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Tuesday, June 29, 2010

अपने मोहल्ले की लड़कियों के बारे में

लगता है कि मैं एक बार फिर कविताओं की ओर लौटने लगा हूं। यह सही हो रहा है या गलत मैं नहीं जानता, बस इतना कह सकता हूं कि एक छटपटाहट ने घेर रखा है जिससे मुक्त होना थोड़ा कठिन लग रहा है। पिछले कुछ समय से मैं लगातार बेचैन चल रहा हूं। यह कब तक  चलेगा कुछ कहा नहीं जा सकता। जो लोग कविता लिखते हैं वे मेरे बारे में अपनी यह राय जरूर कायम कर सकते हैं कि एक बेवकूफ था जो इधर-उधर अपनी फजीहत करवाने के बाद घर लौटकर आ गया है।

अपने मोहल्ले की लड़कियों के बारे में

एक लड़की
सीखने जाती है
सिलाई मशीन से
घर चलाने का तरीका


एक लड़की
दिनभर सुनती है
लता मंगेशकर का गाना


एक लड़की
सुबह  भाई को
स्कूल छोड़ती है
और.. पिता को अस्पताल



एक लड़की
छत पर खड़े होकर
पतंग को कटता देख

लगती है रोने

एक लड़की

शिकाकाई से धोए बालों को
मुस्कुराकर सुखाती है आंगन में

एक लड़की

छज्जे पर केवल कंघी-चोटी
करते हुए ही आती है नजर


एक लड़की
 
हटती ही नहीं है.
आइने के सामने से


एक लड़की 
छोटी सी छोटी बात पर
हो जाती है परेशान
और पोंछते रहती है  पसीना 

एक लड़की
जरा सी गलती पर
गिलहरी की तरह
कुतरती है
दांतो से नाखून


एक लड़की
 
छोटे बच्चों को
पढ़ाती है ट्यूशन


एक लड़की
हर रोज चढ़ाती है

तुलसी को एक लोटा पानी

एक लड़की

किसी न किसी  घर
थाली पर अपने हुनर का घूंघट ओढ़ाकर

ले जाती है मीठे-मीठे पकवान

एक लड़की
हर तीसरे दिन
किसी अन्जान आदमी को

गाना सुनाती है
सितार बजाती है
और बताती है
चिड़ियां उसने बनाई है

तोता भी उसका बनाया हुआ है.

मेरे मोहल्ले में कुछ लड़कियां चश्मा पहनती है
कुछ मेहन्दी लगाते रहती हैं


आप सोच रहे होंगे कि
अच्छा लड़कीबाज आदमी है
जो लड़कियां देखते रहता हैं

क्या करूं साहब..
जिस मोहल्ले में रहता हूं वहां
कुछ इसी तरह की लड़कियां रहती है
इन लड़कियों में से कोई न कोई 
लाल रिबन बांधकर
झम से आ खड़ी होती है 
मोटर साइकिल के सामने
और थमा जाती है किसी न किसी
ईश्वर का प्रसाद.

मैं अपने मोहल्ले की लड़कियों को 
घूरता नहीं... देखता हूं 



हर रोज ... देर रात 
जब मैं लौटता हूं अखबार के दफ्तर से
तब लड़कियां सीरियल देखकर 
सो चुकी होती हैं

मैंने अब तक  मोहल्ले की
किसी भी लड़की को
काली कार से उतरते हुए नहीं देखा है. 

Sunday, June 27, 2010

ब्लाग जगत के दोस्तों आपका बहुत-बहुत धन्यवाद

कहते हैं कि जिस किसी भी ब्लागर की 100 पोस्ट पूरी हो जाती है वह ढक्कन खोल लेता है। आज से तीन साल पहले जब लगातार ढक्कन खोलने की स्थिति कायम थी तब यदि 10 पोस्ट भी पूरी हो जाती तो शायद मैं जश्न मना लेता लेकिन अब वह स्थिति नहीं है कि अभिताभ बच्चन बनकर कहा जाए-आज इतनी भी मयस्यर नहीं पैमाने में... कभी छोड़ दिया करते थे मैखाने में।

खैर.. मेरे जो साथी इस खुशी में ढक्कन खोलना चाहे उनका स्वागत है। हरकीरत हीर जी ने अपनी एक रचना में वाइट मिसचीफ का उल्लेख किया है। लोग इसका इस्तेमाल दिन में भी कर सकते हैं। कभी वाइट मिसचीफ से अपनी नातेदारी थी सो जो मित्र इसे ग्रहण करना चाहेंगे मैं उन्हें तरीका बता दूंगा। हां.. इसका ज्यादा सेवन नहीं करना है। अत्यधिक सेवन के बाद कई बार हीरो होंडा में जाने वाला आदमी रिक्शे में नजर आता है।

 मैंने अपनी पहली पोस्ट पांच जनवरी 2010 को लिखी थी। लिखी क्या थी, जो कुछ अखबार में बतौर कालम छप रहा था उसे एक दिन बाद मेरा विशिष्ट सहयोगी अजय सक्सेना ब्लाग पर डाल देता था। वैसे मेरे कालम को पढ़कर और शायद नाटकों को देखकर संजीव तिवारी ने इस बात के लिए दबाव बनाया था कि मैं अपना ब्लाग खोल लूं। कई दिनों तक तो मैं टाल-मटोल करता रहा लेकिन एक दिन संजीव की जीत हो गई। संजीव ने ही मेरे ब्लाग को व्यवस्थित करने का काम किया और अब भी मेरे आग्रह को वह अस्वीकार नहीं करता है। संजीव के साथ ही ललित शर्मा, बीएस पाबला और जीके अवधिया जैसे धुरंधर ब्लागरों का सहयोग भी मैं समय-समय पर लेता रहता हूं।

बहरहाल इन छह महीनों की यात्रा में कुछ से मेरा विवाद भी हुआ और सच कहूं तो अब जाकर लगता है कि कुछ ब्लागरों से मैंने जबरदस्ती का पंगा भी लिया। हालांकि इस पंगे के पीछे मेरी मंशा कभी भी किसी को नीचा दिखाने की नहीं थी लेकिन शायद जिस तरह से अनजाने में ही मोहब्बत हो जाती है वैसी ही गलतियां भी होती है। कुछ गलतियां खूबसूरत तो होती है। मैं मानता हूं कि जो गलती हुई वह खूबसूरत थी। इन खूबसूरत गलतियों ने मुझे सिखाया कि दुनिया को खूबसूरत तरीके से बनते हुए देखने के लिए दूसरों से मोहब्बत करने की कला आनी चाहिए।
अब मुझे सारे ब्लाग अच्छे लगते हैं। सोचता हूं सबकी अपनी मेहनत है। मुझे किसी की भी मेहनत को एक झटके में खारिज कर देने का क्या हक है।

जनवरी से जून तक का यह सफर थोड़ा कठिन तो गुजरा है लेकिन आप सबके प्रेम और प्रोत्साहन ने मुझे इस बात का भरोसा तो दिलाया है कि रात कितनी भी काली क्यों न हो उजाले को तो आना ही है। यदि ईश्वर ने चाहा तो इसी अगस्त महीने तक मेरी एक किताब छपकर आ जाएगी। अपनी बेकारी और मुफलिसी के दिनों में मैंने कुछ नाटक भी लिखे थे। मैं इन्हें भी व्यवस्थित करने में लगा हूं।

मैं अपने उन तमाम पाठकों का आभारी हूं जिन्होंने मेरे ब्लाग पर कुछ पल बिताना जरूरी समझा। नीचे कुछ ब्लागरों के नाम दे रहा हूं। इन ब्लागरों की टिप्पणी न होती तो शायद मेरा खून कुछ किलोग्राम नहीं बढ़ता।

आभार-अंबरीशजी, सविता भाभी, समीललाल समीर, संजीव तिवारी, गिरीश पंकज अजय सक्सेना, ललित शर्मा, जीके अवधिया, बीएस पाबला, श्याम कोरी उदय, सूर्यकांत गुप्ता, संगीता स्वरूप, कोमल रस्तोगी, वंदना गुप्ता,शिखाजी, हरकीरत हीर राजकुमार ग्वालानी, अनिल पुसदकर, संजीत त्रिपाठी, कृष्ण कुमार मिश्रा, देवसूफी राम बंसल अजय झा, राकेश पांडे, ताऊ रामपुरिया, अजय कुमार, जय कुमार झा,यशवंत धोटे, लीलाधर राठी, मो-सम-कौन जयप्रकाश मानस, शरद कोकास, दिनेशराय द्विवेदी, सुरेश चिपलूनकर, डाक्टर महेश सिन्हा,डाक्टर एम वर्मा, अविनाश वाचस्पति, रुपचंद्र शास्त्री, विवेक रस्तोगी,सतीश सक्सेना, दीपक मशाल, राजभाटिया, रवि रतलामी, अनुनाद सिंह, मिहिरभोज, संजय पटेल, मनीष कुमार, भारतीय नागरिक, अलबेला खत्री, देवेंद्रनाथ, हरिशर्मा, गिरीश बिलौरे, परमजीत बाली, रंजना, अनूप शुक्ल, रमेश शर्मा, अंतरयात्री, पंकज मिश्रा, कविता, नीरज, राजीव रंजन प्रसाद, हिमांशु, राहुल कौशल, सुमन, रानी विशाल संगीता पुरी, डीके शर्मा वत्स वाणी गीत,यशवंत मेहता सौमेंद्र विभाष झा,युवराज गजपाल अश्वनी केशरवानी, अजय त्रिपाठी, सूर्यकांतगुप्ता, राहुलजी डाक्टर अजीत गुप्ता, शिवकुमार मिश्रा,किशोरजी, जय सिंह, अखिलकुमार, सुधा प्रजापति, अक्षिता, रतनसिहं शेखावत, रजनीश सिंह परिहार, अनुराग मुस्कान, संध्या गुप्ता, अरशद अली, दिलीप, आशीष महेंद्र मिश्र , डाक्टर अजमल खान, सतीश चौहान, रशिम प्रभा, अरविंद, रशिम रवीजा, मयंक नरोत्तम, काजल कुमार, देवकुमार झा, अमित शर्मा, अनूप जोशी, सीमा गुप्ता, पीसी गोदियाल, नीरज गोस्वामी, अरूण सी राय, स्वप्निल कुमार आतिश, बेचैन आत्मा, डाक्टर सुभाष राय, पवन धीमान, रचना दीक्षित, रवि कुमार, आदेश कुमार पंकज, श्यामल सुमन, माधव, मनोज कुमार, वंदना गुप्ता, शैल मंजूषा अदाजी,पीएन सुब्रहमिणयम, शानू शुक्ला, दिगम्बर नासवा, निर्मला कपिला, रावेंद्र कुमार रवि, कौशल तिवारी, वाणी गीत, रामत्यागी, संतीश पंचम अनामिका, राजीव तनेजा, जरीन सिद्धकी, निशांत मिश्र, दिव्या, महफूज अली, गौरव अग्रवाल, महेंद्र आर्य, शेखर कुमावत, दर्शनलाल, खुशदीप सहगल, नितीश राज, जय, शाहनवाज, मीनाक्षी, सुलभ, परशुराम, महाशक्ति, बबली, प्रभाकर पांडेय नीरज कुमार सिंह, जाकिर अली, हिमांशु मोहन, डाक्टर अमर कुमार, नीशू तिवारी, मयूर मल्हार, मिथलेश दुबे, राजेंद्र मीणा, धीरू सिंह, सुनीत दत्त, अरविंद मिश्रा, अंतर सोहिल, शेफाली पांडेय, अनजाना, अदिति सक्सेना, अल्पना वर्मा, स्वाति, कुलवंत हैप्पी, मनोज, निलेश माथुर, संजय कुमार चौरसिया, दीपक, गिरीश केशरवानी, तारकेश्वर गिरी, दिवाकर मणि, अल्का, रंजन, अमरेंद्र त्रिपाठी, नीरज जाट, राहुल सिंह, आशा, पारूल, संजय भास्कर, राजेश, संजय तिवारी, पदमसिंह, पूनम, फिरदौस खान, निर्मला कपिला, रजनीश परिहार, अमरजीत, सतीश कुमार, छत्तीसगढ़ मानव, राजीव भरोल, भावेश, रोहित, कुश, कविता रावत, राकेश कौशिक, नवीन प्रकाश, गिरिजेश राव, नरेश सोनी, यौगेंद्र मौदगिल।
( और भी बहुत से नाम है... जिनके नाम छूट गए हैं उन सबसे क्षमा )

