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Monday, August 30, 2010

रजनीगंधा और अंखियों के झरोखों से

अविभाजित मध्यप्रदेश में सिंचाई और वित्त मंत्री रहे रामचंद्र सिंहदेव ने कभी सत्यजीत रे के साथ किया था। उन्होंने कई बंगला फिल्मों के लिए भी फोटोग्राफी की। श्री सिंहदेव फिल्म अभिनेत्री नरगिस को काफी पसन्द करते थे। उन्होंने फिल्मी दुनिया में फोटोग्राफी का काम करते हुए नरगिस की एक से बढ़कर एक सुन्दर तस्वीरें खींची। खैर.. मैं यहां रामचंद्र सिंहदेवजी के बारे में बताने नहीं आया। मैं आपको जानकारी देना चाहता हूं कि निजी तौर पर यदि कभी कोई मुझसे पूछेगा  कि आपकी पंसदीदा हिरोइन कौन है तो मैं उससे यह जरूर कहना चाहूंगा कि मैं रजनीगंधा की विद्या सिन्हा और अंखियों की झरोखों की रंजीता पर मरता हूं।

मन्नू भंडारी एक प्रसिद्ध कहानी यही सच है बासु चटर्जी ने वर्ष 1974 में फिल्म रजनीगंधा बनाई थी। यही सच है यदि अपनी जटिल भावभूमि और सघन किस्म की संवेदना के चलते जहां हिन्दी की उत्कृष्ट कहानियों में शुमार की गई थी तो रजनीगंधा ने हिन्दी सिनेमा की कलात्मक और कामर्शियल विभाजन की सीमा को पहली बार तोड़ा था। रजनीगंधा पहली ऐसी फिल्म है जिसे फिल्मफेयर अवार्ड भी मिला और क्रिटीक अवार्ड भी। योगेश के गीतों और सलिल दा के संगीत से सजी इस फिल्म में एक मध्यवर्गीय लड़की के मानसिक द्वंद को बहुत खूबसूरती से उकेरा गया था। यह लड़की दो प्रेमियों के बंटी हुई थी। बहुत सारे लोग इस बात को नहीं जानते होंगे लेकिन यह हकीकत है कि जब फिल्म बन गई तो लगभग साल भर तक फिल्म को कोई वितरक नहीं मिला था। बाद में इस फिल्म का अधिकार ताराचंद बडजात्या ने खरीदा। फिल्म में अमोल पालेकर ने जो कमाल किया था सो किया था लेकिन विद्या सिन्हा ने जो कयामत ढाई थी वह गजब थी। सादगी सौंदर्य क्या होता है यदि आप इस रहस्य को जानना चाहते हैं तो आपको रजनीगंधा जरूर देखनी चाहिए। फिल्म में अपनी बड़ी-बड़ी आंखों से विद्या सिन्हा ने जिस ढंग से प्यार उड़ेला है कि बस लगता है अभी और इसी वक्त जिन्दगी से कह दिया जाए-प्यारे मंजिल मिल गई।

इसी तरह राजश्री प्रोडक्शन की फिल्म अंखियों की झरोखों को भी जब आप देखेंगे तो पाएंगे कि आप कही शांत तरीके से बहते चले जा रहे हैं। फिल्म बेहद हल्के-फुल्के ढंग से कालेज के एक परिसर से शुरू होती है लेकिन जब अंत होता है तो दर्शक का दिल बैठ जाता है। फिल्म में रंजीता ने एक ईसाई लड़की की भूमिका अदा की थी। इस लड़की के प्यार में पागल हीरो कब जिन्दगी की सच्चाईयों से सामना करने लगता है उसे पता ही नहीं चलता। फिल्म के अंत में वह जिस सच्चाई का सामना करता है वह है अपने सबसे प्रिय के दूर चले जाने का। जिन दिनों यह फिल्म आई थी मैं नया-नया ही कालेज पहुंचा था। कालेज पहुंचने के मैंने सबसे पहला काम रंजीता को खोजने का ही किया था लेकिन रंजीता नहीं मिली। जिन दो-चार लड़कियों से दोस्ती हुई वे सिर्फ इसलिए दोस्त बनी क्योंकि उन्हें कालेज के ड्रामे में रोल चाहिए था। कालेज में मेरा ड्रामे का एक ग्रुप था। बाद में यही ग्रुप कोरस भिलाई के नाम से जाना गया। अब इसे मेरे साथी चला रहे हैं। एक सच्चाई आपको और बताता हूं और वह यह कि मुझे जब कभी भी सर्दी-जुकाम होता है तो मैं विद्या सिन्हा और रंजीता को याद करता हूं। दोनों फिल्म में इन अभिनेत्रियों को सर्दी नहीं लगती लेकिन सर्दी-जुकाम के बाद लड़कियां कितनी खूबसूरत दिखती है, उस खूबसूरती का अहसास दिलाती है दोनों फिल्में। बहरहाल दोनों फिल्मों के गीतों का एक मुखड़ा यहां दे रहा हूं। गुनगुना लेंगे तो भी आपकी बेचैन रूह को रूह-आफजा मिल जाने का अनुभव होगा।

रजनीगंधा फूल तुम्हारे महके यूं ही जीवन में
जैसे महके प्रीत पिया के मेरे अनुरागी मन में


हर पल मेरी इन आंखों में बस रहते हैं सपने उनके
मन कहता है मैं रंगों की एक प्यार भरी बदली बनके
बरसूं उनके जीवन में


अधिकार ये जबसे साजन का हर धड़कन पर माना मैंने
मैं जब से उनके साथ बंधी ये भेद तभी जाना मैंने
कितना सुख है बंधन में

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अंखियों के झरोखों से
मैंने देखा जो सांवरे
तुम दूर नजर आए
बड़ी दूर नजर आए
बंद करके झरोखों को
जरा बैठी जो सोचने
मन में तुम्ही मुस्काए
अंखियों के झरोखों से..


मैं जबसे तेरे प्यार के
रंगों में रंगी हूं
जगते हुए सोई रही
नींदों में जगी हूं
मेरे प्यार भरे सपने
कहीं कोई न छीन ले
दिल सोचके घबराए
अंखियों के झरोखों से..

Saturday, August 28, 2010

सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना

संगीता स्वरुप जी अक्सर अपने ब्लाग पर ख्वाबों को लेकर कुछ न कुछ बेहतर लिखती है। मुझे उनमें एक बात जो सबसे अच्छी लगती है वह यह कि उनका यकीन अब भी ख्वाब देखने को लेकर बना हुआ है। सच तो यह है कि जो आदमी सपना नहीं देखता वह जिन्दा रहने के पहले ही अपने आपको खत्म  कर लेता है। पंजाबी के प्रसिद्ध कवि अवतार सिंह पाश ने भी कहा है कि सबसे खतरनाक होता है हमारे सपनों का मर जाना। 

कवि पाश की यह बात पूरी तरह से सच है क्योंकि एक सपना ही है जो हमें आगे बढ़ाता है, पीछे धकेलता है और रास्ता भी बताता है। अब सवाल यह है कि सपनों को हकीकत में बदलने के लिए क्या किया जाए। अव्वल तो पहले वही सपना देखना चाहिए जिस सपने से आपका आत्मीय रिश्ता कायम हो सकें। अब हेमामालिनी का सपना देखकर कोई यह सोचे कि उसकी बिटिया से ब्याह कर लेगा तो इसे सपना मानना भी गलत है। हर वह सपना जिसका उदेश्य पवित्र नहीं होता वह कभी पूरा नहीं होता। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है लेकिन हकीकत है कि डिस्को डांसर मिथुन चक्रवर्ती ने जब फिल्मों में प्रवेश किया था तब उन्होंने यह तय कर लिया था कि वे एक न एक दिन योगिताबाली से शादी करेंगे। बंगाली दादा का यह सपना कुछ सालों में ही पूरा हो गया।

जब कभी भी सपनों की बात की जाती है तो उसमें चुपके से लड़की का प्रवेश जरूर होता है। जैसा इस समय मैं कर रहा हूं,लेकिन अपने को बेहतर मुकाम तक पहुंचाने वाले मेरे मित्र का मानना है कि  जिस सपने कोई लड़की लिपिस्टिक की मांग के बजाए आपके आगे बढ़ने का इरादा लेकर प्रवेश करती है उसी दिन सपना पूरा हो जाता है। सपनों के पूरे होने को कुछ लोग मन्नत का पूरा होना भी कहते हैं। इसलिए सपनों को पूरा करने के लिए यह आवश्यक है कि आप बंद और खुली दोनों आंखों से सपना देखते रहिए । हां एक बात और सपना केवल आंखों से नहीं दिमाग में लगे लैस से भी देखा  जाता है। किसी शायर ने क्या खूब कहा है कि

ख्वाब जिने जवान होते हैं
वो बड़े भाग्यवान होते हैं.

