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Sunday, July 25, 2010

नई पोस्ट नहीं लिख पाने का अफसोस

आप हर रोज मेरे ब्लाग पर आते हैं यह जानने के लिए कि आज मैंने नया क्या लिखा है, लेकिन पिछले दो-चार दिनों से आपको निराशा हो रही है. सच कहता हूं मुझे भी नई पोस्ट नहीं लिख पाने का अफसोस है. दरअसल मेरे मित्र ललित शर्मा, संजीव तिवारी, जीके अवधिया, अजय सक्सेना और श्याम कोरी उदय ने आपको अपनी पोस्टों के जरिए यह सूचना तो दे ही दी है कि मेरी किताब जिसका शीर्षक ही बिना शीर्षक है उसका प्रकाशन हो गया है. इस किताब का विमोचन 30 जुलाई को विधानसभा के सांस्कृतिक कक्ष में होना है.  मैं इस आयोजन की तैयारी में लगा हुआ हूं. इस बीच रायपुर में ही मेरे मित्र संजय शेखर जो साधना चैनल से जुड़े हुए है ने नक्सल हिंसा, लोकतंत्र और मीडिया जैसे विषय को लेकर एक राष्ट्रीय परिचर्चा का आयोजन कर लिया था. मुझे इस कार्यक्रम में बतौर संचालक अपनी सेवाएं देनी थी सो आप सबसे बातचीत नहीं हो पाई.


मित्रों मेरी शुरू से ही यह धारणा रही है कि जो भी आपके चाहने वाले होते हैं आप उन्हें निराश मत करिए. मुझे भविष्य में राजनेता नहीं बनना है इसलिए किसी भी कीमत पर इसे मेरा राजनीतिक बयान न समझा जाए लेकिन फिर भी मेरा भरोसा यह रहा है कि जो आपके शब्दों पर यकीन करने लगते हैं उनका यकीन किसी भी हाल में नहीं टूटना चाहिए। कुछ समय तक जब मैं लेखकों के गिरोह ( लेखक संगठन) से जुड़कर लिखना-पढ़ना किया करता था तब कोई न कोई झंडा और उसका डंडा मेरे सामने रहता था लेकिन जबसे मैंने यह जाना है कि लेखन सिर्फ दो ही प्रकार का होता है ( अच्छा या बुरा) तो मैं ज्यादा सुखी हो गया हूं.


आप सब मुझे ई-मेल के जरिए यह जानने की कोशिश कर रहे हैं कि मैं हाल-फिलहाल क्यों नहीं लिख रहा हूं.अपने चाहने वालों की इस जिज्ञासा से भला कौन उल्लू का पट्ठा खुश नहीं होगा. आपकी इस खोज-खबर से मैं अभिभूत हूं..... और हां ज्यादा अभिभूत तो किताब के प्रकाशित हो जाने को लेकर हूं. वजह यह भी है कि पत्रकारिता में कभी रूकने का समय नहीं मिलता. थोड़ी सांस लेने की एक पतली सी गली बनी तो मैंने भी लिखे-पढ़े को समेटकर एक नहीं चार किताबों की पांडुलिपि तैयार कर ली. पहली किताब तो आ गई है दूसरी किताब बंद गली का प्रकाशन भी अगस्त में हो जाना है जबकि तीसरी व चौथी किताब में मेरे वे नाटक हैं जिनका मंचन कई रंग संस्थाओं ने किया है. 

मैं अपने बारे और बहुत ज्यादा विस्तार से इसलिए नहीं बता सकता क्योंकि आत्ममुग्धता नाम के एक वायरस से मैं बचे रहना चाहता हूं. यह वायरस बहुत खतरनाक होता है... अच्छे-अच्छों की वाट लगा देता है.इस वायरस के चलते मैंने बड़े-बड़े लेखकों को पागल होकर कपड़े फाड़ते हुए देखा है. राजधानी रायपुर में कार्यरत कई कथित तोपचंद किस्म के पत्रकारों की भी स्थिति भी ऐसी ही है. मैंने अमकां कर दिया.. मैने ढमकां कर दिया है.. मैं पिछले कई सालों से स्वयंभू हूं . मैं यहां का अध्यक्ष हूं मैं वहां का सचिव हूं. मैं जब लिखता हूं तो सरकार हिल जाती है. लेट जाती है...का राग वही आदमी अलापता है जो भीतर से कहीं उथला- कमजोर और असुरक्षित होता है. ईश्वर की बड़ी कृपा और आप सबकी शुभकामनाओं से मैं अब तक आत्ममुग्धता नाम की बीमारी से बचा हुआ हूं. आगे भी बचा रहा हूं इसकी कामना कीजिएगा. यह सब इसलिए भी संभव हो पाया है क्योंकि जीवन में जिन श्रेष्ठ किस्म के मूर्धन्यों  का सानिध्य मिला है उन्होंने मुझे यही सिखाया है कि आलोचनाओं का वार छाती पर सहो और प्रशंसा की धौल पीठ के पीछे. ( ऊपर एक जगह मैंने खुश शब्द लिखा है... खुश होने और आत्ममुग्ध होने में फर्क है)

आप सबसे मैं 30 जुलाई के बाद ही मुलाकात कर पाऊंगा. किताब के विमोचन समारोह में आप सब भी पहुंच पाएंगे तो मुझे अच्छा लगेगा. इस बारे में और बहुत ज्यादा विस्तार से मेरे मित्र ललित शर्मा, संजीव, अवधियाजी, श्यामकोरी और अजय ही बताएंगे.  आपका प्यार, स्नेह मुझ पर बरसता रहेगा इसकी कामना है... वैसे मुझसे कभी कोई पूछेगा कि इस दुनिया से कूच करने से पहले तुम्हारी अंतिम इच्छा क्या होगी तो मेरा जवाब होगा- बस... एक बार मैं सबसे गले मिलकर रोना चाहूंगा और प्यार में डूबकर मरना.  आप सबका शुक्रिया.

Thursday, July 22, 2010

प्रभाष परंपरा की रचनात्मक पहल शुरू !

अंबरीश कुमार 
कल रात उस जमात पर लिखने बैठा जिसने कुछ सालों पहले पूरे देश में गणेश जी को दूध पिला दिया था .इनके  दुष्प्रचार तंत्र का यह सबसे रोचक उदाहरण रहा है.तभी दो जानकारी मिली .उस पोस्ट को रोक दिया है .पता चला कि भगवा रंग में रंगा प्रभाष परंपरा न्यास ने काम शुरू कर दिया .  कैंसर से जूझ रहे साथी आलोक तोमर को धमकाने की कोशिश  की गई तो अपनी जिस बहू सुप्रिया को आशीर्वाद देने एक्सप्रेस समूह के संस्थापक राम नाथ गोयनका खुद गए थे उनके खिलाफ एक न्यासी के गुमास्ते ने अश्लील टिप्पणी एक साईट पर की .आज ही रामनाथ गोयनका को उनके नाम पुरूस्कार देकर याद भी किया जा रहा है . 
यह सूचना मै कुछ लोगों से विशेष तौर पर बाँटना चाहता हूँ जो प्रभाष जोशी के साथ  सालों रहे है . सबकी खबर ले -सबकी खबर दे ,का नारा गढ़ने वाले कुमार आनंद  से जिन्हें प्रभाष जी इंतजाम बहादुर कहते थे .दिल्ली में इंडियन एक्सप्रेस एम्प्लाइज यूनियन के  मेरे चुनाव में जब एक खेमे ने प्रभाष जोशी के लिए अपशब्द  का इस्तेमाल किया तो कुमार आनंद ने उन लोगों पर गुस्से में हाथ उठा दिया था और फिर जो हिंसा हुई उसमे कई घायल हुए और कुमार आनंद ने झुकने की बजाय इस्तीफा दे दिया था .कुमार संजय सिंह जो आलोक को अपना छोटा भाई बताते है और एक्सप्रेस यूनियन के मौजूदा अध्यक्ष अरविंद उप्रेती को भी जिन्होंने उस दिन हमला करने वालो का डटकर मुकाबला  किया और तब से लेकर आज तक इन ताकतों से लगातार भिड रहे है  .
साथ ही बनवारी , मंगलेश डबराल ,सुरेन्द्र किशोर ,श्रीश चन्द्र मिश्र ,सत्य प्रकाश त्रिपाठी ,शम्भू नाथ शुक्ल ,देवप्रिय अवस्थी ,मनोहर नायक , सुशील कुमार सिंह ,ओम  प्रकाश , अनिल बंसल आदि से भी जो जनसत्ता के महत्वपूर्ण पत्रकारों  में शामिल  रहे है उन्हें भी यह जानकारी देना चाहता हूँ .उन संजय सिंह को भी जो उन लोगों में शामिल थे जिनपर जनसत्ता की वजह से तेज़ाब फेक दिया गया था .जनसत्ता के छत्तीसगढ़ संस्करण के साथी रहे अनिल पुसदकर ,राजकुमार सोनी ,संजीत त्रिपाठी से लेकर पटना के साथी गंगा प्रसाद ,भोपाल में आत्मदीप ,जयपुर में राजीव जैन और कोलकोता में प्रभाकर मणि से त्रिपाठी  से भी पूछना चाहता  कि न्यास में  मुरली मनोहर जोशी और राजनाथ सिंह पर सवाल खड़ा करने पर धमकाया जाएगा ? 
जनसत्ता प्रभाष जोशी का वह अखाडा था जिसमे बड़े बड़े चित हो गए .और प्रभाष जोशी जनसत्ता में  जिस टीम को साथ लेकर चलते  थे आज उस टीम को  हाशिये पर फेकने की साजिश हो रही है .जनसत्ता में हर धारा के लोग रहे .वामपंथी ,समाजवादी से लेकर धुर वामपंथी और संघी भी .वाद विवाद होता था पर यह नही कि किसी खास धारा के लोगों को हाशिये पर कर दिया जाए .पर आज एक  धारा के लोग परंपरा के नाम पर जनसत्ता के लोगों का अपमान कर रहे है 
    
