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Wednesday, April 28, 2010

भूख, गरीबी और बेकारी ने बनाया पाकेटमार

जेबकतरी पर पीएडी करने वाले केके गुप्ता भले ही आज रायपुर सेंट्रल जेल में एक बड़े ओहदे में पदस्थ है लेकिन उन्होंने अनुभव आधारित किताब को लिखने के लिए जिसे अपना उस्ताद बनाया था उस उस्ताद ने एक दिन उनसे कह ही डाला-बेटा केके आज तुम्हे अपनी परीक्षा एक बस में दिखानी है। गुप्ता जी को उस्तादजी ने समझाया कि आज तुम्हे एक ग्रामीण के झोले से गहनों को निकालना है। निर्धारित समय में गुप्ता जी और उनके उस्ताद उस बस में चढ़े जिस बस में ग्रामीण चढ़ा था। बस उस्तादजी का इशारा पाते ही गुप्ताजी ने झोले में हाथ डाला और चांदी के गहने खनक उठे। अपनी बिटिया की शादी के लिए एक ज्वेलरी से गहने लेकर घर लौट रहा ग्रामीण वैसे भी सजग था। ग्रामीण चिल्लाया-पकड़ो रे पकड़ो धाड़ों पड़ गयो रे। डकैती डल गई। गुप्ता जी पकड़ लिए गए। बस में सवार सभी लोगों ने हाथ की सफाई का कार्यक्रम कर डाला। कपड़ों के फटने और मुंह-कान को सुजाने के बाद जब गुप्ता जी थाने लाए गए तो एक सिपाही ने उन्हें पहचान लिया। उसने अपने बड़े अफसर को बताया कि सर.. गुप्ता जी भी अच्छे अफसर है लेकिन पता नहीं घर में ऐसी क्या कमी हो गई कि जेब काटनी पड़ रही है।

अफसर ने जैसे ही गुप्ताजी को धमकाया तो गुप्ताजी ने उन्हें सरकार की तरफ से पीएचडी पूरा करने के लिए दिया गया पत्र दिखाया। गुप्ताजी ने अफसर को बताया कि सर.. यदि मैं जेब काट भी लेता तो उसे वापस कर देता लेकिन क्या करूं परीक्षा थी सो देनी थी। मैं इस परीक्षा में फेल हो गया। थाने में मौजूद लोगों में से एक ऐसा आदमी भी था जो किसी पत्रकार को जानता था। उसने पत्रकार को घटनाक्रम की जानकारी दे दी। खबर अखबार में तो छप गई लेकिन पाकेटमार गुप्ताजी से बिदक गए। चूंकि खबर फोटो के साथ लगी थी फलस्वरुप पाकेटमार उन्हें देखते ही भागने लगते थे।

ठुकाई के इस अनुभव के बाद गुप्ताजी ने पाया कि यदि लोग यात्रा के दौरान बड़े नोटों के साथ-साथ खूब सारे सिक्के रखेंगे तो शायद पाकेट कम ही कटे। यदि किसी पाकेटमार ने पाकेट काट भी ली तो सिक्कों के गिरने से यह पता चल जाता है कि घटना अभी-अभी हुई हैं। दूसरा भीड़-भाड़ वाले इलाकों में यदि बार-बार आपका ध्यान उस जेब की जाएगा जहां पैसा रखा हुआ है तो समझिए आप पाकेटमारों के लिए आसान शिकार हैं। जेबकतरों के उस्ताद स्टेशन में झाड़ी(निरीक्षण) कर यह पता लगा लेते हैं कि किसी आदमी की जेब में कितना माल(पैसा) है। शाऱीरिक हाव-भाव के आधार पर जेबकतरे अपना काम करने में सफल हो जाते हैं।

 सामान्य तौर पर यह माना जाता है कि जेबकतरे भीड़भाड़ वाले इलाकों में ही अपना कमाल दिखाते हैं, लेकिन यह धारणा थोड़ी गलत हैं। जेबकट सूनेपन का भी खासा फायदा उठाते हैं। भले ही सीट कन्फर्म हो लेकिन हर आदमी ट्रेन के डिब्बे में चढ़ने से पहले डिस्पले बोर्ड पर जाकर तन्मयता के साथ अपनी जगह और अपना नाम जरूर देखना चाहता है। कई बार यही तन्मयता उसके लिए भारी पड़ जाती है। कई बार जेबकतरे बहुत मेहनत करने के बाद भी जेब नहीं काट पाते तो फिर फार्मूला नं. 336 का इस्तेमाल किया जाता है। इसके तहत कोई भी अन्जान आदमी पान खाकर थूक सकता है। ट्रेन में अचानक कोई खूबसूरत महिला आपको आंख मारकर फंसा सकती है। आपकी नजर हटी तो समझिए दुर्घटना घटी। अरे भाई बाकी तो आपने फिल्मों में देखा ही होगा। कई बड़े-बड़े अभिनेताओं ने फिल्मों में पाकेटमार की भूमिका निभाई है। हिरोइनें भी सीटी बजाकर जेब साफ करती रही है। एक नया छोकरा शाहिद कपूर भी पाकेटमार नामक एक फिल्म में काम कर रहा हैं।

पिकपाकेट शीर्षक से अपनी किताब लिखने वाले गुप्ताजी बताते हैं कि यह जरूरी नहीं है कि यदि आपकी जेब दो-चार स्टेशनों में नहीं कटी तो फिर कटेगी ही नहीं। प्रत्येक जेबकतरा एक निर्धारित समय और दूरी तक ही जेब काटने का काम करता है। यदि कोई जेबकतरा निर्धारित समयसीमा और दूरी के बीच जेब नहीं काट पाया तो फिर दूसरे इलाके के जेबकतरे को अपना ग्राहक बेच देता हैं। जिस जेबकतरे को ग्राहक मिल जाता है यदि वह सफल हो जाता है तो बकायदा पहले जेबकतरे को वह ससम्मान मानदेय भी देता हैं।

गुप्ताजी से चर्चा करने के बाद मैं कई पाकेटमारों से मिला। वे पाकेटमार क्यों बने.. पूछने पर सबने यही बताया कि घर के खराब हालात ने उन्हें लोगों की जेबों को कतरने का हुनर सीखा दिया है। भला बताइए क्या कोई शौक से जेब काटता हैं। मां-बाप की पुरानी खांसी, बच्चे के दिल का बड़ा सा सूराख, आइने के सामने रोज-रोज मुहांसों को फोड़ने वाली बहन की हससतें ब्लेड चलाने के लिए मजबूर कर देती हैं।

यह पोस्ट मैं जेबकतरों के पक्ष को मजबूत करने के लिए नहीं लिख रहा हूं। कोई भले ही इस वाक्य को न माने लेकिन मेरा मानना है कि घृणा अपराधी से नहीं अपराध से होनी चाहिए। इस दुनिया में ऐसा कोई आदमी नहीं है जिसके हिस्से में एक भी पाप न हो।

लड़के की चाह के लिए गर्भ गिराने वाले लोग कौन है। बुढ़ापे में मां-बाप को घर से बेदखल करने वाले कौन है। नौकरी देने के नाम पर किसी लड़की का शोषण करने वाले लोग कौन है। दूसरों की जमीन को अपनी जमीन बताकर बेचने वाले लोग कौन है। प्रतिभा से डरकर दूसरों की टांग खींचने वाले लोग कौन है। भाइयों... दंगे करवाने वाले लोग कौन है। मंदिर और मजिस्द को गिराने वाले लोग कौन है। कानून-व्यवस्था के नाम पर हर रोज आम-आदमी की जान लेने वाले लोग कौन है।

वे लोग जो कोई भी है क्या वे कोई पुण्य आत्मा है। पाकेटमार बेहद छोटे किस्म की पुण्य आत्मा का नाम हैं। जब मैंने पाकेटमार पार्ट-2 लिखी तो मेरे मित्र श्याम कोरी उदय की टिप्पणी ने मुझे चौंकाया। श्री कोरी जी ने अपनी टिप्पणी में लिखा है कि –पाकेटमारों को सिर्फ पैसों से मतलब होता है। पाकेट मारने के बाद जेबकतरे पर्स को घटना स्थल पर ही फेंक देते हैं। उन्हें ड्राइविंग लायसेंस आदि से मतलब नहीं होता। हो सकता है कि श्री कोरी जी की बात सही हो लेकिन मैं अब एक ऐसे प्रसंग का वर्णन करने जा रहा हूं  जिससे यह पता चलता है कि पाकेट्मारों के सीने में भी दिल धड़कता है।

एक बार एक जेबकट ने किसी मजबूर आदमी की जेब काट ली। जेबकतरे को यह अंदेशा नहीं था कि वह जिसकी जेब काटने जा रहा है वह पूरी तरह फक्कड़ तो नहीं लेकिन फक्कड़ निकलेगा। पर्स में जेबकतरे को चार सौ रूपए मिले साथ में एक चिट्ठी भी।

चिट्ठी में लिखा था- 

मां... चरण स्पर्श। आगे समाचार यह है कि मैं खुश तो हूं और तेरी तबीयत का क्या हाल है। मुन्नी से कहना कि उसका भाई जल्द ही लौटेंगा तो जल्द ही खिलौने भी लेता आएगा। मां.. इस बार पैसा तो भेज रहा हूं लेकिन कुछ कम। इधर शहर में मकान का किराया बहुत अधिक देना पड़ रहा है। तेरी दवाई के लिए तीन सौ रुपए कुछ दिनों बाद भेजूंगा। अभी चार सौ रुपए से काम चला लेना।
तुम्हारा बेटा- सतीश, भोले किराना स्टोर के पास, भंगारे वाले की गली, तीसरी खोली मुबंई।

पत्र को पढ़ने के बाद जेबकतरे उसी दिन फिर एक जेब काटी और मजबूर आदमी को चिट्ठी लिखी-
भाई... क्षमा करना अपुन ने तुम्हारी जेब काटी थी लेकिन अपुन तुमको एक सलाह भी देना चाहता है। तुम जहां काम करता है न..उसको छोड़कर कोई दूसरी जगह काम देखो। इतनी कम तनख्वाह में तो मां का इलाज नहीं हो पाएगा। अभी तो अपुन ने मां को पैसा भेज दिया है। क्या है न भाई...मां तो सबकी मां है न भाई।  

Tuesday, April 27, 2010

पाकेटमार-पार्ट-2

साथियों छोटे से ब्रेक के बहाने चला तो गया था लेकिन इस बीच कई साथियों का मजा इस बात के लिए किरकिरा हो गया कि मैं उन्हें जेब काटने... मेरा मतलब जेब कटने से बचने का तरीका नहीं बता पाया।

खैर मैं फिर से चालू हो जाता हूं।

तो भाइयों चोंगे से घोषणा हो रही है कि गाड़ी नं.... प्लेटफार्म क्रमांक पर आने वाली है। एक बार फिर चाय, पेपर और सूटकेस को चेन से बांधकर ऱखने की सिफारिश करने वाले प्लेटफार्म पर चीखने लगते हैं। शर्माजी के परिजन उन्हें याद दिलाते हैं कि चेन सूटकेस में ही है, याद से बांध लेना। मिसेज शर्मा अपने पति से कहती है, कोई कुछ दे तो खाना मत। जमाना ठीक नहीं है। खाने की पोटली के साथ-साथ नसीहतों की पोटली को भी सिरहाने रखकर खर्राटा भरने की जुगत में जुटे शर्माजी अचानक यह देखकर खुश हो जाते हैं कि गाड़ी आ रही हैं।

गाड़ी अभी पूरी तरह आई नहीं है। बस आ रही है... शर्माजी अपनी बोगी खोजने लग जाते हैं। अरे.. डिस्पले तो यहीं किया था कि एस वन का स्टापेज यही होगा लेकिन आगे बढ़ा दिया। गाड़ी नहीं... शर्माजी का निर्धारित डब्बा जिसमें उनका आरक्षण है वह कुछ आगे बढ़ जाता है। शर्माजी दौड़ लगाते हैं। उनके साथ उनकी पत्नी भी दौड़ लगाती है, लेकिन यह क्या ठुल्ला-पानी,कंठी जैसे शब्दों का इस्तेमाल करने वाले पाकेटमार भी उसी डिब्बे की तरफ दौड़ लगाते हैं जहां शर्माजी ने दौड़ लगाई थी। दो पाकेटमार पहले से चढ़कर दरवाजे पर पहुंच जाते हैं। चार पीछे शर्माजी को धकेलते हुए चढ़ने की कोशिश करते हैं। शर्माजी दरवाजे पर फंस चुके हैं। एक पाकेटमार अपना सामान लाने के लिए चिल्लाने लगता है- अरे मेरा सामान तो लाने दो। गाड़ी अभी बहुत देर रूकेगी। क्या पहले कभी ट्रेन में नहीं चढ़े क्या। अरे वो जबान संभालकर बात कर। तीसरा पाकेटमार गाली-गलौच पर उतर आया है। वह सरकार के साथ मनुष्यता को भी चुनौती देता है-जानवर है सारे लोग। ये देश कभी नहीं सुधरने वाला। आरक्षण करवाने के बाद भी मरे जा रहे हैं। क्या ट्रेन भाग जाएगी। पाकेटमारों के बीच फंसे शर्माजी किसी तरह से इस कोशिश में है बस एक बार अंदर पहुंच जाए। उनकी पत्नी भी चिल्लाती है-अरे आप लोग हटोगे तब तो कोई जाएगा न। अरे बहनजी हमें भी यहां तंबू नहीं लगाना है। सामने वाला हटेगा तो मैं जाऊंगा न।

बस इसी नोंकझोक में एक पाकेटमार की दो ऊंगलियां बड़ी तेजी से आगे बढ़ती है और शर्माजी की जेब बगैर कोई चीरा लगाए ही कट जाती है। लेकिन यह क्या शर्माजी की मिसेज ने जेबकतरे को कमाल करते हुए देख लिया। वह चिल्लाती है-अरे देखो कोई पाकेट मार रहा है। इतना सुनते ही पाकेटमार भागता है। उसके पीछे-पीछे वे पाकेटमार भी भागते हैं जो उसके साथी थे। जाते-जाते पाकेटमार यह भी कहते जाते हैं-जमाना भी शराफत का नहीं रहा। बहनजी आप चिन्ता मत करो। अभी पकड़ते हैं... साले को। पकड़ो-पकड़ो साले को, जेब काट रहा था।  पाकेटमार के पीछे पाकेटमार दौड़ लगा रहे हैं। अरे यह क्या रेलवे का पुल पार करने के बाद सब हंसने लगते हैं। हंसते-हंसते ही एक सीनियर पाकेटमार जूनियर को तमाचा जड़ता है-साले मरवाएगा। सफाई ला हाथ में। हम लोग हाथ की खाते हैं। अभी ठुल्ला आ जाता तो कंठी( जेल) हो जाती।

