिकायत के बाद जांच के लिए गठित की गई कमेटी ने श्री उपाध्याय की दो वेतन वृद्धि रोकने की अनुशंसा की है। सच तो यह है कि महिलाओं के साथ उत्पीड़न के मामले में लगातार इजाफा होता जा रहा हैं। प्रदेश के महिला आयोग समक्ष ही बलात्कार के कुल 44 मामले लंबित है। दैहिक शोषण के 83 और प्रताड़ना के 589 मामले विचाराधीन हैं। ज्यादातर प्रकरण सरकारी कर्मचारियों से जुड़े हुए है।
 कानून हुआ लाचार
 केन्द्र के निर्देश के बाद अमूमन सभी प्रदेशों ने कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न रोकने के लिए कमेटी बनाने की अनुशंसा की है। इस अनुशंसा के बाद छत्तीसगढ़ ने भी पहल तो की है लेकिन यह पहल अपर्याप्त दिखती है। महिला एवं बाल विकास विभाग की तरफ से सभी जिले के कलेक्टरों को पत्र के जरिए यह सूचित किया गया है कि वे अपने क्षेत्रों में यौन शोषण रोकने के लिए कमेटियां गठित करें। कई जिलों में तो इन कमेटियों का पता ही नहीं है। जबकि कुछ जिलों में कमेटियां खुल तो गई है लेकिन उसमें कौन लोग हैं और शिकायत कहां करनी है इसकी जानकारी महिला कर्मियों को नहीं मिल पाई है।

इधर महिला एवं बाल विकास मंत्री लता उसेंडी का कहना है कि जिस किसी भी महिला कर्मचारी को यह लगता है कि उसका बॉस उसे प्रताड़ित कर रहा है या अनुचित मांग करते हुए परेशान कर रहा है वह अपनी शिकायत सीधे मुझे भेज सकती हैं। जो दोषी होगा उसे किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाएगा। जबकि महिला आयोग की अध्यक्ष विभाराव का यह कहना है कि आयोग यह नहीं देखता कि कौन सा प्रकरण सरकारी महिलाओं से संबंधित है और कौन सा गैर-सरकारी महिलाओं से जुड़ा हुआ है। महिला तो महिला होती है। यदि किसी ने उसके साथ दुर्व्यवहार किया है तो वह अपनी शिकायत हम तक भेज सकती हैं। यदि प्रदेश के थानों में महिलाओं की सुनवाई सही ढंग से हो पाती तो हमारे पास शिकायतें ही क्यों आती। निश्चित तौर पर प्रताड़ना और यौन उत्पीड़न की शिकायतों में इजाफा हुआ है। लेकिन यह भी सच है अब महिलाएं निर्भीक तरीके से शिकायतें भी कर रही हैं।