जानिसार अख्तर ने भी क्या गजब ढाया है-
पता नहीं कि मेरे बाद उनपे क्या गुजरी
मैं चंद ख्वाब जमाने में छोड़ आया था.

डाक्टर राहत इंदौरी फरमाते हैं-
अपनी ताबीर के चक्कर में मेरा जागता ख्वाब
रोज सूरज की तरह घर से निकल पड़ता है.


कुमार ललित का यह शेर भी बड़े काम का है-
इस जलती धूप में चलने का मजा लो
चाहो तो कोई ख्वाब नया फिर से सजा लो.

दारा बानों ने क्या गजब लिखा है-
मैंने ये सोच के बोए नहीं ख्वाबों के दरख्त
कौन जंगल में लगे पेड़ों को पानी देगा 

तो मित्रों ख्वाबों को कोसना बेकार है। ख्वाब जब कभी भी आए उसके साथ बैठकर दो बातें जरूर करें। कम से कम इतना तो जरूर पूछ सकते हैं- क्यों आते हो दोस्त जब तुमको ये मालूम है कि मेरी नींद किसी मालिक ने गिरवी रख ली है। अब आ ही गए तो बता दो पानी के साथ गुड़ लोगे या बताशा.



Thursday, August 26, 2010

एक पोस्ट परिन्दों पर...

परिन्दें किसे अच्छे नहीं लगते। जो लोग कुदरत के इस अनमोल उपहार को पसन्द नहीं करते उनसे बड़ा बेवकूफ इस दुनिया में नहीं है। अभी हाल के दिनों में किसी मुंबईयां निर्माता ने लंफगे परिन्दे नामक फिल्म बनाई है। अव्वल तो मुझे लंफगे निर्माता की इस लंफगी हरकत पर ही आपत्ति है। भला बताइए अब कोई परिन्दा इधर-उधर उड़ रहा है। इस डाल से उस डाल पर बैठ रहा है तो क्या लंफगा हो जाएगा। लंफगे निर्माता को चाहिए था कि वह फिल्म का टाइटल रखने के पहले कम से कम नूर-तकी-नूर का शेर जरूर पढ़ लेता। नूर साहब ने क्या खूब लिखा है-

परिन्दों में तो ये फिरकापरस्ती भी नहीं देखी
कभी मंदिर पे जा बैठे, कभी मस्जिद पे जा बैठे।


परिन्दों को लेकर शायरों ने एक से बढ़कर एक बातें लिखी है। परिन्दों को लेकर जितनी भी बातें कही गई है उनमें कहीं न कही मनुष्य अपना दर्द भी खोजता है। कभी एकांत में यदि आप कवि प्रदीप का गीत -पिंजरे के पंछी रे... तेरा दर्द न जाने कोई सुनेंगे तो दिल भर आएगा। रफी साहब का गाया हुआ यह गीत भी कम दर्दनाक नहीं है- याद न जाए बीतों दिनों की... इसमें एक लाइन है- दिन जो पखेरू होते, पिंजरे में मैं रख लेता। पालता उनको जतन से मोती के दाने देता। सीने से रहता लगाए। सच तो यह है कि परिन्दें मनुष्य की हर हरकत के साथ खड़े हैं। मनुष्य की असीम जिजीविषा के परिचायक भी है परिन्दें। कुछ पंसदीदा शेर यहां दे रहा हूं। शायद आपको अच्छा लगे।

जाने कितनी उड़ान बाकी है
इस परिन्दें में जान बाकी है.
(राजेश रेड्डी)

हारे हुए परिन्दें जरा उड़ के देख तो
आ जाएगी जमीन पे छत्त आसमान की.
(नीरज)


छत्त पर नए परिन्दों से जब खुलकर बातें करनी हो
एक कटोरे में पानी दूजे में दाने रख देना
(अशोक वर्मा)


अनाज अपनी छत्तों पर जो सुखाना छोड़ देते है
परिन्दें उनके घर में आना-जाना छोड़ देते हैं
(रामप्रसाद बेखुद)


अंजाम उनके हाथ है आगाज करके देख
भीगे हुए परों से ही परवाज करके देख
( नवाज देवबंदी)

 हो ललक जिनमें जरा सी भी गगन छूने की
 हौसला ऐसे परिन्दों का बढ़ाते रहिए
 ( नाज)

ये किस अजीब सी दुनिया में आ गए हैं हम
जहां परिन्दें तो होते हैं, पर नहीं होते
 (राजेश रेड्डी)

आबो-दाना किसी बिगड़े हुए बच्चे की तरह
मैं जहां शाख पै बैठूं कि उड़ाता है मुझे
 ( राहत इंदौरी) 


 परों में सिमटा, तो ठोकर में था, जमाने की
  उड़ा तो सारा जमाना मेरी उड़ान में था
  (वसीम बरेलवी)


 हर शाख पे सहमे हुए बैठे हैं परिन्दे
 क्या कह के गई होगी हवा सोच रहा हूं
   (ताजदार ताज) 


 दो परिन्दें उड़े आंख नम हो गई
आज समझा कि मैं तुझको भूला नहीं
 ( खुमार बाराबंकवी)

Wednesday, August 25, 2010

जय हो उदय चोपड़ाओं की

अपनी हर दूसरी फिल्म में पंजाबी गानों के साथ लाल-पीले/ हरे-नीले फूलों का बगीचा दिखाने वाले यश चोपड़ा के सबसे छोटे बेटे का नाम है-उदय चोपड़ा। आज जब मेरे एक मित्र ने मुझे बताया कि वह उदय चोपड़ा पर कविता लिखने जा रहा है तो थोड़ी देर के लिए तो मैं भी चौक गया।  भला कोई उदय चोपड़ा पर कैसे वक्त बरबाद कर सकता है, लेकिन जब मित्र ने बताया कि हम सब उदय चोपड़ाओं के युग में सांस लेकर जीने के लिए मजबूर है तो मैं भी सोच में पड़ गया। मित्र जब यह बात कह रहा था तो उसका सारा जोर चोपड़ाओं को लेकर था। मैंने चोपड़ाओं को  बेहद पावरफुल तरीके से अभिव्यक्त करने का कारण पूछा तो उसने कहा कि जब मोहब्बत जैसा पवित्र शब्द मोहब्बतें हो सकता है तो फिर एक चोपड़ा बहुवचन में क्यों नहीं बदल सकता।

देखा जाए तो एक अमीर परिवार की बड़ी नाकामी का नाम है उदय चोपड़ा, लेकिन जब लोगों के पास पैसा होता है। बगैर दाढ़ी-मूंछ के थोड़ी सा कसरती बदन होता है  तो वे अपनी नाकामी को दबाने की भरपूर कोशिश करते रहते हैं।  सुपारी, मेरे यार की शादी है, नील एंड निक्की, प्यार इम्पासिबल, मुझसे दोस्ती करोगे जैसी कुछ फ्लाप फिल्मों में काम करने वाले उदय चोपड़ा को अब तक मात्र मोहब्बतें और धूम फिल्म में सफलता मिली है, लेकिन यह सफलता उसकी न होकर किसी और के खाते में ही गई है। मोहब्बतें में सारा श्रेय जहां शाहरूख खान और अभिताभ बच्चन ने ले लिया था तो धूम वन और टू में अभिषेक बच्चन, जान अब्राहम और रितिक रोशन ने बाजी मारी थी। हीरो मटेरियल न होने की वजह से उदय ने अब एक्टिंग के बजाए डायरेक्शन के क्षेत्र में भाग्य आजमाने का फैसला किया है। चर्चा है कि वे फिल्म धूम-थ्री का निर्देशन करने जा रहे हैं। वैसे उदय चोपड़ा ने  इससे पहले कहानी और पटकथा के क्षेत्र में भी भाग्य आजमाया था लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिली। प्यार इम्पासिबल नामक वाहियात सी फिल्म की कहानी उन्होंने ही लिखी थी और दुर्भाग्य की बात है कि इस फिल्म को दर्शकों का प्यार मिलना भी इम्पासिबल साबित हुआ।