Saturday, June 26, 2010

एक सभा में

एक सभा में
तय हुआ कि
लोगों का चलना-फिरना
बंद कर दिया जाएगा


दबा दी जाएगी
हर चौराहे पर उठने वाली आवाज


कोई भी माई का लाल
नहीं बना पाएगा पंजों को मुठ्ठी


जनआंकाक्षाओं के पंडालों पर
लगा दी जाएगी आग


जो लोग
बोलेंगे शाकाहारी भाषा-शैली में


जो लोग
अनगिनत बलात्कारों के गवाह होंगे


जो लोग

मिलेंगे पुस्तकें पढ़ते हुए

जो लोग
लिखना चाहेंगे कुछ बेहतर


जो लोग
ठंडे चूल्हों को जलाने के लिए बनाएंगे माहौल


जो लोग
हां.. ऐसे तमाम लोगों के गले तक
भर दिया जाएगा छर्रा


टोपीवालों की एक सभा में
यह भी तय हुआ कि
मरने वालों के परिजनों को
दिया जाएगा पर्याप्त मुआवजा


और जो लोग चाहेंगे कि
हर मौत की निष्पक्ष जांच हो
उनकी तसल्ली के लिए
बनाया जाएगा आयोग भी।

ऋतु वर्मा


रूआबांधा भिलाई की एक श्रमिक बस्ती में रहने वाली पंडवानी गायिका ऋतु वर्मा से हर कला मर्मज्ञ भली-भांति परिचित है। मुफलिसी और अभाव का जीवन जीने के बाद भी ऋतु ने वेदमती शाखा की पंडवानी को एक नई ऊंचाई प्रदान करने का काम किया है।

छत्तीसगढ़ में पंडवानी की दो शैलियां ही पाई जाती है। कापलिक शैली में जहां गायक पूरी आजादी के साथ गाते हुए लोककथाओं और जातीय मिथकों को तोड़ता है तो वेदमती शैली में उसे शास्त्र सम्मत तरीके से अनुशासन बरकरार रखना पड़ता है। हालांकि अब लोककला को बढ़ावा देने वाली किसी भी मंडली से अनुशासन की उम्मीद करना बेकार ही है क्योंकि कहीं न कहीं कोई न कोई अपनी कला के बीच में पोलियो ड्राप का विज्ञापन करते हुए मिल ही जाता है। यदि यह प्रचार न भी हुआ तो अचानक महाभारत की कथा में आप एड्स से बचने का उपाय भी सुन सकते हैं। बीड़ी जलई ले जिगर से पिया.. जिगर मा बड़ी आग है जैसी धुन तो अब हर बैंजो की शान बन गई है।

... तो ऋतु वर्मा वेदमती शाखा की गायिका है। हालांकि इस शाखा के सबसे बड़े सिद्धस्त झाडूराम देवांगन को माना जाता है। हालांकि ऋतु ने कभी झाडूराम देवांगन को अपना गुरू नहीं माना लेकिन जब पांच साल की थी तब से उनका गायन सुनती रही है। ऋतु के पिता किसी समय लोगों के घरों में जाकर खटिया (नारियल की रस्सी वाली खाट) बुनने का काम करते थे तो ऋतु की मां परिवार के गुजर-बसर के लिए मेहनत- मजदूरी किया करती थी।


हालांकि रूआबांधा का इलाका अब पहले जैसा नहीं रहा। अलग-अलग पार्टी के नेताओं की कृपा से इस बस्ती का कायाकल्प हो चुका है और थोड़े बहुत पक्के मकान भी बन गए हैं। लेकिन मोटे तौर पर इस बस्ती में अब भी रोज कुआं खोदकर पानी पीने वालों का ही बसेरा है। इस बस्ती के ठीक बाजू में भिलाई इस्पात संयंत्र में काम करने वाले लोगों के बनाया गया रूआबांधा सेक्टर भी है। यदि दल्ली राजहरा को लोग लौह अयस्क के भंडार होने के अलावा मजदूर नेता शंकर गुहा नियोगी के कर्मक्षेत्र के रूप में पहचानते हैं तो रूआबांधा सेक्टर की पहचान भी मात्र इसलिए है क्योंकि इससे सटी हुई बस्ती में प्रसिद्ध पंडवानी गायिका ऋतु वर्मा रहती है।

.. तो बस्ती के मजदूर जब थक हारकर अपने घर लौटते थे तो पाते थे कि पांच बरस की एक छोटी सी गुड़िया हाथ में इकतारा( तंबूरा) पकड़कर महाभारत की कथा को बांच रही है। जल्द ही ऋतु को बंसतराम नायक एवं गुलाबदास मानिकपुरी जैसे दो सिद्धस्त गुरू मिल गए। ऋतु ने इन गुरूओं की सानिध्य में पंडवानी गायन का शास्त्र सम्मत तरीके से गायन प्रारंभ किया। ऋतु ने अपने जीवन का सबसे पहला और शायद सबसे बड़ा कार्यक्रम भी अपनी बस्ती के बजरंग चौक में दिया था। यह एक ऐसा कार्यक्रम था जिसकी गूंज एक बस्ती से दूसरी बस्ती और फिर शहर में होने लगी थी।

कहते हैं कि कलाकार जब पूरी दुनिया से प्रेम करता है तो वह निज की दुनिया में प्रेम चाहता है। पंडवानी गाते-गाते ऋतु कब बड़ी हो गई यह उसके अभिभावकों को पता ही नहीं चला। वे तो इस बात से ही खुश थे कि उनकी बेटी एक स्टेज से उतरती ही नहीं है कि दूसरा स्टेज उसका अगवानी को तैयार हो जाता है, लेकिन ऋतु अपनी ही बस्ती के एक लड़के मंगेश से दिल लगा बैठी। ऋतु ने जब अपने अभिभावकों की परवाह किए बगैर मंगेश से विवाह किया तो हर खबर में सनसनी ढूंढ़ने वाली मीडिया ने विवाह को प्रोत्साहित करने के बजाए तिल का ताड़ बना डाला। गोया प्रेम करना अपराध हो और प्रेम करने के बाद विवाह करना तो जैसे महापाप हो। ऋतु की शादी का मामला पहले थाने पहुंचा फिर कोर्ट-कचहरी होते हुए उस बस्ती में जा पहुंचा जहां वह अपने परिजनों के साथ रहती थी। अब ऋतु का ससुराल भी वहीं है और मायका भी दो कदम की दूरी पर है। नए जीवन के इस सफर में अब उसके साथ उसका पति तो है ही उसका बेटा भी शामिल हो गया है।

मां जब पंडवानी गाने बैठती है तो हनी (ऋतु का बेटा) ही उसे तंबूरा लाकर देता है। सब कुछ ठीक-ठाक चल रहा है। ऋतु नियमित रूप से प्रोग्राम देती है और घर-परिवार को संभालती भी है। प्रेम विवाह के बाद परिवार वालों ने कुछ दिनों तक दूरी बना रखा थी लेकिन अब सब कुछ सामान्य हो गया है। अपने जीवन से तो ऋतु खुश है लेकिन छत्तीसगढ़ की लोक संस्कृति पर मंडराते खतरे को लेकर वह चिन्तित है।

ऋतु कहती है कि आज से 15 साल पहले जब वह पंडवानी गाने जाती थी तो उसे सुनने के लिए गांव का गांव उमड़ पड़ता था लेकिन अब ऐसा नहीं होता। कहीं-कहीं भीड़ तो मिल जाती है लेकिन आत्मीयता नहीं मिलती। ऋतु इसका कारण टीवी को मानती है। वह कहती है कि हर चैनल में इतनी चटपटी बातें चलते रहती है कि कोई अब महाभारत की कथा को सुनना नहीं चाहता। लोककला के नाम पर हर दुकान गंदे गानों और फूहड़ कैसटों से अटी पड़ी हुई है इसके कारण भी लोकगायकों का कद छोटा हुआ है। ऋतु को इस बात का भी दुख है कि वह किसी को पंडवानी नहीं सीखा पा रही है। ऋतु पंडवानी तो सीखाना चाहती है लेकिन लड़कियां डांस सीखना चाहती है। इंडियन आइडल में जाने के लिए तैयार होना चाहती है।

पद्मश्री तीजनबाई को मां का दर्जा देने वाली ऋतु बताती है कि जिन दिनों उसने गायन शुरू किया था उन दिनों तीजनबाई का काफी नाम हो चुका था। शुरूआत में जब एक दो बार मैंने उनसे मिलने की कोशिश की तो उन्होंने मुझसे कोई बातचीत नहीं की। शायद वे यह बतलाना चाहती थी कि अभी से उड़ो मत... पहले कुछ सीखो। बाद में एक अवसर ऐसा भी आया जब हमने एक ही मंच पर प्रस्तुतियां दी। मुबंई और ग्वालियर में हम साथ-साथ थे।

वैसे तो समीक्षक यह बात प्रचारित करते रहे हैं कि वेदमती शाखा का उदय कापलिक शाखा के विरोध स्वरूप हुआ है लेकिन ऋतु इस बात से इन्कार करती है। वह कहती है कि सब कुछ लेखकों का अपना गढ़ा हुआ है। पंडवानी की मूल कथा महाभारत है। यह कथा महाभारत के प्रसंगों को लेकर ही आगे बढ़ती है। कोई 18 सर्गों को लेकर मंच पर उतरता है तो को कोई कुछ सर्गों का इस्तेमाल करता है। जिस प्रकार से ऋषि-मुनियों का प्रवचन धर्मशास्त्र के आधार पर होता था उसी प्रकार से वेदमती में इस बात का ख्याल रखा जाता है कि सारे प्रसंग शास्त्र सम्मत तरीके से प्रस्तुत किए जाए।

Friday, June 25, 2010

देवदास बंजारे

देश में पंथी नृत्य को खास पहचान दिलाने वाले देवदास बंजारे भले ही अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन आज भी जब लोग किसी पंथी दल का कार्यक्रम देखते हैं तो उन्हें बरबस ही देवदास बंजारे की याद आ जाती है।
1 जनवरी 1947 को धमतरी जिले के गांव सांकरा में जन्मे देवदास बंजारे ने कभी जीवन में नहीं सोचा था कि वे पंथी नृत्य करेंगे लेकिन शायद किस्मत को यही मंजूर था। देवदास के घर का नाम जेठू था। एक बार जब जेठू गंभीर तौर पर बीमार हुआ तो उनकी माता ने उसके खुशहाल स्वास्थ्य के लिए देवताओं से मनौती मांगी। ढेर सारे लोगों की जरूरी प्रार्थनाओं के बीच जब देवताओं ने एक मां की प्रार्थना को स्वीकार कर लिया तो जेठू का नाम भी देवदास हो गया। देवदास यानी देवताओं का भक्त.. दास।