पाकेटमारी पर शोध करने वाले केके गुप्ता बताते हैं कि जेबकतरों को न तो जेल जाने से डर लगता है न ही पकड़े जाने के बाद पीटे जाने से। वे डरते हैं तो केवल पहचान लिए जाने से। श्री गुप्ता कहते हैं कि गुंडागर्दी के धंधे में जो गुंड़ा जितना बदनाम होता है उसकी दुकान उतनी ही तेज ढंग से चलती है लेकिन पाकेटमारी के धंधे में जो पाकेटमार एक बार पहचान लिया जाता है उसका धंधा लगभग खत्म ही माना जाता हैं। पहचान लिए जाने के बाद पुलिस तो उसे परेशान करती ही हैं, जेब काटने के लिए भीतर से पैदा होने वाला आत्मबल भी कमजोर हो जाता है। जो ऊंगलियां किसी जेब के पास पहुंचने के बाद यदि कांपने लगती है तो समझिए वह एक आदमी का पेट भरने के काबिल नहीं रहती। पाकेटमारी के धंधे में हाथों की ऊंगलियों को शास्त्रीय नृत्य के साथ-साथ ब्रेक और डिस्को भी करना होता हैं। जो ऊंगलियां बेहतर किस्म का नाच नहीं जानती वह पर्स तो क्या किसी के जेब से चवन्नी भी नहीं निकाल सकती।

ऊंगलियों की शास्त्रीयता की वजह से ही बहुत कम लोगों ने जेबकतरों को जेब काटते हुए देखा है। जिस व्यक्ति की जेब कटती है उसे भी तब पता चलता है जब वह अपनी जेब में हाथ डालता है। सचमुच एक क्षण में हरकत के जरिए नोटों से भरा पर्स निकाल लेने की कला किसी जादूगरी से कम नहीं है। जेबकटी को कौतूहल,आश्चर्य और रहस्य की अनेक परतों के भीतर खदबदाता अपराध भी कहें तो कोई अतिश्योक्ति नहीं होगी।

गूढ़ रहस्य को और अधिक गूढ़ बनाने के लिए जेबकतरों के राष्ट्रीय और अंतर्राष्ट्रीय सम्मेलन भी होते हैं। इन सम्मेलनों में जेबकतरों के ठहरने, खाने-पीने का पूरा खर्च भी जेबकटी के पैसों से ही पूरा किया जाता है। यह प्रतिबद्धता देश के किसी भी लेखक संगठनों में भी नजर नहीं आती। क्योंकि सम्मलेनों के बाद अक्सर यह बात लीक होकर बाहर आ ही जाती है कि सम्मेलन का खर्चा सरकार ने उठाया था या फिर उद्योगपतियों ने।
सामान्य तौर पर कोई यह नहीं बता पाया है कि जेबकटी की शुरूआत कब से और कहां से हुई है लेकिन मोटे तौर पर यह माना जाता है कि जब से लोगों ने दर्जियों से यह कहा होगा कि हमारे कपड़ों में एक नहीं दस-बीस जेब बना दो तब से जेबें कटनी भी शुरू हुई होगी। कहा तो यह भी जाता है कि जेबकतरों का गिरोह फैशन डिजाइनरों को सुविधाजनक जेबें बनाने के लिए बकायदा पेमेंट भी करता हैं। आसान जेबों के फैशन में आ जाने से जेबकतरों को जेब काटने में सुविधा होती है। इन दिनों मार्केट में चल रही कार्गों की पैंटों के पीछे भी पाकेटमारों के गिरोह की भूमिका देखी जा रही हैं। जितनी ज्यादा जेब होगी लोग उतना ज्यादा पैसा रखेंगे। लेकिन पिज्जा खाकर सलमान खान बनने वाली पीढ़ी ने पैसों के बजाए एटीएम व मोबाइल रखना चालू कर दिया है। अशिक्षित किन्तु अपने खास स्कूल में प्रशिक्षित जेबकतरों ने अब मोबाइल पार करने को भी अपना धंधा बना लिया है।

मित्रों थोड़ी सी बातें और है जो मुझे आपसे कहनी है। इस बातचीत में वह प्रसंग भी शामिल है जब अपनी पीएचडी को पूरा करने के लिए गुप्ता जी को जेब काटनी पड़ी और फिर पब्लिक ने उन्हें मार-मारकर रंग बिरंगा बना दिया। आप सबने टिप्पणियों से जो प्रोत्साहन दिया है उसके लिए तहेदिल से शुक्रगुजार हूं। आज की पोस्ट पर जेबकाटने वाले औजारों का चित्र (गुगल से साभार) भी जारी किया जा रहा है। यह औजार वैसे तो बहुत भयानक नहीं है लेकिन छोटी कैंची मोटे कपड़े वाली जेब को काटने के काम आती है तो ब्लेड पतले कपड़ों पर चलता है। दो रुपए के एक ब्लेड के छह टुकड़े किए जाते हैं। मैंने पहले भी बताया था कि सामान्य तौर पर जेबकतरे पकड़े नहीं जाते लेकिन यदि लापरवाही से पुलिस के हत्थे चढ़ गए तो वे सबसे पहले  अपने औजार यानी ब्लेड को नष्ट करने का काम ही करते हैं। कुछ दिनों पहले पुलिस के हत्थे चढ़े मदन नाम के एक पाकेटमार ने बताया कि वह ब्लेड के टुकडे को वैसे ही खा सकता है जैसे लोग गुटखा लेते हैं। जेबकटी के बाद यदि पुलिस ने जेबकतरे को पकड़ लिया तो वह पैराशूट के पतले धागे में नोट को बांधकर निगल भी लेता है। धागे का एक सिरा दांतों के बीच  ही कही फंसा होता है। जैसे ही पुलिस ने छोड़ा धागे के जरिए नोट बाहर निकल आता है। साथियों फिर लेता हूं एक छोटा सा ब्रेक। शायद यह ब्रेक अब 12 घंटे का न हो। 

Monday, April 26, 2010

पाकेट मारता है... मारो साले को

साले.. पाकेट मारता है... मारो साले को। यह अमृत वाक्य आपको कभी रेलवे स्टेशन में सुनने को मिल सकता है तो कभी मीनाबाजार में। आज मैं आपको पाकेटमारों की दुनिया के बारे बताने जा रहा हूं। इस दुनिया की बारीक से बारीक बातों को मैं इसलिए एकत्र कर पाया क्योंकि छत्तीसगढ़ की रायपुर जेल में पदस्थ एक अफसर केके गुप्ता ने पाकेटमारी को लेकर न केवल पीएचडी की है बल्कि पाकेटमारी पर जबरदस्त किताब भी लिख मारी है।

कुछ समय पहले जब मैं एक स्टोरी के सिलसिले में उनसे मुलाकात करने जेल गया था तो वहां उन्होंने मुझे पाकेटमारी को लेकर अपना अनुभव बांटा। यह बहुत कम लोगों को पता है कि श्री गुप्ता ने पाकेटमारी पर लिखने के पूर्व अनुभव बटोरने के लिए पाकेटमारी का काम भी किया और लोगों के द्वारा पकड़े जाने पर बकायदा लात-जूतों से अपना स्वागत भी करवाया। बहरहाल उनकी किताब को पाकेटमारी की दुनिया के अलावा अपराध शास्त्र का विवेचन करने वाले लोग मील का पत्थर मानते हैं।

अब मैं पाकेटमारी की कहानी शुरू कर रहा हूं।

अपराध की दुनिया में जेबकतरों को बेहद घटिया श्रेणी में रखा जाता है, लेकिन यह बात बहुत कम लोगों को पता है कि करीम लाला, हाजी मस्तान, यूसूफ पटेल, वरदराजन और दाउद ने अपने जीवन की शुरूआत जेबकटी के धंधे से ही की है। जेबकटी को अपराध विशेषज्ञ गेटवे आफ क्राइम की संज्ञा से संबोधित करते हैं। अब से कुछ अरसा पहले अपराध की काली दुनिया में प्रवेश करने वालों को बकायदा गंडा-ताबीज पहनकर उस्ताद बनना होता था और समय-समय पर परीक्षा भी देनी होती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं हैं। अब तो एक मरियल-खपियल, गुटखा चबाने वाले को एक तमंचा मिल जाए तो वह बारात के आगे ठर्रा पीकर नाचने वाले लुच्चों के बल पर चिल्लाने लगता है-अरे दीवानों मुझे पहचानों..मैं हूं डान।

लेकिन देश-दुनिया में अपने नाम का डंका बजाने वाले डानों ने ऐसा नहीं किया था। उन्होंने हर धंधे के लिए उस्तादों से बकायदा ट्रेनिंग ली और एक जरूरी हिस्सा उस्तादों के पास पहुंचाया भी। जेबकटी के धंधे में यह ईमानदारी कुछ ज्यादा ही देखी गई। अब से कुछ समय पहले तक तो यह धंधा बिखरा हुआ था लेकिन अब इस धंधे ने एक सही आकार ले लिया है। इस सही शेप का नतीजा है कि देश में हर रोज कई हजार लोग जेबकटी के शिकार हो जाते हैं। एक मोटा अनुमान है कि देश के जेबकतरें हर रोज जेबकटी से करीब 25 लाख रुपए बटोर लेते हैं।

क्या जेब काटने का कोई प्रशिक्षण होता है। जी हां.. यह सच है। मुबंई-कोलकता और दिल्ली जैसे शहरों में इसके लिए स्कूल भी चलते हैं। लेकिन गैर मान्यता प्राप्त इन स्कूलों की विशेषता सिर्फ विश्वास है। यानी जिसको धंधे में भरोसा है वही उस्तादों के बीच जाकर ट्रनिंग लेता हैं। बूढ़े उस्ताद भी इसलिए प्रशिक्षण देते हैं क्योंकि उन्हें भी अपना बुढ़ापा काटना होता हैं।
वैसे तो जेबकतरे कई तरह के होते हैं, लेकिन मोटे तौर पर ऊपर की जेब काटने वालों का गिरोह अलग ही होता है और साइड की जेबें साफ करने वालों की टोली अलग होती हैं। जेब काटने की मूलतः दो विधाएं ही प्रचलित हैं। एक जिसमें अगुंली का इस्तेमाल होता है, और दूसरा जिसमें औजार का प्रयोग किया जाता हैं। अंगुली का इस्तेमाल करने वाले सलाईबाज और ब्लेड का इस्तेमाल करने वालों को ताशबाज कहा जाता है। जो लोग ऊपर व साइड की जेब काटने में उस्ताद हो जाते हैं वे गैंग के लीडर बन जाते हैं। पाकेटमार बेहद शास्त्रीय ढंग से जेब काटने का काम करते हैं। ठीक वैसे ही जैसे प्रेमी अपनी प्रेमिका की आंखों से काजल चुरा लेता है और प्रेमिका को पता ही नहीं चलता।

यह काजल कैसे चुराया जाता है... जरा देखते है-

स्टेशन में काफी भीड़ हैं। लोग ट्रेन के आने का इन्तजार कर रहे हैं। थोड़ी-थोड़ी  देर में चाय वाला, फल वाला और किताब बेचने वाला गुजर रहा हैं। भीड़ में कुछ पाकेटमारों की निगाहें उस मुर्गें को खोज रही हैं जो ऊपरी और साइड की जेब में नोट लेकर चल रहा हैं। जिस जेब में नोट के साथ सिक्के होते हैं वहां पाकेटमारी की संभावना काफी कम होती है क्योंकि काजल चुराने के दौरान सिक्के चुगली कर सकते हैं –ये क्या कर रहे हो भाई, लेकिन जिन जेबों में सिर्फ पर्स होता है या फिर नोट होते हैं वहां पाकेटमारी आसान हो जाती है।

मिस्टर शर्मा पहली बार मुबंई जा रहे हैं। उन्हें छोड़ने के लिए उनके परिजन आएं हुए हैं। अभी गाड़ी आने में लेट हैं.. मिस्टर शर्मा बुक स्टाल जाकर किताब खरीदते हैं। पाकेटमार दूर से यह देख रहे हैं कि मिस्टर शर्मा ने किताब खरीदी है और पैसे को ऊपरी जेब में रखा हैं। मिस्टर शर्मा दूसरी बार एक मिनरल वाटर की बोतल खरीदते हैं और नोटों को एक बार फिर ऊपरी जेब में ही रखते हैं। पाकेटमारों को यह पूरा अन्दाजा हो जाता है कि मिस्टर शर्मा ऊपरी जेब में पैसा रखने के आदी है। शर्मा जी का अध्य्यन करने के बाद पाकेटमार सक्रिय हो जाते हैं। कुछ ही देर मे उनके आसपास चार-पांच आदमी आकर खड़े हो जाते हैं और अजीब-अजीब बोली में बातचीत करने लगते हैं। उनकी बोली को सुनकर शर्माजी को पहले तो बुरा लगता है लेकिन फिर वे यह सोचकर खामोश हो जाते हैं कि दुनिया एक मुसाफिर खाना है। न जाने कितने प्रांतो के लोग ट्रेनों में सफर करते हैं। किसी को एक स्टेशन में उतरना है तो किसी तो दूसरे स्टेशन में। गाड़ी फिर आगे बढ़ जाएगी।
जेबकतरे आपस में बातचीत कर रहे हैं- बिहारी, सुच, सयाना, ठोल-ठुल्ला, चरखी,ईंटापानी, सलाई, पानी हो जाना, झाड़ी करके देख, संभल के कंठी हो जाएगी।

मतलब यही है कि सामने वाला अपने आपको होशियार समझ रहा है। लेकिन नया सयाना है। चरखी(
ट्रेन) आएंगी तो पानी हो जाना(जेब काटकर भाग जाना) कही ठुल्ले यानी पुलिस वाले ने पकड़ लिया तो कंठी(जेल) हो जाएगी।
शर्माजी की जेब तो कटती है लेकिन कैसे इस बारे में मैं आपको कल फिर विस्तार से बताऊंगा। हो सकता है कि जो कुछ मैं लिखूं वह शायद आपके काम आ जाए और आपकी जेब कटने से बच जाए...आप भी तो ट्रेन में सफर करते हैं या नहीं। यदि ट्रेन से नहीं जाते तो भी बच्चों की जिद पर मेले में तो जाते ही होंगे। मिलते है एक छोटे से ब्रेक के बाद (जारी.....)