क्या यही है प्रभाष परंपरा ? आलोक तोमर जिस हालत में है हो सकता है उसमे वे ज्यादा कुछ न बोले ,सुप्रिया जिस मनोदशा में है, वे भी टाल जाए पर उनकी ख़ामोशी से मामला रुकेगा नहीं . 
देश के दूरदराज  इलाको में ,जिलों और कस्बों ,पत्रकारिता की मशाल जलाने वाले साथियों ,मानवाधिकार से लेकर जल जंगल जमीन के लिए संघर्ष करने वाले साथियों से इस मुद्दे पर जो समर्थन  मिला है उसके हम आभारी है .
छत्तीसगढ़ में जनसत्ता संस्करण को लांच करने में अंबरीशजी की बहुत बड़ी भूमिका रही है.मैंने इसी संस्करण में उनके साथ काम करते हुए बहुत कुछ सीखा है..पिछले कुछ दिनों से कुछ कथित मूर्धन्यों ने प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी को लेकर एक न्यास का गठन किया है. अपने गठन के दिनों से ही यह न्यास विवादों के घेरे में आ गया है.अंबरीशजी इस न्यास के विरोध में बड़े मुखर तरीके से खड़े हुए हैं.
अंबरीश जी इन दिनों जनसत्ता के उत्तरप्रदेश संस्करण में ब्यूरो चीफ है. बिगुल में उनका यह लेख प्रकाशित कर मुझे खुशी हो रही है- राजकुमार सोनी

Tuesday, July 20, 2010

प्रभाष परम्परा की आड़ में

मित्रों पिछले कुछ दिनों से दो तीन डाट कामों पर प्रसिद्ध पत्रकार प्रभाष जोशी के नाम पर गठित किए एक ट्रस्ट ( प्रभाष परम्परा न्यास) को लेकर जमकर जूतम-पैजार चल रही है. प्रभाष परम्परा न्यास को गठित करने वाला एक धड़ा मानता है कि जो कुछ वह कर रहा है शायद सही कर रहा है तो न्यास के औचित्य को लेकर सवाल उठाने वाले दूसरे धड़े का कहना है कि प्रभाष परम्परा को आगे बढ़ाने का काम दिल्ली में नहीं बल्कि दूर-दराज बैठे पत्रकारों के आत्मीय जुड़ाव से ही संभव हो सकता है।

वैसे अपना अब तक का अनुभव तो यही रहा है कि देश में जितने भी न्यास मृत व्यक्तियों के नाम पर गठित किए गए हैं उनमें कुछ न कुछ बुराईयां तो प्रवेश करती ही रही है। सब जानते है कि रंगकर्मी सफदर हाशमी की मौत के बाद उनकी पत्नी माला हाशमी ने सहमत नामक  ट्रस्ट का गठन किया था लेकिन कुछ दिनों के बाद ही यह खबर आम हुई कि ट्रस्ट के लोग चंदा-चकारी करते हुए सरकार की गोद में जा बैठे है। ट्रस्ट के आयोजन स्थलों पर लालबत्तियों की आवाजाही बढ़ गई। मंत्री भाषण देते हुए नजर आए। आज यह ट्रस्ट कहां है और किस दशा में है इसका तो पता कम से कम उन लोगों को तो नहीं है जो जमीन पर लोट-लोटकर नुक्कड़ नाटक करते हैं। सब जानते है कि ट्रस्ट का काम कभी भी दिल्ली से बाहर नहीं निकला। कहा जा सकता है कि हाशमी जिस व्यवस्था का विरोध करते हुए तंत्र का शिकार हुए थे भाई लोगों ने व्यवस्था के तलुवे चाटते हुए उन्हें मरने के बाद भी फांसी पर लटका डाला था।

प्रभाष परम्परा न्यास आने वाले दिनों में कस्बाई पत्रकारों से संवाद की परम्परा को जारी रखेगा या नहीं इसका तो अन्दाजा नहीं है लेकिन न्यास का विरोध कर रहे धड़े के एक सदस्य अंबरीश कुमारजी की एक बात से मैं सहमत हूं कि प्रभाषजी ने अपने जीते-जीते जिस ढंग से देश के कोने-कोने में बसे लिखने-पढ़ने वालों से अपना रिश्ता कायम किया था, यदि न्यास उन दूर-दराज में कहीं कलम घसीटी कर रहे पत्रकारों की सुध नहीं लेता है तो इसका गठन व्यर्थ है। पत्रकारिता के सारे बड़े पुरस्कार दिल्ली में बैठे पत्रकारों को ही नसीब होते हैं जबकि कस्बे और गांवों में जीवंतता के साथ रिपोर्टिंग करने वाले ज्यादा सक्षम और ईमानदार लोग मौजूद है। हकीकत तो यही है कि पत्रकारिता की इज्जत और उसकी रक्षा के लिए दिल्ली में गठित किसी भी ट्रस्ट ने कभी भी कस्बाई लेखक और पत्रकार को सम्मान के लायक नहीं समझा है।

संजीव नामक एक लेखक ने अंबरीश कुमारजी की निष्टा पर कुछ सवाल भी उठाए हैं। श्री तिवारी ने कहा है कि अंबरीश कुमार जी अपना विरोध सिर्फ इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें ट्रस्ट से जोड़ा नहीं गया। संजीव से मेरा सीधा कोई परिचय तो नहीं है लेकिन उनके आरोप निजी दुश्मनी से भरे-पूरे दिखते हैं। जहां तक मेरी जानकारी में है ट्रस्ट में कुछ ऐसे लोगों ने कब्जा जमा लिया है जिनका विचारधारा से कोई लेना-देना नहीं है। ये लोग अवसर की विचारधारा को महत्व देते रहे हैं। अब भले ही कोई कह दे कि नामवर सिंह जैसा नाम भी न्यास से जुड़ा है तो यह बताने की जरूरत नहीं कि नामवर सिंह का प्रगतिशील लेखक संघ किस दशा और दिशा से गुजर रहा है। इस संघ के एक अध्यक्ष प्रसिद्ध कथाकार ज्ञानरंजन ने पिछले दिनों यह कहकर ही इस्तीफा दे दिया था कि प्रलेस भटकाव के रास्ते पर हैं। श्री रंजन ने यह इस्तीफा तब दिया था जब रायपुर के डीजीपी विश्वरंजन ने प्रमोद वर्मा स्मृति संस्थान के बैनर तले लेखकों की चाट-पकौड़ी नामक एक कार्यक्रम का आयोजन किया था। कुल मिलाकर मेरे कहने का यह आश्य है कि जब संघ, ट्रस्ट या न्यास की पवित्रता में पाखंड का प्रवेश हो जाता है तब सारे सही उद्देश्य प्लास्टिक के नाडे़ से ही फांसी लगाकर आत्महत्या कर लेते हैं। एक न्यास से यदि जनसंघी जुड़े हैं, वामपंथी भी और काशीराम की पार्टी के सदस्य भी तो फिर उस न्यास का क्या होगा यह बताने की जरूरत नहीं है। न्यास में जो खून-खराबा होने वाला है वह अभी से दिख रहा है। दिल्ली के पत्रकार तो यह हैंडिंग लगाएंगे नहीं.. कस्बाई पत्रकारों को ही कहीं किसी छोटे से पर्चे में लिखना होगा- प्रभाष परम्परा न्यास में रणवीर सेना ने किया खून-खराबा।

अंबरीशजी के साथ मैंने जनसत्ता के छत्तीसगढ़ संस्करण में कुछ समय तक काम किया है। उन पर जनसत्ता सोसायटी को लेकर जो आरोप लगते रहे हैं, मेरा उनसे कोई लेना-देना भी नहीं है लेकिन जहां तक निजी तौर पर मेरा अनुभव है वे कभी व्यवस्था के दलाल तो नहीं हो सकते। यह बात मैं इसलिए दावे के साथ कह रहा हूं क्योंकि जिन दिनों अंबरीशजी रायपुर संस्करण में कार्यरत थे तब जोगी ने उन्हें सरकार का भोंपू बनाने  के लिए कई तगड़े हथकंडे अपनाए थे। वे कभी किसी हथकंडे से प्रभावित नहीं हुए। यहां तक नोटों का अच्छा-खासा बंडल भी उन्हें डिगा नहीं सका था। जब अंबरीशजी नहीं माने तब जनसत्ता कार्यालय पर गुंडों ने धावा बोला था। इस धावे की गूंज प्रदेश के साथ-साथ दिल्ली के गलियारों तक हुई थी।
प्रभाषजी की परम्परा आगे बढ़े इसकी कामना इसलिए भी की जा सकती है क्योंकि प्रभाष जी इस काबिल थे लेकिन न्यास के गठन के साथ ही जिस ढंग से विवाद ने जोर पकड़ा है उसे देखकर तो यही कहा जा सकता है-
बहुत देखी है बाजीगरी हमने भी
सियायत की ये बाजीगरी कुछ देखी नहीं जाती.

Sunday, July 18, 2010

हाथियों ने मचाया हाहाकार

छत्तीसगढ़ में केवल नक्सली ही हाहाकार नहीं मचाते। नक्सलवाद की चुनौती का सामना करने वाला यह राज्य हाथियों की समस्या से भी बुरी तरह जूझ रहा है। कैप्टन जे फारसाइथ के अनुसार छत्तीसगढ़ में हाथियों की उपस्थिति का इतिहास डेढ़ सौ साल से अधिक का नहीं है लेकिन ग्लैडविन द्वारा संपादित आइने अकबरी के एक लेख नर्मदा घाटी से लेकर गोंडवाना के आगे तक की चर्चा में हाथियों की मौजूदगी को चार सौ साल से भी अधिक का बताया गया है।राज्य में हाथियों की सबसे पहली दस्तक 1988-89 के आसपास हुई थी। इस साल हाथियों ने जमकर तबाही मचायी थी। इसके बाद हर साल हाथी सरगुजा, कोरबा और रायगढ़ के जंगलों में उत्पात मचाते रहे हैं।
वैसे तो एशियाई हाथी भारत के विस्तृत वन क्षेत्रों में रहा करते थे लेकिन वनों की अंधाधुंध कटाई और जंगलों में मानवीय घुसपैठ के कारण वे अब केवल उत्तराचंल, कर्नाटक, केरल, तमिलनाडु,  आसाम, अरूणाचल प्रदेश, मेघालय, झारखंड और उड़ीसा राज्य में रह गए हैं। 
 
