पाठकों मैं जानता हूं कि आपको लगातार कष्ट हो रहा है. एक तो मैं आपको रूक बाबा रूक जैसा गाना सुना रहा हूं तो दूसरा कष्ट यह भी है कि आप विभिन्न ब्लागों पर जाकर जो टिप्पणी कर रहे हैं वह नजर नहीं आ रही है. शायद किसी तकनीकी दिक्कत की वजह से ऐसा हुआ है. धान के देश को संचालित करने वाले ब्लागर जीके अवधिया जी से जब मेरी इस बारे में बातचीत हुई तो पता चला कि कुछ साल पहले कुछ घंटों के लिए ऐसी घटना हो चुकी है. आरंभ वाले भाई संजीव तिवारी ने भी माना कि कोई तकनीकी दिक्कत सामने आई है. ललित डाट के ललित शर्माजी भी इस घटना पर आश्चर्यचकित है. टिप्पणियों को खा जाने वाले मामले को लेकर उच्चारण के श्री रूपचंद शास्त्रीजी ने तो पोस्ट भी लिखी है. मेरे ब्लाग पर अब भी कुछ टिप्पणियां ही प्रदर्शित हो रही है. पता नहीं बाकी शुभकामनाएं कहां चली गई है.
खैर.. अब एक बार फिर मैं आपको लिए चलता हूं नागलोक की ओर

हम विश्रामगृह लौट आए थे. कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था. मैंने शैलू और सुधीर से कहा कि वह आराम कर ले सुबह जल्दी उठकर कवरेज के लिए निकलना है. वाहन चालक से जब मैंने कहा कि वह भी विश्रामगृह के एक कक्ष का इस्तेमाल कर सकता है तो उसने जवाब दिया-अरे नहीं साहब आप लोग पेपर लगाकर सो जाइए.. मैं कांच बंद करके गाड़ी के भीतर ही आराम करूंगा. जान तो हो जहान है
.विश्रामगृह के भीतर दो पलंग मौजूद थे. एक पलंग पर शैलू और सुधीर सो गए जबकि दूसरे पर मैं लेट गया. मैं जिस पलंग पर लेटा था उसमें मच्छरदानी लगी हुई थी.अपने आपको मच्छरदानी के बीच पाकर मैं इस बात के लिए खुश था चलो यदि सांप आया भी तो कम से कम काटेगा नहीं. कक्ष की लाइट जली हुई थी. कहते है न आदमी दिनभर में जो कुछ सोचता है वह सपने में देखता है. रात दो से तीन बजे के बीच मैंने जो सपना देखा वह बहुत भयानक था. मैंने देखा कि मैं सांपों के बीच घिर गया हूं. सांप मुझे काटने के लिए दौड़ा रहे हैं. मैं बचाओ-बचाओ चिल्लाते हुए अजय शर्माजी के घर के पास पहुंच गया हूं. यहां आकर देखता हूं कि घर में ताला लगा हुआ है. मैं भागकर विश्रामगृह पहुंचता हूं. सांप यहां भी मेरा पीछा करते हुए आ जाते हैं. मैंने दरवाजा बंद कर रखा है लेकिन सांप दरवाजे पर फुंफकार मारते हुए बैठे हुए हैं-देखते हैं बेटा कब तक भीतर छिपा रहेगा. मैं पुलिस को फोन लगाता हूं.वहां से जवाब मिलता है- क्या आप सचमुच सांपों से घिर गए हैं. जब मैं उन्हें बताता हूं कि हां वाकई मेरी जान खतरे में हैं तो वे बताते हैं कि उनके थाने को भी सांपों ने घेर रखा है. मैं कमरे के चारों ओर नजर दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि सुधीर और शैलू सो रहे हैं. ये साले कब आ गए सोचता हूं. मैं उन्हें जगाता हूं, लेकिन यह क्या... दोनों के मुंह से झाग निकल रहा है. मैं ऊपर खुली हुई खिड़की की ओर देखता हूं, मुझे सांप का आधा हिस्सा नजर आता है.
मैं हड़बड़ाकर उठ जाता हूं. सुधीर और शैलू को उठाता हूं. शैलू मेरे सपने की कहानी सुनकर सहम जाता है. अचानक मुझे लगता है कि मैं अपने साथियों को बिलावजह ही भयभीत कर रहा हूं. मुझे एक अच्छी स्टोरी करनी है. यदि साथी ही डरे हुए रहे तो अच्छा काम नहीं हो पाएगा. मैं तय करता हूं शैलू को तो डराने का काम करूंगा ही लेकिन स्टोरी को कवर करने के बाद.
