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Monday, May 31, 2010

झींगालाला ने बांचा ब्लागरों का भविष्य

अरसा पहले जब कृष्णा शाह की फ्लाप फिल्म शालीमार आई थी तब ही शायद लोगों ने पहली बार झींगालाला शब्द को सुना था। याद करिए- हम बेवफा हरगिज न थे गाने में झींगालाला ... हुर्र.. हुर्र को। हाल के दिनों में बदल डाला और लाइफ हो गई झींगालाला जैसा कोई विज्ञापन देखने को मिल रहा है। झींगालाला का सही अर्थ क्या हो सकता है यह तो खुद झींगालाला ही बता सकते हैं लेकिन मोटे तौर पर मुझे लगता है कि जो आदमी झींगा मछली खाकर अपने आपको लाल महसूस करता होगा शायद वही झींगालाला हो सकता है। या फिर हो सकता है कि लाला लोग झींगे को खाते हो इसलिए कुछ लोग उन्हें भी झींगालाला कहते हो। बहरहाल जो भी हो झींगालाला बड़ा प्यारा शब्द है। अभी चंद रोज पहले ही झींगालाला नामक एक ज्योतिषी की भी पैदाइश हुई है। जिस झींगालाला की मैं बात कर रहा हूं वे सिर्फ ब्लागरों का भविष्य बांचते हैं। देश के कुछ प्रसिद्ध ब्लागर उन्हें अपनी कुण्डली दिखा चुके हैं। फिलहाल झींगालालाजी ने राशि के हिसाब से कुछ जानकारियां दी है। आप यदि अपने को ब्लागर समझने का भ्रम पालकर बैठे हैं तो गौर फरमा सकते हैं।

मेष- इस राशि के जातक पहले नंबर पर होने के कारण थोड़ा घमंड में रहते हैं। घमंड करो लेकिन यह भी ध्यान रखिए कि कोई आपके ब्लाग पर गंदी-संदी टिप्पणी कर आपके घमंड की वाट लगा सकता है। यह सप्ताह आपके लिए खतरनाक है क्योंकि कोई न कोई कमीना अपनी जात दिखाते हुए आपकी रचना को वासना से प्रेरित बताकर आपको परेशानी में डाल सकता है।
बचाव- हर सोमवार को पोस्ट न लिखे। शुभ रंग- अपनी चमड़ी के रंग का वस्त्र पहने।
वृष- इस राशि के जातकों की अक्ल भैंस के पास रहती है लेकिन वे अपना उपयोग गदहे के समान करवाते हैं। इस सप्ताह आपको ज्यादा सावधान रहने की जरूरत है क्योंकि जिस ब्लागर से आप अपनी पोस्ट लिखवाते रहे हैं वह आपको धोखा देने वाला है। आपके ब्लाग पर कुछ नए तरह के वायरसों का प्रवेश होगा जिन्हें जूता मारकर आपको बाहर निकालना होगा। कुछ ऐसे लोग भी आपके ब्लाग पर आ सकते हैं जो कहेंगे कि वे ही आपके असली पापाजी है।
बचाव-काले कुत्ते के सामने महेश घी का डिब्बा रख दें। उसकी मर्जी होगी तो पी लेगा। शुभ रंग- सिर से पांव तक जलजला वाला लाल।

मिथुन-इस राशि के जातकों को इस बात का घमंड रहता है कि उनके नाम का एक फिल्म एक्टर है और मेडिकल स्टोर में बिकने वाले कंडोम का नाम भी यही है, लेकिन इन्हें शायद नहीं पता होता कि जो कुछ भी ये कर रहे होते हैं दुनिया की दूसरी राशि का आदमी भी वही सब कुछ आसानी से कर रहा होता है। इस राशि वालों को इस सप्ताह काफी चुनौतियों का सामना करना पड़ेगा क्योंकि कोई न कोई उनका स्टिंग आपरेशन कर सकता है। इस राशि के ब्लागरों को इस सप्ताह अपने ब्लाग पर मानव शरीर के विचित्र अंगों का वीभत्स चित्र देखने को मिल सकता है। कईयों के मुंह से निकल सकता है-हाय राम.. ऊई मां।
बचाव- 35 एमएम की अंडरवियर पहनकर ही विश्राम करें। शुभ रंग-काला

कर्क-इस सप्ताह आप पूरे विश्वास के साथ विरोधियों का सामना करेंगे लेकिन आपका यह प्रयास बहुत ज्यादा सफल होगा ऐसा लगता नहीं है क्योंकि आपके ब्लाग पर पिछले कुछ दिनों से टिप्पणियों का आगमन कम हो चुका है। पहले गिरे से गिरे लोग भी गिरी सी गिरी हालत में 25-30 टिप्पणियां कर ही देते थे लेकिन पता नहीं कमीनों को किसने सीखा-पढ़ा दिया है कि अब लोग बिल से बाहर ही नहीं निकल रहे हैं। सप्ताह के अंत में आपको ब्लागर मीट का न्यौता मिलेगा लेकिन आप यह कहकर नहीं जाएंगे कि नांगलोई जाने तक तेल उबटन निकल जाएगा। फिर भी आप विरोधियों की फाड़के रख देंगे।
बचाव-मुंह में समोसा ठूंसकर दस-बारह पोस्ट लिखे। शुभ रंग- चायपत्ती का।

सिंह- इस राशि के जातक बहुत ज्यादा दहाड़ने का काम करते हैं लेकिन जब वक्त आता है तो बोलते है कि ब्लागर संगठन बनाने से गुटबाजी बढ़ जाएगी। इस राशि के ब्लागरों का संबंध कानपुर वालों से भी बना रहता है। वहां भी इनके मूंछ और पूंछ का बाल पुड़िया में बेचा जाता है। इस राशि के जातकों का यह सप्ताह अच्छा गुजरने वाला है क्योंकि इन्हें इधर की उधर करने का पुरस्कार मिल सकता है। मगर पुरस्कार पाने के लिए आपको यात्रा करनी पड़ सकती है। टिकट इलाहाबाद से ही कन्फर्म हो पाएगी।
बचाव- बस मैं शेर हूं..शेर हूं कहकर चिल्लाते रहे कोई कुछ नहीं उखाड़ पाएगा।
शुभ रंग- भेड़िए का पीला मटमैला।
कन्या-
समझ में नहीं आता कि यह राशि किसने बनाई लेकिन जिसने भी बनाई है यह बड़ी ही खूबसूरत राशि है। यदि आप महिला है तो आपका पति आपको इस बात के लिए पीट सकता है कि ब्लागिंग ज्यादा हो गई थोड़ा समय पर मुन्ने का हगीस भी बदल दिया करो, लेकिन यदि आप पुरूष है तब भी आपकी इस बात के लिए ठुकाई हो सकती है कि क्योंकि बार-बार महिला ब्लागरों के ब्लाग पर जाकर कोमल भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति लिखने के कारण शर्मा-वर्मा और पांडे जी ने आपको पहचान लिया है कि आप उनकी पत्नी की पीछे किस नीयत से पड़े हैं।
बचाव- घटिया रचना को बेकार और अच्छी रचना को अच्छा लिखकर बच सकते हैं।
शुभ रंग- जूते में लगी हुई मिट्टी का रंग।

तुला-
इस राशि के जातक का चुनाव चिन्ह तराजू है। तराजू संतुलन का प्रतीक होता है लेकिन ये ही सबसे ज्यादा असंतुलित रहते हैं। किसी के भी ब्लाग पर दिन-दहाड़े घुसकर वाट लगाना इनकी फितरत है। इस राशि के जातकों का यह सप्ताह काफी परेशानी में गुजरने वाला है क्योंकि समीरलाल समीर का खुलेआम समर्थन करने के कारण कई लोग इनके पीछे लगे हुए हैं। वे मौका ढूंढ रहे है कि किस तरह से वाट लगाई जाए। अभी कोई कुछ भी बोले तो शांत रहे।
बचाव- नाइस वाले बाबाजी को दिन में चार बार याद करें। शुभ रंग-सफेद

वृश्चिक- सरवर डाउन होने का गुस्सा कम्प्यूटर पर निकालने से चालीस-पचास हजार की वाट लग सकती है। आप तुरन्त कोई धार्मिक पोस्ट लिखकर अपने आपको विद्धान साबित कर सकते हैं। यह सप्ताह आपका कुछ खास नहीं बीतने वाला क्योंकि कुछ ऐसे कौव्वे भी ब्लागजगत में आ गए हैं जो मस्जिद की मीनार पर बैठकर अपने को मौलवी समझने लगे हैं। यही मौलवी आपकी बुद्धि की सड़क पर डामर बिछाने का काम करेंगे।
बचाव-जब भी कोई धर्म की बात करें जोर-जोर से रोने लगो। शुभ रंग- अपनी सुविधा के हिसाब से हरा भी और केसरिया भी।

धनु-
इस राशि के जातक अपने ब्लाग को सजाने-संवारने पर भरोसा नहीं रखते। कही भी फूल चिपका देंगे कहीं भी घड़ी लगा देंगे। लेकिन ये मन के बहुत सच्चे होते हैं। इस सप्ताह कोई लड़की बनाम लड़का इनके ब्लाग पर आकर टिप्पणी छोड़ जाएगा कि मेरे शरीर पर कपड़ा चिपक गया है उसे उतार दो। इस टिप्पणी से इनके इरादे बदल सकते हैं लेकिन जैसे ही वे उस कथित लड़की के ब्लाग पर जाएंगे तो पता चलेगा कि वहां पहले ही सिर्फ लड़कियों के ब्लाग पर जाकर अपनी बौद्धिकता झाड़ने वाले कई मूर्धन्य मौजूद है। सावधानीपूर्वक टिप्पणी करें क्योंकि पोस्ट आपको समर्पित हो सकती है।
बचाव- कामवासना को बढ़ाने वाली पोस्ट पढ़ने से बेहतर है कि आप सरिता का कांसे कहूं कलाम जरूर पढ़े। शुभ रंग-आसमानी

मकर- कार्यस्थल पर सख्ती करने से विरोध झेलना पड़ सकता है। विरोध से बचने लिए जरूरी है कि लंबे-लंबे शीर्षक वाली चार-पांच पोस्ट लिखकर उसमें देशी रंग ठूसकर ब्लागजगत को परोस दे। ब्लागों पर जाकर आबलिंग-आबलिंग लगाकर सुझाव देने वाली टिप्पणी भी करेंगे तो विरोधी परास्त हो जाएंगे। आखिर कोई कब तक झेलेगा। विरोधियों को पटकनी देने के लिए जरूरी है कि आप केवल प्रेम कविता ही लिखे और जो प्रेम कविता लिखते हैं वहां जाकर वाह-वाह जरूर करें।
बचाव-बुर्का ओढ़कर ब्लागिंग न करें और मर्द आदमी की तरह टिप्पणियों के दरवाजे पर स्टेफ्री का पैकेट न रखें। शुभ रंग-नेलपालिश का कोई भी कलर चलेगा।
कुंभ- ब्लागजगत में आपकी एकतरफा चलती है। आपके कहने पर ही लोग एक जैसी पोस्ट लगाने को तैयार हो जाते हैं। इस राशि के जातकों की खास बात यह है कि जिसके दोस्त है उसके दोस्त है और जिसके दुश्मन है उसका कुछ नहीं कर पाते हैं। जब ज्यादा परेशानी में होते हैं तो मेरा मन डोले तेरा तन डोले गाना गाकर अपना मन बहलाते है और दूसरों को झेलने के लिए कहते हैं। इस सप्ताह आप हमेशा की तरह की घटिया गजलों का ही उत्पादन करेंगे मगर.. लोग कहेंगे दिल को चीरती हुई रचना लिखी है आपने। दुश्मनों से सावधान रहे, वे आपकी पुंगी बजाने को तैयार है।
बचाव-दोस्ती ही एकमात्र रास्ता है। शुभ रंग- आप पर कोई भी कलर जंचता है।
मीन-
यह सप्ताह आपके लिए मुसीबतों का पहाड़ लेकर आने वाला है क्योंकि कई इलाकों से आपको यह समाचार सुनने को मिल सकता है कि अमुक आदमी ब्लागर संगठन बनाने का विरोध कर रहा है तो ठमुक आदमी ब्लागर संगठन को ढकोसला बता रहा है, लेकिन आप अपने इरादे से हटेंगे नहीं। घटोत्कछ, भूतनी, भूतनाथ, जलजला, अम्माजी, पापाजी, दादाजी, नानाजी और बहनजी आपका कुछ नहीं बिगाड़ पाएंगे।
बचाव-जल्द से जल्द संगठन बना ले वरना कोई जनहित याचिका लगा देगा।
शुभ रंग- इस राशि के सभी जातक लाल रंग का कपड़ा पहनकर काम करें।
टीपःबुरा नहीं मानने का है, और बुरा लगे तो अपने को फोन करने का। 

