अफसर ने जैसे ही गुप्ताजी को धमकाया तो गुप्ताजी ने उन्हें सरकार की तरफ से पीएचडी पूरा करने के लिए दिया गया पत्र दिखाया। गुप्ताजी ने अफसर को बताया कि सर.. यदि मैं जेब काट भी लेता तो उसे वापस कर देता लेकिन क्या करूं परीक्षा थी सो देनी थी। मैं इस परीक्षा में फेल हो गया। थाने में मौजूद लोगों में से एक ऐसा आदमी भी था जो किसी पत्रकार को जानता था। उसने पत्रकार को घटनाक्रम की जानकारी दे दी। खबर अखबार में तो छप गई लेकिन पाकेटमार गुप्ताजी से बिदक गए। चूंकि खबर फोटो के साथ लगी थी फलस्वरुप पाकेटमार उन्हें देखते ही भागने लगते थे।
ठुकाई के इस अनुभव के बाद गुप्ताजी ने पाया कि यदि लोग यात्रा के दौरान बड़े नोटों के साथ-साथ खूब सारे सिक्के रखेंगे तो शायद पाकेट कम ही कटे। यदि किसी पाकेटमार ने पाकेट काट भी ली तो सिक्कों के गिरने से यह पता चल जाता है कि घटना अभी-अभी हुई हैं। दूसरा भीड़-भाड़ वाले इलाकों में यदि बार-बार आपका ध्यान उस जेब की जाएगा जहां पैसा रखा हुआ है तो समझिए आप पाकेटमारों के लिए आसान शिकार हैं। जेबकतरों के उस्ताद स्टेशन में झाड़ी(निरीक्षण) कर यह पता लगा लेते हैं कि किसी आदमी की जेब में कितना माल(पैसा) है। शाऱीरिक हाव-भाव के आधार पर जेबकतरे अपना काम करने में सफल हो जाते हैं।
सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि जेबकतरे भीड़भाड़ वाले इलाकों में ही अपना कमाल दिखाते हैं, लेकिन यह धारणा थोड़ी गलत हैं। जेबकट सूनेपन का भी खासा फायदा उठाते हैं। भले ही सीट कन्फर्म हो लेकिन हर आदमी ट्रेन के डिब्बे में चढ़ने से पहले डिस्पले बोर्ड पर जाकर तन्मयता के साथ अपनी जगह और अपना नाम जरूर देखना चाहता है। कई बार यही तन्मयता उसके लिए भारी पड़ जाती है। कई बार जेबकतरे बहुत मेहनत करने के बाद भी जेब नहीं काट पाते तो फिर फार्मूला नं. 336 का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत कोई भी अन्जान आदमी पान खाकर थूक सकता है। ट्रेन में अचानक कोई खूबसूरत महिला आपको आंख मारकर फंसा सकती है। आपकी नजर हटी तो समझिए दुर्घटना घटी। अरे भाई बाकी तो आपने फिल्मों में देखा ही होगा। कई बड़े-बड़े अभिनेताओं ने फिल्मों में पाकेटमार की भूमिका निभाई है। हिरोइनें भी सीटी बजाकर जेब साफ करती रही है। एक नया छोकरा शाहिद कपूर भी पाकेटमार नामक एक फिल्म में काम कर रहा हैं।
पिकपाकेट शीर्षक से अपनी किताब लिखने वाले गुप्ताजी बताते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि यदि आपकी जेब दो-चार स्टेशनों में नहीं कटी तो फिर कटेगी ही नहीं। प्रत्येक जेबकतरा एक निर्धारित समय और दूरी तक ही जेब काटने का काम करता है। यदि कोई जेबकतरा निर्धारित समयसीमा और दूरी के बीच जेब नहीं काट पाया तो फिर दूसरे इलाके के जेबकतरे को अपना ग्राहक बेच देता हैं। जिस जेबकतरे को ग्राहक मिल जाता है यदि वह सफल हो जाता है तो बकायदा पहले जेबकतरे को वह ससम्मान मानदेय भी देता हैं।