देवताओं का भक्त होने के बावजूद देवदास का बचपन काफी कठिनाइयों में गुजरा। प्रदेश का कबड्डी चैपियन होने के साथ-साथ प्रतिभा के बल पर जब देवदास बंजारे को भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी लगी तब कई साथी कलाकारों को शायद यह अच्छा नहीं लगा। कुछ दिनों के बाद श्री बंजारे पर यह आरोप लगा  कि वे अपने गांव और आसपास के अन्य लोगों से पैसा लेकर उन्हें भिलाई इस्पात संयंत्र में नौकरी लगाने का झांसा देने का गोरखधंधा कर रहे हैं। श्री बंजारे इस आरोप से आहत तो हुए लेकिन कुछ दिनों के बाद जब सच्चाई सामने आई तब पता चला कि श्री बंजारे की प्रतिभा से जलन रखने वाले कुछ लोगों ने यह भ्रम फैलाया था।

जब वे जीवित थे और पैरों में घुंघरू बांधकर देश- प्रदेश के अलावा विदेश के मंचों पर भी थिरक रहे थे तब जनसत्ता के छत्तीसगढ़ संस्करण के लिए उनसे बातचीत करने का अवसर मिला था। इस बातचीत के बाद ही मैं यह जान पाया कि पंथी नृत्य क्या है और पंथ में नाचा का प्रवेश कैसे हुआ।

देवदास बंजारे के मुताबिक-
पंथी बाबा गुरूघासीदास के नाम पर बनाया गया एक रास्ता है। यह रास्ता मनुष्य को ऊंच-नीच का भेदभाव किए बगैर लोगों से सत्य की राह पर चलने की अपील करता है। अरसा पहले कुछ लोग सतनामियों के साथ छुआछूत की भावना रखते थे। यह छुआछूत की भावना इतनी अधिक प्रबल थी कि गांव में उनके पीने का पानी अलग हुआ करता था। कतिपय महाराजों के कारण एक समुदाय विशेष का आदमी गले में घड़ा और कमर में झाडू बांधकर चलता था ताकि पैरों का निशान तक मिट जाए। धीरे-धीरे जब बाबा गुरूघासीदास की महिमा उजागर होने लगी तब जाकर यह छुआछूत कम हुआ। सतनामियों को समानता का दर्जा दिलाने के लिए नैनदास महिलांग, सांवलदास, तुलसीराम सहित अनेक लोगों ने काफी संघर्ष किया।
अक्सर लोग पूछते हैं कि देवदास तेज गति से कैसे नाच लेता है। हकीकत यह है कि सत्य की धार बहुत तेज होती है। तेजधार बात की गति भला धीरे कैसे हो सकती है। यह गति सत्य के प्रतीक जैतखांब के पास शुरू होती है। इसके पास तीन कीले होते हैं जो आकाश-पाताल और पृथ्वी का प्रतीक होते हैं। एक झंडा होता है जो सात और इक्कीस फीट का होता है। नृत्य के दौरान मांदर के साथ ऊंचे-ऊंचे बिंबों का प्रयोग बहुतायात होता है। यह इसलिए होता है क्योंकि इसके जरिए बाबा की महिमा को आस्था के साथ प्रकट किया जाता है। एक आदिवासी परम्परा भी मांदर-मृदंग से जुड़ी हुई है। जिन वाद्ययंत्रों में मिट्टी का प्रयोग होता है वह शुद्ध होती है। अपनी मिट्टी का सम्मान तो अच्छी बात है।

अंतरराष्ट्रीय मंचों पर लगभग सौ से ज्यादा प्रस्तुतियां दे चुके देवदास बंजारे कभी हबीब तनवीर के ग्रुप से भी जुड़े हुए थे। जुड़े हुए कहना ज्यादा ठीक नहीं होगा ब्लकि हुआ य़ूं था कि अपने नाटकों में गांवों की प्रतिभा को जोड़ने के चक्कर में श्री तनवीर उन्हें भी विदेश ले गए थे। श्री तनवीर को भी यह नहीं मालूम था कि नाटक के बीच में देवदास का पंथी एक हिट आइटम साबित होगा। जब-जब नाटकों को गति देने के लिए पंथी का उपयोग होता था दर्शक झूम उठते थे। कई बार तो इतने मंत्र मुग्ध हो जाते थे कि वंस मोर.. वंस मोर की आवाजें आने लगती थी। हबीब तनवीर को कला का मालिक और स्वयं को मजदूर मानने वाले श्री बंजारे जब तक जीवित रहे तब तक यह बात बड़े गर्व के साथ कहते रहे कि गांव के एक सीधे-सादे लड़के को दुनिया दिखाने वाले हबीब तनवीर उनके खेवनहार थे।

Thursday, June 24, 2010

तीजन बाई

पंडवानी गायिका तीजन बाई का बचपन बेहद कठिन संघर्षों में बीता है। तीजन को उसके नाना बृजलाल पारधी ने पाला है। चिड़िया, खरगोश, गिलहरी और अन्य जीव जन्तुओं के शिकार से ही अपने जीवन को चलाने वाले बृजलाल स्वयं भी बहुत अच्छे पंडवानी गायक थे। बचपन में तीजन गोबर बीनकर कंडे थापती थी। घर को चलाने के लिए तीजन ने हाट-बाजारों में जाकर दातौन बेचने का काम भी किया। अपने संघर्ष भरे दिनों को याद कर तीजन कह उठती है-यदि पंडवानी नहीं होती तो शायद तीजन मर गई होती।

तीजन की तीन बार शादी हुई लेकिन वह स्वयं मानती है शादी एक छलावे के सिवाय कुछ और नहीं है। देर से ही सही तीजन इस सच्चाई को जान चुकी है कि वह सिर्फ पंडवानी के लिए ही बनी है।
तीजन को पंडवानी गाने का शौक कैसे हुआ इसके पीछे भी एक रोचक कहानी है। दरअसल तीजन अपने नाना की पंडवानी को दरवाजे के ओट में छिपकर सुनती थी। एक दिन उसके नाना ने उसे पंडवानी सुनते हुए पकड़ लिया। जब नाना ने उससे पूछा कि यह सब कितने दिनों से चल रहा है तो उसने सब कुछ सच-सच बता दिया। तीजन को डांट तो पड़ी लेकिन जब नाना ने महाभारत के तमाम प्रसंगों को सुना तो वे रोने लगे। उन्होंने तीजन को हीरा कहकर गले से लगाया और फिर अपनी चेली बना लिया। तीजन ने अपना पहला कार्यक्रम 13 साल की उम्र में ग्राम चंदखुरी में दिया था, लेकिन जब वह ग्राम चिखली से कार्यक्रम देकर लौटी तो उसके नाना गुजर चुके थे।

तीजन पढ़ाई-लिखाई के नाम पर मात्र अपने हस्ताक्षर करना जानती है, लेकिन उसे महाभारत इस ढंग से कंठस्थ है कि अच्छे-अच्छे दांतो तले ऊंगली दबा लेते हैं। महाभारत को अपने ढंग से कंठस्थ करने में माहिर तीजन का मानना है कि अनपढ़ आदमी किसी भी बात को पहले दिल पर लेता है फिर दिमाग से काम करता है। तीजन को इस बात का बहुत ज्यादा दुख नहीं है कि वह लगभग अनपढ़ है। वह कहती है- देश में जरूरत से ज्यादा पढ़े- लिखे लोग घास छीलने का काम कर रहे हैं, ऐसे में यदि लोग उसे सम्मान दे रहे हैं तो यह बड़ी बात है।

ऐसा भी नहीं है कि साक्षरता अभियान चलाने वालों ने पद्मश्री तीजन को पढ़ाने की कोशिश नहीं की। कुछ साल पहले जब दुर्ग जिले में साक्षरता अभियान उफान पर था तो चार- छह लड़के तीजन को पढ़ाने आते थे लेकिन थोड़े ही दिनों में छोकरों को समझ में आ गया कि जिसे वे पढ़ा रहे हैं वह अपने आपमें अनुभव की किताब है। तीजन ने अपने एक हाथ में गोदने के जरिए तीजन लिखवा लिया है। अपने हाथ में लिखे हुए नाम को देखकर तीजन सरकारी आयोजनों में मिलने वाले चैक इत्यादि पर दस्तखत कर लेती है।

एक समय था जब छत्तीसगढ़ का हर गांव तीजन की पंडवानी सुनना चाहता था। यह हालात तो अब भी कायम है, लेकिन तीजन को मिली लोकप्रियता के चलते जब लुद्दी के माफिक आलोचक भी पैदा हुए तो उन्होंने सबसे पहले यही सवाल उठाया कि तीजन महाभारत की कथा का वर्णन शास्त्र सम्मत तरीके से नहीं करती है। इस आरोप के जवाब में तीजन कहती है कि जब वह अपने नाना के साथ पंडवानी गाया करती थी तो शास्त्र के जानकार लोग मशाल लेकर उनकी झोपड़ी जलाने के लिए दौड़ा करते थे क्योंकि शिकारी समुदाय के लिए धर्म-कर्म की बातों का प्रचार करना प्रतिबंधित था। लोग मेरे नाना को अक्सर इस बात के लिए फटकार लगाया करते थे कि वे शिकारी समुदाय से संबंधित होकर महाभारत की कथा कैसे बांचते हैं। एक बार कार्यक्रम में एक महाराज को महाभारत की कथा पढ़नी थी लेकिन गांव के ही कुछ दर्शकों ने यह भी ऐलान कर दिया कि तीजन भी महाभारत पढ़ेंगी।

बस... महाराज नाराज हो गए। महाराज ने जाति का सवाल खड़ा करते हुए ऐलान कर दिया कि वे तीजन से मुकाबला नहीं करेंगे। बहुत बाद में पता चला कि मामला जाति से ज्यादा मिलने वाले चढ़ावे से था। शुरू-शुरू में तीजन जहां कही भी महाभारत की कथा पढ़ती थी तो लोग चावल, आटा, सब्जी, सुपारी, पान, नमक मिर्च, तेल नारियल भेंट दिया करते थे। तीजन ने अपनी पंडवानी के जरिए कई गांवों में महाराजों का धंधा भी बंद करवाया।

पंडवानी में कई बार अंग्रेजी शब्दों के मिश्रण के सवाल पर तीजन कहती है कि कई बार मनोरंजन के लिए ऐसा करना जरूरी हो जाता है। कापलिक शैली में पंडवानी प्रस्तुत करने वाली तीजन बताती है कि उसका तंबूरा कभी भीम का गदा बन जाता है तो कभी अर्जुन का धनुष बाण भी। महाभारत की कथा में यदि शादी होती है तो दर्शकों को यह बताना जरूरी हो जाता है कि शादी क्यों और किसलिए हुई है। केवल जयमाला डाल देने से शादी नहीं हो जाती।

यह सच भी है ज्यों ही तीजन का कार्यक्रम प्रारंभ होता है उसका रंगीन फुदनों वाला तानपुरा अलग-अलग रूप धारण कर लेता है। इस अलग- अलग रूप के चलते दर्शक के भीतर जोश, क्रोध, दर्द उत्साह और उमंग की धारा भी बहने लगती है।