Friday, May 28, 2010

क्या फिर उभरेगा छत्तीसगढ़ियावाद

प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने बहुत कोशिश की थी कि छत्तीसगढ़ में छत्तीसगढ़ियावाद उभरे लेकिन तमाम तरह की कोशिशों के बाद भी वे नाकाम साबित हुए। अब एक बार फिर कांग्रेस से जुड़े एक फिल्म निर्माता ने अपनी नई फिल्म मया देदे मयारू में इसी वाद  को भुनाने का प्रयास किया है। हालांकि यह फिल्म अभी प्रदर्शित नहीं हुई है लेकिन जानकारों का कहना है कि फिल्म के प्रदर्शन के बाद छत्तीसगढ़ियावाद को लेकर विचार-विमर्श का दौर प्रारंभ हो सकता है। यदि विवाद होता है तो फिल्म को नुकसान होगा या लाभ यह देखना दिलचस्प होगा।

छत्तीसगढ़ियावाद क्या है। छत्तीसगढ़ियावाद भीतरी और बाहरी होने की वकालत करता है। यह समस्या कोई अकेले छत्तीसगढ़ में ही है ऐसी बात नहीं है, वे प्रदेश जो नए-नए बने हैं वहां भी स्थानीय और बाहरी होने का झगड़ा जारी है। ज्यादा दूर न जाए तो मुबंई से बिहारियों को भगाने की बात एक तरह से वाद से ही ग्रसित थी। स्थानीय लोगों को हर काम में प्राथमिकता की बात एक हद तक तो सही हो सकती है लेकिन मामला जब नफरत और वैमनस्यता पर आकर टिक जाता है तो फिर उसमें एक महीन किस्म की सांप्रदायिकता का प्रवेश होते देर नहीं लगती। हालांकि छत्तीसगढ़ का यह रिकार्ड ही रहा है कि यहां लोगों ने कभी भी सांप्रदायिकता के डैने को फड़फड़ाने का अवसर नहीं दिया है।

कांग्रेसी सांसद चरणदास महंत के निकटतम समझने जाने वाले निर्माता-निर्देशक ने अपनी कहानी में कंठी ठेठवार व अन्य लोगों के माध्यम से गांव के चौटाला परिवार व अन्य लोगों के बीच खंदक की लड़ाई दिखाई है। स्थानीय और बाहरी की लड़ाई का भाव यही है कि जितने बाहरी लोग होते हैं वे सब बुरे होते हैं। यानी बाहरी लोग गांव की बहु-बेटियों की इज्जत लूटते हैं उन्हें बरबाद करते हैं। इस विरोध के चलते कंठी ठेठवार की हत्या हो जाती है। बाद में अपने पिता के साथ हुए अन्याय का बदला उसका बेटा यानी फिल्म का हीरो अनुज लेता है।

वैसे तो छत्तीसगढ़ के अधिकांश लोगों की भावना यही है कि यहां लगने वाले स्थानीय उद्योग धंधों में उन्हें अधिकार के साथ काम मिले लेकिन जब वे अधिकार के लिए आंदोलन करते हैं तो उन्हें निराशा होती है। इस निराशा के चलते छत्तीसगढ़ का एक बड़ा मजदूर तबका हर साल पलायन करने को मजबूर होता है। पलायन से उपजी से समस्या को बेहद हल्के अन्दाज में सतीश जैन ने अपनी फिल्म मोर छंइया-भुईया में दर्शाया था, लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद लगातार चल रहे उत्सव में फिल्म का संदेश कही दबकर रह गया था। इसके बाद किसी भी निर्माता-निर्देशक ने पलायन, मजदूर समस्या या नक्सलवाद को लेकर कोई फिल्म नहीं बनाई, और तो और हिरोइनों के आगे-पीछे खड़े होकर फोटो खिंचवाने वाले निर्देशकों ने प्रसिद्ध मजदूर नेता शंकरगुहा नियोगी को ही भुला दिया। जबकि महाराष्ट्र के इगतपुरी में रहने वाले संजीव करबेलकर ने छत्तीसगढ़ की सीमा से लगे मध्यप्रदेश के बालाघाट में नंदिता दास को लेकर लाल सलाम नामक फिल्म ही बना डाली थी। प्रसिद्ध फिल्म निर्माता एन चंद्रा ने भी अपनी एक फिल्म में शंकरगुहा नियोगी जैसा एक कैरेक्टर पैदा किया था। दस-बीस लाख लगाकर करोड़ो पीटने वाले निर्माता-निर्देशकों ने नक्सलवाद,शोषण, पलायन,भाई-भतीजावाद और गांव-गांव में घुस आई राजनीति से होने नुकसान से जैसे किनारा कर लिया है, और तो और इन विषयों पर मीडियाकर्मियों ने भी एक तरह से चुप्पी साध ली है। छत्तीसगढ़ के दलाल किस्म के मीडियाकर्मियों का अधिकांश समय भी इन दिनों फिल्मी पार्टियों में हिरोइनों से हाथ मिलाने, चीयर्स करते हुए चिकन-चिल्ली खाने में बीत रहा हैं। कुछ तो हिरोइनों को चांदनी की श्रीदेवी और करण अर्जुन की राखी बना देने का झांसा देकर बकायदा रकम भी ऐंठ रहे हैं। दलालनुमा लोगों ने अपने ब्लाग पर भी गंदगी फैला रखी है।
जल्द ही एक और फिल्म टूरा रिक्शावाला (रिक्शा चलाने वाला लड़का)  भी आने वाली है। वैसे तो पूरी फिल्म में एक रिक्शेवाले का एक विधायक की लड़की से प्यार ही दिखाया गया है लेकिन माना जा रहा है कि इस फिल्म के बाद भी छत्तीसगढ़ियावाद उभर सकता है। छत्तीसगढ़ का मजदूर या गरीब आदमी बहुत कम रिक्शा चलाता है, रिक्शा चलाने का काम छत्तीसगढ़ से सटे एक प्रांत के लोग ज्यादा करते हैं। यदि विधायक की लड़की छत्तीसगढ़ के मूल आदमी को दिल न देकर दीगर प्रांत के लड़के को दिल देगी तो फिर कैसा वाद जन्म लेगा यह आसानी से सोचा जा सकता है। क्या छत्तीसगढ़ का आदमी हर तरफ से अपनी उपेक्षा के बाद भी चिल्लाएगा- सबले बढ़िया-छत्तीसगढ़िया।

Thursday, May 27, 2010

अब नए डायलाग के साथ प्रदर्शित होगी शोले

जी हां प्रसिद्ध निर्देशक रमेश सिप्पी की फिल्म शोले अब कुछ नए संवादों के साथ प्रदर्शित होने जा रही है। वैसे तो फिल्म के बहुत से संवाद तो जस के तस रहेंगे लेकिन जहां-जहां भी गब्बर सिंह का नाम आएगा वहां-वहां एक बदलाव किया गया है। यह बदलाव क्या है जरा आप भी देखिए, लेकिन ठहरिए जरा फिल्म के इस चित्र को तो देख लीजिए... यह चित्र अमजद खान का है जिसे लोग गब्बर सिंह के नाम से ही जानते हैं.

डायलाग- यहां से पचास-पचास कोस दूर गांव में जब बच्चा रात को रोता है तो मां कहती है बेटा सो जा, सो जा नहीं तो.........(डरावना म्यूजिक...) सो जा नहीं तो जलजला आ जाएगा।
जी हां ब्लाग जगत ने जलजला को इतना अधिक प्रसिद्ध कर दिया है कि गब्बर की प्रसिद्धी भी उसके सामने फीकी पड़ गई है, जिसे देखो वही जलजला-जलजला कर रहा है।
कुछ और संवाद-
-रामगढ़ के लोगों तो इन्हें लाए थे तुम जलजला से टक्कर लेने क्यों
- जलजला ये हाथ नहीं फांसी का फंदा है
- और तुम तीन हरामजादे जलजला का नाम पूरा ही मिट्टी में मिलाए दिए

वैसे जलजला की लोकप्रियता को देखकर दक्षिण भारत के एक प्रसाद नामक निर्माता ने कुछ दूसरी तरह के नामों का पंजीकरण भी करा लिया है। देखिए कुछ नाम-
- मैं प्यासी हूं जलजला
- जवानी का जलजला
- पड़ोसन का जलजला
- नर्स का जलजला
- जलजला और कच्ची जवानी
-जलजला की दीवानी
- मैं जलजला की हूं
- बाथरूम और जलजला
-हुस्न का जलजला
- लुट गई जलजला तेरे प्यार में

वे कहानीकार जो लंबे-लंबे शीर्षकों से कहानियां लिखते हैं उन्होंने भी कुछ कहानियां इन दिनों लिखी है। यह कहानियां कहां प्रकाशित हुई है यह तो नहीं मालूम लेकिन इन कहानियों की समीक्षा अखबारों में देखी गई है। शीर्षक देंखे-
-एक आकाश जिसमें जलजला रहता है
-यदि सूख गया भीतर का जलजला
-इधर भी जलजला उधर भी जलजला
-जलजला मैं और तवे पर दोसा पकाता हुआ मंगलू
-जलजला, केला, नींबू और संतरा
- जलजलाः तीन कविताएं
- जलजले से होकर गुजरा जलजला।

विज्ञापन बनाने वाली कुछ कंपनियों ने भी जलजले का नाम कुछ इस तरह प्रयुक्त किया है-
0 दाद-खाज खुजली का मरहम- जलजला लोशन
0 जलती धूप में चेहरे को निखारे- जलजला क्रीम
0 बचपन के गलत कामों को न छिपाएं... हर जगह लगाएं-जलजला तेल।

Tuesday, May 25, 2010

सच का सामना में ब्लागर

दोस्तों नमस्कार.. एक बार फिर मैं राजीव खंडेलवाल आपका स्वागत करता हूं सच का सामना में। आप सोच रहे होंगे कि यह कार्यक्रम फिर कब से चालू हो गया। कार्यक्रम का क्या है वह कभी भी बंद होते रहता है और फिर जब मर्जी चालू हो जाता है। तो अब तक आप यूसुफ साहब, उर्वशी ढोलकिया, विनोद कांबली सहित कई जानी- मानी हस्तियों को सच का सामना करते हुए देख चुके हैं लेकिन इस कार्यक्रम की दूसरी कड़ी में पहली बार हम आपका परिचय कराने जा रहे हैं एक ब्लागर से। तो लीजिए पेश है ब्लागर मिस्टर एक्स।

मिस्टर एक्स केवल और केवल ब्लागिंग करते हैं इसके अलावा वे केवल ब्लागिंग ही करते हैं। तो मिस्टर एक्स आपको नियम और कानून तो पता ही है। आपको 21 सवालों का जवाब देना है। हर सवाल का जवाब सही होना चाहिए तभी आप एक करोड़ रुपए जीत पाएंगे। आपको पता ही है कि पालीग्राफिक मशीन ने आपका टेस्ट कर लिया है, जो झूठ आप अपने ब्लाग पर लिखते हैं या बोलते हैं कृपयाकर उसे यहां मत बोलिएगा। हां.. यहां हमारे बीच मिस्टर एक्स की एक सही पत्नी और उनके माता-पिता आए हुए हैं। मैं मिस्टर एक्स के परिवार वालों से कहना चाहूंगा कि यदि आपको कोई सवाल गलत लगता है तो आप आपके सामने एक बजर पड़ा हुआ है आप उसे दबा देंगे, लेकिन उस सवाल के बाद आपको मेरे दूसरे सवाल का जवाब देना ही होगा। एक बात और.. आप जानते ही है कि मेरे सवाल किस तरह से निजी होते हैं.. जरा सोच समझकर जवाब दीजिएगा। तो लीजिए दोस्तों देखते हैं कि मिस्टर एक्स कैसे करते हैं आज पूरी दुनिया के सामने सच का सामना  तेज म्यूजिक ... नीली रोशनी...