अब बात मित्र द्वारा लिखी जाने वाली कविता को लेकर हो जाए। मेरा मित्र एक प्रसिद्ध कवि है। उसकी कविता अमूमन देश की सभी बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी है। मुझे लगता है कि मित्र उदय चोपड़ा के बहाने पूंजी के खेल को लेकर कोई सार्थक रचना करने वाला है। सच तो यही है कि आज  जिस किसी के पास भी  थोड़ा सा धन है वह रचनात्मक काम करने का शानदार ढोंग तो कर ही कर सकता है। हो सकता है कि मेरा मित्र  कम प्रतिभाशाली लोगों की चापलूसी के बाद  हासिल होने वाली पद और प्रतिष्ठा के बारे में कुछ लिखे।  मेरे मित्र ने  काफी पहले करिश्मा कपूर को लेकर भी एक कविता लिखी थी। कविता में जब उसने यह लिखा था कि और लोगों की तरह करिश्मा कपूर ने भी तय किया है कि वह रक्तदान करेंगी तो मुझे खूब हंसी आई थी। देखा जाए तो वाकई यह पूरा देश उदय चोपड़ाओं सरीखे लोगों के चलते ही बर्बाद हो रहा है। उदय चोपड़ा पर बात करते-करते मुझे याद आया कि मेरा एक कथित मित्र भी अपने आर्टिकल में दूसरों की कविता को ठूंस-ठूंसकर उसे अपना साबित करने का ढोंग करता रहा है। उसकी इस चौर्य प्रतिभा का जब  खुलासा  हो गया तो उसने लिखना ही बंद कर दिया। भले ही दूसरों ने यह भ्रम नहीं पाला कि वह एक अच्छा रायटर है लेकिन मित्र इस आत्ममुग्धता का शिकार तो है ही कि उससे बढि़या लेखक कोई और नहीं है। सचमुच उदय चोपड़ाओं की कमी नहीं है देश में। पर क्या उदय चोपड़ा ही है इस देश में। यह देश नवीन निश्चल, विजय अरोड़ा, धीरज कुमार, किरणकुमार और अनिल धवनों से भी  भरा पड़ा है। शायद चोपड़ाओं में इसी तरह के लोग आते होंगे। जय हो उदय चोपड़ाओं की।

Saturday, August 21, 2010

अखबार लाइन की कुछ मजेदार बातें

मित्रों आज मैं आपको अखबार लाइन की कुछ मजेदार बातों के बारे में बताने जा रहा हूं। इन मजेदार बातों से आप अपना मनोरंजन तो कर सकते हैं लेकिन यह सोचने के लिए भी स्वतंत्र है कि पीपली लाइव में जो कुछ दिखाया गया है वह गलत नहीं है। हकीकत तो यही है कि दूसरों के चेहरों पर तमाचा मारने वाला मीडिया कभी अपने चेहरे पर तमाचा मारकर खुद को जगाने का प्रयास नहीं करता है।

1-    मेरे एक परिचित बड़ी मुसीबतों में अखबार निकालते थे। एक रोज उन्होंने अपने एक संवाददाता को एक झोलाझाप डाक्टर के पास विज्ञापन लाने के लिए भेजा। अखबार छोटा था इसलिए संवाददाता को केवल पेट्रोल का खर्चा दिया जाता था। संवाददाता भी खुशी-खुशी विज्ञापन लाने चला गया। जब वह डाक्टर के पास पहुंचा तो उसे सबसे पहले इस सवाल का सामना करना पड़ा कि तुम्हारा अखबार निकलता कहां से है। संवाददाता ने अखबार के प्रकाशन की जगह के साथ उसकी प्रसार संख्या भी बता दी। लंबी बहस के बाद डाक्टर ने संवाददाता को यह कहकर भगा दिया कि जो संवाददाता अखबार में खबर से ज्यादा प्रसार संख्या का ख्याल रखता है उसके अखबार में विज्ञापन नहीं देना है। संवाददाता ने लौटकर अपने संपादक को नमक-मिर्च लगाकर यह बात बताई। अगले दिन अखबार में डाक्टर के निधन का समाचार उसके फोन नंबर के साथ छपा हुआ था। लोगों ने डाक्टर के घर फोन लगाना शुरू किया कि भाई डाक्टर कब अपने पीछे भरा-पूरा परिवार छोड़कर चला गया है। जब डाक्टर लगातार हो रही पूछताछ से परेशान हो गया तो उसने संपादक को झूठी खबर छापने के लिए फोन लगाया। डाक्टर का फोन आने के बाद संपादक ने क्या जवाब दिया जानते हैं।
जो डाक्टर हमारे अखबार को एक विज्ञापन के लायक नहीं समझता वह हमारे लिए मर ही गया है।
दूसरे दिन डाक्टर को अपने जीवित होने का एक विज्ञापन अखबार को देना पड़ा.

2-    धमाकेदार खबर छापने के लिए मशहूर एक संवाददाता पर उसका संपादक इस बात के लिए शक करता था कि हो न हो संवाददाता इधर-उधर से कमाता जरूर है। इस ऊपरी कमाई का पता लगाने के लिए उसने प्रेस के दूसरे संवाददाताओं के उसके पीछे लगा रखा था। दूसरे संवाददाता भी संपादक को धमाकेदार खबर छापने वाले संवाददाता के बारे में उल्टी-सीधी जानकारी दिया करते थे। एक रोज एक बेवकूफ किस्म के संवाददाता ने संपादक को समझाया- सर... अब तो हद हो गई है राजेश की। सीधे-सीधे प्रेस मे ही पैसा लेने लगा है। ये नहीं कि कहीं डील हो तो बाहर कर लें। बस सब कुछ आपकी आंख के नीचे हो रहा है और आप खामोश है। संपादक ने बेककूफ संवाददाता से पूछा कि हम प्रमाणित कैसे करेंगे कि राजेश पैसे खाता है।
कुछ नहीं सर जो लोग भी राजेश का नाम लेकर मिलने आते हैं बस उनसे बोलिए कि मैं ही राजेश हूं वे ही आपको पैसा निकालकर दे देंगे। संपादक को यह बात जंच गई। इस बीच राजेश से जलने वाले संवाददाताओं ने तय किया कि अपने परिचित के हाथों राजेश के नाम का एक लिफाफा संपादक के पास भेज देंगे। योजना अन्जाम तक पहुंचती इससे पहले कुछ लोग बड़ी शालीनता के साथ प्रेस पहुंचे और उन्होंने आते ही संपादक से पूछा- राजेश कहां मिलेगा। संपादक भरा बैठा था उसने भी आगुन्तकों से पूछा बताइए.. मैं ही हूं राजेश. क्या कुछ देना है राजेश को।
बस इतना सुनते ही एक शरीफ आदमी चिल्लाया- तो तू ही है राजेश। साले बहुत उल्टा-सीधा छापता है। तेरे को तो खुराक पानी देना ही है। बस फिर क्या था राजेश बनकर बात करने वाले संपादक की वो धुनाई हुई कि ... मामला पहले अस्पताल और बाद में पुलिस तक जा पहुंचा।

3-    अखबार लाइन में जितनी प्रतिस्पर्धा बाहर चलती है उससे कहीं ज्यादा भीतरी हिस्सों में जारी रहती है। एक बार एक वरिष्ठ संवाददाता की अपने संपादक से ठन गई। संपादक ने भी तय किया कि वह जूनियर से जूनियर रिपोर्टर की खबर को नाम देकर छापेगा और वरिष्ठ को मजा चखाकर रहेगा। बस जंग शुरू हो गई। जूनियर रिपोर्टर नाली-कचरे की भी खबर लेकर आते तो उनके नाम से छपती लेकिन वरिष्ठ संवाददाता की खबर को कहीं किसी कोने में फेंक दिया जाता था। सीनियर ने भी अपने संपादक को मजा चखाने का पक्का प्रबंध किया। एक बार इलाके में किसी महिला के साथ बलात्कार हुआ। जूनियर रिपोर्टर खबर लेकर आया- सर... बलात्कार हो गया है। खबर छपी- महिला के साथ बलात्कार........ लेकिन यह क्या खबर में यह भी छपा था कि इस मौके पर प्रदेश के गृहमंत्री भी अपने दलबल के साथ मौजूद थे। दरअसल वरिष्ठ संवाददाता ने जूनियर की कापी के अंत में एक गृहमंत्री के स्वागत समारोह का एक पन्ना कहीं से चिपका दिया था। बंवडर मचा और गृहमंत्री के दबाव के बाद संपादक को नौकरी से हाथ धोना पड़ा।
( टीप- ब्लाग जगत में लिखने-पढ़ने वाले कई ब्लागर पत्रकारिता के पेशे से जुड़े हुए हैं। यदि आपके पास कोई रोचक अनुभव हो तो जरूर लिखे.. शायद आपका यह अनुभव किसी दिन किसी मजबूर संवाददाता के  काम आ जाए.)