छत्तीसगढ़ में हाथी मूलतः झारखंड और उड़ीसा से ही प्रवेश करते रहे हैं। जब छत्तीसगढ़ राज्य मध्यप्रदेश से अलग नहीं हुआ था तब पहली बार 1993 में हाथी विशेषज्ञों की सहायता से लगभग दस जंगली हाथियों को पकड़ा गया था। वर्ष 2000 में जब राज्य का निर्माण हुआ तब हाथियों के एक झुंड ने यहां के जंगलों में जो प्रवेश किया तो फिर वह बाहर ही नहीं निकला।

वर्ष 2003 में जब प्रदेश में अजीत जोगी की सरकार थी तब वन विभाग के अमले ने दिल्ली से एक महिला हाथी एक्सपर्ट पार्वती बरूआ को बुलाया था। पार्वती बरूआ आसाम के जंगलों में रहकर कई बिगडैल हाथियों पर लगाम कस चुकी है लेकिन छत्तीसगढ़ में उनका जोर नहीं चल पाया, अलबत्ता उनके घेरा डालो अभियान के चलते एक हाथी की मौत भी हो गई थी। तब इस मामले की गूंज विधानसभा में हुई थी।

जिन दिनों पार्वती बरूआ के हाथों हाथी मारा गया था उन दिनों कुल 32 हाथी तीन अलग-अलग ग्रुपों में घूम-घूमकर उत्पात मचा रहे थे। पहला ग्रुप जशपुर नगर के बादलखोल अभ्यारण में देखा गया था तो दूसरा ग्रुप धर्मजयगढ़ एवं कोरबा में विचरण कर रहा था। तीसरे ग्रुप को रायगढ़ के जंगलों में देखा गया था। अलग-अलग ग्रुप बनाकर घूम रहे हाथियों ने तब कई ग्रामीणों को मौत के घाट उतार डाला था।

वैसे वन विभाग के एक बड़े अफसर का यह मानना है कि कोई भी जानवर आदमी को तब तक नुकसान नहीं पहुंचाता है जब तक आदमी उसे नुकसान पहुंचाने के बारे में नहीं सोचता है। छत्तीसगढ़ में ज्यादातर ग्रामीणों की मौतें हाथियों को भगवान मानने से हुई है। शुरूआत में जब इक्का-दुक्का हाथियों का आगमन हुआ था तब ग्रामीण उन्हें गणेशजी का अवतार समझकर पूजा-पाठ करने लगे थे। हाथियों को नारियल, चावल, महुआ का प्रसाद चढ़ाने की गलती ग्रामीणों को महंगी पड़ी।

छत्तीसगढ़ में उत्पात मचाने वाले हाथियों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पुरस्कृत होने वाली एक फिल्म भी बन चुकी है। दिल्ली-भोपाल के बड़े-बड़े विशेषज्ञों ने कई मर्तबा सम्मेलनों में हाथियों के उत्पात को लेकर चिन्ता भी जताई है लेकिन किसी ने यह जानने की कोशिश नहीं की है कि हाथी छत्तीसगढ़ में उत्पात क्यों मचा रहे हैं। भूखे-प्यासे हाथी यदि अंधे होकर सब कुछ रौंदते चले जा रहे हैं तो मतलब साफ है कि जंगल में कहीं पानी का टोटा पड़ गया है। वनों की कटाई ने उनका भोजन छीन लिया है। हाथियों को साल का वन बहुत भाता है। यह सही है कि छत्तीसगढ़ में अब पहले की तुलना में साल के वृक्ष नहीं है लेकिन फिर भी बिहार और उड़ीसा की तुलना में यहां साल वन थोड़े ठीक-ठाक अवस्था में हैं। हाथी साल वनों के कटने से बेघर होते रहे हैं। नए घर के तौर पर उन्होंने छत्तीसगढ़ को अपना ठिकाना तो बनाया है लेकिन लोग भूल जाते हैं कि दूसरों का घर उजाड़ने से खुद का घर तो उजड़ेगा ही। हाथियों का घर साल वन है। यदि यह घर उजड़ेगा तो हाथी मंत्री को खोजते हुए सर्किट हाउस पहुंचेंगे ही। जी हां.. यह बात बिल्कुल सच है। एक बार हाथियों का एक झुंड जंगल से होता हुआ अंबिकापुर सर्किट हाउस जा पहुंचा था। इसे सौभाग्य कहे या कुछ और लेकिन जिस समय हाथियों ने धावा बोला तब वहां कोई मंत्री मौजूद नहीं था। वन मंत्री धावे से कुछ देर पहले ही राजधानी रायपुर के लिए निकल चुके थे। सच तो यह है कि प्रकृति से छेड़छाड़ का खामियाजा छत्तीसगढ़ भी भुगत रहा है। यहां के हाथी लोगों के साथी नहीं बन पाएं हैं।

Thursday, July 15, 2010

पुरानी खांसी

कहते हैं कि यह देश किसानों का देश है, लेकिन दुनिया के पेट को रोटी देने वाला किसान जिस तरह से भूखा रहता है। दाने-दाने को तरसता है, उसे देखकर नहीं लगता है कि वास्तव में यह देश किसानों का सम्मान करना भी जानता है। आज से कुछ अरसा पहले एक गांव में दौरे के दौरान मेरी मुलाकात एक किसान सी हुई थी। मैं किसान की बहुत ज्यादा मदद तो नहीं कर पाया सिवाय बेंक अफसरों से कर्ज पटाने के मामले में मोहलत देने को लेकर।  किसान से हुई बातचीत के आधार पर मैंने एक कविता भी लिखी थी। उम्मीद है किसान के दर्द को आप अपना दर्द समझेंगे।

 















पुरानी खांसी

पूछते हो क्यों खांसता हूं
अरे.. बाबू.. ये पुरानी खांसी है
यूं ही नहीं जाती

अब क्या बताऊं आपको
अचानक दोनों छोटी लड़कियों के
कपड़े छोटे पड़ गए
मजबूरी थी
पीले करने पड़ गए उनके हाथ

गिरवी रखना पड़ा
हीरा-मोती को
अरे.. हीरा.. मोती .. नहीं.. नहीं बाबू

हीरा-मोती तो बैल का नाम है.

पायजेब/बिछिया/करधन को बेचा
तब जाकर बदल पाया
घर का खपरैल


एक कुएं में पानी के लिए
थोड़ी सी जमीन बेची
कुछ पैसे बचे तो
बड़कू के लिए खरीदा

स्कूल का कपड़ा
बस्ता और एक साइकिल


सही है जब कभी खांसता हूं तो
कांपने लगता है घर
लेकिन प्याज और हल्दी की गरम गठरी
छाती पर रखते ही
सब ठीक भी हो जाता है

इतना सब कुछ बताते-बताते
किसान ने बंडी से बीड़ी निकाली

और सुलगाते हुए कहा-
अरे.. बाबू.. बड़े लोगों को
होती है
बड़ी बीमारी
अपनी खांसी तो पुरानी है
बस जाते-जाते जाएंगी
(चित्र गुगल से साभार)
 

Wednesday, July 14, 2010

जंगली भैसों का अस्तित्व संकट में

वन विभाग का अमला भले ही यह बात मानने को तैयार नहीं होगा लेकिन हकीकत यही है कि छत्तीसगढ़ के जंगलों में जंगली भैंसों का दिखना कम हो गया है।  वन विभाग की उदासीनता, अवैध शिकार और जंगलों की अवैध कटाई के कारण यह समस्या बढ़ी है। माना जाता है कि तीन दशक पहले इंद्रावती, पामेड़ और भैरमगढ़ में कुल 210 जंगली भैंसे थे लेकिन आज यह संख्या घटकर 32-33 तक जा पहुंची है. पामेड़ में जंगली भैंसों की संख्या पांच तक बताई जाती है।

ऐसा भी नहीं है कि जंगली भैंसों को बचाने के लिए सरकारी प्रयास नहीं हुए लेकिन प्रयास चीख-पुकार से ज्यादा कुछ भी साबित नहीं हुए.

जंगली भैंसे अपना ज्यादातर समय जंगल में बने तालाबों के आसपास ही व्यतीत करते हैं। डील-डौल में भारी होने की वजह से वे झुककर घास नहीं खा सकते, बावजूद इसके लंबी घास इनका प्रिय भोजन है। जंगलों में बढ़ता हुआ अतिक्रमण और खेती के लिए जलाए गए खरपतवार की वजह से जंगली भैंसे इधर-उधर भागते रहते हैं। इसी भागमभाग में उनका शिकाऱ भी आसान तरीके से होने लगा है। रायपुर जिले के सीतानदी अभ्यारण में जितने भी जंगली भैंसे दिखाई देते हैं वे उदंती अभ्यारण के है। इंटरनेशनल यूनियन फार कन्जर्वेशन आफ नेचर एंड नेच्युरल रिसोर्सेस की रेड डाटा बुक में बस्तर के जंगलों में विचरण करने वाले भैसों का उल्लेख एक संकटग्रस्त प्राणी के रूप में ही किया गया है।

जब छत्तीसगढ़ का निर्माण नहीं हुआ था तब बस्तर की प्रकृति बचाओ समिति, बांबे नेच्युरल हिस्ट्री सोसायटी, नेचर इंडिया और वाइल्ड लाइफ इंस्टीट्यूट ने समय-समय पर अपने सुझाव भी दिए थे लेकिन मामला ढांक के तीन पांत वाला ही बना रहा। कुछ समय पहले वन विभाग ने यह तय किया था कि वह भैंसों को बेहोश कर उनके गले में एक उपकरण फिट करेगा ताकि यह आसानी से पता लगाया जा सकें कि वन भैंसों की लोकेशन क्या है लेकिन विभाग का प्रयास भी खाली-पीली का तमाशा साबित हुआ है। सीतानदी, उदंती अभ्यारण,बस्तर के भैरमगढ़, पामेड़ व इंद्रावती उद्यान में छोटे-बड़े कर्मचारियों की पदस्थापना, कंप्यूटर मोबाइल, फोन, जीप, कार पर ही अब तक करोड़ों रुपए फूंके जा चुके हैं बावजूद इसके वनभैसों को संरक्षित करने का काम सफल नहीं हो पाया है। बस्तर के भैरमगढ़, मांटवाड़ा, नैमेड़ और कुटरू इलाके के ग्रामीण बताते हैं कि कुछ समय पहले तक पंगडियों से आते-जाते भैंस दिख ही जाया करते थे लेकिन पिछले कुछ सालों से उन्होंने जंगली भैंसों का दर्शन ही नहीं किया है। गुदमा और करकेली में भी छोटे-बड़े झुंड विश्राम और जुगाली करते हुए मिल जाया करते थे लेकिन धीरे-धीरे इन क्षेत्रों में आवाजाही तेज हुई और फिर जंगली भैंसों के सामने अस्तित्व का संकट खड़ा हो गया।


Tuesday, July 13, 2010

बड़े घर की औरतें

आज फिर किसी
गंदी बस्ती में
सिलाई मशीन बांटेगी

विधानसभा के सामने
रोपेंगी सडियल विचार का
एक पौंधा

वृद्धों के आश्रम जाकर वे
झुर्रीदार शरीर को
ओढाएगी कंबल


कुपोषण के शिकार
बच्चों को केला थमाकर
फोटो भी खींचवाना है उन्हें.