तो मिस्टर एक्स सबसे पहले तो आप यह बताइए कि आपको ब्लागर बनने की सलाह किसने दी।
0-देखिए यह आत्मा का सवाल है। आत्मा से आवाज निकली कि बेटा जब तुम्हारे पास कोई काम धंधा नहीं है तो फिर ब्लागिंग करो। बस आत्मा की पुकार के बाद मैंने फैसला कर लिया कि अब मैं ब्लागिंग ही करूंगा। वैसे ब्लागिंग के क्षेत्र में मेरे आने का एक कारण और भी है। मेरा एक दोस्त जब से ब्लागर बना है तब से अपने ब्लागस्पाट का नाम विजिटिंग कार्ड में छपवाकर घूम रहा है। अपने को जलन हुई और अपन ने अपना ब्लाग भी खोल लिया।
- देखते है पालीग्राफिक मशीन क्या कहती है।
 थोड़ी देर बाद...बिल्कुल सही जवाब
-अब मेरा दूसरा सवाल। ब्लागिंग करने के बाद आपने कितने लोगों को सताया।
देखिए.. राजीव जी जब मैं ब्लागिंग के क्षेत्र में आया था तब मैंने तय किया था कि मैं किसी को नहीं सताऊंगा लेकिन क्या करता। एक दिन एक हराम.. अरे .. पता नहीं था कार्यक्रम में गाली नहीं दे सकते हैं... तो मैं कह रहा था कि एक दिन एक कुत्ते का पिल्ला मेरे ब्लाग पर आया और अंड-बंड टिप्पणी लिखकर चलता बना। उसके बाद मैंने तय किया कि जो मुझे गाली देगा। मेरे ब्लाग पर आकर होशियारी झाड़ेगा तो मैं उसकी बांस कर दूंगा। वैसे मैं कई लोगों को बांस कर चुका हूं।
- तो कितने लोगों की बांस कर चुके हैं आप
0- गिनती नहीं है फिर भी हर रोज का यदि दो का भी एवरेज लेंगे तो अब तक ढाई सौ लोगों को मैं बांस कर चुका हूं।
-चलिए मेरा तीसरा सवाल .. अब आप यह बताइए कि अपने ब्लाग को हिट करने के लिए आपने कौन सा तरीका अपनाया।
0- देखिए राजीवजी जब मैंने ब्लाग खोला तब मेरे ब्लाग पर एक खुजली वाला कुत्ता भी झांकने नहीं आता था। एक दिन मेरे ब्लाग पर एक ब्लागर गाली देकर चला गया। उसके बाद मैने उसके ब्लाग पर जाकर उसकी जमकर ऐसी-तैसी की। इस ऐसी-तैसी से मुझे प्रमोशन मिला। एक दिन मेरे मित्र ने मुझे बताया कि जब तक आप लोगों के ब्लागों पर जाकर टिप्पणी नहीं करोगे तब तक आपको भी टिप्पणी नहीं मिलेगी। बस उसके बाद से मैं हर ब्लाग पर जाकर मत्था टेकता हूं। कोई पांडुरंगा फोंडे फुन्सी पर भी लिख देता है तो कम से कम नाइस लिखकर आ जाता हूं।
-मतलब किसी को फोड़ा हो जाए तब भी आप नाइस लिख देते हो
0- हां लिख देता हूं। नाइस का मतलब हिन्दी में अच्छा होता है। यदि आज फोड़ा है तो कल दवा पानी से अपने आप अच्छा हो जाएगा, इसलिए जब फोड़े को अच्छा होना ही है तो मैं पहले से ही लिख देता हूं-नाइस।
(ब्लागर लगातार रकम जीतते जा रहा है। जब नहीं जीतेगा तब मैं बता दूंगा)
-अब मेरा अगला सवाल। अक्सर आपको महिला ब्लागरों के ब्लागों पर टिप्पणी करते हुए देखा गया है ऐसा क्यों।
0- देखिए.. महिला ब्लागरों के ब्लागों पर मैं ही नहीं बहुत से लोग टिप्पणी करते हैं। हालांकि बहुत सी महिला ब्लागर मार्के का लिखती है लेकिन जो नहीं लिखती हैं मैं वहां भी जाकर लिख देता हूं कि आपकी कविता दिल को छू गई है। एकदम से दिल में उतर गई है। प्रेम के रस में डूबी हुई है। एक सुन्दर अहसास से लबरेज हैं। कोमल भावनाओं की सुंदर प्रस्तुति।
-फिर भी क्या आप बता सकते हैं कि कौन-कौन से लोग है जो महिला ब्लागरों के ब्लाग पर नियमित टिप्पणी करते हैं।
0-देखिए राजीव जी महिला ब्लागरों के ब्लाग पर जाकर टिप्पणी करना कोई बुरी बात तो नहीं है न। हमें स्त्री की ताकत का सम्मान तो करना ही चाहिए लेकिन क्या है कि आपका कहना भी सही है। कुछ टिप्पणिया  वाकई ऐसी होती है जो बताती है कि सामने वाली नीयत क्या है। जैसे- घटिया सी कविता पर कोई यह लिखकर आ जाता है कि आपके ब्लाग पर पहली बार आया हूं। यहां आकर पता चला कि आप कितना सुंदर लिखती है, बिल्कुल चिडि़या की तरह। मन की भीतरी तहों को खोलती हुई .. तो.. समझ में आ जाता है कि सामने वाला ऐड़ा बनकर पेड़ा खाने के चक्कर में हैं। फिर भी आपको बता देता हूं कि यूपी साइड के कई ब्लागर, कवि टाइप के लोग और प्रेम कविता लिखने वाले नए-नए छोकरे अपने से बड़ी उम्र की महिलाओं के ब्लाग पर जाते रहते हैं और कुछ का कुछ लिखकर आते रहते हैं। साले लिखते ऐसा है कि कि पूछिए मत। ये नहीं कि जो आंटी लगे उन्हें आंटी बोले। जो बहन जैसी दिखे उसे बहन बोले। जो माताजी हो उन्हें माताजी का संबोधन दे। साले ऐसा लिखेंगे कि ...देखिए राजीव जी मुंह मत खुलवाइए।
- आप तो बताइए कि आप महिलाओं के ब्लाग पर क्यों जाते हैं।
0- मैं फूल-पत्ती का चित्र देखने के लिए जाता हूं और सही बताऊं तो इसलिए भी जाता हूं कि साले दूसरे ब्लागरों को पता चले कि मेरा अनुशरण करने वालों में महिलाए भी हैं। वैसे जब महिलाएं मेरे ब्लाग पर आकर टिप्पणी करती है तो मेरा दिल बाग-बाग हो जाता है। कोई-कोई आकर भैय्या लिखकर चल देती है तब बुरा लगता है।
-अब धीरे-धीरे मैं खतरनाक सवाल की ओर बढ़ रहा हूं। आपको पता ही है सवाल निजी होता जाएगा।
-क्या आपको नहीं लगता कि ब्लागिंग की वजह से आपकी सेक्सुअल लाइफ प्रभावित हो रही है।

मुझे तो नहीं लगता लेकिन यह सही है कि जो काम मुझे रात को करना चाहिए मैं दिन में करने लगा हूं।
- यानी कि आप पत्नी के साथ अन्याय कर रहे हैं
0- आप बात को गलत मोड़ दे रहे हैं मैं  अब दफ्तर का काम दिन को ही करता हूं।
-अरे तो कौन उल्लू का पट्ठा रात को करता है।
0- पहले मैं रात को ही करता था लेकिन अब रात को ब्लागिंग करता हूं।
- पिछले दिनों कौन श्रेष्ठ है उस बारे में आप क्या सोचते हैं। कौन श्रेष्ठ ब्लागर है। 
0- देखिए मेरे सोचने से क्या होता है। जो कुछ करना था वह जनता ने कर दिया। बाकी समीरलाल साहब की किस्मत और मेहनत थी। श्रेष्ठ ब्लागर वैसे समीरलाल ही है।
-देखते है मशीन क्या बोलती है।
-बिल्कुल सही जवाब है आपका।

अब मेरा एक और खतरनाक सवाल। क्या आपने ब्लागिंग करते-करते दारू चढ़ाई है। कितनी।
0- क्या है राजीव जी मुझे किसी ने बचपन में ही बता दिया था कि जितने बड़े लेखक है वे सब टुन्न होकर ही लिखते रहे हैं सो अमर होने के लिए मैं भी टुन्न होकर लिखता हूं। क्या है कि अपने भीतर जितना पालीथीन पड़ा है न वह टुन्न होने के बाद मुंह तक आता है। उसके बाद अपन पालीथीन चबा-चबाकर जुगाली करते रहते हैं और दूसरों को गाली देते रहते हैं। जब बहुत सारी कुंठा एक साथ जमा हो जाती है तो उसे रंग पोतकर.. कुत्ते-कमीने.. तेरी मां की बहनकी हैडि़ग लगाकर पोस्ट कर देते हैं।

Monday, May 24, 2010

हर हाल में बने ब्लागरों का संगठन

हो सकता है कि हर बार कि तरह कुछ विघ्नसंतोषी मेरी बातों का दूसरा ही अर्थ निकाले लेकिन मैं मानता हूं कि जब रिक्शे और आटो वालों का संगठन हो सकता है तो फिर ब्लागरों का संगठन क्यों नहीं हो सकता है। दिल्ली के ब्लागर मिलन समारोह में इस बार भी यही चिन्ता उभरकर सामने आई है कि अब ब्लागरों को अपना एक मंच तैयार कर लेना चाहिए। मैं भले ही उस सम्मेलन का मौजूद नहीं था लेकिन मेरा मानना है कि वहां अविनाशजी ने जो बातें कही वह सौ-फीसदी सही है। ब्लागरों का अपना एक संगठन तो होना ही चाहिए।

वैसे तो पूरा ब्लागजगत ही एक तरह का मंच है, लेकिन यदि एक संगठन तैयार हो गया तो इस मंच की आवाज को एक सही शक्ल देने में सुविधा होगी। वर्तमान में ब्लागजगत के लोग जो कुछ लिखते-पढ़ते है वह खुद को आत्ममुग्ध रखने से ज्यादा कुछ भी नजर नहीं आता है लेकिन यदि संगठन तैयार हो जाता है यही आत्ममुग्धता शायद दूसरों के काम को अन्जाम तक पहुंचाने का सुख भी प्राप्त कर लेगी। मैं बहुत सारे मित्रों के ब्लागों पर जाता हूं। ज्यादातर ब्लाग तो कविता और कहानियां सुनाने के लिए ही एक पैर पर खड़े दिखते हैं (हालांकि इसमें बुराई नहीं है क्योंकि चाहे जो भी .. आखिरकार वे लोग नफरत फैलाने का काम तो नहीं करते) लेकिन कुछ ब्लाग तो निश्चित तौर पर नई जानकारियों और मीडिया के विकल्प के तौर पर अपना काम करते हुए नजर आते हैं। कई बार तो लगता है कि जो खबरें मीडिया के नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती है उनका प्रकाशन किसी न किसी रूप में ब्लागों पर हो ही जाता है। सूचनाओं के विस्फोट से भरे इस खतरनाक समय में जबकि सारी चीजें बाजार आधारित बनती जा रही है यदि वहां हम मंच तैयार कर सकें तो इससे अच्छी बात क्या हो सकती है। हालांकि बाजार की ताकतों का मुकाबला आसान नहीं माना जाता फिर भी हस्तक्षेप या दखल को कम करके नहीं आंका जा सकता है।

ब्लागर मंच या संगठन को लेकर कुछ चिरकुट यह सवाल उठा ही सकते हैं कि इससे मठीधीशी चालू हो जाएंगी.. कुछ लोग राज करने लगेंगे। कुछ लोग अपनी चलाएंगे.. कुछ लोग अपने मतलब की बातों को परोसने के लिए एकजुटता  दिखाएंगे आदि.. आदि।