24 अप्रैल 1956 को दुर्ग जिले के ग्राम गनियारी में जन्मी तीजनबाई देश-विदेश के अनेक मंचों पर पंडवानी की प्रस्तुति दे चुकी है। वर्ष 1988 में पद्मश्री हासिल करने वाली तीजन को वर्ष 1995 में संगीत नाटक अकादमी पुरस्कार और वर्ष 2003 में पद्मभूषण जैसा सम्मान भी मिल चुका है।
साल के 365 दिनों में तीजन अब शायद ही किसी दिन अपने घर में रहती है। बस.. प्रोग्राम... प्रोग्राम और प्रोग्राम। पद्मश्री मिलने के बाद व्यावसायिक हो जाने के सवाल पर तीजन कहती है-बाबू कोई भी पार्टी पान-सुपारी से नहीं चलती है। तीजन की पार्टी में सब कुछ बदलता रहता है... नहीं बदलता है तो केवल तीजन का तंबूरा और उनका अपना देसी स्टाइल।

Monday, June 21, 2010

घर

मकान बिकाऊ है
बस यही विज्ञापन देखकर
नहीं खरीदना है मकान
मुझे तो घर चाहिए... घर।
 

घर कि-
जिसमें कुछ जोड़ी सुंदर आंखे
करती हो मेरा इन्तजार
 

घर कि-
जिसके आंगन में हो
रस्से का बना एक झूला
पौधे हरे-हरे

 
घर कि-
जिसमें खिड़की हो
पर जरूरी नहीं पीले पर्दे लटके
 

घर कि-
जिसकी छत्त पर
आकर फुदकती हो चिडियां
और मेहमान आने से पहले
आ जाते हो कौव्वे
 

मौके पर फेंस के इधर-उधर
खिल जाते हो
कनेर के फूल

रात गमक जाती हो
रात रानी सी
 

घर जो हवेली न लगे
 

घर जो अस्पताल न लगे
 

घर जो दफ्तर न लगे
 

घर रेलगाड़ी का डिब्बा भी न लगे
 

जब मैं घर लौटूं तो
पत्नी और बच्चों के चेहरे पर
शिकायतों की एक छोटी सी
लायब्रेरी जरूर मिले.

ताकि शिद्दत के साथ
जरूरत की किताबें
बांच सकूं हौसले के साथ
 

जिन घरों के ईंट और गारों में
मिला होता है हौसला
वह घर कभी मकान नहीं बनता
 

वास्तव में ऐसा घर ही
घर होता है
घर लगता है.
 

घर को घर लगना चाहिए
घर को घर होना चाहिए
इसलिए 

घर चाहिए
मकान नहीं
घर...

Sunday, June 20, 2010

यह कैसी गुस्ताखी ...?

रचना को चोरी करते तो सुना था लेकिन कोई रचना को अपने ढंग से सुधारकर यह कहे कि भाइयों वैसा नहीं ऐसा लिखा जाना चाहिए तो इसे आप क्या कहेंगे।
देश के प्रसिद्ध कवि एवं ब्लागजगत के हरदिल अजीज रूपचंद शास्त्री के साथ हाल-फिलहाल तो ऐसा ही कुछ हुआ है। किसी प्रेमनारायण शर्मा ने उनकी एक रचना में मामूली सा फेरबदल करते हुए रचना को तोड़ने-मरोड़ने का प्रयास कर डाला है। किसी फिल्मी गीत की पैरोडी बनते तो सुना था लेकिन किसी साहित्यिक रचना की तीन-पांच होते हुए पहली बार देख रहा हूं। श्री शास्त्री जी चूंकि सरल व सीधे आदमी है सो अपनी व्यथा से उन्होंने मुझे अवगत कराया है। आप भी देखिए यह गुस्ताखी कैसी है। क्या इस गुस्ताखी के लिए श्री शर्मा की निंदा नहीं की जानी जानी चाहिए।
श्री शर्माजी की इस करतूत के बाद मुझे लगने लगा है कि क्या दुनिया में कोई भी चीज मौलिक नहीं है। यदि ऐसा है तो कल को कोई भी हिन्दी साहित्य के महान कवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला की कविता को भी अपने बाप की लिखी हुई रचना बता सकता है। क्या शर्माजी का यह कृत्य क्षम्य है।


डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री "मयंक" की मौलिक रचना


चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!
कलम के मुसाफिर, कहीं सो न जाना!
जलाना पड़ेगा तुझे, दीप जगमग,
दिखाना पड़ेगा जगत को सही मग,
तुझे सभ्यता की, अलख है जगाना!!
कलम के मुसाफिर...................!!
सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,
कलम में छिपी है ज़माने की ताकत,
भटके हुओं को सही पथ दिखाना!
कलम के मुसाफिर...................!!
झूठों की करना कभी मत हिमायत,
अमानत में करना कभी मत ख़यानत,
हकीकत से अपना न दामन बचाना!
कलम के मुसाफिर...................!!



प्रेम नारायण शर्मा ने लगाई रचना की वाट

चमक और दमक में, कहीं खो न जाना!
कलम के मुसाफिर, कहीं सो न जाना!
जलाना पड़ेगा, तुम्हें दीप जगमग,
दिखाना पड़ेगा, जग को सही मग,
इस जग से बेरूख, कहीं हो न जाना!
कलम के मुसाफिर..........!!
सिक्कों की खातिर कलम बेचना मत,
हार करके आखिर कलम फेंकना मत,
देख हालत जहाँ की, कहीं रो न जाना!
कलम के मुसाफिर..........!!
झूठों की करना, कभी मत हिमायत,
अमानत में करना, कभी मत ख़यानत,
भूलके भी ऐसा बीज, कहीं बो न जाना!
कलम के मुसाफिर............!!



























बजाज- सिर्फ नाम ही काफी है...


जल संवर्धन एवं संरक्षण की दिशा में पिछले पांच वर्पो  में रायपुर जिले में अनेक उल्लेखनीय एवं सराहनीय कार्य हुए हैं। जिला पंचायत के अध्यक्ष अशोक बजाज ने 2005 से 2010 तक रायपुर जिले में सभा, सम्मेलन एवं गोप्ठियों के अलावा चौपाल लगाकर वर्षा के जल रोकने तथा उसके सदुपयोग के लिए जनजागरण किया । उन्होंने अनेक स्थानों पर वृहत किसान सम्मेलन आयोजित कर जलवायु परिवर्तन को रोकने के लिए प्रभावी सलाह दी । श्री बजाज ने जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए दस सूत्रीय एजेन्डा तैयार किया तथा ग्राम सभाओं में 10 सूत्रीय एजेंडे पर चर्चा कराई । उन्होंने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में शासन की विभिन्न योजनाओं के माध्यम से स्टॉपडेम, नालाबंधान, एनीकेट, तालाब तथा कुओं का निर्माण किया । जिला पंचायत रायपुर ने अपनी कार्ययोजना में महात्मा गांधी राष्ट्रीय रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत जल संरक्षण एवं संवर्धन के कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी । फलस्वरूप जिले में सिचिंत रकबा का क्षेत्रफल बढ़ा । श्री बजाज ने मार्च 2006 में केन्द्रीय पंचायत राज मंत्री श्री मणिशंकर अययर की उपस्थिति में बायोफयूल पर आयोजित राष्ट्रीय सेमिनार में बढ-चढ कर हिस्सा लिया तथा देश भर के प्रतिनिधियों एवं वैज्ञानिकों को छत्तीसगढ पैटर्न अपनाने की अपील की । उन्होंने अगस्त 2009 में रायपुर में जलवायु परिवर्तन विषय पर आयेजित एक दिवसीय राष्ट्रीय सेमिनार में वैकल्पिक उर्जा श्रोतों के महत्व को प्रतिपादित करते हुए कार्बनडाईआक्साइड के उत्सर्जन को नियंत्रित करने अनेक उपयोगी सुझाव दिये जिसे देषभर के वैज्ञानिकों ने सराहा । मार्च 2008 में वृक्ष मित्र अभियान चलाकर जिले भर में लाखों पोधे रोपे गये।


दस सूत्रीय एजेंडाः-
रायपुर जिले में जलवायु परिवर्तन के मदेनजर दस सूत्रीय एजेन्डा तैयार कर श्री बजाज ने जिले के सभी सरपंचों एवं विभागीय अधिकारियों को पत्र भेजकर उसके अमल की अपील की । दस सूत्रीय एजेन्डे में उर्जा के वैकल्पिक श्रोतों का उपयोग करने, जल सरंक्षण के लिए प्रत्येक गांव में वार्षिक कार्ययोजना तैयार करने, कार्बनडाइआक्साइड के उत्सर्जन को कम करने तथा कम पानी में पकने वाली फसल को बढावा देने का सुझाव दिया गया है ।श्री बजाज द्वारा जारी 10 सूत्रीय एजेंडा निम्नानुसार हैः-

1 जल संरक्षण एवं संवर्धन की योजना बनायें ।

2 ऐसी फसल लगायें जिसमें पानी का उपयोग कम से कम हो ।

3 क्ृषि की ऐसी तकनीक का प्रयोंग करें जिसमें पानी की खपत कम हो ।

4 धान के ऐसे किस्मों का चयन करें जिसमें कम पानी में अधिक उत्पादन हो सके ।

5 कम बिजली खपत वाले लाईटिंग उपकरणों तथा कम ईधन खपत करने वाली गाड़ियों का उपयोग करे ।

6 सौर उर्जा, पवन उर्जा एवं जैविक उर्जा के प्रयोग से सम्बंधित योजना तैयार करें । अधिक कार्बनडाइआक्साइड का उत्सर्जन करने वाले उर्जा का कम से कम इस्तेमाल हो ।

7 गांव में लगे वृक्षों की सुरक्षा सुनिश्चित कर तथा वृक्षारोपण की योजना को क्रियान्वित करें ।

8 प्रदुषण को रोकने के लिए व्यापक कदम उठायें ।

9 नदी, नालों एवं तालाबों के जल को निर्मल व स्वच्छ रखने की व्यवस्था करें ।

10 वन्य प्राणियों की सुरक्षा सुनिष्चित करें, तथा दुर्लभ प्रजातियों को विलुप्त होने से बचाये



ग्राम सभा में बनी कार्ययोजनाः-
श्री बजाज के 10 सूत्रीय एजेन्डे पर 2 अक्टूबर 2009 को आयोजित ग्राम सभा में चर्चा की तथा सभा के माध्यम से पानी के महत्व को प्रतिपादित करते हुए वर्षा के जल को रोकने का प्लान किया गया ।


चौपाल लगाकर जनजागरणः-
श्री अशोक बजाज ने जल संरक्षण के लिए चौपाल लगाने की योजना बनाई तथा दिनांक अप्रैल 2009 से इसकी षुरूआत ग्राम मुडरा ( रवेली ) विकासखण्ड अभनुपर से की । जनजागरण की दृष्टि से चौपाल उपयुक्त माध्यम बना ।



किसान सम्मेलनः-

श्री अशोक बजाज की पहल पर जिले के अभनपुर, कपसदा, अड़सेना (तिल्दा) आदि गांवों में किसान सम्मेलन का आयोजन कर जनजागरण किया गया ।



पंचायत प्रतिनिधि सम्मेलनः-

श्री अशोक बजाज ने जलवायु परिवर्तन को रोकने में पंचायत-राज संस्थाओं की भूमिका के मद्वेनजर आदिवासी विकासखंड छुरा सहित अनेक स्थानों में पंचायत प्रतिनिधियों की बैठक बुलाकर 10 सूत्रीय एजेन्डे पर अमल करने की सलाह दी ।



राष्ट्रीय सेमिनारः-

श्री अशोक बजाज ने दिनांक 7 मार्च 2006 को पंचायत-राज मंत्री की उपस्थिति में बायोफयूल पर आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में रतनजोत की खेती को बढ़ावा देने तथा बायोफयूल के विकास के लिए राष्ट्रीय फार्मिंग नीति बनाने की पैरवी की ।