Sunday, April 25, 2010

चेहरा छिपाने वाले मनोज कुमार

देशभक्ति के नाम पर सेक्स-हिंसा और और अंग्रेजों के जमाने में काम आने वाले तोप-तमंचों को लेकर युद्ध कौशल से भरी फिल्म बनाने के लिए मशहूर फिल्म अभिनेता मनोज कुमार को सभी लोग भारत कुमार के नाम से जानते हैं लेकिन क्या कोई यह बता सकता है कि मनोज कुमार ने किसी भी फिल्म की हर दूसरी रील बल्कि हर दूसरे दृश्य में अपने चेहरे को अपने हाथों से छिपाने का काम क्यों किया है।

इस सवाल का उत्तर आज तक बहुत से लोग नहीं खोज पाएं हैं कि मनोज कुमार हर संवाद के बाद अपने दोनों हाथों से अपना चेहरा क्यों ढांप लिया करते थे। सिनेमा के जानकारों की राय है कि उन्होंने चेहरे को ढांपने की अपनी एक नई शैली विकसित की थी जबकि कुछ का कहना है कि जब-जब वे अभिनय करने से बचना चाहते थे तब-तब अगूंठी पहने हुए हाथों को अपने चेहरे पर ले आते थे। मनोचिकित्सकों की राय है कि (क्षमा करिएगा इसमें से किसी ने मनोज कुमार का चेकअप नहीं किया) हर व्यक्ति की अपनी एक आदत होती है यह आदत उसके काम में बदल जाती है। किसी को अच्छा सोचने लिए सिगरेट की जरूरत होती है तो कोई खोपड़ी खुजाने लगता है। किसी को चाय की तलब होती है तो किसी का दिमाग दो पैग के बगैर काम ही नहीं करता। हो सकता है कि मनोज कुमार को भी लगता हो चेहरे को हाथ से छिपा लेने पर फिल्म हिट हो जाती है। या फिर चेहरे को छिपाकर वे यह सोचते हो अब अगला शाट कैसे अच्छा होगा।

मनोज कुमार ही क्यों फिल्म अभिनेता शत्रुघ्न सिन्हा को भी बार-बार अपना हाथ कालर के पास ले जाने की आदत रही है। यह आदत उन्हें गुलजार की फिल्म मेरे अपने की शूटिंग के दौरान –कह देना छैनू आया था जैसा धुंआधार बोलने की वजह से पड़ गई थी। इसी फिल्म में उन्होंने सिगरेट के धुंए का गोल छल्ला बनाकर हवा में उड़ाया था। बाद में उनका यह छल्ला कई फिल्मों में उड़ता दिखा। फिल्म अभिनेता राजकुमार को जानी-जानी कहने की आदत थी। जबकि सब जानते हैं कि जानी उनके कुत्ते का नाम था। उनके सामने कितना भी बड़ा एक्टर हो उसे वे जानी कहकर ही संबोधित किया करते थे। दक्षिण भारत के एक जबरदस्त अभिनेता रजनीकांत के बारे में भी सब जानते हैं। एक्शन दृश्यों को पूरी संजीदगी के साथ करने के लिए मशहूर रजनीकांत ने भी एक से बढ़कर एक स्टाइल से दर्शक प्रभावित हुए हैं लेकिन उनका भी सिगरेट पीने और चश्मा पहनने का एक खास अन्दाज है। सिने विश्लेषकों का मत है कि यदि दिलीपकुमार अपनी धीमी संवाद शैली की वजह से मशहूर थे तो राजकपूर चार्ली चैपलिन के अन्दाज को अपनाने के कारण विख्यात थे। देवआनन्द को कुछ लोग छिपकली की तरह हिलने-डुलने वाला एक्टर मानकर खुश होते थे तो कुछ लोग उनकी हूं... हां मैं देवानंद हूं कहने वाले अन्दाज से प्रसन्न हो जाया करते थे। राजेंद्रकुमार को लोग दिलीपकुमार के पाकेट एडीशन के रूप में देखते रहे हैं तो धर्मेंद्र को हीमैन के तौर पर। अभिताभ एंग्रीएंग मैन थे तो जितेंद्र जंपिग मास्टर।

कुल मिलाकर पचास से लेकर अस्सी के दशक के तमाम फिल्म अभिनेताओं ने अपनी शैली और अपनी अदाओं को विकसित करने का काम किया। इन्हीं अदाओं और अन्दाज की वजह से वे एक्टर याद भी किए जाते हैं। सेक्स-सौंदर्य और भावनाओं के कुशल चितेरे के तौर पर जब भी कोई फिल्मी सेमिनार होता है तो लोग सबसे पहले  राजकपूर को याद करते हैं। अभिनय क्षमता को लेकर जब भी कोई कार्यशाला लगती है तो दिलीपकुमार की मिसाल सबसे पहले दी जाती है। इसी तरह जब भी 15 अगस्त और 26 जनवरी का दिन आता है तो लोग-मेरे देश की धरती सोना उगले-उगले हीरे मोती गाना पसन्द करते हैं। यह फिल्म उपकार का गीत है। इस फिल्म में मनोजकुमार ने कई बार अपने चेहरे अपने हाथों से छिपाया है। रोटी-कपड़ा और मकान में तो वे खूबसूरत जीनत अमान को पानी में हाय-हाय ये मजबूरी ये मौसम और ये दूरी गाते हुए देखना भी बर्दाश्त नहीं कर पाएं। पहचान, बेईमान, दस नंबरी, क्रांति, कलयुग की रामायण और क्लर्क सहित न जाने कितनी फिल्मों में उन्होंने अपने चेहरे को जमाने से इस तरह से छिपाने का प्रयास किया है जैसे यह पृथ्वी पापियों का पाप ढोते-ढोते थक गई है। उनके इसी प्रयास का शाहरूख खान की फिल्म ओम शांति ओम में जबरदस्त माखौल भी बनाया गया था। बाद में यह विवाद शाहरूख के माफी मांगने के बाद ही समाप्त हुआ।

यदि पाठकों के पास मनोजकुमार के चेहरा छिपाने वाले मामले में कोई नई जानकारी है तो वे जरूर लिखें। वैसे एक बात सही है कि मनोजकुमार ने तो फिल्मों में चेहरा छिपाया... कई लोग तो यूं भी अपना चेहरा छिपा लेते हैं। कुछ शर्माकर तो कुछ दुनिया से घबराकर। ब्लागजगत में कुछ लोग हैं जो बुर्का पहनकर लिखते हैं। घबराकर टिप्पणी के दरवाजे पर अपना हाथ रख देते हैं। क्या ऐसे लोग मनोजकुमार है। नहीं... मनोज कुमार तो बहुत अच्छे एक्टर का नाम है

Saturday, April 24, 2010

झूठ-फरेब और धोखे के लिए तैयार रहो

दुनिया में यदि मजबूती से खड़ा होना है तो यह जरूरी है कि आप धोखा खाना सीख जाएं। जब तक आप धोखा नहीं खाएंगे, झूठ और फरेब के शिकार नहीं होंगे तब तक आपको अपनी मंजिल भी नहीं मिलने वाली । धोखे-फरेब और झूठ से कुछ समय के लिए आप परेशान तो हो सकते हैं लेकिन यदि आप अपनी प्रतिभा और अपने सत्य के साथ अडिग है तो यह तय है कि पराजित नहीं हो सकते।

ऊपर कोड की गई जिन महत्वपूर्ण लाइनों को आप पढ़ रहे हैं वह किसी दार्शनिक की है। यह दार्शनिक कौन है यह पक्के में नहीं बता पाऊंगा लेकिन मुझे लगता है कि दार्शनिक महोदय ने सही ही फरमाया है... और हां दार्शनिक ने किताब में यह भी फरमाया है कि चरित्र से कमजोर, लंपट और प्रगति की सीढ़ी पर ऐन-केन-प्रकारेण दूसरों को धकेलते हुए आगे बढ़ने के आकांक्षी लोग धोखा देने में माहिर होते हैं।

मेरे कई व्यवसायी मित्र है जो हर रोज इस बात का रोना रोते रहते हैं कि अमुक जगह अपने ड्राइवर के साथ लोहा लेकर भेजा था लेकिन ड्राइवर ट्रक के साथ ही गायब हो गया। दो-चार दिनों के बाद मैं देखता हूं कि दोस्त फिर किसी नए धोखे के लिए तैयार हो जाते हैं। जब मैं उनसे पूछता हूं कि भाई ऐसा क्या है कि फर्क  नहीं पड़ता। वे हंसते हुए कहते हैं कि यदि एक धोखे के पीछे रोते रहेंगे तो कर चुके काम। बस धोखे से संभल जाते हैं। कोशिश करते हैं कि दोबारा धोखा न मिले। धोखे ने मेरे कई दोस्तों को मजबूत बना डाला है। मेरे मित्र गोपालदास ने अपने आपको स्थापित करने के लिए जीवन में कई तरह के पापड़ बेले। एक से बढ़कर एक लोगों ने गोपालदास को मूर्ख और न जाने क्या समझते हुए टोपी पहनाने की कोशिश की। गोपालदास ने कभी जमीन के धंधे में कदम रखा तो कभी अखबार के धंधे में। हर तरफ से.... हूं.. गोपालदास जैसा तिरस्कार का भाव मिलने के बाद जब मित्र ने सारे धोखों को गेंद समझकर लात जमाई तो आज उसने तरक्की कर ली है। मित्र का कारोबार आज रायपुर में ही नहीं बल्कि दूसरे प्रांतों में भी फल-फूल रहा है। धोखा खाकर तैयार हुए अपने मित्रों की सफलता देखकर लगता है कि वास्तव में धोखा शायद निर्माण का दूसरा नाम ही है। पर जरा यह भी सोचिए कि धोखा खाने वाला दूसरों को धोखा दे सकता है क्या।

बहरहाल इस चित्र को देखिए और सोचिए कि इसमें कौन किसकों धोखा दे रहा है। हो सकता है कि लड़की अपने प्रेमी को धोखा दे रही हो। हो सकता है कि दोस्त अपने दोस्त के साथ दोस्त-दोस्त न रहा वाले अन्दाज में धोखाधड़ी कर रहा हो। यह भी हो सकता है कि लड़की दोनों लड़कों के साथ खेल रही हो। यह भी तो हो सकता है कि दोनों लड़के किसी छत्तीसगढ़ी फिल्म की हिरोइन को ऊर्जा पार्क लेकर पहुंचे हो और लड़की दोनों लड़कों के साथ बारी-बारी से बैठने का वादा करके  साथ आई हो। यह भी तो हो सकता है कि लड़की यह समझ रही हो कि जिस लड़के गले में हाथ डालने की अनुमति दी है वह हाथ भी उसी लड़के का है। यह भी तो हो सकता है कि फोटोग्राफर ने पाठकों को धोखा देने के लिए एक प्रायोजित फोटो तैयार की हो। ( पाठकों को बता दूं कि टीवी के क्षेत्र में यह घिनौनी हरकत हर रोज होती है। यानी आदमी जो बोलता नहीं है वह बोलते हुए दिखता है। कई बार तो मुंह में पट्टी बांधकर मलखान डकैत का बाइट देने वाले भी टीवी के पत्रकार ही होते हैं)

कुछ भी हो सकता है... क्योंकि कई बार नहीं बल्कि अक्सर यह होता है कि आंख जो कुछ देख रही होती है वास्तव में वह वो नहीं देख रही होती जो उसे देखना चाहिए। धोखा खूबसूरत भी हो सकता है और बद्सूरत भी। आप किस तरह के धोखा खाने के आदी है यह आपको तय करना है। खूबसूरत धोखा आपकी नींद उड़ा सकता है और बदसूरत धोखे से आप जिन्दगी को करीब से देखना सीख जाते हैं और गाने लग जाते हैं- देखा है जिन्दगी को कुछ इतना करीब से, चेहरे तमाम लगने है अजीब से।   

Wednesday, April 21, 2010

डरो मत शास्त्री जी लौन्डे का मुकाबला करो

शास्त्री जी मैं तो आपके सामने अभी लौन्डा ही हूं। क्षमा करेंगे पाठकों लौन्डे शब्द से शास्त्री जी को परहेज है। बच्चा लिखूंगा तो शायद वे गदगद हो जाएंगे, क्योंकि सामन्तवादी सोच श्री शास्त्री जी के भीतर एक रसायन की तरह काम करते रहती है। वे हमेशा सम्मान के पक्षधर रहते हैं लेकिन जो लोग गलती से भी शास्त्री के आगे जी लगाना भूल जाते हैं तो उन्हें लगता है कि उनका सम्मान नहीं किया जा रहा है फिर वे उनसे खफा हो जाते हैं। बदला लेने पर उतारू हो जाते हैं। श्रीमान शास्त्री जी कभी नहीं चाहते हैं कि कोई नौजवान उनसे टकराएं और उन्हें पुरातनपंथी साबित करने की कोशिश करें।

अरे भाई मैंने कौन सी गलत बात कह दी थी। मैंने तो सिर्फ इतना ही कहा था कि जो लोग लिंक देकर चिट्ठा चर्चा कर रहे हैं उन्हें अपने चर्चा की थोड़ी स्टाइल बदलनी चाहिए। पाठक चिट्ठा चर्चा में दी गई पोस्टों को क्यों पढ़े यह बताने से अच्छा लगेगा लेकिन श्रीमान शास्त्री जी पिल पड़े। उन्होंने मुझे अपनी भाषा में अराजक और न जाने क्या-क्या कहने की कोशिश की। मेरी भाषा को खतरनाक और भयावह बताने का प्रयास हुआ। यह अलग बात है कि मैंने भी उन्हें सरल हिन्दी में समझाने का प्रयास किया लेकिन अंग्रेजों के जमाने का घी-तेल खाने वाले वयोवृद्ध नहीं माने।

मेरी टिप्पणियों के कुछ देर बाद ही उन्होंने एक बार फिर छायावादी युग में प्रवेश करते हुए घटिया सी कविता लिखी है और कोरी भावुकता के खंबे पर चढ़कर यह घोषणा कर डाली कि वे अपने दो ब्लाग नन्हे सुमन और चर्चा मंच को छोड़कर सभी ब्लागों की टिप्पणियों का खिड़की- दरवाजा बंद करने जा रहे हैं। उनकी इस तरह की घोषणा से मुझे अचरज हुआ क्योंकि मैंने तो उन्हें अपनी फोटो पर सूखी माला डालकर ब्लागिंग या टिप्पणी के लेने-देने वाले झमेले से अलविदा कहने के लिए नहीं कहा था। कुछ देर बाद जब मैं एक बार फिर चर्चामंच पर गया तो पता चला कि श्रीमान शास्त्री जी ने अपने एक शुभचिन्तक की सलाह पर मेरी टिप्पणियों को हटा दिया है। मुझसे उन्होंने दोपहर में वादा किया था कि वे मेरी तमाम टिप्पणी को जस का तस इसलिए रख रहे हैं ताकि लोगों को मेरी सोच का पता चल सकें। लेकिन अफसोस वे अपने वादे पर कायम नहीं रह सकें। सीधे-सीधे कहूं तो वे मेरी सोच से कहीं डर गए। हमारा तो मानना है कि ब्लाग वही लिखता है जो सार्वजनिक जीवन को जीता है। सार्वजनिक जीवन जीने वाले लोगों को आलोचना से घबराना नहीं चाहिए।  