चिरकुटों के यह सवाल तब लाजिमी हो सकते हैं जब संगठन से जुड़ने वाले लोग गलत प्रवृति के निकलेंगे। गलत प्रवृतियों के लोग जहां कही भी रहेंगे वे अपने आपको बगैर चुनाव के भी स्वयंभू बताते रहेंगे। ऐसे मठाधीशों को इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता है कि कोई उनका नाम लेकर दिन में कितनी बार थूकता है। चिरकुट... पद आदि पाने के लिए भी जी-तोड़ लगाने का सवाल उठाकर भ्रम फैला सकते हैं। वैसे ही जैसे किसी महापुरूष ने यह सवाल उठा दिया था कि पिछली ब्लागर मीट का अजय झा जी हिसाब दें। बहरहाल दिल्ली के ब्लागर सम्मेलन में एक नई दिशा दिखाई है। सोचिए यदि हम सबका एक संगठन दिल्ली में हो और फिर हम एक ईकाई के तौर पर उससे जुड़े रहे तो कितना मजा आएगा। मैं तो उस दिन की कल्पना करके प्रसन्नता से भर उठ रहा हूं जब मैं घर से सूटकेस तैयार कर यह कहते हुए निकलूंगा कि चार दिन बाद तो लौट ही आऊंगा, ब्लागर सम्मेलन में जा रहा हूं। और फिर सम्मेलन में जब देश-दुनिया की चिन्ता करने वाले एक से बढ़कर एक लोगों से मुलाकात होगी तो क्या नहीं लगेगा कि मेरा घर थोड़ा बड़ा हो गया है। सम्मेलन में पहुंचने के बाद जब कोई इस बात के लिए चिहुंक उठेगा कि अरे बिगुल वाले भाई... तो क्या उस खुशी को मैं अपनी आंखों के कैमरे में हमेशा के लिए कैद नहीं करना चाहूंगा। मुझे हर रोज नए लोगों से मिलना-जुलना अच्छा लगता है इसलिए मैं संगठन को बनाए जाने के पक्ष में हूं। मेरे ख्याल से आप भी होंगे , तो फिर जोर से बोलिए- कितने बाजूं कितने सर, लेले दुश्मन जान के
हारेगा हर वो बाजी खेले जब हम जी जान से

ब्लागर एकता जिन्दाबाद.
(जल्द ही छत्तीसगढ़ में भी एक ब्लागर सम्मेलन होगा और हम लोग इस बात पर मंथन करेंगे कि क्या कुछ नया कर सकते हैं। छत्तीसगढ़ का दिल दिल्ली से जुड़ा हुआ है)

Saturday, May 22, 2010

विवाद के बाद दिल्ली का ब्लागर सम्मेलन

दिल्ली में होने वाले ब्लागर सम्मेलन ने सबकी जिज्ञासाएं बढ़ा दी है। सम्मेलन की जवाबदारी अविनाश जी ने ली है। ब्लाग जगत के जितने भी मूर्धन्य है वे सभी अविनाशजी का बड़ा आदर सम्मान करते हैं इसलिए यह भी माना जा रहा है कि सम्मेलन मनोरंजक, रोमांचक होने के साथ-साथ ज्ञानवर्धक भी होगा। सम्मेलन में हर दिल अजीज बीएस पाबला जी के भी शामिल होने की सूचना है वही यह तो पक्के में तय है कि कल के सम्मेलन में हम सबके चहेते ललित शर्मा शिरकत करेंगे ही। ललित शर्माजी का नाम जुड़ते ही कोई भी सम्मेलन अपने आप इंटरनेशलन स्तर का हो जाता है। जिस प्रकार से ब्लाग जगत में उड़न तश्तरी यानी समीरलाल समीरजी का नाम बड़े ही सम्मान के साथ लिया जाता है उसी तरह से लोगों को सुख-दुख में हमेशा हंसते रहने का संदेश देने के मामले में लोग ललित शर्मा को याद करते हैं। 
 
कोई इसे माने या न माने लेकिन यह सच है कि पिछले तीन-चार दिनों से जब से ललित शर्मा छत्तीसगढ़ से गायब है तब से यहां एक तरह से खामोशी भी छाई हुई। मैं ललित शर्मा द्वारा स्वाभाविक ढंग से पैदा की जाने वाली हलचल को देखने और उसमें शामिल रहने का आदी हो चला हूं इसलिए उसका शहर से बाहर रहना मुझे बहुत अखर रहा हैं।

ललित अपने ब्लागर मित्रों के बीच कितना लोकप्रिय है इसका अन्दाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि पिछले दिनों जब एक झोला छाप डाक्टर की सलाह के बाद उसने ब्लागिंग को अलविदा कहा तब ब्लागजगत में एक तूफान सा ही खड़ा हो गया था। सब जानते हैं कि लोगों ने किसे समर्थन दिया था।
अब मैं सम्मेलन करने वाले आयोजकों को एक जरूरी सूचना देना चाहता हूं कि पिछले दिनों हुए विवाद के बाद एकायक आयोजित होने वाले इस सम्मेलन को लेकर एक गुट विशेष के लोगों ने अपनी पैनी निगाह भी लगा रखी है। गुट विशेष के लोग किसी तरह से इस फिराक में हैं कि सम्मेलन असफल और विवादित हो जाए। सम्मेलन के पल-पल की रपट पहुंचाने का जिम्मा भी एक आदमी को सौंपा जा चुका है। जिम्मा को आप सुपारी भी कह सकते हैं।

सूत्र बताते हैं कि सम्मेलन का मुंहतोड़ जवाब देने के लिए एक अन्य ब्लागर सम्मेलन किसी दूसरे स्थान में भी कराए जाने की योजना बनाई जा रही हैं। बहरहाल एकजुट रहिए और सम्मेलन को सफल बनाने की विन्रम कोशिश जारी रखिए। सम्मेलन को लेकर मजेदार टिप्पणियां भी सामने आ रही है। अच्छा लग रहा है। चलो कोई तो है जो हंसा भी रहा हैं।

Friday, May 21, 2010

काली दुनिया का नंगा सच

वे सब प्रियंका,करीना, कैटरीना और दीपिका बनने के लिए ही घर से बाहर निकली थी, लेकिन लंपटों  की फौज उनके पीछे लग गई। किसी ने कहा कि वह उसकी जिन्दगी संवार सकता है तो किसी ने यह कहकर फुसलाया कि बस एक एलबम कर लो फिर तो फिल्मों की लाइन लग जाएगी। वे झांसे में आ गई। चकाचौंध की काली दुनिया में प्रवेश का नतीजा यह हुआ कि किसी प्रतिभा ने बिस्तर पर जाकर दम तोड़ दिया तो किसी को जहर खाकर मौत को गले लगा लिया।

जी हां..छत्तीसगढ़ फिल्म जगत का यह भी एक सच है। भले ही मोटे तौर पर दिख रहा है कि छत्तीसगढ़ का फिल्म जगत बड़ी तेजी से फल-फूल रहा है, लेकिन तल्ख सच्चाई कुछ और है। अब तक एक हीरो अनुज, खलनायक मनमोहन और निर्माता-निर्देशक सतीश जैन को छोड़कर कोई नाम ऐसा नहीं है जो स्थायित्व पा सका हो। यदि कोई पूछे कि भाई छत्तीसगढ़ फिल्मों का सुपर स्टार कौन है तो सबसे पहले अनुज का ही नाम आता है। खलनायकों में लोग मनमोहन का नाम जानते हैं, इसी प्रकार तीन सुपर-डुपर फिल्म बनाने वाले सतीश जैन को भी लोग इसलिए याद रख पा रहे  हैं क्योंकि उनका बंबईया अनुभव जलवा बिखेर रहा है।
बाकी न तो चरित्र अभिनेताओं को पहचान मिल पाई है और न ही हास्य अभिनेताओं को। हिरोइनों की दशा तो और भी खराब है। ऐसा भी नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों में काम करने वाली हिरोइनों ने अपने आपको स्थायित्व प्रदान करने के लिए संघर्ष नहीं किया लेकिन मुबंई में फैली हुई गंदगी ने उनके दामन को भी साफ नहीं रहने दिया है।

सब जानते हैं कि जब राज्य का निर्माण हुआ था तब एक फिल्म किस कदर से सुपर-डुपर हिट हुई थी। लगभग हर जगह से यही आवाज आती थी-आइसक्रीम खाके टूरी फरार होंगे रे.. लेकिन थोड़े समय के बाद ही फिल्म की एक टूरी (लड़की) पर राज्य के एक मंत्री की नजर पड़ गई। उन्होंने एक रेस्ट हाउस में हिरोइन को पकड़ लिया। बात आगे बढ़ पाती इससे पहले हिरोइन को चाहने वाले एक शुभचिन्तक ने एक निजी चैनल वालों को रेस्ट हाउस भेज दिया और मामला गरमा गया। जमकर अखबारबाजी हुई और कुछ दिनों के बाद ही टीवी चैनल के दफ्तरों पर छापा पड़ा और उसका संचालक जेल भेज दिया गया। जोगी शासनकाल में हुई इस घटना को लोग आज भी चटखारा लेकर याद करते हैं। मामले के  सुर्खियों में आ जाने के बाद हिरोइन ने कुछ और फिल्मों में काम किया और फिर कहां चली गई कोई नहीं जानता।

राजनांदगांव जिले की दिव्या साहू भी हिरोइन बनने के लिए रायपुर आई थी। यहां आकर उसने फिल्मों और एलबम के लिए अपना संघर्ष जारी रखा था तभी उस पर प्रीतम बार के संचालक की नजर पड़ गई। आकर्षक शरीर के धनी प्रीतम ने उस पर डोरे डाले और फिर बात फिल्मों से हटकर कही और जा पहुंची। दिव्या ने प्रीतम पर इस बात के लिए दबाव डाला कि वह उससे शादी कर लें। पहले से ही शादी-शुदा प्रीतम ने पिंड छुड़ाने के लिए अपनी पत्नी की मदद ली और फिर एक उसने पत्नी के साथ मिलकर हमेशा-हमेशा के लिए दिव्या को मौत के घाट उतार दिया। प्रीतम और उसकी पत्नी स्वीटी को तो सजा हो चुकी है लेकिन दिव्या एक सफल हिरोइन और माडल बनने से पहले ही इस दुनिया को अलविदा कहने को मजबूर हो गई।
मध्यप्रदेश के भोपाल से यहां छत्तीसगढ़ की फिल्मों में किस्मत आजमाने आई अनिंदता की कहानी भी अलग नहीं है। अनिंदता पहले से ही शादी-शुदा थी। वह अपने छोटे से बच्चे को लेकर छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर चली आई थी। यहां पहुंचने के बाद किसी ने उसे टाप की हिरोइन बनाने का झांसा दिया तो किसी ने गाड़ी-घोड़े, बंगले-नौकर-चाकर सब कुछ होने का लालच दिया। बचपन से अभाव की जिन्दगी गुजर-बसर करने वाली अनिंदता झांसों में आ गई और फिर उसने सफलता का सबसे शार्टकट रास्ता अपनाया। वह कुछ फिल्मों को हासिल करने में सफल हो ही गई थी कि एक रोज राजधानी से कुछ किलोमीटर की दूरी पर उसकी लाश पाई गई। अनिंदता की गाड़ी जिस पेड़ से टकराई थी वहां महंगी सिगरेट और शराब की बोतलें मिली। खुद अनिंदता भी अच्छी हालात में नहीं मिली थी। बताते है कि उसे ठीक-ठाक दशा में  नहीं देखकर गांववालों ने गाड़ी को जलाने का प्रयास भी किया था लेकिन किसी समझदार ग्रामीण ने पुलिस को इत्तला कर दी और मामला इसलिए भी रफा-दफा हो गया क्योंकि इस बार भी हिरोइन के साथ एक नेता का पुत्र घायल मिला था।

राज्य निर्माण के बाद जब पहली बार प्रदेश में आम चुनाव हुए तब विपक्ष के एक खांटी नेता ने अपनी पार्टी को छोड़कर दूसरी पार्टी में प्रवेश ले लिया था। इस प्रवेश को लेकर बाद में यह अफवाह फैली कि नेताजी इसलिए दीगर पार्टी में आ गए थे क्योंकि किसी ने महासमुंद के रेस्टहाउस में उनकी फिल्म बना ली थी। नेताजी की सीडी सार्वजनिक हो पाती इससे पहले उन्होंने सुरक्षित ठिकाना ढूंढ लिया था। जिस अभिनेत्री के साथ नेताजी रेस्टहाउस में ता-ता थैय्या करते हुए मिले थे वे तो अब भी राजनीतिक बनवास ही काट रहे हैं लेकिन अभिनेत्री जरूर एलबम और फिल्मों में ठुमका लगा रही है। छत्तीसगढ़ की सुपर-डुपर फिल्म के एक हीरो के साथ फिल्मी अन्दाज में ही पिज्जा सेंटर और अन्य जगहों पर दिखने वाली एक हिरोइन के बारे में स्थानीय फिल्म समीक्षकों ने यह धारणा बनाई थी कि भविष्य में यह हिरोइन स्मिता पाटिल या शबाना आजमी का रिकार्ड तोड़ डालेंगी लेकिन एक रोज हिरोइन की फोटो पोर्न साइट में नजर आई तो लोगों की संभावनाओं को पलीता लग गया। एक हिरोइन ने खाड़ी देश में रहने वाले किसी युवक से ब्याह रचा लिया था लेकिन कुछ दिनों के बाद ही अभिनेत्री ने एक पत्रवार्ता लेकर युवक पर तरह-तरह के आरोप लगाए। बताते हैं कि हिरोइन अब अपने से उम्र में काफी बड़े यूं कहे एक बूढ़े को अपना सहारा बना लिया है। यह बूढ़ा अपना घर-परिवार छोड़कर फिलहाल रायपुर में ही रहता है और हिरोइन का राकेश रिंकूनाथ बना हुआ है।