Friday, August 20, 2010

समझे बे.. घटिया प्रेमी

चूहामार दवाई खाने और
फिनायल पीने के बाद भी
जब दुनिया को जयहिंद करने से
बच जाता है एक घटिया प्रेमी
तब वह
शहर के एक गंदे से होटल के
वाहियात से पंखे पर
लटककर छोड़ जाता है
अखबारवालों के लिए काम


चांद-सितारों से बात करने वाली
एक लड़की के चेहरे पर
तेजाब डालने वाला एक घटिया प्रेमी

इस बात की पूरी कोशिश करता है कि
उसका खत
सत्यकथाओं का हिस्सा बन जाएं


 कई तरह के बलात्कारों को मिलाकर
नए प्रेम के सृजन का
दावा करने वाला एक घटिया प्रेमी
जब पहाड़ों पर जाकर चिल्लता है
हां.... मैं तुमसे प्यार करता हूं तो...
आवाज टकराकर लौट आती है

उसके पास ही.

पता नहीं क्यों
फरार हवाएं अपने मफलर में 
घटिया प्रेमियों का संदेश

लपेटकर ले जाना नहीं चाहती.


दो बाहों की रगड़-घस को ही 
एक पूरा जीवन मानता है
एक घटिया प्रेमी

अब... सुन ले बे.. घटिया प्रेमी
जिस तरह से देश के बारे में
गला फाड़-फाड़कर चिल्लाने से 

कोई माई का लाल 
देशभक्त नहीं बन जाता है 
 वैसे ही
उष्मा सी भरी हुई
किसी लड़की की छाती पर
सिर घुसाकर सोने से
कोई प्रेमी नहीं बन जाता है.




समझे बे.. घटिया प्रेमी

 

Thursday, August 19, 2010

एचएमटी चावल

एचएमटी चावल खूश्बूदार चावल होता है। यह चावल जिस किसी भी घर में पकता है तो आसपड़ोस को इस बात का पता चल ही जाता है कि कहीं खूश्बूदार चावल पक रहा है।
मेरा एक मित्र इस खूश्बूदार चावल का उदाहरण देते हुए कहता रहता है कि दुनिया में जिस आदमी के भीतर अपनी ऊर्जा से अर्जित की हुई नैसर्गिक प्रतिभा मौजूद रहती है वह दुविधाओं को चीरता हुआ अपना मुकाम बना ही लेता है। अर्थात जो आदमी अपने संघर्षों से कुछ अर्जित करेगा उसके लिए किसी भी तरह की चुनौती मुश्किल नहीं है।
पता नहीं आप मेरे मित्र की बात से कितने सहमत है लेकिन मैं अपने मित्र की बात को बहुत महत्व देता हूं। मित्र ने काफी संघर्ष किया है। आज से कुछ अरसा पहले तक मित्र अपने पिता के साथ झोले में किताब भर-भरके दुकानदारों को किताब बेचा करता था लेकिन अब स्वयं एक बहुत बड़ा प्रकाशक है। यकीन नहीं होगा लेकिन शिक्षा जगत की चार सौ से ज्यादा किताबें उसके पास रजिस्टर्ड है। उसका अपना एक बड़ा कारोबार है। काफी लोगों को कामकाज देने के बाद भी मित्र सरल है और अपने साथ-साथ दूसरों के बारे में भी सोचता है।
यह बात आज यहां मैं इसलिए कर रहा हूं कि पिछले दो चार महीनों में मुझे कुछ ऐसे उदाहरण देखने को मिले हैं जिसे देखकर हंसी भी आई और मैं यह सोचने को मजबूर भी हुआ कि जिन्होंने ढंग से दो हजार रूपए कमाना भी नहीं सीखा है वे कितने घमंडी है। मेरा एक परिचित अपनी धूर्तता से लगातार तरक्की कर रहा है लेकिन अपने आफीस से जैसे ही वह बाहर निकलता है लोग उसे गालियां देना शुरू कर देते हैं। इसी तरह मेरे एक अन्य परिचित की कला जो पूरी तरह मौलिक भी नहीं है उसे इस बात का गुमान हो गया है कि वह दुनिया का सबसे बड़ा आर्टिस्ट है। हालांकि वह खुद भी जानता है कि दो-चार आड़ी-टेड़ी रेखाओं को इधर-उधर कर लेने से वह एमएफ हुसैन नहीं बन जाएगा लेकिन वाह रे घमंड।
इस तथाकथित हुसैन के बारे में विस्तार से बातें तो फिर कभी करूंगा लेकिन एचएमटी चावल यानी खूश्बू, चिराग, दीपक को लेकर कुछ शेर एक बार फिर लिख रहा हूं। आशा है आपको पसन्द आएंगे।

हमें चराग समझकर बुझा न पाओगे
हम अपने साथ कई आफताब रखते हैं
(राहत इंदौरी)


जहां रहेगा वहीं रोशनी लुटाएगा
किसी चराग का अपना मकां नहीं होता
(वसीम बरेलवी)


चराग हो के न हो दिल जला के रखते हैं
हम आंधियों में भी तेवर बला के रखते हैं
(हस्ती)


हम से इस बात पे कुछ लोग बहुत नाखुश है
हम  चरागों को हवाओं में भी जला देते हैं
(डाक्टर अंजना संधीर)


हमने एक शाम चरागों से सजा रक्खी है
शर्त लोगों ने हवाओं से लगा रक्खी है
(वाली आसी)


वो तो खूश्बू है हवाओं में बिखर जाएगा
मसअला पूल का है वो किधर जाएगा
(परवीन शाकिर)

Sunday, August 15, 2010

सच-झूठ, दोस्त और दुश्मन

क्या आपको नहीं लगता कि हमें उन लोगों का शुक्रगुजार होना चाहिए जो लगातार झूठ बोलते हैं। यदि झूठ बोलने वाले नहीं होते तो शायद हमें सच की कीमत का अन्दाजा भी नहीं होता। इसी तरह हमें धोखा देने वालों का भी शुक्रिया अदा करना आना चाहिए। धोखा देने वाले भले ही यह सोचकर खुश हो लेते हैं कि जिसको मजा चखाना था उसे मजा चखा लिया लेकिन हकीकत तो यही है कि वे खुद भी शानदार ढंग से मजा चख रहे होते हैं।

कुछ समय पहले मेरे एक दोस्त को एक वेबसाइड बनानी थी। दोस्त ने अपने भरोसे के एक आदमी को यह काम सौंप दिया। इधर-उधर घुमाने के बाद आधी-अधूरी वेबसाइड सामने तो आई लेकिन वह इस काम की नहीं थी कि उसे लांच किया जा सकता था। मात्र पांच हजार रूपयों के लिए एक मित्र ने दूसरे मित्र को जो धोखा दिया उससे वेबसाइड बनवाने वाला दोस्त संभल गया. एक दिन मित्र ने मुझसे कहा कि अच्छा हुआ भाई पांच हजार रुपए चले गए... मैं तो अपने दोस्त पर लाखों खर्च करने की सोच रहा था।