गुप्ताजी से चर्चा करने के बाद मैं कई पाकेटमारों से मिला। वे पाकेटमार क्यों बने.. पूछने पर सबने यही बताया कि घर के खराब हालात ने उन्हें लोगों की जेबों को कतरने का हुनर सीखा दिया है। भला बताइए क्या कोई शौक से जेब काटता हैं। मां-बाप की पुरानी खांसी, बच्चे के दिल का बड़ा सा सूराख, आइने के सामने रोज-रोज मुहांसों को फोड़ने वाली बहन की हससतें ब्लेड चलाने के लिए मजबूर कर देती हैं।
यह पोस्ट मैं जेबकतरों के पक्ष को मजबूत करने के लिए नहीं लिख रहा हूं। कोई भले ही इस वाक्य को न माने लेकिन मेरा मानना है कि घृणा अपराधी से नहीं अपराध से होनी चाहिए। इस दुनिया में ऐसा कोई आदमी नहीं है जिसके हिस्से में एक भी पाप न हो।
लड़के की चाह के लिए गर्भ गिराने वाले लोग कौन है। बुढ़ापे में मां-बाप को घर से बेदखल करने वाले कौन है। नौकरी देने के नाम पर किसी लड़की का शोषण करने वाले लोग कौन है। दूसरों की जमीन को अपनी जमीन बताकर बेचने वाले लोग कौन है। प्रतिभा से डरकर दूसरों की टांग खींचने वाले लोग कौन है। भाइयों... दंगे करवाने वाले लोग कौन है। मंदिर और मजिस्द को गिराने वाले लोग कौन है। कानून-व्यवस्था के नाम पर हर रोज आम-आदमी की जान लेने वाले लोग कौन है।
वे लोग जो कोई भी है क्या वे कोई पुण्य आत्मा है। पाकेटमार बेहद छोटे किस्म की पुण्य आत्मा का नाम हैं। जब मैंने पाकेटमार पार्ट-2 लिखी तो मेरे मित्र श्याम कोरी उदय की टिप्पणी ने मुझे चौंकाया। श्री कोरी जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि –पाकेटमारों को सिर्फ पैसों से मतलब होता है। पाकेट मारने के बाद जेबकतरे पर्स को घटना स्थल पर ही फेंक देते हैं। उन्हें ड्राइविंग लायसेंस आदि से मतलब नहीं होता। हो सकता है कि श्री कोरी जी की बात सही हो लेकिन मैं अब एक ऐसे प्रसंग का वर्णन करने जा रहा हूं जिससे यह पता चलता है कि पाकेट्मारों के सीने में भी दिल धड़कता है।
एक बार एक जेबकट ने किसी मजबूर आदमी की जेब काट ली। जेबकतरे को यह अंदेशा नहीं था कि वह जिसकी जेब काटने जा रहा है वह पूरी तरह फक्कड़ तो नहीं लेकिन फक्कड़ निकलेगा। पर्स में जेबकतरे को चार सौ रूपए मिले साथ में एक चिट्ठी भी।
मां... चरण स्पर्श। आगे समाचार यह है कि मैं खुश तो हूं और तेरी तबीयत का क्या हाल है। मुन्नी से कहना कि उसका भाई जल्द ही लौटेंगा तो जल्द ही खिलौने भी लेता आएगा। मां.. इस बार पैसा तो भेज रहा हूं लेकिन कुछ कम। इधर शहर में मकान का किराया बहुत अधिक देना पड़ रहा है। तेरी दवाई के लिए तीन सौ रुपए कुछ दिनों बाद भेजूंगा। अभी चार सौ रुपए से काम चला लेना।
तुम्हारा बेटा- सतीश, भोले किराना स्टोर के पास, भंगारे वाले की गली, तीसरी खोली मुबंई।
पत्र को पढ़ने के बाद जेबकतरे उसी दिन फिर एक जेब काटी और मजबूर आदमी को चिट्ठी लिखी-
भाई... क्षमा करना अपुन ने तुम्हारी जेब काटी थी लेकिन अपुन तुमको एक सलाह भी देना चाहता है। तुम जहां काम करता है न..उसको छोड़कर कोई दूसरी जगह काम देखो। इतनी कम तनख्वाह में तो मां का इलाज नहीं हो पाएगा। अभी तो अपुन ने मां को पैसा भेज दिया है। क्या है न भाई...मां तो सबकी मां है न भाई।