जो पाठक इस विवाद से पहली बार स्वयं को जोड़ रहे हैं मैं उन्हें बता देना चाहता हूं कि मैने सिर्फ लिंक देकर पोस्टों की चर्चा किए जाने पर अपनी असहमति जताई थी। मेरा अब भी मानना है कि यदि हम पाठकों को यह बताएंगे कि पोस्ट की विशेषता क्या है और उसे क्यों पढ़ना जरूरी है तो शायद पाठकों के साथ न्याय कर पाएंगे। इसमे बुरा मानने जैसी कोई बात नहीं है।

शास्त्री जी को मेरी इस बात में कोई साजिश दिखाई दी। लगे गरियाने। कुछ अच्छे दिल के लोगों ने भी अपनी भंडास निकाली। बहरहाल कुछ समय पहले तक मुझे लग रहा था कि मैं अपनी ओर से सारे विवादों को खत्म कर दूंगा लेकिन शास्त्री जी की टिप्पणियों से पलायन करने की घोषणा ने मुझे मजबूर कर दिया है कि अब मैं उनसे ठीक-ठाक तरीके से बातचीत कर ही लृं। मैं अब उन्हें आसानी से भागने नहीं दूंगा। विवादों को हाल फिलहाल खत्म करने का मेरा कोई इरादा नहीं है। बाबा शास्त्री जी पलायन करने का काम तो सबसे आसान होता है। भागो मत शास्त्री जी अभी हमें दुनिया को बदलना है। किसी ने कहा भी है-भागो मत दुनिया को बदलो। यह दुनिया तभी बदलेगी जब मैं आपको बदल पाऊंगा और आप मुझे बदल पाएंगे। क्या आपको नहीं लगता है कि आपके और मेरे बीच जो उम्र का अन्तर है इस बार हम अपने पाठकों को यह बताएंगे कि अनुभव किस चीज का नाम है और जोश किसे कहते हैं। शास्त्री जी बहस को चलने दीजिए कोई न कोई रास्ता जरूर निकलेगा।

बीच बहस में महिलाओं और बच्चों को छोड़कर जो कोई भी आएगा हम उसे जवाब देंगे। अपनी भाषा आप रखें और मुझे मेरी भाषा में बोलने दें। आपको लगता है कि मेरी भाषा में कही से गाली-गुफ्तार की गंध आ जाती है तो मैं आपसे वादा करता हूं कि आप जितनी शुद्ध हिन्दी में तर्क पसन्द करेंगे मैं उतनी ही पारम्परिक हिन्दी में आपसे बातचीत करूंगा। शास्त्री जी भागिए मत। लौन्डे.... क्षमा करिएगा बच्चे का मुकाबला करिए। आपने यदि महिलाओं, बच्चों और शुभचिन्तकों की आड़ लेकर बचने का कोई बहाना बनाया तो मैं समझूंगा कि आप डर गए हैं। शास्त्री जी आप आगे बढिए। हे शास्त्री जी आपकी जय हो सदा विजय हो... आपके विशाल नभ में सुख सूर्य का उदय हो। जब तक सूरज-चांद रहेगा शास्त्री जी का नाम रहेगा। जय हो... जय हो शास्त्री जी। शास्त्री जी मैं आपको कोई चने के झाड़ पर चढ़ा नहीं रहा हूं। लीजिए फिल्म करते हैं-
वाह-वाह प्रोडक्शन प्रस्तुत करता है शास्त्री और सोनी का मुकाबला....
( टीप-महिलाओं और बच्चों से अनुरोध है कि वे इस मुकाबले को दूर से ही देंखे... क्योंकि इस मुकाबले के एक पक्ष यानी मेरी फितरत है कि मैं महिलाओं और बच्चों का न कभी बुरा चाहता हूं न उनके बारे कभी बुरा सोचता हूं)
पाठकों मैं तो तैयार हूं अब शास्त्री जी को सोचना है कि उन्हें क्या करना है। आज सुबह बुधवार 21 अप्रैल को मैंने शास्त्री जी के चर्चा मंच उच्चारण पर वैसे तो चार-पांच टिप्पणी की थी लेकिन मेरे पास एक सुरक्षित रह पाई है शेष टिप्पणियों का स्क्रीन शाट शास्त्री जी के पास है कृपया उनसे पूछ लेंगे कि मैंने क्या लिखा था)
बहरहाल जो टिप्पणी प्रकाशित की गई उसका एक अंश इस प्रकार है-

श्रीमान शास्त्री जी,
आशा है आप स्वस्थ व सानंद होंगे। सबसे पहले तो मैं आपसे इस बात के लिए क्षमा मांगता हूं कि मुझे आपकी उम्र का ध्यान रखकर ही कुछ लिखना चाहिए था। जिस उम्र में आप हैं वहां तरह-तरह की बीमारियां घेरे रहती हैं। कई बार टिप्पणी से ब्लड प्रेशर या शुगर भी बढ़ जाता है। मुझे यह हक किसी ने नहीं दिया कि मैं अपनी टिप्पणियों से किसी को बीमारी दूं या फिर उसकी पुरानी बीमारी को उभारने का काम करूं। बहरहाल जिस तरह से आपने मेरी पिछली टिप्पणी को सम्मान दिया है उसके लिए मैं आपका हृदय से आभारी हूं। अन्यथा मुझे यह लग रहा था कि आप टिप्पणी को हटा देंगे। लेकिन मैं टिप्पणी हटा देता लिखकर आपने यह तो बता ही दिया है कि जो टिप्पणी आपके भीतर पहुंचकर वाह-वाह प्रोडक्शन का रूप धारण नहीं कर लेती है उसके साथ आपका व्यवहार ठीक नहीं रहता है। महोदय, मुझे लगता है कि यह ठीक नहीं है... सहमति-असहमति होते रहती है। बहस से लोकतंत्र में बेहतर रास्तों की तलाश आसान हो जाती है।
आपने अपने आपको छोटे दिमाग का लिखकर मुझे महान बनाने की नाहक ही चेष्टा की है। मैं पूरी विन्रमता के साथ स्वीकारता हूं कि आपका अनुभव मुझसे ज्यादा है। आपने दुनिया देखी है। और फिर आप इस दुनिया में मुझसे पहले भी आएं है। जब आप आएं थे तब छोटे किसी बड़ो से मुंह नहीं लड़ाते थे। चार आने में एक किलो घी मिलता था। आप लोग पुराने समय मे मिलने वाला घी-दूध खाकर बैठे हुए लोग हैं इसलिए कोई माने या न माने मैं मानता हूं कि आप तीक्ष्ण बुद्धि के मालिक है, तभी तो आपने बात को एक नया टर्न देने की कोशिश की है। आपने अपने साथ उन पोस्ट लिखने वालों को भी जोड़ने का उपक्रम कर लिया है जिनकी लिंक आपने अपनी चर्चा में दी है। यदि पोस्ट लिखने वाले मेरी टिप्पणी को गंभीरता से पढ़ेंगे तो पाएंगे कि मैंने उसमे साफ कहा है कि मैं किसी पोस्ट लिखने वाले की अवमानना करने के लिए यह नहीं लिख रहा हूं। लेकिन आपको लगता है कि आप लोगों को उकसा सकते हैं तो उकसा रहे हैं।
आपने  मेरी भाषा को लेकर भी परहेज किया है। यदि लोगों को गदहापचीसी में फंसाने का स्वांग रचने वाले लोगों को मेरी भाषा अच्छी नहीं लगती तो इसमें मेरा क्या दोष। यह सौ फीसदी सच है कि बहुत से आड़े-तेड़े लोगों के लिए मेरी भाषा जुलाब का काम करती है। मुझे अपनी मातृभाषा हिन्दी पर गर्व है और जहां तक मैं समझता हूं कि मैंने हिन्दी में कुछ लिखा है। मान्यवर कोई भाषा तीखी नहीं होती... तीखा तेवर होता है। आपको मेरे तेवर पर एतराज करना चाहिए था लेकिन क्या करें आपने अग्रेंजों के जमाने का घी-दूध खाया-पीया है इसलिए मन ही मन में अंग्रेजी को सम्मान देने की परम्परा आप भूले नहीं हैं। वैसे आपने मेरी टिप्पणियों में कहीं से अपने उपयोग के लिए अमृत की तलाश कर ली है उसके लिए आपको बधाई। सही मायनों में आपको अमृत की जरूरत भी है। मैंने पहले भी स्पष्ट किया था कि मैं यह बात अपनी पोस्ट को  चर्चा में शामिल करने के लिहाज से नहीं लिख रहा हूं। मैंने अभी दो दिन पहले ही चिट्ठा चर्चा करने वाले नामवर शीर्षक से एक पोस्ट लिखी है (आप इस पर  मैं 12 हजार चिट्ठों में किस-किस को पढूं लिखकर मेरा मजाक उड़ाते हुए आत्ममुग्ध तरीके से रूह आफजा पीकर अपनी भटकती हुई रूह को आराम देने का काम कर सकते हैं) अपनी पोस्ट में मैंने यही सवाल उठाया था कि आखिर सिर्फ लिंक देने वाली चिट्ठा चर्चाओं का औचित्य क्या है। बहरहाल जो लोग आपको पढ़ते है आपको टिप्पणी देते हैं उनको बहुत-बहुत धन्यवाद। श्रीमानजी टिप्पणी देने वालों में आज से मैं भी तो शामिल हो न। इस उम्र में पहुंचने के बाद भी कोई...... आपका चेला नहीं बन पाया यह जानकार बहुत अच्छा लगा। आप सबको गुरू मानते हैं यह भी आपका बडप्पन ही है। इस बडप्पन के लिए एक बार फिर मैं आपकी वाह-वाह करता हूं। वाह-वाह शास्त्री जी वाह-वाह.....
इस टिप्पणी को प्रकाशित कर देंगे तो मैं समझूंगा कि आप सचमुच में बेहद महान किस्म के इंसान है। अन्यथा पिछली टिप्पणी के साथ इसे अपने ब्लाग में प्रकाशित कर सकूं इसकी अनुमति देंगे तो भी आपका महान मानते हुए आभारी रहूंगा।

  

Monday, April 19, 2010

कराटे और कराटे

यह किसी फिल्म का नाम भी हो सकता है लेकिन फिलहाल तो इस लेख का शीर्षक है। यह शीर्षक मैंने इसलिए रखा है क्योंकि एक समय था जब मैं बाबू मोशाय मिथुन चक्रवर्ती के कारण बिजली के खंबों, ईंट-गारे की पक्की दीवारों पर हूं-हां करते हुए कराटे का अभ्यास किया करता था। मुझसे न तो घर वालों ने कहा था कि कराटे सीखूं और न ही मुझे अपनी इज्जत के लुट जाने का डर था लेकिन कराटे के प्रति मेरे आकर्षण की एक वजह यह भी थी कि रवि नगाइच की फिल्म सुरक्षा में मिथुन ने जबरदस्त ढंग से हूं-हां- भूं-भां की थी। मिथुन दा की भूं-भां वाली अदा को देखकर मैं इस बात के लिए आश्वस्त हो गया था कि आदमी यदि सही ढंग से हवा में भी हाथ-पांव चलाए तो अपनी रक्षा कर ही सकता है। मैं कराटे इसलिए भी सीखने लग गया था क्योंकि मुझे लगता था कि एक दिन मेरे मुहल्ले की कोई न कोई लड़की मुझसे यह शिकायत करेंगी कि अमुक लड़का उसे छेड़ता है तो मैं सरेआम उसकी धुनाई कर दूंगा लेकिन ऐसा अवसर कभी नहीं आया।

मुहल्ले में एक आशा नाम की लड़की थी। इस लड़की के सभी दीवाने थे। देर रात पुलियों पर बैठकर संगीत का लुत्फ उठाने वाले की टोली जब एकत्र होती थी तो हम सबके बीच अपने आप को नौजवान समझकर पहुंचने वाले एक महोदय अक्सर गुनागुना दिए करते थे-
कौन है आशा नाम की लड़की पूछो यार मुहल्ले में।
अरे डाकिया लेकर घूम रहा है कब से तार मुहल्ले में।

आशा नाम की यह लड़की मुझे भी अच्छी ही लगती थी और मुझे उम्मीद थी कि एक न दिन लड़की मुझसे कराटे की सेवाएं लेगी और कहेंगी कि अमुक छेड़ता है उसकी ठुकाई करनी है, लेकिन ऐसा नहीं हो पाया। एक दिन मैंने ही उससे हिम्मत जुटाकर कह दिया कि- आशा तुम्हे किसी से कोई परेशानी होगी तो बताना.. मैं ठीक कर दूंगा। इस अप्रत्याशित से निवेदन के बाद आशा ने भी पलटकर जवाब दिया- क्या ठीक कर लेगा। क्या तू बाक्सिंग जानता हैं। मैंने उसे बताया कि मैं कराटे सीख रहा हूं तो उसने मुझे हिकारत की नजरों से देखा और फिर कहा जा पहले चार पांच ईंटा तोड़कर बता।

आशा की बातों को मैंने एक चुनौती के तौर पर लिया और अपने एक मित्र रवि नेपाली से कहा कि वह मुझे ईंटा तोड़ने की कला सीखा दें। नेपाली भी मेरे साथ हवा में कराटे का अभ्यास किया करता था। उसने ईंटों को इन्तजाम तो कर दिया लेकिन ईंटों को तोड़ने के चक्कर में मैं अपना हाथ सूजा बैठा। बाद में पता चला कि वह फैक्चर हो गया है।