 लगभग छह माह पूर्व मेरा एक दोस्त चैनल का काम छोड़कर प्रिंट से जुड़ना चाह रहा था। मैंने जब उससे पूछा कि अच्छी पोजीशन पर होकर वह चैनल का काम क्यों छोड़ना चाहता है तो उसने इलेक्ट्रानिक चैनल की लगातार बद्तर हो रही स्थिति को लेकर लंबा सा भाषण पिलाया। मित्र ने अपने चैनल के मालिकों को जमीन पर कब्जा करने वाला और अपने तात्कालीन बास को कई मामलों में संदिग्ध गतिविधियों में लिप्त बताया। यहां तक बड़े बास के लिए लड़कियां उपलब्ध करवाने वाला भी बताया लेकिन बाद में पता चला कि उसने चैनल छोड़ा नहीं बल्कि निकम्मेपन की वजह से चैनलवालों ने ही छंटनी की सूची में उसका नाम डाल दिया था। छंटनी में निपटने से पहले मित्र ने माहौल बनाया और अपना रास्ता बना लिया। हालांकि जो रास्ता उसने बनाया वहां भी वह अपनी हरकतों की वजह से विवादों में है। खबर है कि अब मित्र एक बार फिर नया रास्ता बनाने की तैयारी में है लेकिन हरकतों की जानकारी सब तरफ हो गई है फलस्वरूप उसे कोई घास नहीं डाल रहा है। आखिर दिल्ली होती ही ऐसी है। 

कुछ दिनों पहले मेरा एक दोस्त एक डिजाइनर का दुखड़ा लेकर मेरे पास आया। दोस्त ने मुझे बताया कि वह छत्तीसगढ़ी फिल्में बनाता है, प्रचार-प्रसार के लिए उसने डिजाइनर को पैसे दिए थे लेकिन न तो प्रचार हुआ और न ही प्रसार। डिजाइनर ने सारे पैसे हड़प लिए. बाद में दोनों के बीच एक ढाबे में जमकर विवाद हुआ। अब डिजाइनर दोस्त नए मुर्गे की तलाश में निकल पड़ा है और सुना है कि दिल्ली में कोई फैशन शो करने वाला है।
मित्रों सच-झूठ, दोस्ती-यारी, धोखे को लेकर शायरों ने कमाल का लिखा है। इन शायरों को यदि हम पढ़ते रहे तो कभी तकलीफ नहीं पाएंगे। जैसे जिसके साथ किताबें हो वह जीवन में कभी अकेला नहीं होता उसी तरह नीचे दिए गए पंक्तियों को यदि आपने घोंटकर पी लिया तो यकीन मानिए आपको कभी कोई कष्ट नहीं होगा।
इन शेरों को ढूंढकर आप तक पहुंचाने का काम करने की प्रेरणा देने के लिए दिल्ली में मौजूद एक महिला मित्र का आभारी हूं।

1-    सिर्फ खंजर ही नहीं आंखों में पानी चाहिए
       ए खुदा दुश्मन भी मुझको खानदानी चाहिए
        (राहत इंदौरी)

2-    पुराने वक्तों में भी दुश्मनी थी
       मगर माहौल जहरीला नहीं था
       ( अजहर इनायती)

3-    यकीन है कई दोस्त आएंगे जद में
       मैं दुश्मनों के चेहरे अगर बेनकाब करूं
       ( अहमद उस्मानी)


4-     दोस्ती जब किसी से की जाए
        दुश्मनों की भी राय ली जाए
        (राहत इंदौरी)


5-     तन्हा तो नहीं हूं दुनिया में
       दुश्मन ही सही, इक यार तो है।
       ( जमील हापुड़ी)


6-     दोस्ती ने छींन ली, कुछ दुश्मनी ने छीन ली
        थोड़ी-थोड़ी जिन्दगी मुझसे सभी ने छीन ली
        (रामप्रसाद बेखुद)

7 -   जब न होश हमको, दुश्मनी से डरते थे
      अब जो होश आया है दोस्ती से डरते हैं
      (खुमार बाराबंकवी)


8-    कुछ बात है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी
       सदियों से रहा है दुश्मन दौरे-जहां हमारा
       (डाक्टर इकबाल)


9-    झूठ और सच लगता है एक सिक्के के दो पहलू हैं
        झूठ न हो तो सच की कीमत कौन भला बतलाएगा
        (केके नाज)


10-    वो झूठ बोल रहा था बड़े सलीके से
          मैं एतबार न करता तो और क्या करता
         (वसीम बरेलवी)


11-     अजब मयार था, सच बोलने वालों की महफिल का
           जो देखा तो जमाने भर का झूठा आगे-आगे था
           (रामप्रसाद बेखुद)


12-        झूठ के बाजार में ऐसा नजर आता है सच
             पत्थरों के बाद जैसे कोई शीशा देखना
              (हस्ती)


13-         झूठ हारेगा, जीतेगा सच एक दिन
             ये भरोसा मुझे दर-ब-दर ले गया
             (बीआर त्रिपाठी)


कभी-कभी फिल्म के गाने भी आपको ऊर्जा देते हैं। एक पुरानी फिल्म का गीत मुझे बहुत अच्छा लगता है। आप भी कभी समय निकालकर सुने। मुझे यकीन है स्याह रातों में यह गीत आपकी नजर वहां जरूर ले जाएगा जहां एक दीया जल रहा होगा।

क्या मिलिए ऐसे लोगों से
जिनकी फितरत छिपी रहे
नकली चेहरा सामने आए
असली सूरत छिपी रहे

Saturday, August 14, 2010

तो बेहतर होगा...

मित्रों जब मैं स्कूल में पढ़ता था तब प्रार्थना के दौरान एक दिन मेरे ही सहपाठी ने एक कविता का पाठ किया था. मैं शायद गलत नहीं हूं तो यह कविता सर्वेश्वरदयाल सक्सेना की थी. मुझे पूरी कविता तो याद नहीं लेकिन एक पंक्ति अब भी परेशान करती है. पंक्ति थी- देश कोई कागज का नक्शा नहीं होता. अब तो बात काफी पुरानी हो गई है लेकिन फिर यह लाइन दिलो-दिमाग से जाने का नाम नहीं लेती है.इधर-उधर की तमाम बातों पर गौर करने के बाद पाता हूं कि वाकई कवि सक्सेना साहब ने ठीक हीं लिखा है.
ये देश किसी भी प्रधानमंत्री से बड़ा है
ये देश हर सही आदमी के भीतर धड़कता है
और ये देश मेरा है कोई कागज का नक्शा नहीं कि जिसे आजादी को अधूरी बताने वाले लोग जब चाहे फाड़कर आपस में बांट लें.
काफी पहले इस भाव को ध्यान में रखकर एक कविता लिखी थी. उम्मीद है आपको अच्छी लगेंगी

तो बेहतर होगा...


मजहबी चश्मा पहनने की बात
न करो तो बेहतर होगा
मुझे पता है
तमाम बिरादरी के साथ-साथ
चमकती धूंप के 

मोहक रंगों पर भी
कालिख पोतने का
आदेश देने वाले हो तुम एक दिन


तुम कौन होते हो मुझे
अपनी पंसन्द की वेशभूषा बताने वाले
तुम्हारे दिए हुए कपड़े तो
मैं कभी पहनता ही नहीं
तुम्हारे सुझाए गए कपड़ो पर भी

यकीन नहीं है मेरा
इसलिए...

खास  तरह के कपड़े पहनने की बात
न करो तो बेहतर होगा
मुझे पता है
जिस दिन मैं तुम्हारे हिसाब के

कपड़े पहन लूंगा
उसी दिन
एक कमरे को बदल डालोंगे
चार कमरों में 


ये मुझसे मत पूछो कि
सुलगते सवालों पर

अब क्यों नहीं सुलग रहा हूं मैं

जब सुलगा था
 तो तुम करने लगे थे
बांटने/ छांटने/ काटने की बात
.




मैंने घर का चूल्हा जलाने के लिए

चिन्गारी क्या निकाली
तुमने मेरी झोपड़ी के साथ
फूंक डाला था कई जिन्दगियों को

ये मत समझना कि
मैं कभी कुछ बोलूंगा ही नहीं
और कभी चिल्लाऊंगा भी नहीं
एक दिन मैं वो सब  करूंगा
जो तुम कभी सोच भी नहीं सकते


फिलहाल तो मुट्ठियों को भींचकर
मैं इतना ही कह सकता हूं  कि
जिस भीड़ में चलते हुए
तुमने मेरी जेब में ठूंसी थी माचिस
और सिर पर रखवाया था मिट्टी तेल का पीपा
मैं अब उस भीड़ का हिस्सा बनने से
इन्कार करता हूं.

Thursday, August 12, 2010

भागो भूत आया...