उन्होंने दिनांक 21 अगस्त 2009 को रायपुर में जलवायू परिवर्तन विषय पर आयोजित राष्ट्रीय सेमीनार में उर्जा के वैकल्पिक श्रोतों के विकास पर बल दिया ।



नरेगा के माध्यम से जल-संरक्षणः-

श्री बजाज ने अपने अध्यक्षीय कार्यकाल में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी स्कीम की कार्ययोजना में जलसंरक्षण सम्बंधी कार्यों को सर्वोच्च प्राथमिकता दी । इस योजना के अंतर्गत चार वर्षों में नाला बंधान, स्टॉपडेम नये तालाबों के निर्माण कुओं के निर्माण के काम हाथ में लिए । जिला पंचायत ने 2007 से 2010 तक तीन वर्षों में जल संरक्षण एवं संवर्धन के कार्यों को प्राथमिकता देते हुए निम्नलिखित कार्य कियेः-

1. नया तालाब का निर्माण- 649 4 . टार नाली निर्माण /मरम्मत-284

2 सिंचाई व निस्तारी तालाब जिणोध्दार - 6019 5 . नया कुआं निर्माण - 3290

3 स्टॅटाप डेम निर्माण- 289 6 .  नहर मरम्मत सुधार-321



नुक्कड़ नाटकों के माध्यम से जनजागणरणः-

जल संरक्षण एवं संवर्धन के लिए कला जत्थे के माध्यम से नुक्कड़ नाटकों का प्रदर्षन कर जिले भर में जनजागरण किया गया

लेख का प्रकाशनः-

श्री बजाज ने जल जो न होता तो ये जग जाता जल शीर्षक से लेख भी लिखा जिसमे जलवायु परिवर्तन के कारणों, जलवायु परिवर्तन के दुष्प्रभावों तथा जलवायु परिवर्तन रोकने के लिए महत्वपूर्ण सुझाव दिये । यह लेख अनेक लोकप्रिय समाचार पत्रों में प्रकाषित हुआ है । यह लेख देष के प्रमुख ब्लाग प्रवक्ता डॉट काम एवं चिट्ठाजगत में शामिल किया गया है । श्री बजाज के स्वंय के ब्लाग ashokbajaj99.blogspot.com में उनके इस चर्चित लेख को देखा जा सकता है ।


दिवाली ग्रीटिंग में संदेश

श्री बजाज ने दिवाली ग्रीटिंग में तुलसी कृत रामचरित मानस के उत्तरकांड के एक दोहे का उदाहरण

दिया-

विधु महि पूर मयूखन्हि, रवि तप जेतनेहि काज।

मांगे वारिद देहिं जल रामचन्द्र के राज ।।

अर्थ- श्री रामचन्द्र के राज में चन्द्रमा अपनी अमृतमयी किरणों से धरती को पूर्ण करते थे। सूरज उतना ही तपता था जितनी की आवश्यकता होती थी । मांगने पर मेघ पानी बरसाते थे । इसका मतलब यह है कि त्रेता युग मे जलवायु पर लोगों का पूर्ण नियंत्रण रहता था।


वृक्ष मित्र महाभियानः-

विगत 5 वर्षों में वृक्षरोपण हेतु अनेक कार्यक्रम आयोजित किये गये। बायोफयूल को प्रोत्साहत करने के उद्वेष्य से रतनजोत ;जेट्रोफाद्ध एवं करंज के लाखों पोधे रोपे गये हैं। जुलाई 2008 में वृक्ष मित्र अभियान चलाकर नदी, नालों, नहरो व सड़क के किनारे, पड़त भूमि में तथा शाला परिसरों में व्यापक पैमाने पर वृक्षारोपण किया गया। इस अभ्भियान में स्वयं मुख्यमंत्री डॉ. रमनसिंह, मंत्रिमंडल के सदस्य, विभागीय अधिकारी, सांसद विधायक एवं अन्य जनप्रतिनिधियों एवं आम नागरिकों ने बढ़-चढ़कर भागीदारी निभाई। जिला पंचायत ने 2007 से 2010 तक वृक्षारोपण के 1899 कार्य स्वीकृत किया ।



आई डब्ल्यू डी.पी ;हरियालीद्ध योजनाः-

जिला पंचायत रायपुर द्वारा 2005 से 2010 तक आई.डब्ल्यू.डी.पी ;हरियालीद्ध के अंतर्गत वाटर शेड के कुल 852 कार्य किये गये जिसमें नालाबंधान व स्टाप डेम निर्माण के 153 कार्य, सिंचाई व टार नाली निर्माण के 90 कार्य, तालाब गहरीकरण के 138 कार्य, तालाबों में स्लूजगेट निर्माण के 140 कार्य, नये तालाब व डबरी निर्माण के 90 कार्य, मेड़ बंधान के 99 कार्य, वनीकरण व वृक्षारोपण के 75 कार्य तथा अन्य 67 कार्यों के माध्यम से जल संवर्धन व जल संरक्षण के प्रभावी कार्य सम्पन्न किए गये।

Tuesday, June 15, 2010

मुडा-तुडा नोट

एक मुडा-तुडा
पांच का नोट
शायद आपके किसी
काम न आए
लेकिन मेरे लिए
इसकी अहमियत
थोड़ी ज्यादा है


नौकरी को अपनी माशूका
बनाने के लिए
जब मैं भागता रहा
एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर
तब.....
तब एक मुडा-तुड़ा नोट ही
मेरा सच्चा यार बना रहा.



एक मुडा-तुडा नोट ही था
जिसने मुझे
बस में पैर रखने की जगह दी
मुडे-तुडे नोट की वजह से ही मैं
ट्रेन में ऐसी जगह पा सका
जहां से हवा आकर
मेरे बदन का पसीना सोखती रही


लालटेन की अंधी रोशनी से लेकर
मरकरी बल्ब की चकाचौंध कर
देने वाली दूधिया रोशनी में
ढेर सारा कचरा कंठस्थ कर लेने के बाद
जब मैं चप्पल पहनकर
सड़क पर आया
तब... हां... तब
टूटी चप्पलों पर कील
लगाकर चमकाने के काम आया
मुडा-तुडा नोट


एक मुडा-तुडा नोट ही था
जो मुझे भाऊ के पानठेले से
आसानी से दिलवा देता था
चार पनामा, एक हाफ चाय और
सूखी हुए ब्रेड


बेकारी के कठिन दिनों में
जबकि हर रोज
यही लगता था कि
एक लड़की जो कही ख्वाबों में है
आकर कहेंगी-आईलवयू.. मैं तुम्हारा साथ दूंगी
तब और तब
सिर्फ मुडा-तुडा नोट ही
बदन से चिपका रहा मेरे.


मुडे-तुडे नोट ने
मेरा बहुत साथ दिया

मुड़े-तुडे नोटों को
मेरा साथ तो देना ही था

जिन नोटों से मां ने
नहीं खरीदी दवा
जिन नोटों से घर में पक सकती थी
दो बखत की तरकारी

उन नोटों को मां ने
अपने आंचल में
एक उम्मीद समझकर
बांध रखा था.

मां के आंचल में
बेहद मजबूत तरीके से
बंधे पड़े रहने वाले नोट
भला मुझे
कैसे कमजोर होने देते


जो नोट
मां के आंसूओं से
थोड़ा भींग गए हो
क्या वे खराब हो सकते हैं

Monday, June 14, 2010

आटो वाले अमीन सायानी


मैंने पिछले कुछ सालों में आटो वाले अमीन सायानी के दर्शन नहीं किए। शायद आपने भी नहीं किए होंगे। नई फिल्म के लगते ही अमीन सायानी अपनी गे-गो-गे गो करने वाली आटो में बैठकर मोहल्ले के कम से कम चार चक्कर यह कहते हुए जरूर लगाता था कि पूरे परिवार के साथ बैठककर देखने-दिखाने योग्य चित्र शानदार चार खेलों में चल रहा है। सुपर शाहकार है। हंसी का महान धमाका है। फोड़फाड़ और महिलाओं की अपार भीड़ का चौथा सप्ताह है, लेकिन अब ऐसा नहीं होता।


अभी दो पहले जब गली से एक आटो एक छत्तीसगढ़ी फिल्म का प्रचार करते हुए गुजरा तो मुझे लगा कि अब आटो के भीतर बैठा हुआ आदमी अपने खास अन्दाज में- हा... हां हूं-हूं..... बहनों और भाइयों, इस साल की सबसे बड़ी, सबसे महंगी और खूबसूरत संगीत से सजी- संवरी फिल्म जरूर कहेगा... लेकिन आटो ठीक घर के सामने ही छत्तीसगढ़ी गीत बजाता रहा। पोंगे से कुछ आवाज तो आई लेकिन जब भीतर झांककर देखा तो टेप चल रहा था।


जिन दिनों बिनाका गीत माला कार्यक्रम उफान में था उन दिनों तो शायद हर उदघोषक अपने आपको अमीन सयानी से कम भी नहीं समझता था। धीरे-धीरे बिनाका गीतमाला का क्रेज भी खत्म हुआ तो अमीन सयानी भी आर्केस्टा तक सिमटकर रह गए। अब तो अच्छे से अच्छे आर्केस्टा से भी अमीन सायानी की नकल करने वाले गायब हो गए हैं। ऐसा क्यों हुआ क्या आप जानते हैं। क्या हर दो कदम पर मिलने वाले सस्ते मनोरंजन ने अमीन सायानी की नकल करने वालों को भूखों मरने की कगार पर ला खड़ा किया है।
क्या आपने अपने आसपास रहने वाले अमीन सायानी को पिछले कुछ दिनों में देखा है। यदि हां तो मुझे जरूर बताइगा।

Friday, June 11, 2010

पोस्टरों पर कविताएं

जिन दिनों पोस्टरों पर कविताएं लिखी जा रही थी उन दिनों कम शब्दों में सीधी बात कहने की एक परम्परा सी चल पड़ी थी। ऐसा नहीं है कि लेखकों के एक बड़े वर्ग ने या यूं कहें काफी हाउस में काली काफी पर सिगरेट की राख झाड़ने वाले लेखकों ने पोस्टर कविताओं पर विमर्श करना जारी नहीं रखा है। महंगी सिगरेट और रात को स्काच के साथ एक औरत की देह में प्रवेश करने की पूरी संभावनाओं के बीच कुछ लोग पिसल जाने वाले कागज पर कविता देखना चाहते हैं। शायद यही एक वजह है कि अब कविताओं के ज्यादातर पोस्टर लेखकों के सम्मेलन में ही चस्पा होते हैं। जब सम्मेलन बिना किसी निष्कर्ष के समाप्त हो जाता है तो पोस्टरों को फिर किसी अगले सम्मेलन के लिए सुरक्षित रख लिया जाता है। अब सड़कों पर पोस्टर चिपकाकर कविता समझाने का दौर शायद खत्म हो गया है।
(इस टिप्पणी का इस कविता से कोई संबंध नहीं... हां यह कविता कभी पोस्टर में लिखी जरूर गई थी)

पेपरवेट


पेपरवेट हल्का है
कही अधिक भारी है
एक दबा हुआ पेज
जिस पर लिखी गई है
एक तेजधार
कविता


कागज

कागज का हाशिया
बना होता है
माचिस की तीलियों से
और...
समूची की समूची लकीरें
बिजली का नंगा तार होती है