रंगमंच में इधर-उधर छिटपुट रोल करने के बाद एक अभिनेत्री को भी जब उसके ड्राइवर पति ने तलाक दे दिया तो एक हीरो ने उससे नजदीकियां बढ़ाई। हीरो कुछ समय के बाद उससे पिंड छुड़ाना चाहता रहा लेकिन जब अभिनेत्री ने चार-पांच बार जहर खाया तो मामला चलो तुम्हारी जीत हुई पर जाकर टिक गया है। भिलाई की एक अभिनेत्री को जब पुलिस ने यह कहकर परेशान करना चालू किया कि वह सेक्स रैकेट चलाती है तो वह रायपुर आ गई। यहां आने के बाद उसे एलबम में काम करने का मौका मिला और फिल्मों में काम पाने के लिए संघर्ष करने वाले एक युवक का साथ भी। दोनों की दोस्ती इस कदर परवान चढ़ी कि वे सुप्रीम कोर्ट का फैसला आने से पहले ही बगैर शादी के एक साथ रहने लगे। हिरोइन अपने हीरो को प्यार से चूजा कहकर बुलाती थी। फिल्म जगत से जुड़े लोग बताते हैं कि हिरोइन ने अपने चूजे को काम दिलाने के लिए निर्माताओं की चौखटों पर जमकर एड़िया रगड़ी। एक रोज जब चूजे को 20 लाख रुपए बजट की एक फिल्म में काम मिल गया तो उसने चूजी का साथ छोड़ दिया। पहले-पहल तो चूजी ने अपने चूजे को खूब समझाया लेकिन जब वह उससे शादी के लिए राजी नहीं हुआ तो चूजी ने हाथों में मेहन्दी लगाई और माथे पर सिन्दूर तेरे नाम का लगाकर थाने जा पहुंची। चूजे को जेल हो गई। इस अलगाव के बाद राजधानी के प्रशासनिक-राजनीतिक हल्कों में इस बात की जबरदस्त चर्चा है कि हिरोइन को मीडिया जगत से जुड़े होने का दावा करने वाले एक शख्स ने छत्तीसगढ़ी फिल्मों की मल्लिका शेरावत बनाने का झांसा दे रखा है। प्रदेश में ऐसा पहली बार हुआ था जब किसी कथित मीडिया कर्मी के साथ फिल्मों में काम करने वाली हिरोइन वेलन्टाइन डे के दिन ऊर्जा पार्क मे पुलिस के हत्थे चढ़ी थी। चर्चा है कि यह शख्स अब भी युवतियों, सहायक कलाकारों को हाइलाइट करने का झांसा देकर न केवल रकम ऐंठ रहा है बल्कि उनकी जिन्दगी से खिलवाड़ करने में भी लगा हुआ है। फिल्मों में असफल होने के बाद एक हिरोइन ने चुनाव मैदान में भी भाग्य आजमाया लेकिन वहां भी बात नहीं जम पाई। इसी तरह एक अभिनेत्री ने अपने से उम्र में काफी बड़े नृत्य गुरू का ही दामन थाम लिया है

बहरहाल छत्तीसगढ़ का फिल्म जगत एक खतरनाक मोड़ से तो गुजर ही रहा है। उस खतरनाक मोड़ से जहां सामने घना जंगल है और गहरी खाई भी। थोड़ा पैसा लगाकर फिल्म बनाने वाले नवधनाढ्य लोगों ने इस खाई को दलदल की शक्ल भी दे डाली है। छत्तीसगढ़ में कई फिल्मे इन दिनों फ्लोर में है लेकिन किसी से पूछिएगा कि हिरोइन कहां मिलेगी तो जवाब मिलेगा-अभी आती ही होगी एसटीडी पीसीओ से निकलकर। कम्प्यूटर सेंटर से निकलकर। एक फोन करो.. जब बोलो वहां बुला लेंगे। ऐसा भी नहीं है कि छत्तीसगढ़ी फिल्मों की हिरोइने प्रतिभाशाली नहीं है लेकिन इनकी संख्या बेहद कम है और इन क्षेत्रीय हिरोइनों पर अभी मां-बाप का पहरा खत्म नहीं हुआ है।
यदि मन हुआ तो इस मामले में दूसरी किश्त भी लिखूंगा।

Thursday, May 20, 2010

दो अनिवार्य कविताएं

एक  प्रार्थना
शहर फट पड़ा
बम के धमाकों से
बाजूवाला शहर भी फटा


फिर... बाजूवाला


ईश्वर मुझे तुम्हारा नहीं
बाजूवाले का साथ चाहिए


 


बौने हाथ
दिल की जमीं पर

नफरत का यूरिया
और फिर देखिए
सांप-बिच्छुओं की
लहलहाती फसल
काटते हैं यही फसल
बड़ी फुर्ती से

कुछ बौने हाथ

Tuesday, May 18, 2010

एकता कपूर























टीवी की महारानी एकता कपूर के तीन-चार सीरियल फिर से कहर ढाने वाले हैं। इधर-उधर चल रहे कुछ घटनाक्रम तथा एकता कपूर के बारे में सोचते जाने कब एक कविता बन गई पता ही नहीं चला।

खाते-पीते
उठते-बैठते
सोते-जागते
देख सकते हैं आप
एकता कपूर का सीरियल

लगभग हर चैनल
हर घर में मौजूद है-एकता कपूर.

समीक्षक फरमाते हैं-
एकता ने कई घरों की नींव पर
बिछा डाला है बारूद.
सिर्फ और सिर्फ अपने
संसार के बारे में ही
सोचा है एकता ने.

क्या सच है
क्या झूठ
नहीं मालूम
लेकिन इतना तय है कि
बन चुकी है एकता कपूर
हमारे समय की पहचान.

दोपहर जब खाना खाने के बाद
जब आपको लगे कि
मुंह हो गया है जरूरत से ज्यादा मीठा
तो आप
याद कर सकते हैं एकता कपूर को.
 

शाम जब गुपचुप
खाने का मन हो
तब भी आप सीरियल में चलने वाले चांटो को
जेब में ठूंसकर
निकल सकते हैं घर से बाहर.

लंबा टीका लगाकर
एकता कपूर अब बड़े मजे से
गा लेती है आरती
और सीरियल का लंबा आलाप
आपको खुद-ब-खुद लाकर
खड़ा कर देता है
एक पोस्टमार्टम कक्ष के बाहर.

यहां आकर आप देख सकते हैं
मुर्दों की आंखों को चूहे कैसे ले जाते हैं.




 

 

Friday, May 14, 2010

आईएमए डिस्को डांसर टेनटेन टडन

कुछ समय पहले विशाल भारद्वाज की फिल्म कमीने का एक गीत काफी लोकप्रिय हुआ था। गीत तो पूरी तरह से याद नहीं लेकिन उसमें तेली के तेल-वेल का उल्लेख होने के साथ-साथ ढेनटेनटेडन शब्द पर काफी जोर दिया गया था। गीत कितना उपयोगी निकला और कितना नहीं इस बारे में बहुत ज्यादा ठीक-ठाक गुलजार साहब ही बता पाएंगे लेकिन इतना जरूर कह सकता हूं कि ढेनटेनटेडन सुनकर लोगों को काफी मजा आया। कुछ ऐसा ही मजा लोगों को बी. सुभाष की फिल्म डिस्को डांसर देखने के बाद भी आया था। इस फिल्म में जैसे ही मिथुन पर्दे पर गाता था-आईएमए डिस्को डांसर... तो पब्लिक टेनटेन टडन करने लगती थी।

बहुत से लोग यह सोच सकते हैं कि मैं अचानक बी. सुभाष जैसे बी ग्रेड डायरेक्टर की फिल्म डिस्को डांसर का जिक्र लेकर क्यों बैठ गया हूं। हकीकत यह है कि आज लड़कियां काफी हाउस में कोल्ड काफी पीने, दस-बीस बार पिज्जा खाने, मैसेज.. नेट और पत्रकार बनने के बाद दिल लगाने का काम करती है लेकिन जिन दिनों मिथुन की फिल्म डिस्को डांसर का जोर था उन दिनों ऐसा नहीं था। लड़की को अपना बनाने के लिए मोहल्ले के छोकरों को न केवल मिथुन स्टाइल में हेयर स्टाइल रखनी पड़ती वरन सार्वजनिक गणेश उत्सव समारोह में नाच-नाचकर यह भी बताना होता था कि वह जबरदस्त डिस्को कर लेता है।

डिस्को डांस के युग में लड़कियां खूब छली गई है। वैसे तो हर समय में लड़कियां छली जाती रही है। चाहे वह धर्मवीर भारती का समय हो, अभिताभ का समय हो, अंखियों के झरोखे वाले सचिन का समय हो, शाहरूख का समय हो या फिर प्रियांशु का समय।

साहित्यकार धर्मवीर भारती के उपन्यास गुनाहों का देवता के बारे में एक समय यह विख्यात था कि लड़कियां सबमें उपन्यास के पात्र चंदर जैसा प्रेमी ही तलाशती रहती थी। इसके लिए वे उपन्यास को अपने तकिए के नीचे रखकर सोया करती थी। बहुत से विद्वान इसे श्रेष्ठ उपन्यास भी मानते हैं लेकिन मेरी मान्यता है कि उपन्यास ने युवाओं को थोथी किस्म की कोरी भावुकता के अलावा कुछ नहीं दिया। सुधा और चंदर का आदर्श प्रेम आज कहीं दिखाई नहीं देता है। खैर जमाना भी तो काफी बदल चुका है।

 अब तो लड़की लड़के से कहती है-देखो पहले मुझको भोग लो। यदि मेरा भोग तुमको ठीक लगा तो अपन एक छत्त के नीचे रह सकते हैं वरना तुम किसी और को पकड़ लेना मैंने भी चार-पांच लोगों को अपना फोन नबंर दे रखा है। ( यही बात लड़का भी कह सकता है)

तो बात डिस्को डांसर को लेकर चल रही थी। मिथुन की यह फिल्म जैसे ही आई.. झुग्गी बस्तियों में तहलका मच गया था। जिसे देखो वह मिथुनकट रखकर घूमता नजर आता था। गणेश पूजा, छोटे-मोटे समारोह और बारात के आगे लड़के आईएमए डिस्को डांसर की धुन पर थिरकते नजर आते थे।

 उन दिनों मुझे थियेटर से लगाव हो चला था। मेरे एक मित्र जो प्रतिबद्ध किस्म के रंगकर्मी थे, एक रोज उन्होंने मुझे बताया कि वे अपनी नाटक मंडली को लेकर गणेश पूजा में नाटक का प्रदर्शन करने जा रहे हैं। मैंने उनसे कहा-दादा आप गंभीर विषयों पर नाटक करते हैं क्या आपका नाटक गणेश पूजा के दर्शक झेल पाएंगे। मित्र ने समझाया कि नहीं बंधु यदि हम एक दर्शक को भी बदल सकें तो नाटक का उद्देश्य सफल हो जाएगा। मैं भी उनके साथ उनके नाटक को सहयोग करने चला गया।

जिस जगह नाटक होना था वहां की दशा बड़ी खराब थी। नाटक मंडली के कलाकार पर्दे के पीछे मेकअप आदि करने लग गए थे। माइक से बार-बार यह घोषणा हो रही थी- अब थोड़ी ही देर में नाटक जंगीराम की हवेली का मंचन किया जाएगा। माताओं-बहनों से अनुरोध है कि वे जल्द से जल्द काम खत्म करके नाटक को देखने के लिए आ जाए। नाटक अब होगा.. तब होगा कि घोषणा होती रही लेकिन काफी देर तक जब कोई नहीं आया तो आयोजकों ने मित्र से कहा कि  आपका नाटक एकदम सडैला है क्या। मित्र ने उन्हें समझाया कि नहीं भाई, भिलाई में होने वाली बहुभाषीय नाट्य स्पर्धा में पुरस्कार पा चुका है।

यदि पुरस्कार पा चुका है तो फिर लोग क्यों नहीं आ रहे हैं
अब क्या पता.. अपसंस्कृति फैल चुकी है। मित्र ने चिंता जताई।