मैं पिछले कुछ दिनों से लगातार यह सोच रहा था कि आज नहीं तो कल माइक पकड़कर चैनलों में एक ही बात को पचास बार बोलने वाले मीडियाकर्मियों के बारे में लिखूंगा लेकिन चाहकर भी मौका नहीं मिल पा रहा था. दूसरा डर यह भी था कि कुछ मित्र नाराज भी हो जाएंगे, लेकिन अब सोचता हूं कि किसी के नाम का उल्लेख किए बगैर मैं बड़ी तेजी से पनप चुकी प्रवृति पर ही कुछ लिख डालूं। वैसे यह बात शायद पचासों बार लिखी जा चुकी है लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि शायद मैं कुछ नई बात आपको बता सकूं। मैं आपको यह जानकारी बिन्दुवार दे रहा हूं-

1-    चैनल में काम करने वाले प्रत्येक रिपोर्टर को यह भ्रम होता है कि वह जो कुछ भी जानकारी दे रहा है वह एकदम नई है और उसने ही सबसे पहले ब्रेक की है.

2-    आत्ममुग्धता का शिकार रिपोर्टर बार-बार.. जैसा कि आप देख रहे है.. निश्चत तौर पर.. मैं जहां खड़ा हूं... सच तो यह है कि... जैसे शब्दों का कई बार इस्तेमाल करता है।

3-    जब टीवी में बैठी किसी खूबसूरत नवयौवना को यह समझ में नहीं आता कि अब आगे क्या सवाल पूछा जाए तो वह अपने बचाव के लिए सबसे प्यारा शब्द इस्तेमाल करती है- लगता है हमारा संपर्क टूट गया है।

4-    चैनल के रिपोर्टर को बाइट के लिए काफी मेहनत करनी पड़ती है। वे पहले से ही यह दिमाग बनाकर घर और दफ्तर से निकलते हैं कि फलां आदमी से किस तरह की बाइट चाहिए। यदि किसी ने उनके मन के मुताबिक बाइट नहीं दी तो वे ऐन-केन-प्रकारेण इस बात की पूरी कोशिश करते हैं कि सामने वाले के मुंह में अपने शब्द ठूंस दे।

5-    एक बार एक चैनल में एक महिला एंकर रिपोर्टर से जो सवाल पूछ रही थी वह इस प्रकार है-
हां... अमित बताओ विमान कहां पर गिरा
जी.. वनविभाग का अमला पता लगा रहा है
अमित बताओ कुल कितने लोग मरे है
जी कोई नहीं मरा क्योंकि विमान रिमोर्ट से संचालित हो रहा था, उसमें कोई सवार नहीं था
जी.. यह तो अच्छी बात है कि कोई हताहत नहीं हुआ लेकिन आसपास तो कोई हताहत हुआ होगा
जी.. अभी-अभी मेरी वनविभाग के सबसे बड़े अफसर से बात हुई है, इस अफसर ने मुझे बताया है कि विमान कही भी गिरा होगा तो कुछ नुकसान नहीं होगा क्योंकि उसे सांइस कालेज में पढ़ने वाले कुछ छात्रों ने माडल के तौर पर बनाया था.
हम अपने दर्शकों को और ताजा जानकारी देते रहेंगे कि कौन हताहत हुआ.. मिलते है एक ब्रेक के बाद.

6-    कुछ समय पहले गलती से एक रिपोर्टर चैनल की दुनिया से उठकर अखबार की दुनिया में आ गया. आते ही उसने अपने मातहतों को आदेश दिया कि हमें लाइव रिपोर्टिंग करनी है। जब प्रिंट मीडिया के पत्रकारों ने यह जानना चाहा कि लाइव रिपोर्ट किसे कहते हैं तो चैनलकर्मी ने बताया कि जैसे किसी दवाई दुकान में यदि कोई दुकानदार 25 पैसे का मधुर मुनक्का बेच रहा है तो हमें दवा दुकान के सामने मुनक्के को हाथ में पकड़कर खड़ा हो जाना है और फिर अपने छायाकार से कहना है कि फोटो खींच ले। इससे खबर लाइव हो जाएगी। लाइव करने के चक्कर एक अखबार के रिपोर्टर दुकानदारों के हाथों पीटते-पीटते बचे।

7-    खबरों के चलाते समय चैनलकर्मी यह नहीं देखता कि उसका जनजीवन और लोगों पर क्या असर पड़ने वाला है। एक बार ( यह घटना छत्तीसगढ़ की है) एक चैनलकर्मी ने अपने चैनल में यह खबर चलाई कि पांच-पांच रूपए में बेची जा रही है थ्री इडियट्स। दूसरे दिन पुलिस ने राजभवन के पास फुटपाथ पर सीडी बेच रहे लोगों को दौड़ना प्रारंभ किया। कई लोग पुलिस के हत्थे चढ़े। जिन लोगों के पुलिस ने पकड़ा उनमें से एक विकलांग भी था जो अपने परिवार के भरण-पोषण के लिए सीडी बेचने का काम किया करता था।

8-    छत्तीसगढ़ में एक चैनल का कर्मचारी खबरें कम और अपने मालिकों के लिए वीआईपी पास बनाने में ही लगा रहता है। इस कर्मचारी की डयूटी ही मात्र इतनी है कि वह सीएम हाउस और राजभवन में प्रवेश का पास बनाएं। बहुत संभव है ऐसे हालात और जगहों पर भी हो.

9-    आंदोलन और भीड़ को कवरेज करने वाले ज्यादातर पत्रकार भीड़ की अगुवाई करने वाले लोगों को बताते है कि उन्हें क्या करना चाहिए। एक बार एक चैनलकर्मी आंदोलन करने वालों को सलाह दे रहा था कि भाइयों जब तक शानदार विजुअल नहीं होगा तब तक मजा नहीं आएगा। आप लोग मंहगाई पर आंदोलन कर रहे हैं तो आलू-प्याज, लौकी की माला पहनिए। सबको बात जम गई। कुछ ही देर में आंदोलनकारी सब्जी-भाजी को लपेटकर चिल्ला रहे थे- केंद्र सरकार हाय-हाय।

10-    चुनाव के दौरान तीन-चाह तरह के मुहावरे काफी उछलकूद मचाते रहते हैं। एक मुहावरा तो राजस्थान की रेत पर चलने वाले विशालकाय जानवर ऊंट से ही जुड़ा हुआ है। चुनाव के दौरान ऊंट तो लेखक और पत्रकारों से विचार-विमर्श करने के बाद ही करवट लेता है। चुनाव में शंखनाद हो जाने, डुगडुगी के बज जाने का जिक्र भी खूब होता है, लेकिन इधर चैनलकर्मी बिगुल शब्द का इस्तेमाल करने लगे है। इडियट बाक्स के लिए काम करने वाले कर्मचारियों को लगता है कि शायद बिगुल कभी भी बज सकता है और इसके बजते ही सब कुछ पलट भी सकता है। चुनाव के दौरान जब कभी आप टीवी देखे तो यह जरूर गौर करें कि बिगुल शब्द का इस्तेमाल कौन सा रिपोर्टर कितनी बार करता है। रिपोर्टर जिस क्षेत्र में जाता है तो बिगुल ही बजाता है।

11-    बाकी ऊपर पवन का कार्टून बता रहा है कि चैनलकर्मियों की समझ कितनी विकसित हो पाई है। वर्ष 2000 में जब छत्तीसगढ़ का गठन हो रहा था तब अफसरों, नेताओं और लोगों को लगता था कि चैनलवाले कुछ कमाल करेंगे लेकिन अब चैनलवालों को कोई गंभीरता से नहीं लेता। छत्तीसगढ़ में किसी भी चैनल में एक रिपोर्टर ऐसा नहीं है जिसकी प्रस्तुति को जनसामान्य का दिल जीतने वाली माना जा सकें। यहां के रिपोर्टरों को देखते ही लोग, पुरानी फिल्म भागो भूत आया की सीडी-कैसेट ढूंढने निकल पड़ते हैं। ऐसा और जगह भी होता होगा यह तय है। चैनल में काम करने वाले रिपोर्टर ही खुद बताते हैं कि वे अब पत्रकार कम क्लर्क ज्यादा हो गए हैं।
(कार्टूनिस्ट पवन के प्रति आभार)