लालटेन













लालटेन
लालटेन
और..
लालटेन

कहीं से भी
ले आना है
एक लालटेन

अंधेरे के खिलाफ
निकालने के लिए
बित्ते भर की जीभ













Thursday, June 10, 2010

हताश और निराश लोगों.. शायद यह कविता आपके काम आ जाए

जो कोई भी यह कहता है कि वह जीवन में कभी निराश नहीं हुआ तो शायद वह झूठ बोलता है। फरेब और मक्कारी का पंजा जब संवेदनशील आदमी को जकड़ता है तो आदमी मौत को भी गले लगाने के लिए आतुर हो जाता है। एक दिन ऐसे ही निराशा के क्षणों में मुझे लगा कि यह दुनिया मेरे किसी काम की नहीं है। साला... मैं जिस किसी के लिए भी अच्छा करता हूं वहीं मुझे सांप बनकर डंसने चला आता है। अचानक मैंने तय किया बस अब दुनिया को अलविदा कह ही देना चाहिए।

 मैं सुनियोजित तरीके से मरने की योजना बनाने लगा। मसलन मैंने तय किया कि मैं चिट्ठी-वगैरह लिखकर मरूंगा कि पुलिस वालों... कमीनों... मरने के बाद मेरे परिवार को परेशान मत करना.. क्योंकि मैं परिवार के कारण नहीं अपनों दोस्तों से मिले धोखों के कारण इस दुनिया को नमस्ते बोल रहा हूं। मैं मन ही मन उन उपायों को भी सोच रहा था जिससे मरने पर कम से कम तकलीफ हो। जहर खाकर आदमी बहुत तड़पता है। ट्रेन से कटने पर भी लोग एसी के डिब्बे में बैठे रहते हैं। ये नहीं कि एक बार उतरकर देखने की जहमत उठाएं कि कौन महापुरूष उनकी दुनिया को छोड़कर चला गया है। फांसी लगाकर जीभ बाहर निकालो तो लोग ताना मारते हैं-साला मरते-मरते भी जीभ निकालकर चिढ़ा रहा है। अच्छा है मर गया। साला.. बहुत सी लड़कियों से मोबाइल पर बात करता था। इन दिनों फांसी लगाकर मरने पर मीडिया ढंग से कव्हरेज भी नहीं देता है। मीडिया की शायद यह सोच बन गई है कि फांसी तो केवल लड़कियां ही लगाएंगी वह भी प्रेम करने वाली लड़कियां। यह बात मैं मजाक में इसलिए कर रहा हूं कुछ समय पहले तक मैं मौत से डरता था, लेकिन जबसे मैंने गुरूदेव रविंद्रनाथ टैगोर की एक कविता पढ़ी है तब से मुझे लगने लगा है कि मैं तो बिलावजह ही छोटी सी छोटी चीजों को लेकर परेशान रहा करता था। अब मैं जब भी निराश होता हूं तो सीटी बजाता हूं।

हां तो मित्रों जब मैंने मरने की योजना बनाई तो मेरे दिमाग में यह विचार आया कि क्यों न एक बार फिल्म दीवार का दृश्य दोहराया जाए और अभिताभ के जैसे भगवान से बातचीत कर ली जाए- खुश तो बहुत होंगे आज......।
 मैं आकाशवाणी रायपुर के पास स्थित काली मां के मंदिर में चला गया। जब मैं मंदिर के चक्कर लगा रहा था तभी दीवार पर मुझे गुरूदेव रविंद्रनाथ टैगोर की एक कविता दिखाई पड़ी। इस कविता को पढ़कर मैं काफी देर तक रोता रहा। कहते हैं कि रोने से मन हल्का हो जाता है। जब मैं रोकर थोड़ा शांत हुआ तो मैंने एक कागज पर कविता नोट की। दोस्तों यह कविता क्या है इसे आप भी पढ़े। हो सकता है निराशा के किन्ही क्षणों में यह कविता आपके काम आ जाए।

प्रार्थना

हे देवी विपत्ति में तुम मेरी रक्षा करो यह मेरी प्रार्थना नहीं
विपत्ति में न डर
जाऊं
यही मेरी इच्छा।

दुख-संताप से दुखी मेरे मन को
तुम सांत्वना प्रदान करो
यही मेरी इच्छा


दुख पर मुझे विजय मिले
यही मेरी इच्छा।

मेरी मदद के लिए अगर कोई नहीं आया
तब भी मेरा मनोबल न टूटे
यही मेरी इच्छा

इस दुनिया में अगर मेरा नुकसान हुआ
सिर्फ धोखा ही मेरा नसीब हुआ
तो भी मेरा मन अडिग रहे

यही मेरी इच्छा।

तुम मुझे बचाओ
यह मेरी इच्छा नहीं
मेरा बोझ हल्का करके
तुम मुझे सांत्वना दो
यह मेरी प्रार्थना नहीं

बोझ उठाने की शक्ति मुझमें आए
यही मेरी इच्छा


अच्छे दिनों में सिर झुकाकर
मैं तुम्हारा चेहरा पहचान सकूं
दुख के अंधकार में
सारी दुनिया मुझे धोखा दे
तब भी मेरे मन में
तुम्हारे प्रति कोई शंका न हो।

Monday, June 7, 2010

शाबाश लड़की


 







एक लड़की जो
मां की पुरानी खांसी
मकान मालिक की धौंस से
जानती है निपटना
इंच-इंच भर लड़ते हुए

एक लड़की जो
भाई की बेकारी
पिता का दर्द ओढ़ते हुए
जानती है जीना
इंच-इंच भर अड़ते हुए


एक लड़की जो
प्रेम के पचड़ों से
जानती है बचना
इंच-इंच भर बढ़ते हुए

क्या ऐसी किसी लड़की के लिए
कभी कोई कविता नहीं लिखी जाएगी



मैंने तो लिख दी है
शीर्षक है-शाबाश लड़की

Sunday, June 6, 2010

कुत्तों के सम्मेलन की एक्सक्लुसिव तस्वीरें

इलाहाबाद के मीरगंज इलाके में संपन्न हुए कुत्तों के सम्मेलन की रपट पढ़ने के बाद मेरे कुछ ब्लागर मित्रों ने नापंसद के जबरदस्त चटके लगाए लेकिन कुछ मित्रों ने यह भी अनुरोध किया कि मैं सम्मेलन की एक्सक्लुसिव तस्वीरें जल्द ही जारी करूं। आज कुछ तस्वीरें जारी कर रहा हूं।

कुछ तस्वीरें थोड़ी निजी किस्म की है इसलिए अभी तो उन्हें जारी नहीं किया जा रहा है लेकिन जब लोग ज्यादा ही तीन-पांच करने लग जाएंगे तो फिर मैं खुद को प्रेमनाथ और उन्हें पदमा खन्ना समझने में देर नहीं लगाऊंगा। ( छोकरों.. जानी मेरा नाम देख लेना... हुस्न के लाखों रंग... कौन सा रंग देखोगे)


1-बेहद अनुशासनबद्ध होकर अपने साथियों की बाट जोहते हुए आयोजकगण


2-दिल्ली के सम्मेलन में तो जलजला लाल टी शर्ट पहनकर काली कार में पहुंचा था। मीरगंज इलाके में संपन्न हुए सम्मेलन में कानपुर का अंडू अपनी वाइट कलर की निजी कार में पहुंचा था। सभी कुत्तों ने अंडू को अपना संरक्षक बनाया है।


3-सम्मेलन स्थल का पता भूल गए रांगडू-पांगडू और जांगडू। सम्मेलन में काफी देरी से पहुंचे तीनो।


4-सचिव पद के लिए दावेदारी ठोंकी परमिंदर ने। परमिंदर ने काफी तगड़े ढंग से केनवाशिंग भी की।


5- हे... हे...हे.. साथियों मुझे कोषाध्यक्ष बनना है... अपने साथियों से कुछ यही अपील कर रहा है शेरू प्यासा।

6-सम्मेलन में हड्डी के पैकेट का इन्तजार करता हुआ कालू।


7-सालों यहां भी नेतागिरी... यदि मुझे अध्यक्ष नहीं बनाया तो समझ लो किसी की भी मां-बहन गली की पुलियां पर बैठकर ठंडी हवा नहीं खा पाएगी।


8- हो गया सम्मेलन अब हड्डी तो चबा लेने दो यार।

टीपः ओफ वो... फिर साला बुरा सपना देखा... लगता है अब रात को सोना बंद करना पड़ेगा।

(सभी चित्र गुगल से साभार)

Friday, June 4, 2010

गाने की वाट

अभी कुछ दिनों पहले ही हास्य अभिनेता राजू श्रीवास्तव की एक प्रस्तुति को देखकर मैं खूब हंसा था। राजू श्रीवास्तव ने कुछ फिल्मी गानों की तीन-पांच करते हुए यह साबित करने की कोशिश की थी कि गाना लिखने वालों ने गीत तो लिख दिया लेकिन उन्हें नहीं पता कि नई पीढ़ी उनके गानों की किस तरह से देखेंगी। फिल्मों के गानों का अर्थ ढूंढने जाओगे तो अनर्थ हो जाएगा।

एक गीत है- सुबह से लेकर शाम तक और शाम से लेकर सुबह तक मुझे प्यार करो।
ससुरी 24 घंटे प्यार ही करवाते रहेगी तो सडांस कब जाओगी।

इसी तरह एक गीत और है जो फिल्म हरे रामा हरे कृष्णा से है-
फूलों का तारों का सबका कहना है। एक हजारों में मेरी बहना है, सारी उमर हमें संग रहना है।
बताइए... कैसा भाई बोलता है जिन्दगी भर बहन के साथ ही रहेगा। क्या बहन की शादी नहीं करेगा। दहेज का खर्चा बचा रहा है।

राजू श्रीवास्तव की इस प्रस्तुति को देखकर मैं भी सोच में पड़ गया कि क्या वाकई आप हर गाने की वाट लगा सकते हैं। शायद ऐसा हो सकता है क्योंकि बाजार के इस युग में अब जिन्दगी को कोई गंभीरता से लेता नहीं है। पिज्जा खाओं और जींस पैंट पर हाथ पोंछकर चलते बनो।
हाल के दिनों में जब मैं गाने के शौकीन एक नए मित्र से मिला तो वह भी मुझे गाने की वाट लगाते ही मिला। कुछ बानगी देखिए-


तुम मुझे न चाहो तो कोई बात नहीं...तुम किसी गैर को चाहोगी तो मुश्किल होगी
लड़की- क्या मुश्किल होगी... क्या चाकू मार देगा या तेजाब डाल देगा मेरे चेहरे पर साला कमीना। क्या मुश्किल होगी.. क्या मेरे बाप को बता देगा कि मैं मुंह पर मफलर बांधकर कहां-कहां घूमती हूं।

एक और गीत-
अंखियों से गोली मारे..
साली आंखे हैं या देशी तमंचा।

आजा मेरी गाड़ी में बैठजा
साला आजा गाड़ी में बिठा रहा है... कल बोलेगा गाड़ी भरी हुई है चल गोद में बैठ जा।

नींद आती नहीं, रात जाती नहीं.... आती नहीं... आती नहीं
बेटा इसबगोल पीकर सोया कर। सुबह ठीक-ठाक आ जाया करेगी।
मुझको यारों माफ करना मैं नशे में हूं
बेटा मैं होश में हूं। दो लात जमाकर तेरा नशा भी उतार दूंगा