आनन्द मेले में भजिया-पकौड़ी
बेचने के बाद
जब थक जाएंगी
बड़े घर की औरतें
तब उनके मरद
उन्हें प्रभु भक्ति का महत्व समझाएंगे
और फिर वे बड़ी सी कार में

ढोलक लेकर निकल पड़ेंगी
भजन गाने के लिए


महाराज के प्रवचन से लौटकर
जब अपने गर्भवती होने का समाचार
हर किसी को बताएंगी
बड़े घर की औरतें तब...

तब...
झाडू-पौंछा करने वाली एक औरत
बताएंगी कि

साहब ने खुश होने के बाद
दिलवाई है नई साड़ी.
और.. घर की सदस्य बोलकर
अपने हाथों से पिलाया है मजेदार शरबत.


दोस्तों.. फिलहाल
बड़े घर की औरतें
दुनिया के महत्वपूर्ण कामों में
जुटी हुई हैं.


उन्हें उनके काम में
लगे रहने दिया जाए
हम कौन होते हैं उनके
काम में खलल डालने वाले.

Monday, July 12, 2010

बोल रही है विज्ञप्तियां

कल शहर अंधा था
कल शहर बहरा था
कल शहर गूंगा था


लेकिन कल के पहले
शहर अंधा नहीं था


हर बात पर
राम-राम कहने वाले
कुछ बुढ़ऊ
शहर की गंदी बस्तियों को लेकर
व्यक्त कर ही दिया करते थे
अपनी गहरी चिन्ता


कल के पहले शहर

बहरा भी नहीं था

वृक्षारोपण के नाम पर
घर से निकली
मोटी और थुलथुल महिलाएं
लौटते-लौटते
चौका-बुता करने वाली औरतों से
पूछ ही लिया करती थी
उनका दुःख और दर्द


कल के पहले शहर

गूंगा भी नहीं था

नंग-धडंग बच्चे
किसी न किसी पार्टी का झंडा लेकर
चीखते-चिल्लाते
टायर चलाते
गुजर ही जाते थे आंखों के सामने से

कल से शहर अंधा है
बहरा है
गूंगा है


कल शहर में

निकला था एक जुलूस
जिस पर किसी कमीने ने
उछाल दिया था एक पत्थर
पत्थर पहले तो
महात्माजी की आंख पर लगा
लेकिन कुछ घंटों में ही सरकार ने भी
यह मान लिया कि
सत्ता को उखाड़ने की
रची गई है साजिश


बस फिर क्या था..

अश्रुगैस के गोले छूटे
ताबड़तोड़ चली लाठियां
और फिर शहर हो गया
अंधा/बहरा और गूंगा


अब अखबारों में केवल
बोल रही है  विज्ञप्तियां

Sunday, July 11, 2010

आपके घर.

मकान का आहता
जुड़ा है अकरम भाई के मकान से


मेरी बकरी खा जाती है
अकरम भाई के बरामदे में
सूखाया गया गेहूं, पापड़


मेरा लड़का
गालियां बकते हुए थूक
देता है अकरम भाई के लड़के पर


मेरी बीवी हर रोज
मोहल्ले की महिला संसद में
अकरम भाई को मुसलमान बताकर
लाती है अविश्वास प्रस्ताव


शायद इसी वजह से
अकरम भाई अब नहीं जाते
मेरे साथ पान खाने
न ही पूछते हैं-आज क्या छपा है अखबार में
कविता की किताब भी नहीं मांगते हैं अब.


चलिए अकरम भाई
मैं कल ही बेच दूंगा बकरी
लड़के को दूंगा दो रापट

और पत्नी को भी डपटकर समझा दूंगा कि
मुसलमान होना अपराध नहीं है


इसके अलावा मुझे
नहीं लगता अकरम भाई कि
देश के बनने- बिगड़ने वाले
खौफनाक तापमान ने
कभी आपको परेशानी में डाला होगा.


बस अकरम भाई..
आप अहाता अलग न करें


और हां...

एक कटोरी में गाजर का हलवा
मेरे लिए भी संभालकर रखिएगा


भाई-चारे को
हलवे की तरह
मीठा होना ही चाहिए अकरम भाई


अकरम भाई...
मैं अभी पहुंच रहा हूं.आपके घर.

Saturday, July 10, 2010

पुरानी तलवार

पिता को याद करते हुए
न जाने कितनी चीजें आ जाती है याद
सबसे पहले तो याद आई वह साइकिल
जिसकी सीट बहुत लंबी थी


जब कभी मौका लगता
हरकुलिस की
शानदार और जानदार सवारी पर
लंगी मारते हुए
निकल पड़ता था मैं अपने दोस्तों से मिलने


पिता ने जब खरीदी हीरो मैजस्टिक
तब भी उसके साथ यही व्यवहार रहा मेरा


और... उबड़-खाबड़ रास्तों पर
जिन्दगी भर  साथ निभाने का 

दावा करते हुए जब राजदूत को घर में लाया गया
तब हर दूसरे दिन अपने आपको

शशिकपूर समझकर
मैं गाने लगता था-
एक रास्ता है जिन्दगी 

जो थम गए तो कुछ नहीं

साइकिल.. मैजस्टिक और राजदूत की खरीदी के
कुछ सालों बाद ही एक रोज
पिता अचानक चले गए.


अस्थियों की राख
जब हमसे दूर जा रही थी 
तभी एक भाई ने
पिता को बहुत कोसा
कुछ बनाकर नहीं गए...
कुछ छोड़कर नहीं गए
एक मकान है किसके नाम होगा
राजदूत को चाटेंगे... साली डिमांड खत्म हो गई है

बंटवारे में कुछ नहीं चाहता था मैं


फिर भी मेरे हिस्से आ गया एक जंग लगा संदूक
पिता का यह संदूक
बहुत कीमती था
इसमें रखी थी उनकी पुरानी घड़ी
एक छात्ता
एक कंबल
रेडियो बनाने वाली किताब
कुछ दवाईयां

कीड़ों को भगाने वाली कस्तूरी
अलबेला, अनमोल रतन और उड़न खटोला के
बड़े तवे वाले रिकार्ड.


और हां... संदूक में थी एक 

छोटी सी तलवार भी.
वही तलवार जिसे शायद कुछ मंत्रों के साथ पिता ने
अपने शरीर पर हल्दी लगने के दौरान

सात वचन  देने से  पहले
किया था धारण.

बस यही छोटी सी तलवार ही

मेरी ताकत है अब तक
जब कभी घिर जाता हूं परेशानियों में 

पिता की पुरानी तलवार से
काट डालता हूं मुसीबतें.

Friday, July 9, 2010

पहली बार प्रेम करने वाली लड़की

नींद में तैयार करती है खुद को
जागती है नींद में 
और नींद में ही
 अम्मा.. अभी आई कहकर
 निकल जाती है घर से


 चटख लाल रंग लाने वाली मेहन्दी
 इत्र, नेलपालिश की शीशियां
 और चमकदार कागजों की तलाश के बाद
 जब घर लौटती है लड़की
 तब भी वह नींद में ही होती है.


 हर फूल को देखकर मुस्कुराती है 
 पहली बार प्रेम करने वाली लड़की
 और.. डायरी में रखें फूलों के बीच
 नोट करती है खूब सारी कविताएं

 पहली बार प्रेम करने वाली लड़की

 बर्फ के गोले खाती है
 बारिश में भीगती है
 और.. देखते ही देखते
 बन जाती है तितली

 पहली बार प्रेम करने वाली लड़की
 जरा-जरा सी बात पर
 रोती है
 और जरा सी बात पर

 हंसती भी है इस कदर कि
 मीठे गाढ़े चुंबन के लिए
 आसमान धरती पर उतरने को
 हो जाता है उतावला.

पहली बार प्रेम करने वाली लड़की
किसी से कुछ नहीं बोलती
फिर भी सबको
पता चल जाता है
उसके प्रेम के बारे में.

Wednesday, July 7, 2010

पोस्टर कविताएं

मित्रों  इन दिनों  पोस्टर कविताएं कम ही लिखी जा रही है।  पता नहीं ऐसा क्यों है लेकिन लगता है  शायद लेखकों और कवियों ने मान लिया है कि अब जनता के बीच जाने की जरूरत नहीं रह गई है. कविता-कहानी को लेकर सारी बहस काफी हाउस सिमटी हुई नजर आती है.  आत्ममुग्ध लेखक इसी बात से ही खुश है कि उनकी कहानी स्कूली किताबों में पढ़ाई जा रही है। जबकि कुछ इस बात से प्रसन्न है कि वे विज्ञापन देकर अपनी कहानी छपवाने में कामयाब है। कुछ समय पहले तक हमारे छत्तीसगढ़ में एक साहित्यकार एसईसीएल में पीआरओ था. इसी पीआरओ ने थोड़े समय के लिए जनसत्ता के छत्तीसगढ़ संस्करण की कमान भी संभाली. इस कथित साहित्यकार के बारे में जो रोचक जानकारी पता चली है वह यह कि महाशय देश की तमाम बड़ी पत्रिकाओं में अपनी घटिया कहानी विज्ञापन देकर ही छपवाते थे. श्रीमानजी इन दिनों किसी पीठ-वीठ के अध्यक्ष है और नेताओं के इशारे पर अपना लेखनकर्म जारी रखे हुए हैं। हो सकता है ऐसे साहित्यकार आपके आसपास भी हो. मैंने तो बात निकल ही गई तो आपको बता ही दी जाए वाले अन्दाज में बता दी है. खैर.. आप सब यह पचड़ा छोडि़ए..  और पढि़ए कुछ पोस्टर कविताएं-

बच्चा
बच्चा लट्टू चलाता है

चलाने दो
देखना एक दिन
घुमाकर रख देगा
पृथ्वी को लट्टू की तरह.