हम लोग सुबह ही तैयार होकर बैठ गए थे. चौकीदार सुबह के नाश्ते में हम सबके लिए पोहा ले आया था.सुबह आठ बजे जब शर्माजी हमारे बीच आए तो थोड़ा परेशान थे. पूछने पर उन्होंने बताया कि पड़ोस के किसी घर में सांप घुस गया था उसे निकालने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी है.
अब हम शर्माजी के साथ सेमरताल गांव जा रहे थे. इस गांव के बारे में शर्माजी ने मुझे बताया था कि वहां दो लड़कियां ऐसी रहती है जो जड़ी-बूटियों के सहारे सांप को पकड़ने का काम करती है. इस गांव में पहुंचने के बाद पता चला कि एक ग्रामीण का बेटा सर्पदंश से दो दिन पहले ही मरा था लेकिन ग्रामीण अपने बेटे की अंतिम क्रिया करने के बजाए उसका इलाज झाड़-फूंक से कर रहा था. मैंने सुधीर से कहा कि वह इसके शाट बना लें. जब हम लाश के करीब पहुंचे तो वहां हमने बड़े-बड़े बाल वाले दो बैगाओं को देखा. शायद यह बैगा झाड़-फूंक कर रहे थे. लाश के पास एक तसला, कांसे की थाली, तांबे का पैसा, जली हुई लकड़ी और नीम की पत्तियां पड़ी हुई थी. कैमरे को देखते ही बैगा अपने फार्म में आ गया. वह उछलकूद करने लगा. एक सर्पाकार जैसी छड़ी से उसने हमारी भी धुनाई की. लाश बदबू मारने लगी थी फलस्वरूप हम ज्यादा देर तक वहां नहीं रूक सकें.
जब हम ग्रामीण की झोपड़ी से बाहर निकले तो शर्माजी ने बताया कि फरसाबहार और तपकरा इलाके में डाक्टर और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी हमेशा बनी रही है. कभी डाक्टर अस्पताल में मिलता है तो दवाई नहीं मिलती और यदि दवाई मिलती है तो डाक्टर नहीं मिलता. स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण झाड़-फूंक से ही सर्पदंश का इलाज करते हैं.
मैंने शर्माजी से जानना चाहा कि जब ग्रामीणों को यह पता है कि झाड़फूंक से उनके अपने मर ही जाते हैं तो फिर वे अंधविश्वासी क्यों बने हुए हैं.जवाब में शर्माजी ने बताया कि कभी किसी मामूली जहर वाले सांप के काटने से कोई ठीक हो गया होगा तो ग्रामीणों को लगता है कि जब फलां गांव का आदमी ठीक हो सकता है तो फिर दूसरा क्यों ठीक नहीं हो सकता. श्री शर्मा ने बताया कि काफी पहले फरसाबहार थाने के प्रभारी बीपी अहिरवार ने लोगों को सर्पदंश से बचाने के लिए एक अभियान चलाया था लेकिन उनके जाने के बाद यह अभियान ठंडा पड़ गया. श्री अहिरवार ने ग्रामीणों को जमीन के बदले खाट पर सोने के लिए प्रेरित किया था इसके अलावा घर-घर में रस्सी ( ताकि सांप काटने के बाद उस हिस्से को बांधा जा सकें जहां से जहर शरीर के दूसरे हिस्से में न चढ़ सकें) और ब्लेड़ का वितरण भी किया था. इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया था लेकिन कुछ दिनों के बाद सब समाप्त हो गया. एक थानेदार ने जो किया सो किया, सरकार ने भी नागलोक में बसने वाले सांपों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जशपुर में स्नेक पार्क बनाने केंद्र को एक प्रस्ताव भेजा था लेकिन यह प्रस्ताव भी कई सालों से धूल खा रहा है. यदि केंद्र यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेता तो शायद यहां भी सांपों का जहर निकाला जा सकता था। यह सर्वविदित है कि एक सर्प के एक मिलीग्राम जहर की कीमत पंद्रह से बीस हजार रूपए के आसपास होती है. यह जहर असाध्य से असाध्य रोगों के इलाज में उपयोगी साबित होता है. कई खतरनाक किस्म के चर्म रोगों के इलाज में भी यह जहर काम आता है. यदि केंद्र ने राज्य सरकार के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी तो तय मानकर चलिए कि हर रोज एक से डेढ़ हजार सांपों का जहर आसानी से निकाला जा सकेगा. इस मंजूरी से ग्रामीणों को सांप पकड़ने का रोजगार भी मिल जाएगा.