अनहोनी को होनी कर दे होनी को अनहोनी, एक जगह जब जमा हो तीनों
अमर-अकबर- अन्थोनी
-मैच की ऐसी-तैसी कर दें.. मैच की कर दे बोनी, एक जगह जब जमा हो तीनो........ और धोनी।
खैर ऐसा क्यों हो रहा है यह मुझे नहीं मालूम लेकिन लगता है कि कचरे के उत्पादन में भी मनोरंजन ढूंढ़ने की संस्कृति ने लोगों को वाट लगाने की कला सीखा दी है। धन्य है वे लोग जो हत्या को हलाल में बदलना जानते हैं।
कुछ अरसा पहले जब फिल्मी गीतकारों का जलवा-जलाल हुआ करता था तब कुछ अच्छे गीत सुनने को मिल जाया करते थे लेकिन अब ऐसा नहीं है। अब तेली का तेल भी निकल सकता है और जूता चुर्र... भी कर सकता है। बगैर माचिस के बीड़ी भी जल सकती है और.... भी बहुत कुछ हो सकता है।

Thursday, June 3, 2010

ब्लागरों के कुत्तों ने बनाया संगठन

जी हां... यह सच है। अब यह जूनियर ब्लागर है या सीनियर यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन आज सुबह जैसे ही मैंने अपने घर में मौजूद बुद्धु बक्से के कान को उमेंठा तो अपने टकले के दो चार बालों को छिपाते हुए लोगों को कटघरे में खड़ा करने वाले एक आदमी के चैनल में यह खबर चल रही थी कि ब्लागरों के कुत्तों ने भी अपना संगठन बना लिया है। एक दुबली-पतली सी लड़की जिसने जरूरत से ज्यादा लिपस्टिक चुपड़ रखा था ने चैनल में काम करने वाले संवाददाता से जो कुछ पूछा-ताछा वह मैं आपके सामने प्रस्तुत कर रहा हूं-

लड़की- दुनिया की सबसे अजीबो-गरीब घटना की ओर लिए चलते हैं आपको। जी हां पहली बार कुत्तों ने अपना संगठन बना लिया है। संगठन की पहली बैठक इलाहाबाद में संपन्न हुई है। इस बैठक में कई महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए हैं। इस वक्त मौजूद है हमारे संवाददाता अवध बिहारी पांडे। बिहारी... बिहारी.. क्या आप मेरी आवाज सुन रहे हैं।

बिहारी-
हेंडफोन लगाऊंगा तब तो कुछ सुनाई देगा न...ये लगाया। अब बोलिए क्या बात है।

लड़की- जी बताए कुत्तों की बैठक में क्या-क्या हुआ।
बिहारी-
कुछ नहीं मोना.. दिल्ली से कुछ कुत्ते कल ट्रेन पकड़कर इलाहाबाद चले आए थे। टिकट कन्फर्म नहीं हो रही थी तो ज्ञानू चाचू को बोले कि टिकट कन्फर्म करवा दो। ज्ञानू चाचू पिछले दिनों बीमार थे। बोले मैं लफड़े में नहीं पडूंगा। अभी थोड़े दिन पहले ही पड़ा था तो लोगों ने ढोलक समझकर दोनों तरफ से बजाया है। खैर फिर कानू चाचू ने टिकट कन्फर्म करवा दी।

लड़की-  टिकट कैसे मिली यह नहीं पूछ रही हूं... यह बताओ बैठक में क्या हुआ।
बिहारी- देखो.. पूरा सिलसिलेवार सुनना है तो सुनो.. वैसे भी तुम्हारे चैनल वाले साले तनख्वाह कहां देते हैं। बोलते हैं जितना कमाते हो उसमें से आधा दे दो। जैसे साला मैं अपने बाप का हण्डा भरने के लिए निकला हूं।

लड़की-
मैं पूछ रही हूं बैठक में क्या हुआ।
बिहारी- वही तो बता रहा हूं। दिल्ली से तीन-चार कुत्ते ही आए थे बाकी सब इलाहाबाद-कानपुर क्षेत्र के थे। इन कुत्तों ने तय किया कि अब अन्याय नहीं सहेंगे  मोना जरा गौर से देखो एक भूरे रंग का कुत्ता सबको लीड़ कर रहा है। यही कुत्ता पूरे समय बोलता रहा। वैसे तो बाकी कुत्तों ने भी थोड़ा-बहुत बोला लेकिन एक भूरे रंग का एक कुत्ता थोड़ा ज्यादा ही फुरसत में था। उस कुत्ते ने बैठक में जूनियर कुत्तों से आह्वावान करते हुए कहा कि यदि आपके मालिक ब्लागर आपकी बात नहीं सुनते हैं तो पिल पड़ो। मालिक जब बगीचे में पानी डाले तो पीछे से उसकी लुंगी खींच देना ताकि साला पूरी तरह नागा बाबा बन जाए। एक तरह से भूरे कुत्ते के भाषण ने सभी कुत्तों में जोश भर दिया था।

लड़की-
फिर भी क्या तय हुआ
बिहारी-भूरे कुत्ते ने सबको समझाया कि अब एकजुटता की जरूरत है। मालिक लोग बिलावजह ही दुलत्ती जमाते रहते हैं इसलिए उनसे निपटने के तरीके अपनाने होंगे।

लड़की-
वे तरीके क्या है। यह हम आपको बताएंगे लेकिन पहले लेते हैं एक छोटा सा ब्रेक
(विज्ञापन-सौंदर्य साबुन निरमा..इस सीमेंट में जान है और तुम मेरे थम्स अप के पीछे क्यों पड़ी रहती हो.... मैं तो पलक हूं किसी के पीछे भी पड़ सकती हूं थम्सअप क्या चीज है)

लड़की-
लीजिए फिर चलते हैं एक बार कुत्तों के संगठन और सम्मेलन की ताजा जानकारी  के लिए इलाहाबाद। हां... बिहारी... ये तो बताओं कि दुनिया में हर शरीफ आदमी कुत्ता पालता है लेकिन केवल ब्लागरों के कुत्तों ने ही संगठन क्यों बनाया और उन्हें सम्मेलन करने की जरूरत क्यो आन पड़ी।
बिहारी- देखिए मोनाजी क्या है कि ब्लागरों ने अपने कुत्तों को ठीक से हड्डी का टुकड़ा नहीं डाला था। टुकड़ा नहीं डालते कोई बात नहीं थी कम से कम एकाध बिस्कुट तो खिला देते। पूरे समय समोसा-आलूबड़ा खाते रहेंगे और समोसे आलू बड़े पर भी पोस्ट लिखते रहेंगे तो कुत्ते क्या करेंगे।

लड़की- तो फिर कुत्तों ने क्या फैसला किया है।
बिहारी – जी.. कुत्तों ने तय किया है कि वे अब स्वयं का एग्रीकेटर खोलेंगे। ब्लागिंग सीखेंगे और संगठन के जरिए अपनी ताकत का अहसास कराएंगे।

लड़की-
किस तरह की ताकत
बिहारी- ताकत... वही। जहां मौका लगेगा काटेंगे। नोच डालेंगे। कोई गाड़ी में जाता रहेगा तो उसको दूर तक दौडाएंगे।

लड़की-
और क्या निर्णय लिया गया है
बिहारी- जी मोना सम्मेलन में मौजूद एक छोटे से कुत्ते से जब यह पूछा गया कि उसका नाम क्या है तो उसने बताया कि उसके मालिक ने उसका कोई नाम नहीं रखा है.... बस बड़े भूरे रंग के कुत्ते ने उसे यह जवाबदारी दे दी है कि वह सीनियर ब्लागरों के ब्लाग पर जाकर पीले रंग का द्रव्य छोड़ता रहेगा।

लड़की- इस द्रव्य से क्या होगा।
बिहारी- द्रव्य से ब्लागरों की जिन्दगी पीली-पीली हो जाएगी।
लड़की- मतलब
बिहारी- मतलब यह कि जैसे ब्लागर उतनी-भूतनी की टिप्पणियों से परेशान रहते हैं, वैसे ही अब वे अपने ब्लाग के पीले हो जाने से परेशान रहा करेंगे। अब तो जिस किसी के ब्लाग पर भी ज्यादा पीलापन नजर आए तो यह समझ लीजिएगा कि ब्लाग को पीलिया होने वाला है और यह सब उस छोटे से कुत्ते का कमाल होगा।

लड़की- तो क्या पिल्लर पीलिया फैलाएगा
बिहारी- पीलिया जैसा ही कुछ। ब्लाग पीला-पीला होकर दम तोड़ देगा थोड़े ही दिनों में ब्लागर भी टें बोल सकता है।
लड़की- बिहारी आप कहां खड़े हैं... और आपके पीछे ये इन्ही लोगों ने ले लिना टुप्पटा मेरा गाना क्यों सुनाई दे रहा है।
लड़की- मोना मै मीरगंज इलाके में हूं। सम्मेलन भी वही हो रहा है।  यहां पलक की बहन अपलक अक्सर आते रहती है। यह इलाका कई कारणों से फेमस हैं, वैसे ही जैसे दिल्ली में जीबी रोड़ की प्रसिद्धी है।
लड़की- क्या कुछ खास होता है वहां
बिहारी- बहुत कुछ खास होता है।
लड़की-हम अपने दर्शकों को बताना चाहेंगे कि क्या खास होता है।
बिहारी- नहीं मोनाजी यह मत बताओ वैसे भी हमारे चैनल को अब समझदार लोग कम ही देखते हैं। मैं नहीं चाहता कि नई जानकारियों से हमारे दर्शक डाक्टर शाहनी की दवाई खाने लगे।
लड़की- ये डाक्टर शाहनी कौन है।
बिहारी- डाक्टर शाहनी बूढ़े हो चुके हैं अब उनका बेटा काम देखता है। वह भी शाहनी ही है। जी हां शाहनी ही शाहनी है। शाहनी आहूजा नहीं। ये शाहनी बचपन की गलत-सलत चीजों को दवा देकर ठीक करता है।
लड़की- तो क्या यह माना जाए कि सम्मेलन डाक्टर शाहनी के इलाके में हो रहा है।
बिहारी- नहीं इलाका तो शाहनी का नहीं है लेकिन यहां आने वाले लोग अक्सर डाक्टर शाहनी के पास ही जाते हैं।

लड़की-
बहुत खूब। काफी नई जानकारियां दी आपने। एक आखिरी सवाल आपसे और...
हमें यह बताया गया था कि कुत्तों ने संगठन के निर्माण और सम्मेलन के दौरान सामाजिक कार्यों को करने की घोषणा भी की थी। ये सामाजिक काम कौन-कौन से है
बिहारी- जी सम्मेलन में यह तय हुआ है कि सब अपने मालिक का साथ छोड़कर गली-मुहल्लों की पुलियों में रहने के लिए आ जाएंगे। बाकी मोहल्ले में यदि किसी ने रीमा-पींकू टिंकी-चिकी के ऊपर आंख उठाई तो उसके पीछे का एक किलो मांस निकाल लिया जाएगा।
लड़की- एक किलो ही क्यो ज्यादा क्यों नहीं
बिहारी- अब जितना होगा उतना ही तो निकालेंगे।
लड़की- बहुत-बहुत धन्यवाद आपका इस जानकारी के लिए
बिहारी- हो गया समाचार... अब ये तो बताओ रात को गिल साहब के साथ कनाट पैलेस में क्या कर रही थी।
लड़की-
बिहारी तुम जूते खाने का काम मत करो। मै भी पलक की बहन लपक ही हूं। मेरे साथ ज्यादा लपक-सपक करोगे न तो फफक पड़ोगे। हां तो चलते है अगले समाचार की तरफ।