पेपरवेट
शब्दों की छात्ती में दर्द

और अर्थ के किसी घर में
अन्धेरा नहीं हो सकता
एक पेपरवेट की वजह से
बस आपको लिखनी होगी
एक तेजधार कविता.



चील
एक दिन ऊंचाई पर देखी चील

मैं  गड़ गया जमीन पर
ऊंचाई परेशान करती है
हर किसी को.


आदमियत
बस, रेलगाड़ी और सायकिल टिफिन
और भी बहुत सारी चीजें
जब जल चुकी होती है
तब-
आदमियत आती है अपने खोल से बाहर
अब वह सुलगती चीजों से
खौफ खाती है

और पाती है
जहां सिर छिपाने की जगह
छिप जाती है.



सूरज
सूरज हम सबका है
बस तय करना है

हमारे हिस्से आएगा
कितने ग्राम उजाला

भट्टी
भट्ठी गरम है
भट्ठी गरम रहती है
फिर भी दिन और रात
खटने के बाद
मासूम हाथों को
नसीब होती है
ठंडी रोटियां


Tuesday, July 6, 2010

मौत का पैगाम ( अंतिम)

पाठकों मैं जानता हूं कि आपको लगातार कष्ट हो रहा है. एक तो मैं आपको रूक बाबा रूक जैसा गाना सुना रहा हूं तो दूसरा कष्ट यह भी है कि आप विभिन्न ब्लागों पर जाकर जो टिप्पणी कर रहे हैं वह नजर नहीं आ रही है. शायद किसी तकनीकी दिक्कत की वजह से ऐसा हुआ है. धान के देश को संचालित करने वाले ब्लागर जीके अवधिया जी से जब मेरी इस बारे में बातचीत हुई तो पता चला कि कुछ साल पहले कुछ घंटों के लिए ऐसी घटना हो चुकी है. आरंभ वाले भाई संजीव तिवारी ने भी माना कि कोई तकनीकी दिक्कत सामने आई है. ललित डाट के ललित शर्माजी भी इस घटना पर आश्चर्यचकित है. टिप्पणियों को खा जाने वाले मामले को लेकर उच्चारण के श्री रूपचंद शास्त्रीजी ने तो पोस्ट भी लिखी है. मेरे ब्लाग पर अब भी कुछ टिप्पणियां ही प्रदर्शित हो रही है. पता नहीं बाकी शुभकामनाएं कहां चली गई है.

खैर.. अब एक बार फिर मैं आपको लिए चलता हूं नागलोक की ओर
हम विश्रामगृह लौट आए थे. कोई कुछ बोलने की स्थिति में नहीं था. मैंने शैलू और सुधीर से कहा कि वह आराम कर ले सुबह जल्दी उठकर कवरेज के लिए निकलना है. वाहन चालक से जब मैंने कहा कि वह भी विश्रामगृह के एक कक्ष का इस्तेमाल कर सकता है तो उसने जवाब दिया-अरे नहीं साहब आप लोग पेपर लगाकर सो जाइए.. मैं कांच बंद करके गाड़ी के भीतर ही आराम करूंगा. जान तो हो जहान है
.विश्रामगृह के भीतर दो पलंग मौजूद थे. एक पलंग पर शैलू और सुधीर सो गए जबकि दूसरे पर मैं लेट गया. मैं जिस पलंग पर लेटा था उसमें मच्छरदानी लगी हुई थी.अपने आपको मच्छरदानी के बीच पाकर मैं इस बात के लिए खुश था चलो यदि सांप आया भी तो कम से कम काटेगा नहीं. कक्ष की लाइट जली हुई थी. कहते है न आदमी दिनभर में जो कुछ सोचता है वह सपने में देखता है. रात दो से तीन बजे के बीच मैंने जो सपना देखा वह बहुत भयानक था. मैंने देखा कि मैं सांपों के बीच घिर गया हूं. सांप मुझे काटने के लिए दौड़ा रहे हैं. मैं बचाओ-बचाओ चिल्लाते हुए अजय शर्माजी के घर के पास पहुंच गया हूं. यहां आकर देखता हूं कि घर में ताला लगा हुआ है. मैं भागकर विश्रामगृह पहुंचता हूं. सांप यहां भी मेरा पीछा करते हुए आ जाते हैं. मैंने दरवाजा बंद कर रखा है लेकिन सांप दरवाजे पर फुंफकार मारते हुए बैठे हुए हैं-देखते हैं बेटा कब तक भीतर छिपा रहेगा. मैं पुलिस को फोन लगाता हूं.वहां से जवाब मिलता है- क्या आप सचमुच सांपों से घिर गए हैं. जब मैं उन्हें बताता हूं कि हां वाकई मेरी जान खतरे में हैं तो वे बताते हैं कि उनके थाने को भी सांपों ने घेर रखा है. मैं कमरे के चारों ओर नजर दौड़ाता हूं तो पाता हूं कि सुधीर और शैलू सो रहे हैं. ये साले कब आ गए सोचता हूं. मैं उन्हें जगाता हूं, लेकिन यह क्या... दोनों के मुंह से झाग निकल रहा है. मैं ऊपर खुली हुई खिड़की की ओर देखता हूं, मुझे सांप का आधा हिस्सा नजर आता है.

मैं हड़बड़ाकर उठ जाता हूं. सुधीर और शैलू को उठाता हूं. शैलू मेरे सपने की कहानी सुनकर सहम जाता है. अचानक मुझे लगता है कि मैं अपने साथियों को बिलावजह ही भयभीत कर रहा हूं. मुझे एक अच्छी स्टोरी करनी है. यदि साथी ही डरे हुए रहे तो अच्छा काम नहीं हो पाएगा. मैं तय करता हूं शैलू को तो डराने का काम करूंगा ही लेकिन स्टोरी को कवर करने के बाद.

हम लोग सुबह ही तैयार होकर बैठ गए थे. चौकीदार सुबह के नाश्ते में हम सबके लिए पोहा ले आया था.सुबह आठ बजे जब शर्माजी हमारे बीच आए तो थोड़ा परेशान थे. पूछने पर उन्होंने बताया कि पड़ोस के किसी घर में सांप घुस गया था उसे निकालने के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी है.

अब हम शर्माजी के साथ सेमरताल गांव जा रहे थे. इस गांव के बारे में शर्माजी ने मुझे बताया था कि वहां दो लड़कियां ऐसी रहती है जो जड़ी-बूटियों के सहारे सांप को पकड़ने का काम करती है. इस गांव में पहुंचने के बाद पता चला कि एक ग्रामीण का बेटा सर्पदंश से दो दिन पहले ही मरा था लेकिन ग्रामीण अपने बेटे की अंतिम क्रिया करने के बजाए उसका इलाज झाड़-फूंक से कर रहा था. मैंने सुधीर से कहा कि वह इसके शाट बना लें. जब हम लाश के करीब पहुंचे तो वहां हमने बड़े-बड़े बाल वाले दो बैगाओं को देखा. शायद यह बैगा झाड़-फूंक कर रहे थे. लाश के पास एक तसला, कांसे की थाली, तांबे का पैसा, जली हुई लकड़ी और नीम की पत्तियां पड़ी हुई थी. कैमरे को देखते ही बैगा अपने फार्म में आ गया. वह उछलकूद करने लगा. एक सर्पाकार जैसी छड़ी से उसने हमारी भी धुनाई की. लाश बदबू मारने लगी थी फलस्वरूप हम ज्यादा देर तक वहां नहीं रूक सकें.

जब हम ग्रामीण की झोपड़ी से बाहर निकले तो शर्माजी ने बताया कि फरसाबहार और तपकरा इलाके में डाक्टर और स्वास्थ्य कार्यकर्ताओं की कमी हमेशा बनी रही है. कभी डाक्टर अस्पताल में मिलता है तो दवाई नहीं मिलती और यदि दवाई मिलती है तो डाक्टर नहीं मिलता. स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव में ग्रामीण झाड़-फूंक से ही सर्पदंश का इलाज करते हैं.

मैंने शर्माजी से जानना चाहा कि जब ग्रामीणों को यह पता है कि झाड़फूंक से उनके अपने मर ही जाते हैं तो फिर वे अंधविश्वासी क्यों बने हुए हैं.जवाब में शर्माजी ने बताया कि कभी किसी मामूली जहर वाले सांप के काटने से कोई ठीक हो गया होगा तो ग्रामीणों को लगता है कि जब फलां गांव का आदमी ठीक हो सकता है तो फिर दूसरा क्यों ठीक नहीं हो सकता. श्री शर्मा ने बताया कि काफी पहले फरसाबहार थाने के प्रभारी बीपी अहिरवार ने लोगों को सर्पदंश से बचाने के लिए एक अभियान चलाया था लेकिन उनके जाने के बाद यह अभियान ठंडा पड़ गया. श्री अहिरवार ने ग्रामीणों को जमीन के बदले खाट पर सोने के लिए प्रेरित किया था इसके अलावा घर-घर में रस्सी ( ताकि सांप काटने के बाद उस हिस्से को बांधा जा सकें जहां से जहर शरीर के दूसरे हिस्से में न चढ़ सकें) और ब्लेड़ का वितरण भी किया था. इसका सकारात्मक परिणाम भी सामने आया था लेकिन कुछ दिनों के बाद सब समाप्त हो गया. एक थानेदार ने जो किया सो किया, सरकार ने भी नागलोक में बसने वाले सांपों के संरक्षण और संवर्धन के लिए जशपुर में स्नेक पार्क बनाने केंद्र को एक प्रस्ताव भेजा था लेकिन यह प्रस्ताव भी कई सालों से धूल खा रहा है. यदि केंद्र यह प्रस्ताव स्वीकार कर लेता तो शायद यहां भी सांपों का जहर निकाला जा सकता था। यह सर्वविदित है कि एक सर्प के एक मिलीग्राम जहर की कीमत पंद्रह से बीस हजार रूपए के आसपास होती है. यह जहर असाध्य से असाध्य रोगों के इलाज में उपयोगी साबित होता है. कई खतरनाक किस्म के चर्म रोगों के इलाज में भी यह जहर काम आता है. यदि केंद्र ने राज्य सरकार के इस प्रस्ताव को मंजूरी दे दी तो तय मानकर चलिए कि हर रोज एक से डेढ़ हजार सांपों का जहर आसानी से निकाला जा सकेगा. इस मंजूरी से ग्रामीणों को सांप पकड़ने का रोजगार भी मिल जाएगा.

