अविभाजित मध्यप्रदेश में सिंचाई और वित्त मंत्री रहे रामचंद्र सिंहदेव ने कभी सत्यजीत रे के साथ किया था। उन्होंने कई बंगला फिल्मों के लिए भी फोटोग्राफी की। श्री सिंहदेव फिल्म अभिनेत्री नरगिस को काफी पसन्द करते थे। उन्होंने फिल्मी दुनिया में फोटोग्राफी का काम करते हुए नरगिस की एक से बढ़कर एक सुन्दर तस्वीरें खींची। खैर.. मैं यहां रामचंद्र सिंहदेवजी के बारे में बताने नहीं आया। मैं आपको जानकारी देना चाहता हूं कि निजी तौर पर यदि कभी कोई मुझसे पूछेगा कि आपकी पंसदीदा हिरोइन कौन है तो मैं उससे यह जरूर कहना चाहूंगा कि मैं रजनीगंधा की विद्या सिन्हा और अंखियों की झरोखों की रंजीता पर मरता हूं।मन्नू भंडारी एक प्रसिद्ध कहानी यही सच है बासु चटर्जी ने वर्ष 1974 में फिल्म रजनीगंधा बनाई थी। यही सच है यदि अपनी जटिल भावभूमि और सघन किस्म की संवेदना के चलते जहां हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियों में शुमार की गई थी तो रजनीगंधा ने हिन्दी सिनेमा की कलात्मक और कामर्शियल विभाजन की सीमा को पहली बार तोड़ा था। रजनीगंधा पहली ऐसी फिल्म है जिसे फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला और क्रिटीक अवार्ड भी। योगेश के गीतों और सलिल दा के संगीत से सजी इस फिल्म में एक मध्यवर्गीय लड़की के मानसिक द्वंद को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया था। यह लड़की दो प्रेमियों के बंटी हुई थी। बहुत सारे लोग इस बात को नहीं जानते होंगे लेकिन यह हकीकत है कि जब फिल्म बन गई तो लगभग साल भर तक फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था। बाद में इस फिल्म का अधिकार ताराचंद बडजात्या ने खरीदा। फिल्म में अमोल पालेकर ने जो कमाल किया था सो किया था लेकिन विद्या सिन्हा ने जो कयामत ढाई थी वह गजब थी। सादगी सौंदर्य क्या होता है यदि आप इस रहस्य को जानना चाहते हैं तो आपको रजनीगंधा जरूर देखनी चाहिए। फिल्म में अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से विद्या सिन्हा ने जिस ढंग से प्यार उड़ेला है कि बस लगता है अभी और इसी वक्त जिन्दगी से कह दिया जाए-प्यारे मंजिल मिल गई।
इसी तरह राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म अंखियों की झरोखों को भी जब आप देखेंगे तो पाएंगे कि आप कही शांत तरीके से बहते चले जा रहे हैं। फिल्म बेहद हल्के-फुल्के ढंग से कालेज के एक परिसर से शुरू होती है लेकिन जब अंत होता है तो दर्शक का दिल बैठ जाता है। फिल्म में रंजीता ने एक ईसाई लड़की की भूमिका अदा की थी। इस लड़की के प्यार में पागल हीरो कब जिन्दगी की सच्चाईयों से सामना करने लगता है उसे पता ही नहीं चलता। फिल्म के अंत में वह जिस सच्चाई का सामना करता है वह है अपने सबसे प्रिय के दूर चले जाने का। जिन दिनों यह फिल्म आई थी मैं नया-नया ही कालेज पहुंचा था। कालेज पहुंचने के मैंने सबसे पहला काम रंजीता को खोजने का ही किया था लेकिन रंजीता नहीं मिली। जिन दो-चार लड़कियों से दोस्ती हुई वे सिर्फ इसलिए दोस्त बनी क्योंकि उन्हें कालेज के ड्रामे में रोल चाहिए था। कालेज में मेरा ड्रामे का एक ग्रुप था। बाद में यही ग्रुप कोरस भिलाई के नाम से जाना गया। अब इसे मेरे साथी चला रहे हैं। एक सच्चाई आपको और बताता हूं और वह यह कि मुझे जब कभी भी सर्दी-जुकाम होता है तो मैं विद्या सिन्हा और रंजीता को याद करता हूं। दोनों फिल्म में इन अभिनेत्रियों को सर्दी नहीं लगती लेकिन सर्दी-जुकाम के बाद लड़कियां कितनी खूबसूरत दिखती है, उस खूबसूरती का अहसास दिलाती है दोनों फिल्में। बहरहाल दोनों फिल्मों के गीतों का एक मुखड़ा यहां दे रहा हूं। गुनगुना लेंगे तो भी आपकी बेचैन रूह को रूह-आफजा मिल जाने का अनुभव होगा।
रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूं ही जीवन में
जैसे महके प्रीत पिया के मेरे अनुरागी मन में
हर पल मेरी इन आंखों में बस रहते हैं सपने उनके
मन कहता है मैं रंगों की एक प्यार भरी बदली बनके
बरसूं उनके जीवन में
अधिकार ये जबसे साजन का हर धड़कन पर माना मैंने
मैं जब से उनके साथ बंधी ये भेद तभी जाना मैंने
कितना सुख है बंधन में
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अंखियों के झरोखों से
मैंने देखा जो सांवरे
तुम दूर नजर आए
बड़ी दूर नजर आए
बंद करके झरोखों को
जरा बैठी जो सोचने
मन में तुम्ही मुस्काए
अंखियों के झरोखों से..
मैं जबसे तेरे प्यार के
रंगों में रंगी हूं
जगते हुए सोई रही
नींदों में जगी हूं
मेरे प्यार भरे सपने
कहीं कोई न छीन ले
दिल सोचके घबराए
अंखियों के झरोखों से..