Sunday, August 8, 2010

1947 का एक अखबार

आज मैं जिला पंचायत में अध्यक्ष रहे अपने मित्र अशोक बजाज से मिलने गया था. इधर-उधर की चर्चाओं के बाद श्री बजाज ने मुझे द टाइम्स आफ इंडिया की फोटो प्रति भेंट की। यह फोटो प्रति कई मायनों में ऐतिहासिक निकली. दरअसल जिस अखबार की फोटो प्रति दी गई थी वह उस रोज प्रकाशित हुआ जब देश आजाद हुआ था। 15 अगस्त 1947 को खुली हवा में सांस लेने का दिन शुक्रवार था। बांबे से निकले टाइम्स आफ इंडिया की कीमत दो आने थी। इस अखबार में जो सबसे खास बात थी वह यह थी कि पंडित जवाहरलाल नेहरू को पहली खबर के लायक समझा गया था। ऐसा नहीं था कि प्रथम पृष्ठ में महात्मा गांधी का जिक्र नहीं था. अपने बापू का भी एक खबर में उल्लेख था लेकिन सिंगल कालम में उनके बारे में यह बताया गया था कि वे उपवास रख रहे हैं। अखबार का यह पृष्ठ यह साबित करता है कि भारतीय मीडिया प्रारंभिक दिनों से सत्ता के करीब रहने का गुर जानता था।

सच तो यह है कि कुछेक संस्थानों को छोड़ दे तो मीडिया आज भी सत्ता की चौखट पर याचक की मुद्रा में खड़ा हुआ ही नजर आता है। किसी को सत्ता से विज्ञापन चाहिए तो किसी को तेल का कारखाना खोलने के लिए जमीन। नवधनाढ्य सेठ-साहूकारों ने जब से अखबार का धंधा खोला है तब से उनकी जरूरतें भी बेहद पूंजीवादी हो गई है। अभी कुछ दिनों एक चैनल में काम करने वाले मेरे एक मित्र ने जानकारी दी कि छत्तीसगढ़ में एक व्यापारी ने सिर्फ इसलिए चैनल प्रारंभ किया क्योंकि उसे बड़े सम्मान के साथ सीएम हाउस में प्रवेश नहीं मिल पा रहा था। चैनल खोलने के बाद व्यापारी के यहां काम करने वाले इसलिए परेशान हो गए है क्योंकि अब सीएम हाउस का प्रवेश भी प्रतिबंधित हो गया है और राजभवन में जाने के लिए तो डेली का पास बनता ही नहीं है। खैर आप अखबार को देखिए और विचार करिए कि जिस मीडिया को आप लोकतंत्र का चौथा खंबा समझ रहे हैं वह खंबा क्या सचमुच में सीधा खड़ा है।

Saturday, August 7, 2010

बोलो तुम क्या कर सकते हो...

दोस्तों आज से कुछ समय पहले जब मैं एक टीवी के लिए काम कर रहा था तब एक बार मुझे कवर्धा पैलेस जाने का अवसर मिला था। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से मात्र 140 किलोमीटर की दूरी पर मौजूद कवर्धा पैलेस। रानी दुर्गावती के सेनापति महाबलि सिहं से लेकर योगेश्चवरराज सिंह ( 12 वीं पीढ़ी) तक का इतिहास समेटे हुए हैं यह पैलेस।

पैलेस का अपना गौरवशाली इतिहास, अतीत सब कुछ है.. बस नहीं है तो आवाम की मौजूदगी। मंहगाई की मार के चलते कवर्धा पैलेस इन दिनों एक होटल में बदल गया है। होटल भी ऐसा-वैसा नहीं कि कोई भी आया और किराया देकर रूक गया। यहां ठहरने के लिए पहले आपको इत्तला देनी होगी। जब आपके बारे में छानबीन हो जाएगी तब आपको न केवल पैलेस में ठहरने का मौका मिलेगा बल्कि हो सकता है कि राजा-महाराजाओं की बची हुई पीढ़ी में से कोई आपके साथ भोजन भी ग्रहण करें। पंखा झेलते हुए सेवकों और राजा-महाराजाओं के वंशजों के बीच भोजन का आनन्द आपको एक नए किस्म के रोमांच में डाल सकता है।

कवर्धा कुल 805 वर्गमील क्षेत्र में फैला हुआ है। अकेले 12 एकड़ क्षेत्र में पैलेस स्थित है। राजा-महाराजाओं के चले जाने के बाद उनके महल सरकारी कार्यालयों का हिस्सा बनकर रह गए है। कवर्धा पैलेस का एक बड़े हिस्से में भी सरकारी दफ्तर लगता है लेकिन अब भी एक ऐसा पैलेस बचा हुआ है जो दर्शनीय है।

महाबलि सिंह, उजियार सिंह, टोकसिंह, बहादुर सिंह, रूपकुंवर, गौरकुंवर, राजपाल सिंह, पदुमनाथ सिंह, देवकुमारी, धर्मराज, विश्वराज के बाद जब योगेश्वरराज के ऊपर पैलेस की जवाबदारी आयी तो उन्होंने अपने पुरखों से मिली समृद्ध विरासत को एक नई पहचान देने का काम किया। पैलेस में लगभग तीन सौ तरह की तलवारें मौजूद है। इसके अलावा युद्ध में प्रयुक्त आने वाली 35 बंदूके, कई जानवरों के सिर, बेशकीमती कपड़े, टोपियां, छड़ियां, सोने-चांदी के बर्तन, छुरी और कांटो का अनोखा संग्रह भी है।  पैलेस में एक दरबार हाल है जो प्रवेश करते ही आकर्षित करता है। इसके अतिरिक्त आफीस लांउज, स्टेट डायनिंग हाल और लगभग 12 लोगों के ठहरने के लिए बनाया गया कमरा देखने योग्य है।

कभी कवर्धा स्टेट का एक बड़ा हिस्सा भोंसले के कब्जे में था। बाद में जब राजा धर्मराज सिंह के पास आया तब उन्होंने इसकी देख-रेख पर ध्यान देना प्रारंभ किया। पैलेस के भीतर जितनी भी लकड़ी प्रयुक्त हुई है वह बर्मा देश की है। सारे मार्बल इटैलियन है जबकि कुछ पत्थर कवर्धा के पास मौजूद सोनबरसा गांव से मंगवाए गए हैं। एक अनुमान है कि पैलेस के रख-रखाव के लिए हर साल 10 लाख रुपए खर्च होते हैं।

कवर्धा पैलेस से राष्ट्रीय पार्क कान्हा की दूरी मात्र 95 किलोमीटर है। जो देसी-विदेशी पर्यटक कान्हा जाने के इच्छुक रहते हैं वे एक बार कवर्धा पैलेस में जरूर रूकते हैं। मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ में विधायक रहे योगीराज बताते हैं कि वर्ष 1991 में महल को पैलेस के रूप में बदल दिया गया था। योगीराज के मुताबिक पर्यटकों के आने से जो आय होती है उसका उपयोग बैगाओं के इलाज के लिए किया जाता है। उल्लेखनीय है कि इस क्षेत्र में एक अति प्राचीन जनजाति बैगा की उपस्थिति भी कायम है। सरकारी योजनाओं का लाभ नहीं मिल पाने के कारण बैगा जनजाति का समुचित विकास नहीं हो पाया है। आज भी यह जनजाति झाड़-फूंक पर भरोसा रखती है।
यह बात कोई ठीक-ठाक नहीं बता सकता है कि सत्यमेव जयते की शुरूआत कब हुई और भारत सरकार ने इसे अपना स्लोगन कब बनाया लेकिन यह तय है कि कवर्धा स्टेट की राजपत्रित मुहरों में लिखा होता था-सत्यमेव जयते।

पैलेस की विभिन्न कोणों से शूटिंग करने के बाद अपने कैमरामेन के साथ जब मैं पैलेस से बाहर निकला तो यही सोच रहा था कि जिनके पास खूब पैसा है क्या वे ही लोग पैलेस में ठहर सकते हैं। क्या आवाम की मौजूदगी केवल चित्रों में रहेगी। जी... हां... पैलेस की दीवारों पर कई ऐसे चित्र लटके हुए है जो गरीबी और मुफलिसी का बेजोड़ नमूना है। पैलेस में एक आदिवासी कक्ष भी है जिसमें विदेशियों को लुभाने का हर सामान मौजूद है। आज जबकि एक बार मैं कवर्धा पैलेस को याद कर रहा हूं मुझे बैगा आदिवासी का वह चित्र याद आ रहा है जो एक चित्र में खड़े होकर मुझसे सवाल पूछ रहा था- रिपोर्टर यह तो बताते जाओ, हमें यहां क्यों कैद कर रखा है। क्या हम चिडियाघर के लिए बने है। हम तो जिन्दा इतिहास है... हमें यहां से बाहर निकालने के लिए बोलो तुम क्या कर सकते हो।

एक बार फिर मैं निरूतर हो गया हूं.