जशपुर के एक बड़े हिस्से में भले ही लोग सर्पदंश का शिकार होकर मर रहे हैं लेकिन यह भी हकीकत है कि यदि इन इलाकों में सर्प नहीं हुए तो लोग भूखे मर जाएंगे। अजय शर्मा मानते है कि यदि नागलोक इलाके के सांपों को एक ही दिन में मार दिया जाएगा तो वहां की खेती चौपट हो जाएगी. दीमक और चूहे खेती को बरबाद करते हैं जबकि इन्हें खाकर सांप एक तरह से खेती की रखवाली ही करते हैं। उल्लेखनीय है कि इस इलाके में जितने सांप पाए जाते हैं उससे ज्यादा तो यहां दीमकों के टीले हैं. कहा जाता है कि सांपों को जशपुर का वातावरण इसलिए सुहाता है क्योंकि रेतीली भूमि होने की वजह से यहां पर्याप्त ठंडकता कायम रहती है. जिले में करैत, कोबरा, चित्ती, महिराज, पहाड़चित्ती, छलांग लगाकर दौड़ने वाला सांप जाड़ा, ढोडिया, धामिन, दूधनाग और अजगर की भरमार है. जशपुर वनमंडल ने मुकेश इंगले नामक एक शोधकर्ता से जो सर्वे करवाया है उसके मुताबिक इलाके में सीतालटी, बिल्ली सांप, पानी सांप, सामान्य अंधे, धामन, भेडिया, कुकरी, कांसे के रंग वाला पेड़ सांप, दबोइया और बैंडेड करैत तो इलाके में बहुतायत है. कहा जाता है कि करैत का काटा हुआ पानी नहीं मांगता है. आदिवासी बहुत क्षेत्र जशपुर में इस बात का प्रमाण मिलता है कि यह क्षेत्र शैव उपासकों का गढ़ था. इस क्षेत्र के मजदूर आज भी नदी की रेत छानकर उसमें सोने का कण ढूंढने का काम करते हैं. सेठों और धनपतियों ने यह अफवाह फैला रखी है कि जहां सोना-चांदी, हीरा-मोती होगा वहां उसकी रक्षा सांप करेंगे. सांप उसे ही काटेगा जिसकी रक्षा सोना हड़पने की होगी. यही एक वजह है कि यहां के मजदूर रेत में सोना तलाशते हैं और औने-पौने दामों में सेठ-साहूकारों को सोने का विक्रय कर देते हैं. ग्रामीणों के बीच यह मान्यता भी कायम है कि खाट या तख्त पर सोने से देवता नाराज हो जाते हैं या फिर शरीर दुर्बल हो जाता है. अतः वह जमीन पर सोना पंसद करते हैं और मौत को निमंत्रण दे डालते हैं. बताते हैं कि करैत पहले कभी व्यक्ति को नहीं काटता. जमीन पर सोया व्यक्ति करवट बदलता है या फिर हाथ-पांव हिलाता है तो करैत हमले की आशंका से उसे काट लेता हैं. जशपुर में जितनी अधिक ठंडक रहती है उससे अधिक गर्मी भी पड़ती है. तेज धूप से बचने के लिए सर्प दीमक की बांबियों में चले जाते हैं. इन्ही बांबियों में करैत की मादा अंडे देती है और फिर जैसे ही वर्षा की पहली फुहार पड़ती है सैकड़ों की संख्या में रेंगते हुए सपोले बाहर निकल आते हैं. जिसे जहां जगह मिलती है भागता है. सर्प झोपडियों में शरण ले लेते हैं और फिर शुरू हो जाता है नागलोक में मौत का तांडव. वर्षा ऋतु में दीमकों के टीले ढहने के उपरांत सांपों को भोजन के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है. शिकार की तलाश में निकले मृत्यु के ये दूत, पांव से दबने, बाधित होने पर काट लेते हैं.
 
खैर.. अब हमारे सामने वह लड़कियां उपस्थित होने वाली थी जो किसी जड़ी-बूटी के सहारे सांपों को पकड़ने का काम करती थी. गांव के सरपंच ने हमारे बैठने के लिए दो खाट की व्यवस्था कर दी थी. एक छायादार पेड़ के नीचे हमारी खाट लगी हुई थी और अवंती और रंभावती नाम की दो जवान लड़कियां टीवी कैमरे के सामने अपना जौहर दिखाने को तैयार थी. सांप-सांप और केवल सांप के बारे में सोच-सोचकर मैं इतना ज्यादा परेशान हो चुका था कि मुझे लड़कियों की आंखे भी भूरी-भूरी सी लगने लगी थी. मैं श्रीदेवी की फिल्म नगीना की याद करने लगा. मैं फिल्म के हिट होने के कारणों के बारे में सोच ही रहा था कि दोनों लड़कियों ने झट से अपने ब्लाउज के भीतर हाथ डाला और दो सांपों को निकालकर हमारी ओर उछाल दिया. सांप हमारे ऊपर तो नहीं गिरा लेकिन हमारी सिट्टी-पिट्टी गुम हो गई. बाद में लड़कियों ने हमें बताया कि उनके पास गरूड़ जड़ी है जिसकी खूश्बू से सांप उनके वश में हो जाता है. मुझे गरूड़ जड़ी पर यकीन तो नहीं हुआ लेकिन यह जरूर सोचता रहा कि साला..ब्लाउज के भीतर सांप क्या करता होगा.

मैं जानता हूं आप मुस्कुरा रहे हैं.. सोच रहे होंगे साला लेखक बदमाश है. हकीकत तो यही है मित्रों कि जिसे आप पढ़ रहे हैं उसका जीवन कई तरह के खट्टे-मीठे रंगों से भरा हुआ है. कभी आपको नक्सलियों के साथ पांच दिन व्यतीत करने और वहां हुई गोलीबारी की घटना के बारे में भी जरूर बताऊंगा.

खैर.. कुछ और गांवों को घूमने के बाद हमें इलाके में उड़ीसा के बरगढ़ क्षेत्र से आया हुआ एक आदमी मिला. नाम था-कविलास सिदार. श्री सिदार ने बताया कि वह अक्सर सांपों को पकड़ने के लिए फरसाबहार आता है। उसके चेले भी यही काम करते हैं। सांपों को पकड़कर क्या करते हैं पूछने पर उसने बताया कि एक आदमी उससे आकर मिलता है वह उसे एक से दो हजार रूपए लेकर सांप बेच देता है। सिदार की बातों ने इस बात को पुष्ट कर दिया कि क्षेत्र से खासा जहर उगलने वाले सांपों की जमकर तस्करी भी हो रही हैं।

हमारी स्टोरी पूरी हो चुकी थी. कैमरे में कई तरह के सांप कैद थे ( हाल-फिलहाल जो फोटो प्रकाशित हुए हैं वह गुगल से साभार लिए गए हैं) हम शर्माजी को धन्यवाद देकर लौट रहे थे. हमने तय किया था कि अब दोपहर का भोजन नागलोक से बाहर निकलकर ही करेंगे. जल्द से जल्द नागलोक छोड़ देने की सूचना से शैलू बहुत खुश था लेकिन मैं उसे थोड़ा और परेशान करना चाहता था. रास्ते में कुछ सपेरों ने हमारी गाड़ी को हाथ देकर रोका. मैंने अपने विशेषाधिकार का प्रयोग करते हुए सपेरों को गाड़ी में बिठा लिया. अब हम सब सांपों के साथ चल रहे थे.रास्ते में सपेरों ने बताया कि उनके पास चार सांप ऐसे हैं जिनका जहर निकाला जा चुका है लेकिन दो सांप ताजा-ताजा पकड़े गए हैं जिनका जहर निकालना बाकी है. शैलू... मुझे कोसता हुआ सहमा-सहमा सा बैठा रहा. जब सपेरे हमें धन्यवाद देकर गाड़ी से उतर गए तब जाकर वह थोड़ा नार्मल हुआ. गाड़ी जब सपेरों को छोड़ने के बाद थोड़ा आगे बढ़ी तब अचानक सुधीर चीखा- अरे... साला.. सपेरे अपने दोनों सांप तो यही छोड़ गए हैं. शैलू की आंखे फट गई.. उसने गुस्से में गाड़ी रूकवा दी और वह दूसरी गाड़ी से घर पहुंचने की धमकी देने लगा. काफी मिन्नत के बाद हमारे साथ जाने को तैयार तो हो गया लेकिन घर पहुंचते-पहुंचते तक उसे बुखार चढ़ चुका था.

Monday, July 5, 2010

मौत का पैगाम (भाग-2)


पाठकों आपको थोड़ा कष्ट हुआ उसके लिए क्षमा लेकिन क्या करता, पिछले कुछ दिनों से बीएसएनएल का नेट परेशान कर रहा है. अब भी कब टें बोल जाएगा कुछ कहा नहीं जा सकता। खैर....एक बार फिर मैं आपको नागलोक लिए चलता हूं.

भोजन पकाने के लिए जाने से पहले चौकीदार ने हमसे पूछा था कि हम लोग क्या खाएंगे. मैंने भी मजाक ही मजाक में कह दिया था कि सांप को छोड़कर कुछ भी चलेगा. चौकीदार हंसता हुआ अपने काम में जुट गया था. इस बीच मेरा कैमरामैन सुधीर कैमरे की बैटरी को चार्ज करने में लग गया जबकि सहायक शैलू पुराने अखबार की तलाश में निकल गया. थोड़ी देर बाद जब शैलू लौटा तो उसके हाथ में लगभग एकाध किलो पुराना अखबार था.शैलू ने आते ही पूरे घर के बल्ब बदल डालूंगा वाले अन्दाज में कहा- अब देखता हूं सांप कैसे आता है।

मैंने शैलू से पूछा- क्या कागज जलाने से सांप नहीं आएगा.