हाथ के फैक्चर हो जाने के बाद भी मैंने कराटे के प्रति सम्मान का भाव इसलिए रखा क्योंकि जब आशा को यह पता चला कि उसके कहने पर मैं हाथ तुड़वा बैठा हूं तो वह बहुत भावुक हो गई थी। मुझे लगने लगा था कि मेरा काम बन जाएगा और आशा कहेंगी-ये क्या किया तुमने। क्या तुम सचमुच मुझे इतना चाहते हो, लेकिन पता चला कि उसकी भावुकता की वजह कुछ और ही है। दरअसल आशा भी जब छोटी थी तब एक बार आचार चुराने के चक्कर में अपना हाथ तुड़वा बैठी थी। उसे टूटे हुए हाथ की तकलीफ पता थी और उससे कहीं ज्यादा प्लास्टर चढ़े हाथ पर खुजली की तकलीफ का अहसास था।


जब मैं ब्यावरा इटारसी में देशबन्धु अखबार का ब्यूरो प्रमुख था तब भी कराटे वाले से मेरी अच्छी-खासी दोस्ती हो गई थी। इस मित्र ने भी एक दिन मुसीबत के दौरान मेरी मदद की। बाद में जब मैं दुर्ग चला आया तब कराटे के जानकार एक मित्र के साथ मेरा लंबा और अच्छा वक्त गुजरा। मेरा मित्र दिन में तो बच्चों को कराटे सीखता था लेकिन शाम होते ही मेरे साथ हमप्याला हो जाया करता था। अब तो मैंने भी छोड़ रखी है और मित्र ने भी त्याग दिया है। कराटे के बारे में मुझे एक रोचक प्रसंग और याद आ रहा है। मेरा एक रंगकर्मी मित्र कौशल गले को खोलने के लिए भिलाई के जयंती स्टेडियम में अभ्यास किया करता था। जिस स्टेडियम में रंगकर्मी मित्र अभ्यास किया करता था उसी स्टेडियम में कुछ कराटे वाले भी अपना अभ्यास किया करते थे। रंगकर्मी मित्र सीढ़ियों पर खड़े होकर हो-हो- हो-हो चिल्ताता था तो कराटेबाज लोग मैदान में हूं-हां किया करते थे। एक दिन कराटे सीखने वालों को लगा कि हो न हो साला.. अमुक आदमी हर रोज हमें चिढ़ाने का काम करता है। बस फिर क्या था एक दिन चारों ओर से हूं-हां हुई और मित्र को लालपीला कर दिया गया। थियेटर के लिए आवाज को ठीक-ठाक करने का अभ्यास करने गया मित्र आवाज निकालने लायक नहीं रह गया था।

कराटे के प्रति मेरे मन मे सम्मान तब घटा जब एक रोज मेरी जानकारी में आया कि अपनी आत्मरक्षा के लिए कराटे सीखने गई एक लड़की से कराटे सीखने वाले लड़कों ने ही जबरदस्ती की है। इस घटना के बाद मैं काफी दिनों तक विचलित रहा और सोचता रहा कि क्या वाकई कराटे के जरिए आत्मरक्षा हो सकती है। क्या कराटे किसी लड़की की इज्जत को लूटने से बचाने की कला का नाम है। देश में हर रोज सैकड़ो लड़कियां छिलटों और गुंडों की हवस का शिकार बन जाती है। उस दौरान कोई कराटेबाज फूं-फां- हूं-हां करने नहीं पहुंचता है, क्यों।

Sunday, April 18, 2010

चिट्ठा चर्चा करने वाले नामवर सिंह

दोस्तों मैं पिछले कुछ समय से लगातार देख रहा हूं कि चिट्ठा चर्चा करने के नाम पर ब्लाग जगत में एक से बढ़कर एक नामवर सिंह पैदा हो गए हैं। अरे भाई... नामवर सिंह को तो जानते हो न। वही नामवर सिंह जिनकी रोजी-रोटी आलोचना करने के नाम पर ही चलती रही है। यानी किसी भी एक दिन यदि उन्होंने किसी लेखक या किसी विषय पर कुछ नहीं बोला( नामवर सिंह लिखते कम है बोलते अधिक है) तो समझिए उन्हें अपना हाजमा ठीक करने के लिए झंडु पंचारिष्ट पीना पड़ सकता है। नामवर सिंह को बोलने की बीमारी ने घेर रखा है।

 नामवर सिंह के बारे में एक बात विख्यात है कि वे जिस किसी के कंधे पर हाथ रख देते हैं वह महान लेखक हो जाता है भले ही साला गदहे का बच्चा लेखक हो या न हो। मित्रों एक बार जब भिलाई छत्तीसगढ़ के अग्रसेन भवन में प्रगतिशील लेखक संघ का आयोजन हुआ तो भोजन करते-करते टेंट वाला यह पूछने आ गया कि भाई साहब कुर्सी कहां रखनी है। नामवर सिंह ने तुरंत ही उसके कंधे पर हाथ रखा और पूछ लिया कि दिनभर में कितना कमा लेते हो। टेंट वाले ने बताया अपन कमाते नहीं अपन तो टेंटहाउस के मालिक है। मैं तो पूछ रहा हूं कि कुर्सी कहां रखनी है। नामवर ने फिर कहा कि भले ही मालिक हो लेकिन यह बताओ कि आज मौजूदा समय में टेंट का व्यवसाय किस दशा में गुजर रहा है। टेंट वाले को कुछ समझ में नहीं आया उसने पूछा-आप कहना क्या चाहते हो। लेखक होने का प्रमाण पत्र लेन के लिए आसपास खड़े लेखकों ने टेंटवाले को बताया कि बेटा तुमसे जो बात कर रहे है जानते हो वह कौन है। नामवरजी है नामवर...

टेंटवाला सहम तो गया लेकिन वह एक कोने में जले हुए उस कनात को भी देखने लगा जिस पर कुछ देर पहले ही किसी लेखक ने सिगरेट फेंकी थी। नामवर ने उसे सलाह दी, भले ही कुछ करो या न करो.. समय मिले तो एक कहानी या कविता अथवा कुछ नहीं तो डायरी जरूर लिखा करो। मजदूरों या श्रमिकों के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह होती है कि वे जानते सब कुछ है लेकिन लिखते कुछ नहीं। जिस दिन मजदूर कुदाल के साथ कलम उठा लेगा समझो उस दिन दुनिया में क्रांति आ जाएगी।

कुछ दिनों बाद टेंट वाला सरकार के नाम एक ज्ञापन बनाकर कलेक्टर से मिलने चला गया। बाद में पता चला कि टेंट वाले ने कहानी लिखने की प्रारंभ कर दी है। इस तरह से नामवर सिंह ने एक टेंट वाले को लेखक बना दिया। यह बात सौ फीसदी सत्य है कि जो लोग नामवर सिंह के पट्ठे रहे हैं उन्हें स्थापित करने में नामवर सिंह ने पूरी ताकत लगाई है। मैं यह तो नहीं जानता कि कौन-कौन सी पीठों में उनके लोग फिट है लेकिन जैसा कि लोग बताते हैं उसके मुताबिक प्रगतिशील लेखक संघ और उससे जुड़कर शिवसैनिक सा तेवर रखने वाले लेखकों को नामवर ने काफी प्रोत्साहन देने का काम किया है। आज प्रगतिशील लेखक संघ में जो भी धर्म की ध्वजा उठाने वाले लोग बचे है उसके पीछे नामवरसिंह का बड़ा योगदान माना जाता है।

ब्लाग जगत के नामवर भी कुछ ऐसा ही कर रहे हैं। साहित्य जगत के नामवर के पास तो एक भाषा है, समझ है और उससे कहीं ज्यादा सभी सरकारों से संतुलन बिठाकर बयान जारी करने की समझदारी भी है लेकिन ब्लाग जगत के मूर्ख नामवरों को यह नहीं मालूम कि चिट्ठा चर्चा का मतलब क्या होता है। केवल किसी के ब्लाग से किसी की पोस्ट को उठाकर अपनी पोस्ट में रख देने मात्र से क्या कोई चर्चा पूरी हो जाती है। एक पोस्ट क्यों किस उदेश्य के तहत लिखी गई है जब तक कोई यह नहीं बताता.. ऐसी चर्चा को बकवास मानना ही ठीक होगा। मेरे एक मित्र गिरीश पंकज बहुत ही अच्छा लिखते हैं लेकिन मैं देखता हूं कि उनकी पोस्ट उस रैंक में नहीं आ पाती जिस रैंक में लौंडी-लफाडियों की पोस्ट आ जाया करती है। जिसे देखो वह प्रेम कविता पेलते रहता है और बिनाका गीत माला में पहले पायदान पर पहुंच जाता है। कई बार तो यह भी लगता है कि टिप्पणी करने वाले पूरी पोस्ट पढ़ते भी या नहीं। अरे भाई जब चिट्ठा चर्चा करने वाले नहीं पढ़ते तो फिर टिप्पणी करने वालों का क्या दोष।


तो ब्लाग जगत के नामवर सिंहों और बाद में पैदा हुए मैनेजर पांडेयों, परमानंद श्रीवास्तवों (सभी आलोचक) मेरा आपसे अनुरोध है कि अपनी चर्चा को चना-मुर्रा, मूंगफल्ली बनने से रोके। जो लोग गंभीर है उन्हें आपकी मूंगफल्ली को खाने का मन नहीं करता है। ब्लाग जगत में तरह-तरह की टंटपुजियागिरी देखकर तो कई बार यह लगता है कि मैं राजन-इकबाल सीरिज से उपन्यास लिखने वाले चुतियों के इलाके में कहीं आकर फंस तो नहीं गया हूं। 

Saturday, April 17, 2010

खुशखबरी... खुशखबरी... ललित शर्मा की वापसी

एक डाक्टर के अजीबो-गरीब तरह के ट्रीटमेंट के बाद ब्लाग की दुनिया को अलविदा कहने वाले ललित शर्मा इसी हफ्ते बुधवार से लिखते-पढ़ते, चिट्ठा चर्चा करते हुए नजर आएंगे। जाहिर सी बात है जो लोग ललित शर्मा को बेहद चाहते हैं उन्हें यह खबर पढ़कर बेहद खुशी होगी लेकिन जो लोग ललित शर्मा से बिना किसी कारण के नफरत करते रहे हैं, करते हैं उन्हें यह खबर थोड़ा परेशान कर सकती है। जिन लोगों ने ललित शर्मा की फोटो पर सूखी हुई माला डाल रखी थी उन्हे अपनी दैनिक क्रिया को निपटाने में थोड़ी दिक्कत आ सकती है। इस दिक्कत का जिक्र मैं इसलिए कर रहा हूं क्योंकि मेरा यह अनुभव रहा है कि जो लोग दूसरों का बुरा सोचने का काम करते हैं उनका बुरा सोचने के लिए कोई न कोई अवतरित हो ही जाता है। कहते हैं कि जो लोग दूसरों के लिए गढ्ढा खोदते हैं वे सबसे पहले उसी गढ़्ढे में गिरते हैं। इस बात को मैं थोड़ा नए अन्दाज में कहूं तो कई बार जिन्दा आदमी को भूत समझकर अगरबत्ती खोंसने वाले बाजार में अगरबत्ती का पूड़ा बेचते हुए मिल जाते हैं।

मित्रों आज से कुछ अरसा पहले जब दिलीप कुमार रोने-धोने का रोल करते हुए बीमार पड़ने लगे थे तब डाक्टरों ने उन्हें सलाह दी थी कि वे विविधता लाने के लिए थोड़ा हंसने-हंसाने वाला रोल भी करें। डाक्टरों ने उन्हें कभी यह सलाह नहीं दी कि यूसुफ साहब अब रोल ही मत करिएगा वरना काम तमाम हो जाएगा। एक लिखने-पढ़ने वाले आदमी से कोई किसी भी शैली में यह कहेगा कि भाई तुम अब लिखना-पढ़ना मत तो  अपना दिल तो नहीं मानता है कि यह ट्रीटमेंट है। मैं इसके बहुत ज्यादा विस्तार में जाना तो नहीं चाहता लेकिन ब्लागरों के बीच जो चर्चा है उस पर यदि भरोसा करें तो पता चलता है कि हमारे मित्र किसी फुरसतिया की साजिश का शिकार हो गए हैं। बताते हैं कि फुरसतिया ने अपने एजेंटों के माध्यम से ललित शर्मा का काम लगाने की पूरी योजना बनाई थी। अब इसी बात मे कितनी सच्चाई है यह तो फुरसतिया और सुरसतिया ही बता सकते हैं। मैं सिर्फ इतना जानता हूं कि ललित ने मेरे अलावा श्याम कोरी उदय और जीके अवधिया जी से भी यह वादा किया है कि वह ब्लाग जगत में अपनी वापसी कर रहा हैं।
इस पोस्ट के माध्यम से मेरा आप सबसे अनुरोध है कि हम सब भाई ललित शर्मा की वापसी का स्वागत करें। क्या आपको नहीं लगता कि हम एक बार फिर एक जिन्दादिल इंसान को अपने बीच पाकर खुश होंगे। विचार की दुनिया में यदि हम हें तो सहमति-असहमति बनती रहनी चाहिए। सहमति-असहमति का क्लाइमेक्स इतना खतरनाक तो नहीं होना चाहिए कि एक आदमी अपनी रचनात्मकता को खूंटी पर टांग कर यह कसम खा लें कि वह फिर कभी नहीं लिखेगा। दोस्तों मेरा मानना है कि जो आदमी नफरत फैलाने की चेष्टा करता है विरोध उसका होना चाहिए। दवा का छिड़काव हमेशा उस खेत में ही किया जाना चाहिए जहां नफरत के बीज बोएं जाते हैं। यदि समय रहते इन बीजों को मारा नहीं गया तो खेतों से बंदूकों की फसलें उगना तय हैं। यही बंदूके एक दिन हम अपने साथियों के ऊपर तान देंगे।
जिन पाठकों को यह सूचना अच्छी लगी वे अपनी टिप्पणी दे सकते हैं और जिनको बुरी लगे वे फर्जी आईडी मसलन तहसीलदार, बंदर की औलाद, माचो, पहरेदार आदि बनकर भी अपना गुस्सा उतार सकते हैं।

टकला शेट्टी

क्या आप टकला शेट्टी को जानते हैं। जरूर जानते होंगे क्योंकि कई फिल्मों में उसने अपनी खतरनाक आंखों से न केवल हिरोइनों वरन हीरो को भी घूरते हुए चुनौती देने का काम किया है। एक जनवरी 1938 को जन्मे टकला शेट्टी का पूरा नाम एमबी शेट्टी यानी मुद्या शेट्टी था। टकला शेट्टी अब इस दुनिया में है या नहीं इसकी मुझे जानकारी नहीं है लेकिन दुर्भाग्य है कि नेट पर उनके बारे में कोई ठोस जानकारी उपलब्ध नहीं है, और तो और उनके दो लड़कों रोहित शेट्टी और हृदय शेट्टी ( ये वही है जिन्होंने गोलमाल, जमीन, प्लान प्यार में टिवस्ट जैसी फिल्में बनाई है)  ने भी अपने पिता के प्रचार-प्रसार व उनसे जुड़ी चीजों को सहेजने को लेकर कोई ध्यान नहीं दिया है। नेट पर रोहित शेट्टी, हृदय शेट्टी, सुनील शेट्टी और दूधाधारी शिल्पा शेट्टी बारे में तो ढेरों जानकारी मिलती है, लेकिन टकला शेट्टी को लेकर कोई खास जानकारी उपलब्ध नहीं है।