माइक से नाटक को मिले पुरस्कारों के बारे में फिर से बताया गया लेकिन लोग तब भी बाहर नहीं निकले। आखिरकार आयोजकों ने मित्र से पूछा कि क्या आप लोगों के पास कोई ऐसा आइटम है जो भीड़ जुटा सकें। मित्र .. आइटम शब्द को सुनकर हक्का-बक्का रह गया। उसने बताया कि ज्यादे से ज्यादा हम लोग माइक में जनगीत गा सकते हैं। आयोजकों ने जनगीत गाने की स्वीकृति दे दी। नाटक मंडली के पूरे कलाकारों ने- हम मेहनतकश जब दुनिया से जब अपना हिस्सा मांगेंगे , एक बाग नहीं एक खेत नहीं हम सारी दुनिया मांगेंगे... सहित जब तक रोटी के प्रश्नों पर ऱखा रहेगा भारी पत्थर जैसा दमदार गीत कम से कम दस बार गाया होगा लेकिन वाह रे लोग। रात के साढ़े दस बजे तक कोई भी शख्स रोटी-सोंटी खाकर नाटक देखने नहीं आया। इस बीच जरूर एक खुजली वाला कुत्ता मंच के पास आता रहा। जनगीत समाप्त हो जाने के बाद कुत्ता भी अदृश्य हो गया।
नाटक का मंचन नहीं होने की दशा में नाटक के कलाकार दुखी थे ही कि आयोजकों में से एक ने नया आइडिया सुझाया। उसने नाटक के कलाकारों को कहा कि अभी भीड़ आ जाएगी। उसने गणेश उत्सव समिति से जुड़े एक लड़के से कहा कि जा रहे देखके आ चेपटी घर पर है क्या। इससे पहले नाटक मंडली के कलाकार माजरा समझ पाते, चेपटी माथे पर पट्टी, बांह कटी बनियान, चमकीली पट्टी और डिस्को डांसर का कैसेट लेकर उपस्थित हो गया।

माइक से फिर घोषणा होने लगी-भाइयों नाटक नहीं देखना तो मत देखिए.. कम से कम अपने प्यारे चेपटी का डांस तो जरूर देखिए। एक बार फिर सबकी फरमाइश पर चेपटी अपना कार्यक्रम देने के लिए हम सबके बीच हाजिर है। डिस्को डांस के बेताज बादशाह चेपटी।

और फिर शुरू हुआ चेपटी का डांस- आईएमए डिस्को डांसर। एक बार दो बार तीन बार और फिर चेपटी वंसमोर। चेपटी दुबला-पतला मरियल सा काला युवक था। चेहरे पर फोंडे-फुंसियों का गोदाम बना हुआ था। नाक चेपटी होने की वजह से लोग उसे चेपटी कहा करते थे। सब जानते थे कि  लड़कियां उस पर मरती है लेकिन मुहल्ले के बड़े दादा टाइप के लोग उसे इसलिए कुछ नहीं बोलते थे क्योंकि वह सबका कहना मान लिया करता था। कहना मान लेने का मतलब यह था कि जा रे चेपटी पनामा ले आ। चेपटी जी भैय्या कहते हुए पनामा(सिगरेट) लाने चल देता था।

तो चेपटी कभी अपनी टांग को बाहर फेंकता था तो कभी माइक पकड़ने का स्वांग करते हुए बिल्कुल मिथुन चक्रवर्ती की तरह पेट का निचला हिस्सा उछालता था। क्या औरतें क्या बच्चे और क्या लड़कियां सब सिसकारी लेते हुए चेपटी का डांस देखते रहे। जब चेपटी चार-पांच गानों पर नाच चुका तब आयोजकों ने घोषणा की कि चेपटी नाश्ता करने के बाद फिर नाचेगा तब तक आप लोग नाटक देखिए।
लेकिन जनता का टेस्ट बिगड़ चुका था। जैसे-तैसे नाटक जंगीराम की हवेली का मंचन हुआ। इस बीच जनता.. चेपटी-चेपटी चिल्लाती रही। साला चेपटी जब दोबारा आया तो उसने आते ही स्टेज पर इस तरह से माथा झुकाया जैसे मां सरस्वती का असली उपासक वहीं है।

तो मित्रों यह थी डिस्को डांसर की लोकप्रियता की कहानी। नाटक वाले दिन मैंने डिस्को डांसर का जो कमाल देखा था वह कुछ सालों तक और दिखता रहा। इन सालों में मैंने एक से बढ़कर एक चेपटियों को- कोई यहां नाचै-नाचै- अव्वा- अव्वा, देखा मैंने तुझे फिर से पलटके। जिमी-जिमी.. आजा-आजा जैसे गीतों पर थिरकते हुए देखा। इस बीच यह भी सुनता रहा कि फलांना डिस्को डांसर मुहल्ले की बेबी को लेकर भाग गया है। लड़की के मां-बाप जो मिथुन के पाकेट एडीशन का डांस देखने के लिए अपनी बेटी को लेकर गए थे उन्हें इस बात का पता ही नहीं चल पाया कि कब उनकी बेटी को डिस्को डांसर ने अपना शिकार बना लिया था। पिछले दिनों एक डिस्कों डांसर से मुलाकात हुई थी। जब मैने उससे कहा कि अरे क्या तुमने डांस वगैरह छोड़ दिया। भूतपूर्व हो चुके डांसर ने बताया कि उसकी डांस मे बिल्कुल भी रूचि नहीं थी। वह तो मोहल्ले की रूचि नाम की लड़की पर मरता था इसलिए दो-चार स्टेप सीख लिए थे। तो क्या रूचि तुम्हारे गियर में आई। भूतपूर्व ने बताया कि  उसने अंतिम समय में डिस्कों सीखना चालू किया था। बात जम भी जाती लेकिन जावेद जाफरी बोल बेबी बोल राक एंड रोल लेकर पहुंच गए।
मतलब...
मतलब क्या.. रूचि.. मुहल्ले के बंटी के साथ उड़ गई।
खैर.. बदचलन और आवारा टाइप के लडकों को तो लड़कियां अब भी अपना दिल दे ही बैठती है, भले ही वह डिस्को डांसर हो या न हो। ऐसा क्यों होता है जरा आप भी सोचिए।

Tuesday, May 11, 2010

ज्ञानदत्त और संजय दत्त

ज्ञानदत्त अंग्रेजी के ब्लागर है।
अंग्रेजी के ब्लागर इसलिए लिख रहा हूं क्योंकि हिन्दी में अंग्रेजी के शब्दों को बड़ी बेशर्मी से ठूंसने का जो काम ज्ञानदत्त करते हैं उतनी बेशर्मी से कोई और दूसरा शायद नहीं कर सकता है। उनकी तुलना मैं संजय दत्त से भी इसलिए कर रहा हूं क्योंकि काफी समय पहले संजय दत्त की मानसिक हलचल भी ठीक नहीं थी। यदि हलचल ठीक ही होती तो संजय दत्त को तीन-चार शादियां नहीं करनी पड़ती। जेल की हवा नहीं खानी पड़ती और सबसे बड़ी बात उत्तर प्रदेश में है दम.. यहां होता है अपराध कम जैसा घटिया नारा लगाने वाले मुलायम सिंह का साथ भी नहीं देना पड़ता।

मैं जानता हूं कि मेरी इस पोस्ट पर मेरे चाहने वाले मुझसे एक बार फिर नाराज होंगे और यह जरूर कहेंगे भाईसाहब आप फिर फट्टे में कूद पड़े। आपको ऐसा नहीं करना चाहिए था, लेकिन इससे पहले कि मेरे चाहने वाले नाराज हो मैं अपने सभी चाहने वालों से माफी मांग लेना चाहता हूं। न जाने क्यों मुझे लगता है कि तटस्थता एक तरह का अपराध ही है। मैं तो बीच बहस का हिस्सा बनना भी नहीं चाहता था, लेकिन एक बात ने मुझे परेशान किया और वह यह कि पता नहीं दुनिया में कुछ लोगों को यह भ्रम हो जाता है कि वे जब तक लोगों को प्रमाण पत्र नहीं देंगे तब तक दुनिया चलने वाली नहीं है। आत्ममुग्धता की स्थिति ने कई लोगों को पागल कर रखा है। दूसरों को संस्था और भी न जाने क्या-क्या बताने वाले श्रीमान एक हजार आठ सौ चालीस ज्ञानदत्त जी आईएसओ बन बैठे हैं।

भाइयों यदि आप लिखते हैं तो आपको लिखने से पहले गंगा किनारे लोटा लेकर टहलने वाले ज्ञानदत्त से प्रमाण पत्र लेना ही होगा। ज्ञानदत्त ही बताएंगे कि किसकी पोस्ट का विचार अच्छा है और किसकी पोस्ट से विचार गायब है। भाइयों चाहता तो मैं भी ज्ञानदत्त की तरह कन्टेंट शब्द का प्रयोग कर सकता था लेकिन हिन्दी की सेवा में लगे हैं सो अपराध कम से कम हो यही कोशिश रहती है।

तो भाइयों अंग्रेजी के इस ब्लागर ने दिनांक 11 मई 2010 को एक पोस्ट लगाई और यह बताने का प्रयास किया कि समीरलाल उड़न तश्तरी और अनूप शुक्ल में कौन श्रेष्ठ है। यदि मानसिक दिवालिएपन के शिकार श्रीमान ज्ञानदत्त जी केवल इस शब्द तक ही अपने को सीमित रखते हुए निर्णय पाठकों पर छोड़ देते तो मैं क्या बहुत से लोग कुछ नहीं कहते लेकिन जब बात जब नामवर सिंह का पूज्यनीय पिताजी बनने से ऊपर पहुंच जाए तो समझिए कि कही न कहीं कोई साजिश हैं।

मीनाबाजार में जाकर गाल पर हाथ रखते हुए फोटो खिंचाने वाले भइये ज्ञानदत्तजी। ऐसी फोटो लगाकर आप समझते होंगे कि आप बहुत बौद्धिक है, मैं मानता हूं कि जो आदमी फोटो में भी अपने आपको नहीं बदल पाया वह दुनिया को क्या खाक बदलेगा। श्रीमानजी हिन्दी ब्लागिंग को नामवर की नहीं समझदार लोगों की जरूरत ज्यादा है। आज आप दो लोगों के लिए प्रमाण पत्र बांट रहे हैं कल आप किसी के ब्लाग का नाम देखकर कह सकते हैं अपने ब्लाग का नाम तुरन्त बदल दीजिए क्योंकि यह वास्तु के हिसाब से ठीक नहीं है। परसो आपकी टिप्पणी किसी के कपड़े को लेकर भी आ सकती है और गदहे लोगों ने आपको स्वीकार करना चालू कर दिया तो फिर आप ब्लागरों को ई-मेल के जरिए भभूत भी भेजने लगेंगे। एक न एक दिन तो आप यह तमाशा करने ही वाले हैं। तो मैं किसी साजिश की ओर इशारा कर रहा था। साजिश यह है दोस्तों श्रीमान ज्ञानदत्तजी को लगने लगा है कि दो की लड़ाई का उन्हें फायदा किस तरह से मिले। निजी सुख-दुख, टिप्पणियों के अलावा एक-दूसरे के ब्लागों पर जाकर हालचाल जानने वाले ब्लागर अभी गुट में होते हुए भी खुश है कि चलो बात केवल रचनाकर्म पर हो रही है लेकिन ज्ञानदत्त की कोशिश है कि एक गुट के ब्लागर वही लिखे जो उस गुट का मुखिया चाहता है तो दूसरे गुट के ब्लागर भी वही चाकरी करें जो दूसरे गुट के मुखिया चाहते हैं।

मुझे ब्लागिंग की दुनिया में आएं हुए ज्यादा दिन नहीं हुए लेकिन देख रहा हूं कि कोई चिट्ठाचर्चा खोलकर अपने आपको मायापुरी का संपादक बना बैठा है तो कोई अभिताभ और विनोद खन्ना में मारपीट लिखकर अपने आपको मित्र प्रकाशन यानी मनोहर कहानियों का मालिक समझने की भूल कर रहा है।

तो भइए संजयदत्तजी अपनी मानसिक हलचल को ठीक करिए वैसे भी इलाहाबाद और उसके आसपास हर रोज यह खबर छपती रहती है कि रेलगाड़ी पटरी से उतर गई है। रेलगाड़ी भी पटरी से तब ही उतरती है जब या तो पटरी दिशा छोड़ देती है या फिर वाहन चालक की मानसिक दशा ठीक नहीं रहती है।
हां.. मैंने लिख तो दिया है लेकिन यह सब कुछ मैंने प्रमाण पत्र देने के लिए नहीं लिखा हैं। आपकी जय हो।