जशपुर के एक बड़े हिस्से में भले ही लोग सर्पदंश का शिकार होकर मर रहे हैं लेकिन यह भी हकीकत है कि यदि इन इलाकों में सर्प नहीं हुए तो लोग भूखे मर जाएंगे। अजय शर्मा मानते है कि यदि नागलोक इलाके के सांपों को एक ही दिन में मार दिया जाएगा तो वहां की खेती चौपट हो जाएगी. दीमक और चूहे खेती को बरबाद करते हैं जबकि इन्हें खाकर सांप एक तरह से खेती की रखवाली ही करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस इलाके में जितने सांप पाए जाते हैं उससे ज्यादा तो यहां दीमकों के टीले हैं. कहा जाता है कि सांपों को जशपुर का वातावरण इसलिए सुहाता है क्योंकि रेतीली भूमि होने की वजह से यहां पर्याप्त ठंडकता कायम रहती है. जिले में करैत, कोबरा, चित्ती, महिराज, पहाड़चित्ती, छलांग लगाकर दौड़ने वाला सांप जाड़ा, ढोडिया, धामिन, दूधनाग और अजगर की भरमार है. जशपुर वनमंडल ने मुकेश इंगले नामक एक शोधकर्ता से जो सर्वे करवाया है उसके मुताबिक इलाके में सीतालटी, बिल्ली सांप, पानी सांप, सामान्य अंधे, धामन, भेडिया, कुकरी, कांसे के रंग वाला पेड़ सांप, दबोइया और बैंडेड करैत तो इलाके में बहुतायत है. कहा जाता है कि करैत का काटा हुआ पानी नहीं मांगता है. आदिवासी बहुत क्षेत्र जशपुर में इस बात का प्रमाण मिलता है कि यह क्षेत्र शैव उपासकों का गढ़ था. इस क्षेत्र के मजदूर आज भी नदी की रेत छानकर उसमें सोने का कण ढूंढने का काम करते हैं. सेठों और धनपतियों ने यह अफवाह फैला रखी है कि जहां सोना-चांदी, हीरा-मोती होगा वहां उसकी रक्षा सांप करेंगे. सांप उसे ही काटेगा जिसकी रक्षा सोना हड़पने की होगी. यही एक वजह है कि यहां के मजदूर रेत में सोना तलाशते हैं और औने-पौने दामों में सेठ-साहूकारों को सोने का विक्रय कर देते हैं. ग्रामीणों के बीच यह मान्यता भी कायम है कि खाट या तख्त पर सोने से देवता नाराज हो जाते हैं या फिर शरीर दुर्बल हो जाता है. अतः वह जमीन पर सोना पंसद करते हैं और मौत को निमंत्रण दे डालते हैं. बताते हैं कि करैत पहले कभी व्यक्ति को नहीं काटता. जमीन पर सोया व्यक्ति करवट बदलता है या फिर हाथ-पांव हिलाता है तो करैत हमले की आशंका से उसे काट लेता हैं. जशपुर में जितनी अधिक ठंडक रहती है उससे अधिक गर्मी भी पड़ती है. तेज धूप से बचने के लिए सर्प दीमक की बांबियों में चले जाते हैं. इन्ही बांबियों में करैत की मादा अंडे देती है और फिर जैसे ही वर्षा की पहली फुहार पड़ती है सैकड़ों की संख्या में रेंगते हुए सपोले बाहर निकल आते हैं. जिसे जहां जगह मिलती है भागता है. सर्प झोपडियों में शरण ले लेते हैं और फिर शुरू हो जाता है नागलोक में मौत का तांडव. वर्षा ऋतु में दीमकों के टीले ढहने के उपरांत सांपों को भोजन के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है. शिकार की तलाश में निकले मृत्यु के ये दूत, पांव से दबने, बाधित होने पर काट लेते हैं.