ओफ्फ...मेरे सिर में दर्द हो रहा है। शायद मैंने बुरा सपना देखा है।

Wednesday, June 2, 2010

बसन्ती, मेरी जानेमन.. पापी पेट का सवाल है

अब से कुछ अरसा पहले जब धर्मयुग और साप्ताहिक हिन्दुस्तान जैसी पत्रिकाएं प्रकाशित हुआ करती थी तब ट्रकों के पीछे लिखे जाने वाले वाक्यों और शायरी को लेकर लिखे गए एक लेख से मैं बहुत प्रभावित हुआ था। यह लेख किस लेखक का था यह तो मुझे नहीं मालूम लेकिन पूरे लेख का भाव यही था कि हमसे बेहतर तो जिन्दगी का सही मतलब वही समझते है जो सफर में होते हैं। इस लेख का प्रभाव अब भी मेरे जेहन में कायम है। अब भी जब कभी ट्रकों के पीछे कुछ लिखा पाता हूं तो उसे पढ़ता जरूर हूं। कई बार तो शायरी का अर्थ समझते हुए ट्रक के पीछे-पीछे ही अपनी मोटर साइकिल दौड़ाता रहता हूं। यह हरकत मैं इसलिए नहीं करता कि पागल हूं बल्कि सहज ढंग से यह घटना मेरे साथ इसलिए हो जाती क्योंकि मैं दुनिया के सर्वश्रेष्ठ कवियों के बारे में सोचने लगता हूं। उन कवियों के बारे में जिन्होंने यह सोचकर अपनी ट्रकों के पीछे शायरी नहीं लिखी कि कोई रोककर उन्हें शाबासी देगा। टिप्पणी देगा।
जरा आप भी देखिए सर्वश्रेष्ठ कवियों की बानगी और फिर मुझे बताइए क्या मैं इन्हें सर्वश्रेष्ठ बोलकर गलत कर रहा हूं-
1-    बसन्ती
2-    मेरी जानेमन
3-    पापी पेट का सवाल है
4-    भूतपूर्व सैनिक
5-    मां का दुलारा
6-    ज्वालामुखी
7-    अपने से बचो
8-    पीछे से चुम्मी मत लेना
9-    रात का राजा
10-    लैला
11-    अनोखी अदा
12-    मनमौजी
13-    लटक मत टपक जाएगा
14-    आशिक आवारा
15-    सोनू-मोनू दी गड्डी है
16-    जरा बचके
17-    नखरेवाली
18-    जवानी-दीवानी
19-    लाट साहब
20-    चौदवी का चांद
21-    चमचों से सावधान
22-    या मेरे मौला
23-    या ताज रखना लाज
24-    साइड मिलने पर जगह दी जाएगी
25-    नमाज पढ़ो इससे पहले कि तुम्हारी नमाज पढ़ी जाए
26-    मालिक का वफादार
27-    आदमी खिलौना है
28-    दिल अपना प्रीत पराई
29-    सोहनी-महिवाल
30-    दिल का राजा
31-    जय बजरंगबली
32-    बम-बम भोले बोल फिर दरवाजा खोल
33-    बीबी रहेगी टिपटाप- दो के बाद फुलस्टाप
34-    कब तक छिपोगी पत्तों की आर में, कभी तो मिलोगी मीनाबाजार में
35-    मत देख पराई लड़की को पाप होगा तू भी किसी दिन एक हसीना का बाप होगा
36-    चांदनी चांद से होती है सितारों से नहीं.. गाड़ी भी एक से चलती है हजारों से नहीं
37-    कर भला तो हो भला
38-    दिल के अरमां आंसूओ में बह गए वो उतरकर चल दिए हम गियर बदलकर रह गए
39-    ऐ लड़की मंझधारों में आ किनारों में क्या रखा है, प्यार है तो आगोश में आ इशारों में क्या रखा है.
40-    हमने उनकी याद में जिन्दगी गुजार दी वे लौटकर नहीं आएं जिनको उधार दी
41-    यूं तो ट्रकवाले तमाम है गर जानना चाहे तो बंदे का बलविन्दर नाम है
42-    वादा किया है तो वादा निभाना, मुझे पीकर न चलाना
43-    दुल्हन ही दहेज है
44-    सिंग इज किंग
45-    बुरी नजर वाले तेरा मुंह काला
46-    जलो मत बराबरी करो
47-    किसी की अमानत देखकर हैरान मत हो, तू भी खुदा से मांग परेशान मत हो.
48-    कीचड़ में पांव रखोगे तो धोना पड़ेगा, ड्राइवर से शादी करोगे तो रोना पड़ेगा
49-    पलट तेरा ध्यान किधर है
50-    चल हट हवा आने दे
51-    कश्मीर जैसी रोड़ नहीं पर सियासत लड़ा देती है, भाई जैसा भाई नहीं पर भाभी लड़ा देती है।
52-    चलती है गाड़ी उड़ती है धूल, हसीना तेरे बालो में चमेली का फूल
53-    लोन लेकर खेल ये खेला है.. यारो नजर न लगाना ये गरीब का ठेला है
54-    रात होगी अंधेरा होगा और नदी का किनारा होगा, हाथ में स्टियरिंग होगी और मां का सहारा होगा.
55-    अम्मी की दुआ
56-    मिलेगी मंजिल
57-    फिर मिलेंगे
58-    पप्पा जल्दी आ जाना

Tuesday, June 1, 2010

खूनी महल के दरवाजे में प्यासा हैवान और चीखती लाश

शीर्षक देखकर आप चौक सकते हैं लेकिन जो लोग कथित किस्म के डर में जीवन का आनन्द लेना जानते हैं वे एक न एक बार रामसे बद्रर्स की फिल्मों को जरूर देखते हैं। जो डर में भी हास्य तलाशने के शौकीन है वे रामसे की आड़े-तेड़े नामों से फिल्मों को देखकर अपना माथा फोड़ बैठते हैं। रामसे ने डरावनी फिल्में कब से बनानी शुरू की इसका ठीक-ठाक ब्यौरा तो नहीं मिल पाया है लेकिन माना जाता है कि फिल्म पैसे की गुडि़या के बाद रामसे बंधुओं ने जले-कटे चेहरों को लेकर फिल्म बनाने का अपना धंधा जारी रखा।
 फिल्म पर्दे के पीछे और दो गज जमीन के नीचे की सफलता के बाद तो रामसे बद्रर्स ने फिर कभी मुड़कर नहीं देखा। हालांकि अब रामसे की जगह रामगोपाल वर्मा ने ले ली है लेकिन रामसे की फिल्म का मजा ही कुछ और था।

कई दर्शक रामसे की फिल्मों को इसलिए भी देखने के लिए जाते रहे क्योंकि फिल्म का असली हीरो भूत हवेली में बिलावजह ही चड्डी पहनकर घूम रही हिरोइन को भी नहीं छोड़ता था।
यह तो तय है कि हर पुरूष के अन्दर एक जानवर बैठा हुआ है। किसी-किसी के भीतर भूत भी बैठा हुआ है। तो... जैसे ही भूत हिरोइन पर झप्पटा मारता था दर्शक चिल्ला उठते था- छोड़ना मत ससुरी को। साली कुतिया चड्डी पहनकर तमाशा कर रही है। दीपक पाराशर जैसे हीरो के साथ जब हिरोइन झरने पर नाहती थी तो भी दर्शक मन ही मन यही कामना करता था कि हे.. भगवान जल्द से बड़े पंजो वाले भूत को भेजो। बहुत लपट-झपट चल रही है।
यदि आपके पास आठ-दस लाख रूपए हैं तो आप आसानी से एक हारर फिल्म बना सकते हैं। नीचे कुछ सामानों की सूची दी गई है।
1-    एक हवेली या एक कब्रिस्तान किराए पर ले लें।
2-    पच्चीस-तीस किलो मकड़ी का जाला
3-    चालीस-पचास चमगादड़
4-    मोमबत्ती के दस-बीस पैकेट
5-    सफेद साड़ी में मोमबत्ती पकड़कर घूमने वाली एक महिला कलाकार
6-    कुछ घूंघरू
7-    जानवरों की खाल
8-    दो-चार सांप
9-    एक बड़ा सा झूमर
10-     राजा-महाराजाओं की पुरानी सी तस्वीरें
11-     एक बूढ़ा चौकीदार जिसकी एक आंख में पट्टी बंधी हो
12-     यही चौकीदार पहली इंट्री में लालटेन पकड़कर आएगा और चिल्लाएगा-यहां से चले जाओ। मैं कहता हूं कोई नहीं बचेगा। भाग जाओ यहां से।
13-    हीरो के नाम पर दीपक पाराशर या फिर अनिल धवन
14-    हिरोइन कोई भी चलेगी.. बस उसको बात-बात पर गर्मी लगनी चाहिए ताकि कपड़े उतार सकें
15-    हास्य कलाकार ऐसा जो पूरी फिल्म में बरमुड़ा पहनकर घूमता दिखाई दे।
16-    एक भालू टाइप का भूत जो सिर्फ क्रास या फिर त्रिशूल ही मरता हो।

 फिल्म की कहानी (फ्री में दे रहा हूं)
कालेज के कुछ लड़के-लड़कियों का ग्रुप पिकनिक पर गया हुआ है। सबके पास अपना अपना आइटम है। मतलब सबकी महबूबा है। अचानक तेज बारिश होती है सभी रास्ते बंद हो जाते हैं। बचने के लिए सभी एक हवेली में पहुंचते हैं तभी एक आंख में पट्टी बांधा चौकीदार निकलता है। (क्या बोलेगा वह मैं ऊपर लिख चुका हूं)
सबको कमरा एलाट हो जाता है। हीरो की हिरोइन पर एक लड़के की नीयत खराब हो जाती है। हिरोइन अपने कमरे में सो रही है तभी.... टेनटेन डेटन। हीरो आता है फायटिंग होती है। खराब नीयत रखने वाला लड़का हवेली के पीछे भागता है पीछे कब्रिस्तान है वहां जोरदार फायटिंग होती है। इससे पहले कि हीरो उसे मारे कब्रिस्तान से एक हाथ निकलता है और गंदी नीयत रखने वाले लड़के को खींच लेता है। हीरो के साले दोस्त चीख-पुकार सुनकर वहां आ जाते हैं। सभी लोग हवेली को छोड़कर जाने की बात करते हैं तभी बूढ़ा चौकीदार कहता है- अब कोई नहीं बचेगा.. बारिश बहुत बढ़ गई है। दूसरे दिन भूत का प्रवेश होता है और वह एक-एक कर तमाम बुरी आत्माओं का खात्मा करता है। अंत में भूत त्रिशूल के लगने से मर जाता है। हिरोइन अपने हीरो से चिपक जाती है। दी एंड।
यदि आपने फिल्म का विचार बना लिया है फिर फिल्म के नाम की जरूरत भी पडेगी। फिल्म का नाम भी कुछ इस तरह से हो सकता है-
अमावस की रात, कफन, डायन, गेस्ट हाउस, खून की प्यासी, प्यासी आत्मा, खंडाला टाउन, कब्रिस्तान, वो भयानक रात, आखिरी चीख, प्यासा शैतान, खूनी महल,शैतानी इलाका, वीराना, महाकाल, सन्नाटा, चीख, पुरानी कब्र, तहखाना, प्यासा हैवान, दरवाजा, बंद दरवाजा, प्यासी भूतनी, पुरानी हवेली, टेलिफोन, पुराना मंदिर, खौफनाक महल,खूनी मुर्दा, आत्मा, रूहानी ताकत, होटल।
आप कहेंगे इन नामों से तो फिल्म बन चुकी है.. तो मैं कब कह रहा हूं कि नहीं बनी है। आपको इन नामों के आगे-पीछे पार्ट-टू जोड़ते जाना है।