पाठक सोच सकते हैं कि टकला शेट्टी में ऐसी क्या खास बात है जिसकी वजह से मैं फड़फड़ा रहा हूं। फड़फड़ाने वाली बात इसलिए हैं क्योकि छुटपन में शेट्टी ने मुझे बेहद खुशी देने का काम किया है। जब-जब शेट्टी धमेन्द्र या अभिताभ के सामने लोहे की छड़ लेकर खड़ा होता था तब-तब मैं घबरा जाता था। बाद में जब मेरा पंसदीदा हीरो शेट्टी को पीटकर जीत जाता था तो मुझे खुशी होती थी कि चलो अब आगे की लड़ाई सरल हो जाएगी। सचमुच यदि शेट्टी न होता तो मैं कभी नहीं जान पाता कि लोहे की छड़ को कैसे मोड़ा जाता है। जैकेट पर माचिस की तीली रगड़कर कैसे सिगरेट जलाई जाती है। कैसे घड़े को सिर से फोड़ा जाता है। कैसे अंगूठे से शराब की बोतल खोली जाती है।

शेट्टी ने बहुत सी असंभव चीजों को पर्दे पर संभव कर दिखाने का काम किया है। बचपन में जब कभी मैं अपने मित्रों से लड़ बैठता था तो उनकी धुनाई शेट्टी समझकर ही करता था। यह अलग बात है कि कई बार शेट्टी भी भारी पड़ जाते थे। शेट्टी ने हिन्दी फिल्मों को कोई योगदान दिया हो या न हो मुझे तो लड़ने का साहस जरूर दिया है। पिछले दो-चार महीनों से मेरा समय कुछ ठीक-ठाक नहीं चल रहा है। मैं लड़ना नहीं चाहता हूं लेकिन लोग आकर भिंड जाते हैं। जब भिंड जाते हैं तो फिर सामने वाला मुझे शेट्टी लगने लगता है। हर रोज अप्रत्यक्ष ढंग से शेट्टी दर्शन के चलते जब मैंने असली शेट्टी के बारे में जानने की चेष्टा की तो निराशा ही हाथ लगी।
नेट पर शेट्टी की लगभग 112 फिल्मों का उल्लेख तो है लेकिन किसी ने भी यह बताने का प्रयास नहीं किया है कि वे मूल रूप से कहां के रहने वाले थे। उनके घर में कौन-कौन था। उनका संघर्ष कैसे प्रारंभ हुआ। उन्हें पहली फिल्म कैसे मिली। फिल्मी दुनिया में कौन-कौन उनके करीबी थे। उनकी शादी किससे हुई थी। फाइट डायरेक्टर के तौर पर कैरियर प्रारंभ करने को लेकर उन्हें किससे प्रेरणा मिली थी आदि-आदि।


शेट्टी पर काम इसलिए भी जरूरी लगता है क्योंकि वह उसने उस दौर में फाइट मास्टर के तौर पर अपना काम प्रारंभ किया जब हीरो कम्पयूटर के भरोसे नहीं लड़ता था। साठ के दशक में हीरो के सामने या तो चीता होता था या फिर शेट्टी। सचमुच शेट्टी के फाइट के तौर-तरीकों को जानना बड़ा रोमांचक होगा। बहरहाल शेट्टी के बारे में जो जानकारी मेरे पास पहले से है वह आप तक शेयर कर रहा हूं। शेट्टी ने 1956 के आसपास अपने कैरियर की शुरुआत की थी। माना जाता है कि हीर नामक फिल्म में उन्होंने फाइट इंस्टक्टर के तौर पर काम किया था। तुमसा नहीं देखा में उन्हें भोला नाम का कैरेक्टर मिला था तो वर्ष 1958 में रिलीज हुई डिटेक्टिव नामक फिल्म में वे एक्शन कोडिनेटर व एक्टर दोनों थे। शेट्टी ने तेल मालिश बूट पालिश, जंगली, जब प्यार किसी से होता है, चाइना टाउन जैसी कई फिल्मे की। उनका सुनहरा दौर 1960 से 1980 के बीच का ही माना जाता है। इस दौर में उन्होंने नाइट इन लंदन, किस्मत, यकीन, कहानी किस्मत की, ईमानधरम, कब क्यों और कहां, यादों की बारात, विक्टोरिया नंबर दो सौ तीन, डान और त्रिशूल जैसी फिल्में की। सनी दयोल के पिता के साथ उन्होंने फाइटिंग के एक से बढ़कर एक दृश्य किए हैं। लेकिन अभिताभ के साथ त्रिशूल में उन्होंने जो माधव सिहं नामक गुंडे की भूमिका निभाई है वह अदभूत है। याद करिए वह दृश्य जब अभिताभ एक एम्बुलेंस लेकर बेशकीमती जमीन से माधव सिंह की सल्तनत को उखाड़ने के लिए उसके अड्डे पर पहुंचते हैं। अभिताभ और शेट्टी के बीच सलीम-जावेद ने कल शाम पांच बजे घर में घुसकर मारूंगा वाले अन्दाज में फाइटिंग करवाई है वह भुलाए नहीं भूलती। पहली बार रूपहले पर्दे पर दर्शकों को यह अहसास हुआ था कि वाकई गुंडो से घर या जमीन खाली करवाने के लिए एम्बुलेंस या बुलडोजर की जरूरत होती है। पहले चुनौती देनी पड़ती है फिर शाम के पांच बजे मां का दूध पीकर पहुंचना पड़ता है। लगभग पांच से सात मिनट के इस दृश्य को शेट्टी ने अपने अभिनय से जीवंत कर डाला था। डान के शाकाल को कौन भूल सकता है। बाद में यही शाकाल कुलभूषण खरबंदा के तौर पर हमें शान फिल्म में दिखाई देता है और फ्लाप हो जाता है।
पाठकों से अनुरोध है कि यदि शेट्टी के बारे में उनके पास कोई लेख या अन्य जानकारी उपलब्ध है तो वे मुझे जरूर अवगत कराएं।

Thursday, April 15, 2010

गुटखा चबाने वाले कुत्ते

सचमुच आदमी नाम का जानवर बहुत खतरनाक है। आदमी की संगत में रहकर जानवर भी अजीबो-गरीब हरकत करने लगता हैं। काफी समय पहले जब फिरोज खान की कुर्बानी नामक फिल्म आई थी तब एक समाचार पढ़ने को मिला था कि राजस्थान इलाके की एक गाय जब तक आप जैसा कोई मेरी जिन्दगी में आए जैसा गाना नहीं सुन लेती थी तब तक दूध नहीं देती थी। छत्तीसगढ़ के तालाबों में नहाने वाली एक भैंस के बारे में यह प्रचलित था कि उसे हर रोज अपने बदन पर शैम्पू मलवाना ही पसन्द था। जबकि राजधानी के रामकुंड इलाके का एक बंदर आम-जाम व संतरा खाने के लिए नहीं वरन् नड्डा खाने के लिए उत्पात मचाया करता था। गत कई दिनों से राजधानी के कुत्तों में एक अजीब किस्म की सनक देखने को मिली है। मरियल-हडियल व खुजली वाले कुत्ते आरएमडी व राजश्री गुटखों के खाली पाउचों के लिए हाय-हाय करते हुए दिखे हैं। आप सोच सकते हैं कि क्या कुत्तों पर मैं कोई शोध कर रहा हूं जिसकी वजह से मुझे इतनी जानकारी है।

कुत्तों की लाइफ स्टाइल पर किसी तरह का शोधकार्य करने का मेरा कोई इरादा नहीं है लेकिन आते-जाते जहां कहीं भी देखो कुत्ते खाली पाउचों के लिए झगड़ते हुए दिखते हैं। गुटखा चबाने वाले कुत्तों पर शोधकार्य करने के लिए स्वयंसेवी संस्थाओं से जुड़े लोग छत्तीसगढ़ आ सकते हैं। वैसे जब कभी भी हमने सड़क के बीचों बीच बैठी हुई गऊमाता को पालीथीन चबाते हुए देखा है तब-तब हमें बेहद दुख ही हुआ है। पालीथीन चबाने वाली गाय ने दूध देना भी इसलिए बंद किया है क्योंकि पालीथीन बहुत बड़ी रूकावट बनती रही है। मुझे गुटखा खाने वाले कुत्तों का भविष्य भी खतरे में दिखाई देता है। कुत्तों को नहीं मालूम है कि गुटखों की वजह से आदमी का मुंह ठीक से नहीं खुल पा रहा है। यदि कुत्तों ने भी उनकी गंदी आदत को अपना लिया तो वे भौकेंगे किस पर। अरे.. कुत्तों... आपका काम हर नए-पुराने चेहरे को देखकर भौंकना ही है चाहे वह आपको पसन्द हो या न हो। यदि यह काम भी आप लोग ठीक तरीके नहीं कर पाएंगे तो फिर समाज में आपकी महत्ता पूरी तरह से खत्म ही जाएंगी।
दुनिया एक पागलखाना है और इस पागलखाने में सबके काम बंटे हुए हैं। किसी को मेहनत करने की जवाबदारी मिली है तो किसी को उसकी मेहनत पर पानी फेरने का ठेका हासिल है। कोई दुनिया को खूबसूरत बनाने का स्वप्न देखना पंसद करता है तो किसी को उसके सपनों पर छुरा भोंकने की सुपारी मिली हुई है। कोई अंधेरी रातों में सुनसान राहों पर एक मसीहा निकलता है गाते-गाते अचानक जागते रहो चिल्लाने लगता है तो कोई जागते रहो बोलते-बोलते सो जाने के काम में लगा हुआ है।

समाज में कुत्तों को भी महत्वपूर्ण दायित्व मिला हुआ है। किसी कुत्ते को ईश्वर ने यह कहा है कि वह दिनभर प्रेस क्लब के आसपास ही मंडराता रहेगा तो किसी को यह जवाबदारी दी गई है कि वह काम करने वाले पत्रकार जब भी लौटेंगे तब-तब उन्हें दौड़ा-दौंडाकर काटेगा। कुछ समय पहले मेरे एक अत्यंत ही प्यारे मित्र ने कार भी इसलिए भी खरीदी ताकि वह कुत्तों से बच सकें। क्योंकि जब-जब वह मुफ्त की शराब डकारकर मोटर साइकिल पर घर लौटता था रास्ते में कालू-लालू उसका इन्तजार किया करते थे। कुत्तों से बचने के लिए मित्र ने कार तो खरीद ली लेकिन फिर भी जागरूक किस्म के कुत्तों ने उसे इंजेक्शन लेने के लायक बना ही दिया। हुआ यह कि मित्र तो कार के अंदर था लेकिन जब कार को मोड़ने की बारी आई तो मोटरसाइकिल में पड़ी हुई आदत की तरह उसने साइड लेने के लिए हाथ को बाहर निकाल लिया। बस फिर क्या था। हाथ बाहर निकला और लहूलुहान पाकिस्तान बनकर भीतर घुस गया।


राजधानी में जब सुनील सोनी महापौर थे तब उन्होंने कुत्तों का पंजीयन के साथ-साथ उनकी नसबंदी करने की योजना भी बनाई थी लेकिन दुर्भाग्य से न तो पंजीयन का काम आगे बढ़ पाया और न ही कुत्तों की नसबंदी हो पाई। अब राजधानी में कितने कुत्ते है इसका अन्दाजा लगाना कठिन है। आप जिस गली से भी गुजरेंगे कुत्ते आपको जरूर नजर आएंगे। गर्मी के मौसम में कुत्ते छांव की तलाश मं। बैलगाड़ी के नीचे सोते हुए दिखाई देंगे। मुझे लगता है कि बैलगाड़ी के नीचे सोते हुए कुत्ते निश्चत तौर पर यह जरूर सोचते होंगे कि वे ही समूची बैलगाड़ी का बोझ उठाएं हुए हैं। इसी प्रकार जब-जब विद्युत कंपनी की गाड़ी बिजली का खंबा लेकर दौड़ लगाती है तो कुत्ते उसके पीछे दौड़ लगाते हैं। खंबा गाड़ने वाले तो गाड़कर चल देते हैं लेकिन टांग उठाकर जमीन गीली करने के बाद कुत्ते इस विश्वास में जीने लग जाते हैं कि वे वास्तविकता के धरातल को सूंघने की क्षमता जान गए हैं। जबकि ऐसा होता नहीं है।

पाठकों क्षमा करिएगा मैं थोड़ा भटकते हुए कुत्तों के साथ थोड़े दिनों में विकसित हुई समझ के बारे में बताने लग गया था। बात कुत्तों के गुटखा खाने को लेकर चल रही है तो मैं फिर उसी प्रसंग पर आ जाता हूं। वाकई राजधानी के कुत्ते गुटखा खाने के आदी हो चुके हैं। एक चिकित्सक से जब मैंने यह बात बताई तो उनका कहना था कि इन शहर में प्यास बुझाने के ठिकानों की कमी होने की वजह से कुत्ते चमकती हुई छोटी-छोटी झिल्लियों को ही पानी समझ बैठते हैं। चूंकि शहर में पानदुकानों की भरमार है इसलिए वे खाली पाउचों को ही मुंह में दबाकर भाग निकलते हैं। पाउचों में थोड़ा-बहुत जो भी अंश बचा रहता है कुत्ते उसके आदी हो चले हैं। वैसे राजधानी में कुत्ते ही क्यों आदमी भी बड़े पैमाने पर गुटखा चबा रहा हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि आदमी पैसा देकर चबाता है और कुत्ते को पैसा खर्च नहीं करना पड़ता।