Friday, August 6, 2010

मछलियों को भरोसा है उन्हें कोई नहीं मारेगा


हमारी यह आदत है कि हम अच्छी या बुरी किसी भी तरह की खबर को तब तक प्रमाणित नहीं मानते जब तक उसे चार अन्य लोगों के मुंह से सुन नहीं लेते। सच तो यह भी है कि हमारे आसपास सूचनाओं का जो विस्फोट हो रहा है वह हमें किसी एक माध्यम पर यकीन करने भी नहीं देता है। संवेदनशीलता के घट जाने से विश्वास का जो संकट पैदा हुआ है उसे लेकर फिलहाल चिल्ल-पौ मची हुई है। कुल मिलाकर बाजारी संस्कृति ने हमारे दाएं हाथ को भी बाएं हाथ पर भरोसे के लायक नहीं छोड़ा है। संकट के ऐसे गहरे समय में छत्तीसगढ़ के रायगढ़ इलाके में भगत तालाब की मछलियों को इस बात का भरोसा है कि उन्हें कोई नहीं मारेगा।

मछलियों का यह यकीन यूं ही कायम नहीं हुआ।

दरअसल खरसिया रायगढ़ का भगत तालाब लगभग दो सौ साल पुराना है। इस तालाब को हरियाणा के व्यापारी महारामदास रामशरण भगत ने बनाया था। कहा जाता है कि रामशरण भगत ने तालाब में विभिन्न प्रजातियों की ढेरों मछलियां पाली थी। मछलियों को वे निरन्तर दाना डाला करते थे। धीरे-धीरे मछलियों को भी श्री भगत के हाथों दाना खाने की आदत हो गई। श्री भगत की देखा-देखी अन्य लोगों ने भी मछलियों को दाना डालना प्रारंभ किया और फिर देखते ही देखते आलम यह हो गया कि जो कोई भी तालाब की तरफ घूमने जाता वह अपने साथ लाई, मुर्रा व अन्य खाद्य सामाग्री जरूर ले जाता। मछलियों को दाना खाता देखकर बच्चे व महिलाएं खुश होती रही। मछलियों से लोगों की दोस्ती इस कदर बढ़ गई है कि उन्होंने तय कर लिया कि बस भगत तालाब की मछलियों को नहीं मारेंगे। कोई एक मछली अपनी स्वाभाविक मौत भी मरती तो लोग उसकी अंतिम क्रिया उसी तरह से करते जैसे उनके परिवार का कोई सदस्य उनसे बिछुड़ गया हो।

एक मर्तबा एक व्यक्ति ने तालाब की मछली को आग में भूनकर खाने का काम किया था लेकिन बताते हैं कि कुछ दिनों के बाद उसकी मौत भी हो गई। मछली मारकर खाने वाले आदमी की मौत के बाद तो लोगों में यह भी खौफ बैठ गया कि जो कोई भी तालाब की मछलियों को मारेंगा उसके साथ कोई न कोई अनहोनी हो सकती है। अब तो आलम यह है कि तालाब में मछलियों की नई-नई किस्मों के साथ बूढ़ी मछलियां भी शानदार ढंग से विचरण करती है। तालाब में सौ-दौ सौ किलो वजन की मछलियां भी मौजूद है। गलती से यदि कोई मछली तालाब से बाहर निकल आती है तो लोग उसे पक़ड़कर तालाब के भीतर डाल देते हैं। ऐसा नहीं है कि रायगढ़ के लोग मछलियां नहीं खाते, वे मछलियां खाते हैं लेकिन भगत तालाब की नहीं।

यदि आप कभी छत्तीसगढ़ आना चाहे तो रायगढ़ जरूर जाए। यह इलाका महाराजा चक्रधर की नगरी के नाम से विख्यात है। यहां कही प्राचीन शैलचित्र है तो कत्थक की एक शानदार समृद्धशाली परम्परा का वास भी यही है।
मित्रों.. समय-समय पर में आपको छत्तीसगढ़ की कुछ नई जानकारियों से अवगत कराता रहूंगा। आप अपना स्नेह बरकरार रखेंगे इसकी उम्मीद है मुझे।

Thursday, August 5, 2010

बेटियों की आड़ में

मित्रों काफी दिनों के बाद लौटा हूं. इस बीच ब्लाग जगत में क्या कुछ होता रहा इसका पता नहीं चल पाया. उम्मीद करता हूं कि सब कुछ ठीक-ठाक रहा होगा और ऐसा कुछ नहीं हुआ होगा जिससे लोगों को यह कहने का मौका मिला होगा कि ब्लाग जगत के लोग अपरिपक्व है.
खैर... काफी दिनों से मेरी नजर घर में पड़े हुए एक झोले पर लिखी एक कविता पर टिकी हुई थी. हर बार यही सोचता रहा कि आज नहीं तो कल इस झोले को लेकर कुछ लिखूंगा लेकिन चाहकर भी ऐसा अवसर नहीं निकाल पाया था. आप भी झोले पर अंकित कविता को गौर से देखे. झोले पर जो कविता लिखी है वह इस प्रकार है-

बोए जाते हैं बेटे, उग जाती है बेटियां
खाद-पानी बेटों में पर लहलहाती है बेटियां
एवरेस्ट पर ठेले जाते हैं बेटे, पर चढ़ जाती है बेटियां
रूलाते हैं बेटे, और रोती हैं बेटियां
पढ़ाई करते हैं बेटे, पर सफलता पाती है बेटियां
कुछ भी कहें पर अच्छी हैं बेटियां


बेटियों के साहस को लेकर लिखी गई यह कविता निश्चित तौर पर शानदार और जानदार है. एक झोले में कविता के प्रकाशन को लेकर मेरी कोई आपत्ति नहीं है, मेरा कहना मात्र इतना है कि इतनी शानदार किस्म की कविता के बीच अंडरगारमेन्टस के विक्रेता ने ब्रा, पेन्टी, नाइटी और गाउन का जो विज्ञापन किया है वह थोड़ा कष्ट देता है. कविता का इतना गंदा इस्तेमाल तो मैंने कभी नहीं देखा. हो सकता है कि पिज्जा खाने वाली पीढ़ी के बीच मैं थोड़ा पुराने ख्यालों का नजर आऊं लेकिन फिर भी मुझे लगता है कि न तो बेटियों के लिए कविता इस ढंग से बेची जानी चाहिए और न ही कविता की आड़ में ब्रा-पेन्टी की बिक्री होनी चाहिए. हो सकता है कुछ लोग मेरे ख्यालात से सहमत हो और कुछ नहीं भी.

मित्रों वर्षा होजियारी वाले की दुकान जैन ज्योति काम्पलेक्स, अल्का रेस्टोरेंट के सामने, आरएस शुक्ला रोड़ रायपुर में स्थित है. इस दुकान के संचालक ने क्या सोचकर इतनी अच्छी कविता का इतना भद्दा इस्तेमाल किया है यह तो वह ही जाने लेकिन मुझे यह कहने में कोई गुरेज नहीं है कि जो लोग आज बेटियों का बहाना लेकर चीजों को बेच रहे हैं एक दिन वे.... खतरनाक बाजार की खतरनाक मांग पर कुछ और भी कर सकते हैं. हो सकता है कि मेरी शंका निर्मूल हो, क्योंकि टीवी में तो कुछ लोग वेस्पर बेच ही रहे हैं. एक औरत जो कभी दाढ़ी नहीं बनाती वह भी ब्लेड़ का विज्ञापन करती हुई नजर आती ही है.
खैर... हाल-फिलहाल मैं उस बेटी के बारे में सोच रहा हूं जो आज नहीं तो कल औरत बन जाएगी. कोई बेटी जब औरत हो जाएगी और गलती से लेखिका हो जाएगी तब पुलिस की वर्दी पहनकर कोई विभूतिनारायण निकलेगा और उसे......... बोलकर अपनी वर्दी पर एक और स्टार लगा लेगा.
आखिर कब बंद होगा एक औरत का इस्तेमाल...