Sunday, May 9, 2010

माई के लालों जरा शहीद हो चुके जवानों की माई के बारे मे भी सोचो

देख रहा हूं लोग माताराम को याद कर किस तरह से आंसू बहा रहे हैं। किसी को माताओं के वृद्धाश्रम में जाने की चिन्ता सताए जा रही है तो किसी को लहसून-प्याज चटनी के साथ रोटी में मां की सूरत नजर आ रही है। कोई.. मां तू कितनी अच्छी है प्यारी.. प्यारी है गाकर दिल बहला रहा है तो किसी को मां का थप्पड़ याद आ रहा है। मां को एक दिन याद करना तो अच्छी बात नहीं है लेकिन फिर भी जो लोग याद कर रहे हैं भगवान उनका और उनकी मां का भला करें। माई के लालों से मेरा सिर्फ इतना आग्रह है कि मदर्स डे पर अपनी और फिल्म वाली निरूपाराय जैसी मां को याद करने के अलावा उन माताओं को भी याद करें जिन्होंने नक्सली हिंसा में एक बार फिर अपने बेटों को खो दिया है।

जी हां.. छत्तीसगढ़ में नक्सली हिंसा के चलते कुछ माताओं के लिए मदर्सडे गहरे अवसाद का दिन बनकर आया है। कल यानी 8 मई 2010 को एक बार फिर नक्सलियों सीआरपीएफ के जवानों पर बड़ा हमला बोलकर लगभग आठ जवानों को मौत के घाट उतार दिया था। जवानों की माताओं तक यह सूचना आज यानी 9 मई को पहुंची है। मदर्सडे पर माताओं को कितना बड़ा और क्रूर तोहफा मिला है यह बताने की जरूरत शायद नहीं है।


छत्तीसगढ़ में ऐसा पहली बार नहीं हुआ। इससे पहले भी जब कोई मां दीवाली या दशहरे में अपने बच्चे के लौटने का इन्तजार करती रही है तब उसके पास एक न एक बुरी खबर ऐसी पहुंचती रही है कि माई अब तुम्हारा बेटा नहीं लौटने वाला। मैं हर बार ऐसी तस्वीरों को देखने के लिए विवश होता रहता हूं जिसमें कोई मां मुंह में आंचल दबाकर रोती हुई दिखती है। बंगाल, बिहार और भी न जाने कितनी जगहों की मांए अपने बेटों के मरने की खबर सुनकर लाठी थाम छत्तीसगढ़ आ जाती है। यहां आने के बाद उन्हें सरकार की तरफ से सम्मान तो मिल जाता है लेकिन नहीं मिल पाती है तो बेटों की मुस्कान। नक्सलियों की गोली से मुंह फाड़े आसमान की ओर ताक रहे बेटे जैसे अपनी मां से ही पूछते हैं- मां तू रोना मत। कहती थी न तेरे बेटे पर फौज का कपड़ा अच्छा फब रहा है। देख मां अब तो कपड़ा भी जल जाएगा। अपने जवान बेटों की लाश के लिए छत्तीसगढ़ पहुंचने वाली माताओं की आंखे पथरा चुकी है। इन आंखों से अब आंसू भी नहीं गिरते।

जब छत्तीसगढ़ का निर्माण नहीं हुआ था तब भी नक्सली वारदात यहां हुआ करती थी लेकिन तब शायद नक्सलियों और सरकार के बीच सीधी लड़ाई हुआ करती थी। बेशक पुलिसवाले उनके वर्गशत्रु पहले भी थे लेकिन तब शायद उतना गुरिल्लायुद्ध नहीं हुआ करता था जितना अब हो रहा है। पुलिस के आलाअफसर मानने लगे कि पुलिस का खुफिया तंत्र कमजोर हो चला है। इस खुफिया तंत्र के चलते नक्सली पुलिस पर भारी पड़ रहे हैं। अभी एक महीने पहले ही 6 अप्रैल 2010 को नक्सलियों ने दंतेवाड़ा के तालमेटला के पास 76 जवानों को मौत के घाट उतार डाला था। ठीक एक महीने बाद नक्सलियों ने एक बार फिर बीजापुर के करीब के एक गांव कोड़ेनाल में बुलेटफ्रूफ वाहन पर सवार होकर आ रहे 8 जवानों को अपना शिकार बनाया है। राज्य बनने के बाद पुलिस और नक्सलियों के बीच मुठभेड़ की कुल 1661 वारदात हो चुकी है। इन वारदातों में नक्सलियों ने कुल 11 सौ 13 लोगों को मौत के घाट उतार डाला है। सरकारी आंकड़ा कहता है कि नक्सलियों के द्वारा किए गए हमले में लगभग छह सौ से ज्यादा सैनिक शहीद हुए हैं। गोपनीय सैनिकों की संख्या 26 और विशेष पुलिस अधिकारियों की संख्या 153 बताई गई है, लेकिन जरा सोचिए... क्या वाकई इतने ही लोग मारे गए हैं। शायद नहीं... एक परिवार से जब एक कमाने-खाने वाला गुजर जाता है तो फिर उस परिवार में मात्र एक मौत नहीं होती।  मदर्स डे पर मैं शहीदों की माताओं को याद कर रहा हूं। मैं जानता हूं कि मेरे अलावा और भी बहुत से लोग होंगे जो एक दिलेर माताराम को खोज रहे होंगे।

Tuesday, May 4, 2010

नक्सलवाद और पोसम्पा भई पोसम्पा


मैं मुहल्ले की तंग गलियों से यह देखने के लिए गुजर रहा हूं कि शायद मुझे कुछ छोटी बच्चियां पोसम्पा भई पोसम्पा खेलते हुए मिल जाएगी,लेकिन शायद मैं अच्छी किस्मत का मालिक नहीं हूं। कस्बे से शहर और फिर शहर से कांक्रीट का जंगल बनते जा रही राजधानी में सब कुछ सिकुड़ गया है। खेल का मैदान सिकुड़ गया है। भावनाओं की चादर सिकुड़ गई और उससे कहीं ज्यादा लोगों का दिल सिकुड़ गया है। मैं एक बच्ची के पिता से पूछता हूं-आपकी बच्ची कौन सा खेल पसन्द करती है। बच्ची के पिता बड़े फक्र से मुझे बताते हैं कि उनकी बच्ची की रूचि खेल में नहीं है। उसे डाक्टर बनाना है भाई... यदि बचपन से ही खेलकूद में ध्यान लग गया तो हो गई मुसीबत। बच्ची के पिता मुस्कुराते हैं और फिर मुझे बताते हैं कि वे उसके लिए वीडिय़ो गेम ला देते हैं। कभी-कभार लड़की उनके साथ बैठकर ताश खेल लेती है। कमाल का ताश खेलती है बच्ची। अरे भाई कभी-कभी क्या हर बार मुझको हरा देती है।

लड़की ने कभी नहीं गाया- पोसम्पा भाई पोसम्पा.. चाय की पत्ती पोसम्पा, सवा रूपए की घड़ी चुराई। अब तो जेल में जाना पड़ेगा। जेल की रोटी खाना पड़ेगा। जेल का पानी पीना पड़ेगा।

विरासत में मिली नक्सलवाद की चुनौती के चलते छत्तीसगढ़ का हर बच्चा लोरी सुनकर सो जाना तो शायद भूल ही चुका है। देश और दुनिया के वे एनजीओ जो अनुदान पाकर कुकुरमुत्ते साबित होते रहते हैं उन्हें शायद इस बात की जानकारी नहीं होगी कि यहां के हर घर का बच्चा नक्सली की व्याख्या करने में लगा हुआ है। यकीन नहीं होता तो कभी एनजीओ से जुड़े लोग इस बात का सर्वे जरूर करें कि छत्तीसगढ़ का बच्चा नक्सलियों के बारे में बातें क्यों करता हैं। हालांकि यह बातें नक्सलियों की करतूतों के बारे में ही होती है लेकिन कलम-कापी, किताब और  पेंसिल से चित्र बनाने वाले हाथ जब बंदूक के जरिए ही राजसत्ता पाने का ख्वाब देखने वाले लोगों की बातें करने लगते हैं तो लगता है कि सचमुच हालात अब पहले जैसे नहीं रहे।
अब से कुछ समय पहले तक मैं शाम को जब कभी भी किसी गली से गुजरता था तो कोई न कोई बच्चा मुझे नदी-पहाड़, आमलेट-चाकलेट खेलते हुए मिल ही जाता था। मेरा कहने का आश्य बिल्कुल भी नहीं है कि नक्सलियों के डर के मारे बच्चों ने खेलना बंद कर दिया है, लेकिन यह भी सच है कि एक डर ने उनके खेलने में बाधा तो डाली है। यह डर क्या है और क्यों है यह शोध का विषय हो सकता है। लेकिन लगभग डेढ़ सौ बच्चों से की बातचीत के बाद मैं इस निष्कर्ष पर पहुंचा हूं कि बच्चे अक्सर अपने माता-पिता से यह जरूर पूछते हैं कि क्या नक्सली कभी शहर में आकर हम सबको मार डालेंगे। पाठकों आज से कुछ अरसा पहले जब स्काईलैब का हौव्वा खड़ा हुआ था तब भी हर जुबान पर उसके कहीं भी गिर जाने से मौत का तांडव मच जाने की चर्चा कायम थी। नक्सली इन दिनों स्काईलैब साबित हो रहे हैं।

उनके कभी भी आ धमकने की चर्चा ने बच्चों के साथ बड़ों के दिलों में भी एक डर पैदा कर दिया है। हो सकता है कि मैं चीजों को बहुत सही ढंग से नहीं देख पा रहा हूं। बाजारवाद के खतरनाक दौर में नई-नई विदेशी कंपनियों के महंगे खिलौनों से भी छत्तीसगढ़ का गरीब व मध्यमवर्गीय परिवार का बच्चा डर गया हो, लेकिन मैं टूथपेस्ट, पेपर और टीवी में घुसकर बच्चों के सपनों में चले आने वाले डर को अच्छा संकेत नहीं समझ रहा हूं।
यदि केरल देवताओं का देश है तो छत्तीसगढ़ देवियों का देश है। यहां अब भी आदिवासी के तौर पर मानव सभ्यता का जिंदा इतिहास देखने को मिल जाता है। यदि कुछ नहीं मिल रहा है तो वह है खेल-खेल में गाया जाने वाला बच्चों का गीत।

1-कांच किल्लो-बांगड बिल्लो
किसी नगर में केशकाल किसका घर।
झूम झप्पा लाई लप्पा
संतरे के पेड़ के नीचे चादर बिछाऊंगी
चादर का कोना फटा
दर्जी बुलाऊंगी
दर्जी की सुई टूटी
घोड़ा दौडाऊंगी
घोड़े की टांग टूटी तो
हल्दी लगाऊंगी
हल्दी भाई हल्दी
तेरी शादी जल्दी।

2- टूटी खिड़की मकड़ी का जाला
उसके पीछे भूत का बंगला
यहां कोई आया है
आके हमें जगाया है
बचके कहां जाएगा। हो... हो... हा... हा...