Wednesday, April 14, 2010

महिलाएं इस पोस्ट को न पढ़े

मेरी एक पिछली पोस्ट पर मेरे मित्रों ने कहा कि मुझे गालियों के प्रयोग से बचना चाहिए। मैं भी यह मानता हूं कि लिखने-पढ़ने वाले लोगों को कम से कम गालियों का इस्तेमाल करना चाहिए, लेकिन इस बात के साथ मैं यह भी सोचता हूं कि यदि हमने अपने जीवन से गालियों को निकाल दिया तो शायद हमारा गुस्सा कम हो जाएगा। गालियां गुस्से को प्रकट करने का सबसे सशक्त माध्यम है। यह सही है कि बहुत सी गालियां बेहद भद्दी लगती है लेकिन वाजिब मौके पर गुस्से में दी गई गालियों की अपनी खूबसूरती तो होती ही है।
मैं यह बात इसलिए नहीं लिख रहा हूं कि मुझे कोई सफाई देनी है। मैं मानता हूं कि दुनिया का हर शरीफ और अच्छा आदमी जो ईश्वर पर यकीन रखता है वह गालियां जरूर देता है। और तो और संस्कार चैनल में प्रवचन देने वाला महात्मा भी स्टाइल से गालिय़ां बक देता है और लोग उसे संत महाराज का प्रवचन समझकर ग्रहण भी कर लेते हैं। अभी पिछले दिनों जब एक मुनिवर राजधानी पहुंचे तो एक पत्रकार ने उनसे पूछ लिया महाराज आपको रायपुर कैसा लगा। मुनिवर ने भी पलटकर जवाब दिया क्यों शहर तुम्हारे बाप का है क्या। अपने अखबार में रोज दूसरों को गरियाने वाला पत्रकार महाराज की गालियों को खाकर चुप हो गया। यदि वह खामोश नहीं रहता और बहस करता तो शायद पीट भी जाता। समाज की एकता का मतलब एकता कपूर नहीं होता है कि कोई कुछ भी बोल लेगा... दिखा लेगा।

मित्रों सामान्य जनजीवन में भी हम अपने आसपास कई बार बड़े अभद्र शब्दों का इस्तेमाल करते हैं लेकिन यह अभद्रता अब स्वीकार हो चुकी है। मेरे एक परिचित है, उनके मुंह से बार-बार घंटा शब्द निकल जाता है। घंटे का मतलब तो मैं आज तक नहीं समझ पाया हूं लेकिन लगता है घंटे के साथ जब बाबाजी जुड़ जाते होंगे तब जरूर कोई न कोई बड़ी बात जरूर होती होगी। वैसे जब-जब कोई बाबाजी का घंटा बोलता है तो मुझे चांदसी दवाखाने वाले डाक्टर मजूमदार की याद आती है। वही मजूमदार जिनके हर पोस्टरों में लिखा होता है इलाज के पहले ऐसा.... इलाज के बाद वैसा।

एक और शब्द बेहद प्रचलन में है और वह है- क्या उखाड़ लोगे। उखाड़ शब्द से ही भंयकर किस्म की दादागिरी करने की बू आती है। उखाड़ शब्द का इस्तेमाल करते ही सामने वाला एकदम से बहादुर बन जाता है। और फिर जब उखाड़फेंक में हाथ का इशारा भी जुड़ जाता है तो लगता है सामने वाले के अंदर सनी दयोल या नाना पाटेकर की आत्मा का प्रवेश हो चुका है। लोग दमदार तरीके से बोले गए उखाड़ शब्द को तालियां बजाकर स्वीकार करते हैं और मन ही मन सोचते है वाकई दो चार बालों के उखड़ जाने से कोई हल्का नहीं हो जाता। यानी उखाड़ लोगे का मतलब ही यही है कि भारी आदमी हमेशा भारी ही रहता है। उसका कुछ भी उखाड़ना बेहद कठिन होता है। लोग अक्सर चुतियानंदन जैसी गाली का उपयोग भी खूब करते हैं। मुझे लगता है किसी भी चुतिये की पीछे नंदन को जोड़ना ठीक नहीं है। हमारा बचपन तो नंदन और पराग पढ़ते हुए बीता है और फिर यह गाली देश के प्रसिद्ध साहित्यकार कन्हैयालाल नंदन के साथ-साथ ईश्वर पर श्रद्धा रखने वाले लोगों का अपमान भी है। पाठकों से अनुरोध है कि जो लोग चुतिए शब्द के साथ नंदन को जोड़ते हैं वे अपनी सुविधा के हिसाब से किसी और को जोड़ लें। वैसे इन दिनों दफ्तरों में चुतियों में सल्फेट भी बहुत प्रचलित हैं।

पांडु के पहले इस्तेमाल की जाने वाली एक धाकड़ गाली तो वाकई खराब है और उससे कहीं ज्यादा बगैर मां-बहनों की गलती के उन्हें अपने संसार में घसीटना तो और भी बुरा है। कमीने, मामू, छिलटे, नपुंसक जैसे शब्दों के इस्तेमाल को लेकर इसलिए भी बुरा नहीं मानना चाहिए क्योंकि इन शब्दों की समाज में धीरे-धीरे स्वीकार्यता बन चुकी है। यह स्वीकार्यता ठीक वैसी ही है जैसे देश के सबसे तेज बढ़ते अखबार में अंग्रेजी शब्दों को ठूंसने की स्वीकार्यता बनी हुई है।

मित्रों देश के प्रसिद्ध साहित्यकार सआदत हसन मंटो ने जब एक से बढ़कर एक कहानियां लिखी तो गाली-गलौच के खूबसूरत इस्तेमाल के लिए उन पर मुकदमा तक चलाया गया। इस्मत चुगताई की कहानियों में ऐसा क्या था जिसकी वजह से उन्हें आज भी याद किया जाता है। जिन लोगों ने जगदंबा प्रसाद का मुर्दाघर नामक उपन्यास नहीं पढ़ा उन्हें तो कम से कम एक बार यह उपन्यास अवश्य पढ़ना चाहिए। इस उपन्यास के हर दूसरे पन्ने पर दी जाने वाली एक से बढ़कर शानदार गालियों से तबीयत हरी हो जाती है। गरीबी-मुफलिसी और समस्या से जूझते लोग जब गरियाना चालू करते हैं तो हर पाठक को यह लगने लगता है गालियां ठीक ही दी जा रही है। लोग यदि देश के प्रसिद्ध कहानीकार मनोज रूपड़ा और प्रियवंद को खोजकर पढ़े तो उन्हें अच्छा लगेगा। मनोज की जितनी भी कहानियों में गालियां आई है वह अस्वाभाविक ढंग से नहीं आई है।

यदि कही से राही मासूम रजा साहब का लिखा-पढ़ा मिल जाए तो विशेषकर आधा गांव तो गालियों की खूबसूरती का मतलब आसानी से समझा जा सकता है। गालियां उसे ही बुरी लगती है जो गाली खाने के लायक काम करता है। जिसका काम गाली खाने के लायक नहीं होता वह गालियों की परवाह नहीं करता। चलते-फिरते-उठते-बैठते लोग व्यवस्था को गाली बक रहे हैं क्या हम हर किसी के मुंह पर टेप चस्पा कर देंगे। हां एक चीज का मैं जबरदस्त विरोधी हूं और वह यह कि गालियां बेमतलब की नहीं होनी चाहिए। इसलिए सड़ी-गली व्यवस्था को गरियाए। आदमी को भी गरियाए बशर्ते वह व्यवस्था का एक नुमाइंदा हो तब। हां कभी-कभी भोली और मासूम किस्म की गालियों से भी अपना काम चल जाता हो वह भी करना चाहिए। भोली और मासूम से आश्य अबे साले और ऐडूं-तेडूं से  हैं। बाकी जय हो।

Tuesday, April 13, 2010

नारायणराव जेल से बाहर

  • अपराध के बजाय अपराधी से घृणा करने वाले नपुसंकों
  • मासूमों की मुस्कानों को अपनी गंदी रुचि से तहस-नहस करने का नापाक इरादा रखने वाले पांखडियों
  • चर्बीयुक्त अनिकघी खाने के बाद हर ताजी पत्तल को अपनी बदबूदार उल्टी से गंदा करने वाले बदहजमी लोगों
  • और...और दूसरों के कहने पर विद्रोह का झंडा बुलंद करने वाले छिलटों, कमीनों ( आगे गाली लिखना गालियों का भी अपमान है) तो.....
नारायणराव जेल से बाहर आ चुका है।

पाठक पूछ सकते हैं कि यह नारायणराव कौन है। मित्रों नारायणराव वह शख्स है जो रायपुर के नंदनवन के पास एक अनाथ आश्रम चलाता रहा है। पिछले दिनों उस पर एक बच्चे को बेचने का आरोप लगा। बच्चा वाकई बेचा गया या नहीं इसका फैसला तो अब माननीय अदालत की लंबी लड़ाई के बाद ही सिद्ध हो सकेगा, लेकिन अपने दिल और दिमाग में फंसी हुई सड़ी हुई गोली लेकर उदय चोपड़ाओं के साथ हमबिस्तर होने वाले लोगों ने अदालत का फैसला आने से पहले ही यह साबित करने का प्रयास किया कि नारायणराव दुनिया का सबसे बड़ा अपराधी है। उसकी सजा सिर्फ फांसी और फांसी है। नक्सलियों के समर्थक, जमीनों के दलाल और हर तीसरे आदमी को अपने चरित्रवान होने का प्रमाणपत्र बांटने वाले लोगों ने भी नारायणराव को नीच और न जाने क्या-क्या कहा, लेकिन लोग भूल जाते हैं कि दुनिया में एक अदालत यदि नीचे चलती है तो दूसरी अदालत ऊपर भी चलती है। कहते हैं कि ऊपरवाले की लाठी में आवाज नहीं होती। ऊपरवाला जब लाठी चार्ज करता है तो फिर उसकी चार्जशीट कही दाखिल नहीं होती।
एक 20 दिन की बच्ची को बेचने के कथित आरोप में (क्षमा करिएगा अभी माननीय अदालत का फैसला नहीं आया है) नारायण राव को मार्च माह के प्रथम सप्ताह में जेल जाना पड़ा था। नारायणराव को जेल भेजने के लिए निम्नकोटि के निकृष्ट ..... (पाठक अपनी सुविधा के हिसाब के गाली जोड़ ले) लोगों ने न केवल सीडी तैयार कर पुलिस के अधिकारियों को सौंपी थी वरन् वे नारायण राव को जेल भेजने के लिए सुबह तक थाने में वैसे ही डटे हुए थे जैसे मांस का लोथड़ा पाए जाने की सूचना मिलते ही कुत्ते डट जाते हैं। लोग नारायणराव को जेल भिजवाने में सफल तो हो गए लेकिन आश्रम को तबाह करने में असफल रहे। नारायणराव को लगभग एक माह से ज्यादा समय तक जेल में रहना पड़ा। माननीय अदालत ने मंगलवार को नारायणराव को जमानत पर रिहा करने का आदेश दे दिया है।
इस फौरी तौर पर हुई रिहाई के बाद अब कम से कम यह तो तय हो गया है कि अब भेडिए नहीं ..अदालत तय करेंगी कि नारायणराव दोषी है या नहीं।
अपने गुरूजी नारायण राव के जेल से बाहर आने की खबर सुनकर आश्रम के बच्चे बेहद खुश है। बताते हैं कि वे उन्हे रिहा होते हुए देखने के लिए जेल परिसर भी जाना चाहते थे लेकिन रात होने की वजह से उन्हें रोक दिया गया। वैसे भी इन दिनों आश्रम का पहरा कड़ा कर दिया गया है। यह पहरा इसलिए लगा हुआ है ताकि फिर कोई छिलटा नेता किसी बच्ची को सोते में न जगा सकें। फिर किसी जवान लड़की की चुन्नी न खींची जा सकें.. और ढाबे में मुफ्त की शराब पीकर कोई दलाल माइक पकड़कर यह न चिल्ला सकें कि देखिए जहां मैं खड़ा हूं वहां नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चे रहते हैं। मैं क्या करूं यहां तो मैं भी आकर अपना जन्मदिन मनाता रहा हूं लेकिन अब आश्रम को उजाड़ने के लिए सवा पांच लाख का पैकेज मिला है... और फिर बिल्डर जिसके लिए हम आश्रम को खत्म करना चाहते हैं उसे खत्म करने से काम नहीं चलेगा। आश्रम तभी खत्म होगा जब बच्चे खत्म हो जाएंगे। इसलिए बच्चों को भूखा मारने के लिए जरूरी है कि उन तक राशन न पहुंचने दिया जाए।
( यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि जब नारायणराव को जेल की सजा हुई तो आश्रम में राशनपानी की व्यवस्था खत्म हो चुकी थी। भूख-प्यास से बच्चों मासूम होठों पर पपडिया जम चुकी थी। एक बच्चा तो झाग भी फेंकने लगा था)
दुनिया की किसी भी अदालत के फैसले के पहले बच्चों को अपने गुरूजी के साथ खुश रहने का अधिकार है। यह अधिकार उन्हें इसलिए भी है क्योंकि आश्रम परिसर में ही बने एक मंदिर में बच्चों ने हर सुबह अपने गुरूजी की सकुशल रिहाई के लिए घंटों प्रार्थना की है।
पाठक इस खबर के बहुत ज्यादा विस्तार को जानने के लिए बिगुल में ही चमगादड़ की तरह लटका हुआ सवाल  कमीनों से मुकाबला- एक, कमीनों से मुकाबला दो, राहुल गांधी के नाम एक खतरनाक चिट्ठी, उफ... यह गहरी साजिश तथा भंडाफोड शीर्षक से प्रकाशित पोस्ट का अवलोकन कर सकते हैं।