उसने मुझे बताया कि वह कागज जलाएगा नहीं बल्कि दरवाजे-खिड़की और उसके आसपास दिखने वाले तमाम तरह के होल(छेद) को बंद कर देगा. मैं विश्रामकक्ष में अपने सोने वाले स्थल का मुआयना कर बरामदे में बैठकर इधर-उधर की बकवास सोच रहा था. विश्रामगृह के कमरे में गया शैलू अचानक बड़ी तेजी से बाहर निकला और चिल्लाने लगा- अरे इसकी मां की आंख.. साला... अखबार के अन्दर से भी सांप निकल रहा है.

मैं भी हड़बड़ाकर उठा. कहां है पूछने पर वह मुझे भीतर ले गया. सुधीर दौड़कर चौकीदार को बुला लाया. अखबार को इधर-उधर पलटने पर पता चला कि एक छिपकली थी जो शायद अखबार के बीच में दबकर काफी पहले मर चुकी थी. मैं और सुधीर जोर-जोर से हंसने लगे. अब शैलू हमारे टारगेट में था. जरा सी कोई बात होती तो हम लोग चिल्ला उठते- देख शैलू... संभल.. सांप। पुराने अखबारों से सांप को दूर रखने का उपाय खोजने वाले शैलू को जब मैंने बताया कि कमरे के अन्दर के सारे होल तो तुम बंद कर दोगे लेकिन अंग्रेजों के जमाने में बने रेस्ट हाउस के ऊपरी हिस्से में बनी खिड़की को कैसे बंद करोगे, कहीं सांप वहीं से आ गया तो. शैलू एक बार फिर घबरा गया. शैलू की परेशानी देखकर सुधीर भी मजे लेने लगा. सुधीर ने कहा कि जब सांप फिल्म नागिन में बदला लेने के लिए बिजली के तार पर चलकर सुनीलदत्त को मारने पहुंच सकता है तो फिर कुछ भी हो सकता है. उसने शैलू से सवाल किया कि क्या उसने कभी सांप को मारा है. शैलू ने बताया कि एक बार उसके घर सांप निकला था तो एक नेपाली को बुलाकर सांप को मारा गया था.

बस... बेटा.. तेरा तो काम तय है. तेरे को पता नहीं है कि जो कोई भी सांप को मारता है सांप की प्रेमिका बदला लेती है. तेरे को बड़ी स्टाइल से नागिन ने यहां जशपुर में बुलवा लिया है. अब तो तू नहीं बचेगा.
अरे.. पर सांप को तो नेपाली ने मारा था न
हां... लेकिन उसे मरवाने वाला तो तू था न. साजिश करने वाले की फोटो ही नागिन अपने आंख में रखती है. बस तू गया.
मुझे दोनों की नोंक-झोंक में मजा आ रहा था.

इस बीच गरमा-गरम भोजन आ गया.  भोजन करने के बाद हम शर्माजी का इन्तजार करने लगे. शर्माजी रात 11 बजे आने वाले थे. 11 बजने से कुछ मिनट पहले ही  वे  तीन-चार टार्च लेकर हमारे पास पहुंच गए.
अब हम लोग निकल पड़े मौत का तांडव मचाने वाले सांपों को   देखने. शर्माजी ने मुझसे पूछा कि पहले कौन सा गांव देखना चाहेंगे... हमने आगे का  सारा फैसला उन पर छोड़ दिया था.

कुछ देर बाद हम अन्धेरे में डूबे एक गांव में पहुंचे. शर्माजी टार्च जलाकर एक झोपड़ी के भीतर चले गए. कुछ देर बाद निकलकर उन्होंने हमें बताया कि ग्रामीण ने दो बड़े सांपों को पकड़कर रखा था लेकिन कल ही कोई आकर ले गया है. उनकी बातों से लगा कि सांपों की कई तरह की प्रजाति होने के कारण उनकी तस्करी का धंधा भी जोरों पर चलता होगा.

पहले ही गांव में मिली असफलता के बाद जब हम दूसरे गांव पहुंचे तो पता चला कि गांव में किसी को सांप ने काट लिया था, सो गांव के अधिकांश लोग अस्पताल गए हुए थे. तीसरे गांव में प्रवेश के पहले एक तालाब पड़ता था. शर्माजी जो गाड़ी के सामने बैठे हुए थे, उन्होंने अचानक गाड़ी को रूकवा दिया और धीमे कदमों से चलने का निर्देश दिया. शर्माजी एक जगह थोड़ा झुककर बैठ गए. हम लोगों ने भी वही किया. शर्माजी ने जब टार्च जलाई तो दृश्य बड़ा डरावना था- लंबाई में काफी बड़ा एक सांप फन फैलाए खड़ा हो गया था. टार्च और कैमरे की बैटरी की रोशनी में सुधीर जब अपने शाट बनाने लगा तो सांप बड़ी तेजी से एक बेशरम की झाड़ी मे जा छिपा.

कुछ देर और इधर-उधर की खाक छानने के बाद यह तय हुआ कि हम लोग अब अल-सुबह सांपों को देखने के लिए निकलेंगे। विश्रामगृह में लौटते हुए बातचीत के दौरान पता चला कि जशपुर का कुछ हिस्सा बिहार की सीमा को छूता है.श्री शर्मा बिहार के गुमला जिले के कुरडेग महाविद्यालय में अर्थशास्त्र के विभागाध्यक्ष हैं. जशपुर जिले की सर्पदंश विभीषिका पर गहन शोध करने वाले श्री शर्मा ने बताया कि जशपुर में सांप इसलिए भी अधिक है क्योंकि यहां की जमीन थोड़ी रेतीली है. चिकनी मिट्टी में सांप चल नहीं सकता. टीलेनुमा भूमि, बांबियों के साथ-साथ आहार के रूप में मेढ़क, दीमक और चीटिंयों के अंडों की माकूल व्यवस्था के कारण सांपों को यहां की जमीन रास आती है. श्री शर्मा ने बताया कि सर्पदंश का उपचार करने के मामले में यहां का स्वास्थ्य विभाग पूरी तरह लचर साबित हुआ है. अस्पतालों में पर्याप्त मात्रा में दवाईयां ही नहीं रहती. कभी-कभी किसी मरीज को दो तीन एम्पूल देना पड़ता है तो डाक्टर इस बात के लिए परेशान हो जाते हैं कि दूसरे मरीज को क्या देंगे. सांप के काटने से जिस व्यक्ति की मौत हो जाती है शासन उसे मुआवजे के तौर पर 20 या 25 हजार रूपए की राशि तो देती है लेकिन यह पैसा भी पीड़ित पक्ष तक नहीं पहुंच पाता है.

( पाठकों... बस आपको एक और कड़ी का इन्तजार करना पड़ेगा... दरअसल इस कहानी को लिखते हुए खुद को भी अच्छा लग रहा है सो थोड़ा विस्तार का मोह छोड़ नहीं पा रहा हूं. अरे भाई मैं तो वैसे भी इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए स्टोरी करने गया था, सो ब्रेक का तो अधिकार बनता है न... चलिए मिलते हैं ब्रेक के बाद)

Sunday, July 4, 2010

मौत का पैगाम

वर्ष 2000 में जब छत्तीसगढ़ राज्य़ का निर्माण हो रहा था तब कुछ अमीरों को दिल्ली के मीडिया दिग्गजों ने यह सलाह दे डाली थी कि यदि एकाध चैनल का काम संभाल लोगे तो बल्ले-बल्ले हो जाएगी। शायद इसी चक्कर में मेरे एक परिचित ने जी टीवी का कामकाज देखने के लिए कैमरा और कुछ जरूरी उपकरणों को खरीद लिया था। चूंकि परिचित का लोहे से संबंधित बड़ा कारोबार था सो उसने चैनल का कामकाज संभालने की जवाबदारी मुझे सौंप दी। प्रिंट मीडिया को लगातार सेवाएं देते रहने के कारण मुझे भी लगने लगा था कि एकाध बार आबो-हवा बदलने में कोई बुराई नहीं है, इसलिए जी टीवी वालों से सीधा जुड़ाव नहीं होने के बावजूद मैंने कुछ समय के लिए इलेक्ट्रानिक मीडिया के लिए काम करना मंजूर कर लिया.

जिन दिनों मैं दुर्ग से छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर आया उन दिनों मात्र दो ही चैनल वाले यहां कार्य करते हुए दिखाई देते थे, एक प्रवीण था जो ईटीवी के लिए काम कर रहा था तो समरेंद्र नाम का एक युवक यही अवंति विहार में एक बड़ा सा रूम लेकर दिल्ली के एक नेता के चैनल रोजाना के लिए कार्यरत था। हां... भोपाल का एक युवक गोविन्द साहू भी था जो सभी चैनलों को किसी एजेंसी के जरिए खबरें भेजता था.