खैर.. अब हमारे सामने वह लड़कियां उपस्थित होने वाली थी जो किसी जड़ी-बूटी के सहारे सांपों को पकड़ने का काम करती थी. गांव के सरपंच ने हमारे बैठने के लिए दो खाट की व्यवस्था कर दी थी. एक छायादार पेड़ के नीचे हमारी खाट लगी हुई थी और अवंती और रंभावती नाम की दो जवान लड़कियां टीवी कैमरे के सामने अपना जौहर दिखाने को तैयार थी. सांप-सांप और केवल सांप के बारे में सोच-सोचकर मैं इतना ज्यादा परेशान हो चुका था कि मुझे लड़कियों की आंखे भी भूरी-भूरी सी लगने लगी थी. मैं श्रीदेवी की फिल्म नगीना की याद करने लगा. मैं फिल्म के हिट होने के कारणों के बारे में सोच ही रहा था कि दोनों लड़कियों ने झट से अपने ब्लाउज के भीतर हाथ डाला और दो सांपों को निकालकर हमारी ओर उछाल दिया. सांप हमारे ऊपर तो नहीं गिरा लेकिन हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई. बाद में लड़कियों ने हमें बताया कि उनके पास गरूड़ जड़ी है जिसकी खूश्बू से सांप उनके वश में हो जाता है. मुझे गरूड़ जड़ी पर यकीन तो नहीं हुआ लेकिन यह जरूर सोचता रहा कि साला..ब्लाउज के भीतर सांप क्या करता होगा.
मैं जानता हूं आप मुस्कुरा रहे हैं.. सोच रहे होंगे साला लेखक बदमाश है. हकीकत तो यही है मित्रों कि जिसे आप पढ़ रहे हैं उसका जीवन कई तरह के खट्टे-मीठे रंगों से भरा हुआ है. कभी आपको नक्सलियों के साथ पांच दिन व्यतीत करने और वहां हुई गोलीबारी की घटना के बारे में भी जरूर बताऊंगा.
खैर.. कुछ और गांवों को घूमने के बाद हमें इलाके में उड़ीसा के बरगढ़ क्षेत्र से आया हुआ एक आदमी मिला. नाम था-कविलास सिदार. श्री सिदार ने बताया कि वह अक्सर सांपों को पकड़ने के लिए फरसाबहार आता है। उसके चेले भी यही काम करते हैं। सांपों को पकड़कर क्या करते हैं पूछने पर उसने बताया कि एक आदमी उससे आकर मिलता है वह उसे एक से दो हजार रूपए लेकर सांप बेच देता है। सिदार की बातों ने इस बात को पुष्ट कर दिया कि क्षेत्र से खासा जहर उगलने वाले सांपों की जमकर तस्करी भी हो रही हैं।
हमारी स्टोरी पूरी हो चुकी थी. कैमरे में कई तरह के सांप कैद थे ( हाल-फिलहाल जो फोटो प्रकाशित हुए हैं वह गुगल से साभार लिए गए हैं) हम शर्माजी को धन्यवाद देकर लौट रहे थे. हमने तय किया था कि अब दोपहर का भोजन नागलोक से बाहर निकलकर ही करेंगे. जल्द से जल्द नागलोक छोड़ देने की सूचना से शैलू बहुत खुश था लेकिन मैं उसे थोड़ा और परेशान करना चाहता था. रास्ते में कुछ सपेरों ने हमारी गाड़ी को हाथ देकर रोका. मैंने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए सपेरों को गाड़ी में बिठा लिया. अब हम सब सांपों के साथ चल रहे थे.रास्ते में सपेरों ने बताया कि उनके पास चार सांप ऐसे हैं जिनका जहर निकाला जा चुका है लेकिन दो सांप ताजा-ताजा पकड़े गए हैं जिनका जहर निकालना बाकी है. शैलू... मुझे कोसता हुआ सहमा-सहमा सा बैठा रहा. जब सपेरे हमें धन्यवाद देकर गाड़ी से उतर गए तब जाकर वह थोड़ा नार्मल हुआ. गाड़ी जब सपेरों को छोड़ने के बाद थोड़ा आगे बढ़ी तब अचानक सुधीर चीखा- अरे... साला.. सपेरे अपने दोनों सांप तो यही छोड़ गए हैं. शैलू की आंखे फट गई.. उसने गुस्से में गाड़ी रूकवा दी और वह दूसरी गाड़ी से घर पहुंचने की धमकी देने लगा. काफी मिन्नत के बाद हमारे साथ जाने को तैयार तो हो गया लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते तक उसे बुखार चढ़ चुका था.