3-अटकन-मटकन
दही चटाकन लहवा लाटा बनमें कांटा
तुर-तुर पानी गिरे, सावन में करेला पाके
चल-चल बिटिया गंगा जाबौ
गंगा ले गोदावरी-पका पका बेर खाबौ,
बेर के डारी टूटगे, भरे कटोरा फूटगे

4-नौ साल की नाली में
बारह मिट्ठू बैठे थे
एक मिट्ठू कच्चा
गुलाबी रंग पक्का
कटोरी में आगी
बुझा दे मेरी भाभी
भाभी लाई अंडा
खेले गिल्ली डंडा
गिल्ली गई खेत में
अंडा गया पेट में।
( यदि आपको यह सब गीत सुनने को मिल जाए तो मुझे जरूर बताइगा। अपने आपको गलत साबित होता देखकर मुझे खुशी होगी. मैं आपको पार्टी देना चाहूंगा) 

Sunday, May 2, 2010

मीनाबाजार से लौटकर

अब से कुछ दिन पहले जब मैंने पाकेटमार शीर्षक से तीन किश्तों में एक लेख लिखा था तब एक शब्द पर आकर मेरी सुई अटक गई थी। वह शब्द था-मीनाबाजार। मैंने इधर-उधर से मीनाबाजार का अर्थ जानने की कोशिश की तो किसी ने बताया कि जिस प्रकार से वाशिंग पाउडर निरमा में फ्राक पहनकर एक लड़की गोल घूमती है न.. ठीक उसी तरह से मीना नाम की एक लड़की भी बहुत मेले-ठेले में जाया करती थी। एक दिन उसके बाप ने परेशान होकर उससे कह दिया अब तुम्हारा मेले-ठेले में जाना बंद। लड़की ने उस जमाने में अपने बाप से पूछा-इतना जुल्म क्यों। लड़की के बाप ने समझाया कि देखो लड़की जात हो, यूं ही टंग-टंग मेले-ठेले में घूमोगी तो किसी दिन मेरी नाक कट सकती है। लड़की को बाप की यह बात बुरी लगी,उसने खाना-पीना छोड़ दिया। नाक का ख्याल करते हुए लड़की के बाप ने अपने घर के पास की खाली जमीन पर जहां लड़की गोल-गोल रानी, कितां-कितां पानी खेला करती थी वहां बाजार लगवा दिया। घर के पास ही बाजार लग जाने से लड़की कभी सांप वाले का खेल देखने पहुंच जाती थी तो कभी चूड़ी वाले की दुकान पर। चूंकि लड़की का बाप दिन में 24 बार बाजार में मीना कहां मर गई रे तू.. कहते-कहते घूमता था इसलिए बाजार का नाम पड़ गया मीनाबाजार।  मुझे नहीं लगता कि यह कहानी सच भी होगी लेकिन है मजेदार।

मेरे एक प्रोफेसर मित्र डाक्टर सियाराम शर्मा का कहना है कि मुगल शासनकाल में सम्राट अकबर ने महिलाओं की सुविधाओं के लिए एक ऐसा बाजार बनाया था जिसमें सिर्फ और सिर्फ महिलाएं ही आ-जा सकती थी। इस बाजार में जरूरत की सभी चीजें मिल जाया करती थी चाहे वह पुरूषों के उपयोग के लिए ही क्यों न हो। सम्राट अकबर द्वारा चलाए गए कल्याणकारी कार्यक्रमों की तरह यह बाजार भी काफी लोकप्रिय हुआ। धीरे-धीरे इस बाजार का नाम मीनाबाजार पड़ गया।

वैसे जो लोग ऊर्दू साहित्य के जानकार नहीं भी है मगर पीने-पिलाने के शौकीन है तो उन्हें यह बात अच्छी तरह से पता है कि मीना का मतलब क्या है। यदि आप पियक्क़ड़ नहीं भी है तो कभी बार जरूर जाइएगा। वहां एक पोस्टर आपको हर हाल में चस्पा मिलेगा। एक बाजीराव सरीखा आदमी हुक्का गुड़गुड़ाते हुए बैठा होगा और एक पतली कमरिया लिए हुए एक लड़की उसे सुंदर से जग से शराब परोस रही होगी। मीना का मतलब दारू पिलाने का कंटेनर भी होता है। मीना एक धातु भी होती है  जिससे सोने-चांदी के गहनों की नक्काशी की जाती है।

मित्रों जो भी हो मुझे तो मीनाजी पसन्द है और मीनाबाजार भी। मीनाजी( मीनाकुमारी) इसलिए पसन्द है क्योंकि उन्होंने मुझे मेरे अपने से लेकर फूल और पत्थर, काजल और भी न जाने कितनी फिल्मों में फफककर रोने के लिए मजबूर किया है। मैं सच कहता हूं कि मीनाजी पत्थर से पत्थर दिल इंसान को रूला सकती थी(है) वैसे मैं मीना नाम की जितनी भी लड़कियों से मिला हूं पता नहीं क्यों मैंने उनको अपने जीवन से बहुत ज्यादा खुश नहीं पाया है। कई बार तो मैं यह भी सोचता हूं कि मां-बाप अपनी बच्चियों का नाम मीना रखते ही क्यों हैं। मीना को मोना कर देंगे तो सीधे अजीत के पास चली जाएगी। वहां कम से कम सिंगार तो जलाएगी। जितनी भी पुरानी फिल्में देखिए... यदि किसी लड़की का नाम मीना है तो तय है कि उसका पैर टूटा होगा या फिर वह अंधी होगी और फिर अंधी लड़की का सुधीर कुमार( फिरोज खान की धर्मात्मा वाला) रेप जरूर करता नजर आएगा।
खैर.. वैसे तो मैं रोज ही सुपरबाजार( मीनाबाजार का आधुनिक रूप) से लौटता हूं लेकिन काफी दिनों के बाद मैं मीनाबाजार से लौटा हूं। रायपुर के दो स्थानों पर मीनाबाजार लगा है। नाम इसका मीनाबाजार नहीं है। एक जगह फन मेला वगैरह कुछ कर दिया गया है तो दूसरी जगह भी कुछ इसी तरह का नाम है। लेकिन अंदर वही सब कुछ है जिसमें आपका बचपन लौट जाता है।

वहीं पांच रूपए में अभिताभ के साथ फोटो खींचने वाला। वहीं मौत का कुआं। वहीं एक जिन्दा लड़की जिसका आधा शरीर सांप का है। वहीं छोटी बंदूक से फुग्गा फोड़ने वाला स्टाल है। लक्स साबून पर रिंग फेंककर घड़ी तुरन्त ही आपके हवाले कर देने वाला आपको बुलाता है। मीनाबाजार में आज भी वहीं नाव बिक रही है जो एक छोटी से मोमबत्ती जलाने पर एक बड़ी सी थाली पर दौड़ लगाने लगती है।  वही हवाई झूला है जिसका टिकट लेकर एक लड़की- ऊई मां मैं नहीं बैठूंगी.. मेरे को डर लगता है कह रही है तो दूसरी उसे समझा रही है-
अरे डरती है, साली डरपोकनी कहीं की। ला टिकट मैं बैठती हूं। वह संतोषी माता को याद कर बैठ जाती है और फिर ऊपर पहुंचकर चिल्लाती है- मां रे मर गई। नीचे आकर कहती है-साली तू ठीक कह रही थी। मेरा न दिल निकलकर आ गया था। हाय राम.. दिल निकल जाता न तो चींटू नाराज हो जाता। सब तेरे कारण है साली.. खुद तो बैठी नहीं मुझको मरवा दिया। चल अब गुपचुप खिला।

गुपचुप वाला भी है तो भेल बनाने वाला भी। अरे हां आपने गर्मी में बर्फ का गोला खाया है या नहीं..जरूर खाइए। एकाध बार खा लेने से कीटाणु अंदर नहीं चले जाते। जो भी प्यारे मजा तो आता है। जब बर्फ वाला आपके आदेश पर गोला तैयार करता है तो उसका चेहरा देखने लायक होता है। उसे बर्फ का गोला तैयार करते हुए देखकर लगता है जैसे वह जीवन की सारी जमा पूंजी आपको लुटाने के लिए ही बैठा हुआ है। लाल-हरा-पीला पता नहीं कौन-कौन से रंग डालता है। रंगों का गाढ़ापन देखकर हालात खराब हो जाती है लेकिन जब बर्फ का टुकड़ा मुंह में जाता है न तो चेहरा कई तरह के हैरतअंगेज भावों से भर उठता है। जो आदमी बर्फ का गोला खाता है वह गुपचुप खाकर सुंदर दिखने वाली लड़कियों को भी मात दे सकता है। कसम से.. खाकर तो देखिए.. यदि पत्नी साथ में है तो वह हंसेंगी कि क्या कर रहृ हो। और यदि आप अपनी प्रेमिका के साथ मीनाबाजार में बर्फ का गोला खा रहे हो भी आपको सुंदर सी टिप्पणी मिलेगी। एक टिप्पणी जो मैंने सुनी है वह आपको शेयर कर रहा हूं-अरे तुम्हारे होंठ तो मेरे से भी ज्यादा लाल हो गए थे। सो स्वीट। गाड़ी चलाओगे तो एक पप्पी मिलेगी पक्के में, मेले छोना.. सोना..छोना। मेले में बर्फ खाते-खाते चिमटी मिली। गाड़ी में पक्के में तो कुछ मिला ही होगा।



हर मीनाबाजार में एक पुलिस चौकी जरूर होती है जिसमें पुलिस वाले बैठकर अपने लोगों को फ्री में आने का जुगाड़ करते रहते हैं। मीनाबाजार लगाने वाला भी पुलिस चौकी का इन्तजाम इसलिए कर देता है क्योंकि जहां खाकी वर्दी दिख जाती है फिर लोगों को लगने लगता है कि अब कोई ठगी नहीं कर रहा है। हर मीनाबाजार में दो-तीन जरूरी सूचनाएं आवश्यक रूप से सुनने को मिलती है। सूचना नम्बर एक-माताओं-बहनों से अनुरोध है कि अपना पर्स-पाकेट संभालकर रखें। पाकेट कट गई तो हमारी जवाबदारी नहीं होगी। सूचना नम्बर दो- एक लड़का जो लाल शर्ट व लाल रंग का बरमुंडा पहने हुए हैं वह रोता हुआ सूचना केंद्र तक चला आया है। लड़के का नाम...  हां बेटे क्या नाम है ( माइक से आवाज आती है) बताओ-बताओ क्या नाम है। लगता है नाम भूल गया है। लड़का लाल रंग का बरमुड़ा पहने हुआ है।

मैं अब क्लाइमेक्स की ओर जा रहा हूं। मैं पोस्टर देख रहा हूं। एक लड़की जो नाग बन जाती है। शेर बन जाती है। उसकी हडिड्यों का ढांचा नजर आने लगता है।10 रूपए की टिकट लेकर मैं दर्शक दीर्घा में शामिल हो चुका हूं। मेरे सामने भी तीन-चार लोग बैठे हुए हैं। एक आदमी ठीक वैसे ही बीड़ी भी पी रहा है जैसे आज से कुछ अर्सा पहले लोग टूरिंग टाकीजों में पीया करते थे। जिस लड़के ने मुझे टिकट काटकर अंदर भेजा है मैं बाहर निकलकर उससे पूछता हूं-अरे भाई तुम्हारा खेला कब स्टार्ट होगा। लड़का मुझसे पब्लिक को आने की बात कहता है। एक-दो लोग और आते हैं और फिर खेल शुरू होता है। एक सफेद से पर्दे के पीछे एक छोटी सी लड़की खड़ी होती है। देखते ही देखते अंधेरा होता है और फिर लड़की गायब हो जाती है और उसके बदले पर्दे में सांप दिखाई देने लगता है। सांप हिलता-डुलता है और लाउडस्पीकर से नगीना का गाना बजने लगता है- मैं तेरी दुश्मन, दुश्मन तू मेरा। मैं नागिन तू सपेरा। कुछ देर में दर्शक गाली देते हुए बाहर निकल जाते हैं। साले गधा समझते हैं। प्रोजेक्टर से दिखाते हैं। बन्डल हैं।

मैं भी वहां कोई मजा लेने नहीं गया था और न ही दस रुपए की टिकट की टिकट काटकर अपनी मदद का इजहार करने गया था। मैं जानना चाहता था कि लोगों का स्वाद कितना बदल चुका है। सचमुच आज से कुछ अर्सा पहले यह सारे आश्चर्य कई लोगों को ठीक ढंग से पेट भरते थे। अब ऐसा नहीं है। टीवी, वीडिया, इंटरनेट की दुनिया ने हमें लोगों के पेट भरने के काम धंधे से भी पीछे धकेल दिया है। मीनाबाजार में मुझे नूतन डांस पार्टी नजर नहीं आई। अपने थियेटर के दिनों में एक मर्तबा मैं कुछ नया सीखने के लिहाज से भिलाई में लगे मीनाबाजार में चला गया था। वहां एक छम्मकछल्लो ने जैसे ही हाला हीले.. पटना हीले पर कमर मटकाय़ा.. लड़कों का झुंड मंच पर चढ़ गया। अपने को समझ में आ गया कि हाल-फिलहाल लोककला के संरक्षण से ज्यादा खुद को बचाने का समय है। डांस पार्टी वालों ने पुलिस से तगड़ी सेटिंग कर रखी थी। बस थोड़ी ही देर में वह लाठियां चली कि सुबह सारा शहर हिल गया था। कई दिनों तक तो लोग मीनाबाजार यह देखने ही जाते रहे कि अच्छा ये वो जगह जहां लफड़ा हुआ था। मीनाबाजार से लौटने के बाद मैं आपको सलाह जरूर दूंगा कि आप एक न एक बार छोटे किस्म के मेलों में भी जरूर जाएं।

जिन्दगी तमाशे से शुरू होती है
और तमाशे पर खत्म होती है।
दुनिया मीनाबाजार है दोस्तों
दुनिया मीनाबाजार।