खैर.. एक रोज अमीर परिचित ने मुझसे कहा कि- यार दिल्ली वाले साफ्ट लेकिन धमाकेदार स्टोरी चाहते हैं, क्या ऐसा हो सकता है.परिचित के नाम से दिल्ली वालों को कुछ स्टोरी आइडिया फैक्स करने और वहां से ओके हो जाने के बाद हम लोग निकल पड़े जशपुर जिले के नागलोक की ओर।

नागलोक यानी बागबहार, बगीचा, फरसाबहार, कांसाबेल, कुनकुरी, तपकरा, पत्थलगांव और नारायणपुर. इन इलाकों में कई प्रजातियों के सांप पाए जाते हैं. बरसात की शुरूआत होते ही इन इलाकों के सांप यहां रहने वाले ग्रामीणों के लिए मौत का पैगाम लेकर निकलते हैं. एक निश्चित आंकडा तो किसी के पास नहीं है लेकिन एक अनुमान है कि गत एक दशक में यहां लगभग एक हजार से ज्यादा लोगों की मौत केवल सांप के काटने की वजह से ही हुई है।

वैसे तो प्रदेश के वन भैसों, शेर, हिरण, जंगली कुत्तों, गौर, सफेद भालूओं के अलावा मैंने मनुष्य के भीतर मौजूद सांपों पर कई तरह की स्टोरी की है,लेकिन वास्तविक सांपों से रू-ब-रू होने का यह मेरा पहला मौका था। मैं इस मौके को खोना नहीं चाहता था सो एक ढाबे में खाना खाने के बाद कैमरामैन सुधीर, वाहन चालक और एक सहायक शैलू के साथ मैं निकल पड़ा नागलोक की ओर. इस बीच रास्ते में चलते हुए हमने सांपों के आकार-प्रकार और उनकी विविधता को लेकर खूब चर्चा की। मेरे कैमरामैन ने कहा-भाईसाहब यदि सांप नहीं होता तो क्या होता। मैंने उसे बताया कि यदि सांप नहीं होता तो शायद लोग आस्तीन में सांप नहीं पालते। सांप निकल जाने के बाद लकीर नहीं पीटते। निर्माता नागिन, नागकन्या, नागमणि, नगीना और एनाकोण्डा जैसी फिल्में ही नहीं बनाते। एक निर्माता ने हद कर दी थी. उसने दो सांपों को ढोलक के पास बिठवाकर उनकी पूंछ से ढोलक बजवा दिया था. वाकई सांप नहीं होते तो सपेरों का पेट कैसे भरता. नागपंचमी के दिन हम किसे दूध पिलाते और तो और यदि सांप नहीं होता तो हिरोइन को उस जगह नहीं डंसता जहां हीरो मुंह लगाकर खून चूसता और फिर आंखो ही आंखो में प्यार होने दो गाना गाया जाता. सो सांपों की अपनी महिमा है.

सांपों के द्वारा बदला लिए जाने, लड़की के सांप बन जाने और भी न जाने कितनी तरह की मनोहर कहानियों पर उपलब्ध कहानियों की चर्चा करते हुए ज्यों ही हमने तपकरा क्षेत्र में प्रवेश किया, तेज बारिश होने लगी. मुझे पता था कि यहां सांप बारिश में ही निकलते हैं, मैंने कैमरामैन से कहा कि वह अपना कैमरा तैयार रखें. इससे पहले कि सुधीर अपने बैग से कैमरा निकाल पाता एक विचित्र घटना हो गई। कही से एक सांप हमारी सूमो की बोनट पर धम्म से आ गिरा. ड्राइव्हर का संतुलन बिगड़ गया और हमारी गाड़ी एक पेड़ से जा टकराई. हालांकि गाड़ी की स्पीड इतनी नहीं थी कि कोई नुकसान होता लेकिन इतना धक्का तो जरूर लगा था कि सब हिल गए. सांप और वाहन चालक को कोसने के बाद ज्यों ही हमने जमीन पर पैर रखना चाहा वहां का दृश्य देखकर चीख निकल गई. यहां भी चार-छह सांप हमारा इन्तजार कर रहे थे.

उम्मीद नहीं थी कि सांपों से कुछ तरह से मुलाकात होगी. सांपों को लेकर जो मजाक गाड़ी में चल रहा था वह काफूर हो गया. शाम के धुंधलके में ही जब हमने एक ग्रामीण को रोककर यह पूछा कि क्या यहां रूकने के लिए कोई होटल वगैरह है तो उसने जनजातीय ग्रामीण विकास समिति तपकरा के अध्यक्ष डाक्टर अजय शर्मा के घर की ओर इशारा कर दिया. जब हमने शर्माजी को अपने तपकरा पहुंचने का प्रयोजन बताया तो वे खुश हुए. श्री शर्मा ने सांपो-सरिसृपों को लेकर काफी काम किया है. वे यहां के ग्रामीणों को सांपो से बचने का तौर-तरीका भी सिखाते रहे हैं. उनके प्रयासों से हमें एक सरकारी विश्राम कक्ष में जगह मिल गई। जब हम विश्राम कक्ष पहुंचे तो वहां मौजूद चौकीदार ने हमें हिदायत देते हुए कहा कि साहब आप लोग जब विश्राम करें तो दरवाजे के नीचे पुराने अखबार से पैकिंग जरूर करें। थोड़ी सी जगह पाकर सांप अपना काम करने चले आता है। जब चौकीदार यह बात बता रहा था तब हम लोग विश्रामगृह के बरामदे में कुर्सी डाले बैठे थे. चौकीदार के इतना कहते ही सारे लोगों ने अपने पांव कुर्सी के ऊपर कर लिए.

कैमरामैन सुधीर बोला-सोनी जी लगता है आज फंस गए... जल्दी स्टोरी करो और निकल लो.

हमारी परेशानी को देखकर शर्माजी ने हमारा हौसला बढ़ाया. उन्होने कहा कि अरे साहब मैं कई सालों से यहां रह रहा हूं लेकिन मुझे आज तक सांप ने नहीं काटा. सांप भी उसे ही काटता है जब उसे यह लग जाता है कि उसकी जान खतरे में हैं। शर्माजी से कुछ सुनने-समझने के बाद यह तय हुआ कि हम लोग रात के अन्धेरे में ही मौत का तांडव मचाने वालों का कारनामा देखने के लिए निकलेंगे.


हम काफी थके हुए थे और हमें भूख भी लग रही थी. चौकीदार हमारे लिए खाना पकाने में लग गया था. शर्माजी रात 11 बजे मिलने का वादा कर अपने निवास लौट गए.

( आगे क्या-क्या हुआ यह जानने के लिए आपको इन्तजार करना पड़ेगा... मिलते हैं एक ब्रेक के बाद)

Friday, July 2, 2010

गैरजरूरी प्रार्थनाएं

आकाश और धरती में
विराजमान करोड़ो देवताओं से
मां करती है प्रार्थना
हे प्रभु टिमटिमाता रहे
लाल तारा माथे पर
सुहाग अमर रहे मेरा

फटी हुई बनियान को
पीठ पर रगड़ते हुए
पिता बड़बड़ाते हैं
हे नीली छतरी वाले रख लेना लाज

दो बेटे आवारा निकल गए
तीसरे का चाल-चलन कुछ ठीक नहीं है.

चाहे श्रीदेवी  हो
माधुरी दीक्षित
या फिर भोले शंकर का
बड़ी बहन
सुबह-शाम
हर कैलेंडर के सामने चार अगरबत्ती
खौंसकर रोने लगती है-

उम्र पक गई है चावल की तरह
अब तो कोई अच्छा सा लड़का भेज दो भगवान.

छोटा भाई
हर रोज अभिताभ की तरह
 
घूरता हैभगवान को
शायद कहता होगा
नौकरी दोगे तब तो एक्सपीरियंस आएगा न
जब पुराने खुसट मर जाएंगे
क्या तब मिलेगा ठिकाना


अरे हां..
अपनी प्रार्थना के बारे में तो
बताना भूल ही गया


मैं चाहता हूं

मां-बाप, बहन- भाई की प्रार्थना पर
प्रभु थोड़ा जल्दी विचार करें

लेकिन लगता है कि प्रभु के पास
पहले से ही काफी लोगों ने

प्रार्थनाओं का आवेदन
लगा रखा है.
शायद इसी एक वजह से
सारी जरूरी प्रार्थनाएं
हो गई है गैर जरूरी.


Thursday, July 1, 2010

कथरी

अपनी पुरानी साड़ियों और इधर-उधर की
चिन्दियों को जोड़कर
मां ने इसलिए नहीं बनाई थी कथरी कि
हम गरीब थे.


जब कभी भी हम पांच भाई
लड़-झगड़कर
जमा लेते थे पूरे बिस्तरों पर कब्जा
तब मां अपनी कथरी निकालकर
लेट जाया करती थी जमीन पर.


शायद जमीन पर लेटकर ही मां ने
अपने चौरासी करोड़ देवताओं से यह

दुआ मांगी थी उनके बेटे
जल्द से जल्द आसमान की ऊंचाईयों को छू ले.


जब मैं कुछ बड़ा हुआ और मुझे लगने लगा कि
मां को लग सकती है सर्दी तब

 जिद करके मैं भी सोने लगा कथरी पर.

कथरी पर लेटने के बाद ही मुझे पता चला कि
मेरी मां किस गांव से आती है।
जब पैदा हुआ था तब कौन सा त्योहार आगे-पीछे था
मां के गांव की नदी उनके घर का चरण स्पर्श करने
कैसे चले आती थी
मेरे मामा फौज मे क्यों चले गए
गांव से थोड़ा बाहर आम का बगीचा
कहां पर है
शिवजी के मंदिर के बाहर
बैल क्यों बैठे रहता है.
नदी में बर्तन कैसे तैरते हैं.


कथरी पर लेटकर जब मैं
पहाड़ों पर चढ़ता-उतरता था
तब चुपके से मां का हाथ
मेरे माथे पर पहुंचता
और मेरा बुखार तपासने के बाद
रोटी सेंकने के लिए चला जाया करता था.


घर में बनने वाली पहली रोटी भी
मुझे इसलिए खिलाई जाती थी क्योंकि
मैं कथरी पर सोता था.


कथरी की वजह से घर में झगड़े भी बहुत हुए
सुविधाओं का हवाला देकर पिता ने हमेशा
कथरी पर व्यंग्य कसा और
जमकर कोसा मां के खानदान को.


भाइयों ने भी हिकारत का भाव कायम रखा
क्योंकि किसी ने उनके दिमाग में
यह बात बिठा थी कि
गरीब आदमी ही सोता है कथरी पर.


मुझे फकीर और गरीब की संज्ञा से नवाजने वाले
भाइयों को क्या मालूम था कि
मैं कितने फायदे में हूं.


एक रोज जब मैंने कथरी का धागा तोड़ा
तब पता चला कि
मां ने हम सबकी खुशहाली के लिए
भगवान की भभूत को
कथरी के भीतर ही कहीं बांध रखा था.


भभूत के साथ ही एक चिट्ठी भी चस्पा थी
जिस पर  लिखा हुआ था-

हे भोले भंडारी दुनिया की बलाओं से मेरे बच्चों को 
बचाकर रखना.

अब जाकर लगता है कि
कथरी नहीं होती तो शायद
मां के विश्वास से मेरा परिचय
नहीं हो पाता.

उस विश्वास से
जिसमें छिपी हुई थी हमारी  तरक्की.