Monday, April 12, 2010

जगजीत सिंह का आर्केस्टा

जगजीत सिंह को दुनिया प्यार करती है। मैं भी उन्हें बहुत चाहता हूं। दुनिया में मौजूद करोड़ों प्रशंसकों में से एक मैं भी उनका प्रशंसक ही हूं। अभी दो रोज पहले ही महान गजल सम्राट जगजीत सिंह का रायपुर शहर में आना हुआ था। ऐसा तो हो ही नहीं सकता था कि वे शहर में आए और मैं उन्हें सुनने न पहुंचू। अखबार के कामकाज से समय निकालकर जब मैं उन्हें सुनने के लिए राजधानी से 12 किलोमीटर दूर एक स्थान पर पहुंचा तो मुझे घोर निराशा हुई। निराशा इसलिए नहीं हुई कि जगजीत सिंह बेसुरा गा रहे थे, या फिर चलताऊ या उबाऊ रचनाएं ही सुना रहे थे। हकीकत यह थी पूरे इलाके में जबरदस्त अव्यवस्था फैली हुई थी और शराब के नशे में धुत्त हर तीसरा श्रोता वाह-वाह जग्गू.. वाह-वाह कर रहा था। पता नहीं यह आवाजें महान गायक तक पहुंची या नहीं लेकिन वातावरण को देखकर यह लगने लगा था कि मैं जगजीत सिंह के द्वारा गायी  जाने वाली गजलों को सुनने नहीं वरन् जगजीत सिंह का आर्केस्टा सुनने आ  पहुंचा हूं।
मैं फिर कह रहा हूं कि जगजीत सिंह के कार्यक्रम में कहीं कोई खोट नहीं था। उन्होंने तो सबके टेस्ट का भरपूर ख्याल रखा। अधिक उम्र के नौजवानों के लिए माशूक का बुढ़ापा लज्जत दिला रहा है। अंगूर का मजा किसमिस में आ रहा है जैसी रचनाएं गायी तो कम उम्र में बूढे हो चुके युवकों के लिए उन्होंने एक कहानी भी सुनाई कि एक बार एक नौजवान की शादी सिर्फ इसलिए नहीं हो पाती क्योंकि लड़की उससे चार साल बड़ी रहती है। जब घर वाले उम्र को लेकर रोड़ा अटकाते हें तो लड़का कहता है-अरे भाई इसमें दिक्कत कहां पर है। यदि लड़की चार साल बड़ी है तो चार साल बाद शादी कर लेंगे। कुल मिलाकर उन्होंने सबको मजा देने की भरपूर कोशिश की। निराश वे लोग हुए जो शेरों की पंच लाइन पर भीतर तक भींगना चाहते थे।
अमीरों के लिए मकान बेचने वाले एक बिल्डर के बहुत बड़े प्लांट पर जब मैं पहुंचा तो मैंने देखा कि कोई कार में बैठकर लड़की को चूम रहा था तो कोई कार की डिक्की खोलकर जहां चार यार मिल जाए वही रात हो गुलजार जैसा गीत गा रहा था। किसी कार की बोनट पर रोस्टेट मुर्गा औंधा पड़ा था तो कोई मिनरल वाटर की बोतल में सिमरन आफ की अद्धी उड़ेलकर उसे कार्यक्रम स्थल तक ले जाने की योजना बना रहा था। अच्छा यदि यह सब लड़के ही करते तो कोई बात नहीं थी। एक झुंड तो मुझे लड़कियों का भी नजर आया। इस झुंड से बार-बार यही चीखें सुनाई पड़ रही थी कि मैं अब ज्यादा बीयर नहीं पीयूंगी। पूरे दृश्य को देखकर मुझे लगा कि सचमुच मेरा शहर मेट्रो में बदल गया है। आज से ढाई-तीन साल पहले जब मैंने शराब से तौबा की थी तब भी ऐसे दृश्य देखने को नहीं मिले थे लेकिन जगजीत सिंह के कार्यक्रम में आए दर्शकों को देखकर मेरा भ्रम टूट गया। इस दृश्य को देखने के बाद मैं दावे के साथ कह सकता हूं कि जल्द ही छत्तीसगढ़ में भी बैकांक-पटाया जैसे हालात पैदा हो जाएंगे। जो लोग बैकांक-पटाया जा चुके हैं उन्हें यह बात अच्छी तरह से मालूम है कि वहां मर्दों के पीछे लड़किया किस तरह से बूम-बूम करते हुए घूमती है। कुछ समय पहले जब एक मित्र के निवेदन पर मैं बैकांक-पटाया पहुंचा तो कई दिनों तक मैं पापी पेट को ही कोसता रहा। पापी पेट को इसलिए कोसता रहा क्योंकि यदि यह पेट ही नहीं होता तो शायद आदमी चमड़ी के धंधे में नहीं पड़ता। गंदे से गंदा काम नहीं करता। खैर... जगजीत सिंह के कार्यक्रम को देखने-सुनने वालों की तो ऐसी कोई मजबूरी नहीं थी। (क्षमा करिएगा बहुत से अच्छे श्रोता भी थे) लेकिन जिस ढंग से वीआईपी होने के नाम पर लफाडियों का हुजूम आयोजन में जुट गया था उसे देखकर तो यहीं लगने लगा था कि इस दुनिया को बरबाद होने से कोई नहीं रोक सकता।
पता नहीं क्यों शराबियों को लगता है कि जब तक दो-चार पैग अंदर जाएगी नहीं तब तक गजल समझ में नहीं आएगी। इस चक्कर में भाई लोग बोतल गटक जाते हैं और फिर जगजीत सिंह क्या सुनाएंगे उनकी गजल चालू हो जाती है। लगभग दो ढाई पहले जब मेरे एक मित्र ने गुलाम अली का कार्यक्रम आयोजित किया था तब तो गुलाम अली साहब जैसे-तैसे बच पाए थे। हुआ यूं कि गुलाम अली साहब किसी तरह रायपुर में कार्यक्रम देकर तो निकल पड़े लेकिन जब वे बिलासपुर से लौटने वाले थे तब रायपुर से ही उनकी गजल को सुनने गए शराबियों ने आयोजकों की आंखों में धूल झोंकते हुए उनका अपहरण कर लिया था। शराबियों ने उन्हें बड़ी सी गाड़ी में बिठा लिया और बिलासपुर से रायपुर तक के सफर में लगभग चार घंटे तक उनसे गजल सुनते रहे। हां इस बीच जगह-जगह पड़ने वाले ढाबे में रोककर उन्हें चाय-पानी के लिए पूछा जाता रहा। एक ढाबे वाले ने जब गुलाम अली साहब को पहचान लिया और गजल सुनाने की फरमाइश कर डाली तो शराबियों ने उससे यह कहकर झगड़ा कर लिय़ा कि जानते हो किससे गजल सुनाने की बात कर रहे हो। तुमने क्या गुलाम अली साहब को तुम तो ठहरे परदेसी गाने वाला समझ लिया है। बेटा जब तेरा ढाबा फाइव स्टार होटल बन जाएगा तब बोलना। गुलाम अली साहब जब जैसे-तैसे जान बचाकर एयरपोर्ट पहुंचे तब उन्होंने वहां मौजूद कई शुभचिन्तकों को हंसते हुए यह जानकारी दी कि मांशा अल्लाह कैसे-कैसे शुभचिन्तक है।  

Sunday, April 4, 2010

कविता घर की बांदी

अभी चंद रोज पहले मेरे एक शुभचिन्तक ने फोन कर मुझसे यह जानना चाहा क्या वाकई कविताओं से पेट नहीं भरा जा सकता। मैं अपने शुभचिन्तक को फोन पर बहुत ज्यादा विस्तार से जवाब तो नहीं दे पाया लेकिन यह सच ही है कि कविताओं से पेट तो भरा नहीं जा सकता है।
शुभचिन्तक ने मुझे बताया कि मंचों पर एक से बढ़कर एक कवि अपनी कविताओं को पढ़ने का कई-कई हजार रुपए लेते हैं। यदि साल में चार-छह कवि सम्मेलन मिल गए तो कवि अपना पेट तो क्या पड़ोसियों का पेट भी भर सकता है।
सच्ची और सीधी बात तो यह है मित्र कि जिन लोगों को आप कवि बताने का प्रयास कर रहे हैं दरअसल वे कवि नहीं वरन् वक्त और हालात के साथ बदलने वाले भांड हैं। मंचो पर चुटकुलों के जरिए ही एक-दूसरे की मां-बहन करने वालों को यदि आप कवि मानेंगे तो फिर मुझे सूर्यकांत त्रिपाठी निराला और गोरखपांडे को भूल जाना होगा। हालांकि इन कवियों ने भी कभी कविता यह सोचकर नहीं लिखी कि उसके जरिए वे उदर पोषण का काम करेंगे लेकिन यह सच है कि जैसे ही कोई सच्चे और अच्छे कवियों से यह पूछता है कि भाई कविता लिखने के अलावा और क्या करते हो तो वह उसकी आत्मा को छलनी-छलनी करने का काम ही करता है। हमारे यहां फिल्म के लिए पटकथा लिखना एक काम हो सकता है लेकिन कविता लिखने को कोई काम नहीं माना जाता। भाई जिन दिनों मैं स्कूल का छात्र था और हर तीसरी लड़की से मोहब्बत कर बैठने की गुस्ताखी करते हुए पत्र-पत्रिकाओं को कविता भेजने की हिमाकत कर रहा था तब मेरे घर का हर सदस्य मुझसे इस बात के लिए नाराज रहता था कि मैं कविता क्यों लिख रहा हूं। मेरे पिता का तो साफ कहना था कि मुझे उनके बुढ़ापे का सहारा बनना है तो कविता का साथ छोड़ना होगा। मैं अपने पिता से विद्रोह कर कुछ दिनों तक तक कविता के साथ भागने को तैयार भी हो गया था लेकिन जल्द ही मेरी आंखो के सामने पड़ा हुआ परदा उठ गया। मैंने देखा कि जो लोग बेहद महीन तरीके से झूठ बोल रहे हैं उनके बारे में उनके प्रगतिशील मित्र लगातार यह बता रहे हैं कि वह इस समय समूचे विश्व की चिन्ता को केंद्र में रखकर जबरदस्त कविताएं लिख रहा है।

देश-दुनिया के अलावा दिन में सौ से ज्यादा बार अपने आप से ही झूठ बोलने वालों का भला कविता से कोई रिश्ता हो सकता है, लेकिन ऐसा हुआ है और लगातार हो रहा है। क्या झूठ बोलने वालों को वाकई कविता लिखनी चाहिए। अच्छा बताइए यदि झूठ बोलने वाले मक्कार लोगों ने कविता लिख भी ली तो क्या उनकी लिखी कविता सच्ची हो सकती है। बहुत से पाठक आज भी पुरानी सैकड़ो कविताओं को कंठस्थ रखे हुए हैं और जैसे ही उनसे कहा  जाएगा तो वे वह तोड़ती पत्थर.. बुंदेल हरबोलों के मुख हमने सुनी कहानी थी खूब लड़ी मर्दानी वह तो झांसी वाली रानी थी को सुनाएं तो वे उसे बड़े उत्साह के साथ सुनाने लगेंगे।
मुझे तो वर्तमान समय के किसी भी नए कवि की कविता याद नहीं है। यदि मुझे कभी किसी समाचार में उन्हें कहीं कोड़ करना होता है तो इसके लिए किताब तलाशनी होती है। वह भी उस किताब को जिसके बारे में मैं अच्छे से जानता हूं कि उसे नए सशक्त हस्ताक्षर ने किस तरह से जोड़-जुगाड़ करके प्रकाशित करवाया है। पाठकों को यह जानकार हैरत होगी कि देश के अधिकांश कवि जो हंस-फंस और वागर्थ उग्थार्थ में छपते है उनमें से अधिकांश ने अपना संग्रह इधर-उधर के परिचय और ज्यादा हुआ तो पैसा देकर छपवाया है। देश के हर गली-मोहल्ले में कुकुरमुत्ते की तरह पैदा हो चुके इन कवियों में कोई कालेज में अपने छात्रों से झूठ बोलते कविता लिख रहा है तो कोई किसी सरकारी शोधपीठ का मुलाजिम बनकर कविता पेल रहा है। हो सकता है कि मेरी इस बात पर कोई यह सवाल उठा सकता है कि आखिरकार आदमी को अपना काम करते हुए कविता क्यों नहीं लिखनी चाहिए। बिल्कुल लिखनी चाहिए मैंने कब मना किया है कि कविता को आप चलते-फिरते, उठते-बैठते कहीं भी न लिखे। बिल्कुल लिखिए जनाब कविता आपके घर की बांदी तो है ही। लिखिए और फिर हर 15 अगस्त और 26 जनवरी को दिल्ली के लालकिले पर चढकर उसका पठन-पाठन भी करिए... सरकार आपको पद्मश्री तो दे ही देगी। मैं यह लेख कोई विलाप करने के लिए नहीं लिख रहा हूं लेकिन हकीकत यही है कि देश की अधिकांश पत्र-पत्रिकाओं में आज भी किसी लोहे पर घन चलाने वाले लोहार की कविता नहीं छपती। गाय-भैंसों को चराने वाले चरवाहे का मौलिक गीत जिसे सुनकर जानवर लौटने लगते हैं वह प्रकाशित नहीं होता। कविता के प्रकाशन के लिए आपका प्रोफेसर होना जरूरी है। पुलिसवाला होना जरुरी है। किसी पीठ का अध्यक्ष होना जरूरी है और फिर यदि यह सब नहीं है आप तो आपको किसी न किसी गिरोह(प्रगतिशील लेखक संघ-जनवादी लेखक संघ, जसम) आदि का सदस्य होना ही पड़ेगा। वीणापाणी साहित्य समिति का संरक्षक बनकर आप उन पत्र-पत्रिकाओं में तो कदापि नहीं छप सकते जहां संवेदनाओं का सूपा फटकारने वाले कवि छपते हैं।
यह मेरे निजी विचार है। इन विचारों को पढ़कर किसी कवि को धक्का लगता है तो उसके लिए मैं क्षमाप्रार्थी हूं। इसलिए जो कवि झूठ बोलते हुए एसी कमरों में बैठकर गांव के खलिहानों पर कविता लिख रहे हैं उनको मैं यहीं कह सकता हूं कि हुजूर आदाब बजाता हूं। और जो कविता को घर की बांदी न समझते हुए कहीं पहाड़ों-कंदराओं में गुनगुना रहे हैं उन्हें मैं सलाम करता हूं।

Saturday, April 3, 2010

जुलूस

पता नहीं डायरी का निर्माण किसने किया है लेकिन जिस किसी ने भी किया होगा वह कमाल का बंदा रहा होगा। डायरी में आप सब कुछ रख सकते हैं। अपने ब्लड ग्रुप की जानकारी, याददाश्त की चीजे और भी न जाने क्या-क्या। मुझे लगता है डायरी फूल रखने के काम भी आती है। दुनिया का हर समझदार आदमी जिसका यकीन मोहब्बत पर है वह अपनी डायरी में एक न एक बार फूल जरूर रखता है। मैं यहां डायरी का जिक्र इसलिए कर रहा हूं क्योंकि काफी खोजबीन के बाद आखिरकार मुझे मेरी पुरानी डायरी मिल गई है। डायरी में वर्ष 1993-94 में  लिखी गई कुछ पुरानी कविताएं भी जिंदा मिली है।
 
जुलूस-एक
 
जुलूस जब चलता है
मौजूद होते है
सारे हथियार
तेज हथियार
मजबूत हथियार
खतरनाक हथियार
जुलूस में
सबसे खतरनाक होता है इरादा
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जुलूस-दो
कुछ दिनों पहले
वह जुलूस के आगे था
कुछ दिनों बाद
वह जुलूस के पीछे था

दोनों की दफे
उसे मालूम नहीं हुआ
वह किसलिए
जुलूस में था


राजकुमार सोनी