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Sunday, March 21, 2010

शाबाश ननकी

राजकुमार सोनी

हम पर इल्जाम ये है चोर को क्यों चोर कहा
क्यों सही बात कही, काहे न कुछ और कहा
इसका बदला ये मिला उलटी छुरी हम पे चली
अब तो चारों ही तरफ बंद है दुनिया की गली
हमसे क्या भूल हुई जो ये सजा हमको मिली
दिल किसी का न दुखे हमनेबस इतना चाहा
पाप से दूर रहें, और झूठसे बचना चाहा
ये है इंसाफ तेरा वाह रे दाता की गली
अब तो चारों ही तरफ बंद है दुनिया की गली
हमसे क्या भूल हुई जो ये सजा हमको मिली
एक पुरानी फिल्म जनता हवलदार का यह गीत प्रदेश के गृहमंत्री ननकीराम के बयान को देखकर बड़ी शिद्दत के साथ याद आया है। ननकीराम एक सीधे-सरल और किसी भी काम को पूरी संवेदनशीलता के साथ करने वाले मंत्री हैं, लेकिन पता नहीं क्यों लगता है कि वे जब-जब अपना कोई काम दिल से करने या कहने की कोशिश करते हैं उन्हें लपेटने की चेष्टा प्रारंभ हो जाती है। ‘सच कह दो तो बुरा मानते हैं लोग’ जैसी उक्ति श्री कंवर पर सौ फीसदी फिट बैठती है। श्री कंवर का सच बोलना कई लोगों के लिए मुसीबत खड़ी कर देता है। अभी दो रोज पहले ही उन्होंने भ्रष्टाचार को लेकर विधानसभा में जो चिन्ता जाहिर की है उससे एक वर्ग की प्रतिक्रिया तो ठीक-ठाक मिली है, लेकिन ‘थानेदार घूस खाता है’ जैसा बयान सामने आने के बाद कई लोग परेशान हो उठे हैं। श्री कंवर के इस बयान से सबसे ज्यादा दुखी पुलिस महकमे के अफसर हुए हैं। अफसर कानाफूसी में व्यस्त हो गए हैं। ज्यादातर अफसरों का यह मानना है कि श्री कंवर ने विधानसभा में उनकी पोल खोलकर ठीक नहीं किया है। सबको मालूम है कि थानेदार तो घूस लेता ही है लेकिन उसे बताने की क्या जरूरत है, और फिर बताना भी था तो कम से कम ठीक-ठाक रेट बताया जाता। थानेदार की औकात दस हजार रुपए से ज्यादा नहीं है बताकर एक तरह से श्री कंवर ने रेट गिराने का ही काम किया है। अब जो कोई भी मुर्गा मिलेगा तो वह यह कह सकता है कि टीआई साहब.. मंत्रीजी ने कह दिया है कि आप लोग दस हजार रुपए तक ले सकते हो इसलिए सोच-समझकर मांगो। पुलिस वालों का मानना है कि कई बार मौका-ए-वारदात और परिस्थितियों के मद्देनजर तीन-पांच करने से भी ज्यादा मिल जाता है, लेकिन मंत्रीजी ने एक तरह से ब्रेक लगा दिया है।

दूसरी तरफ कुछ ऐसे लोग भी हैं जो मानते हैं कि मंत्रीजी ने विधानसभा में ‘थानेदार रिश्वत लेता है’ जैसा बयान देकर ठीक ही किया है। इस बयान के जरिए उन्होंने एक तीर से कई निशाने साधे हैं। श्री कंवर जब विधानसभा में यह कह रहे थे तब अफसरों की दीर्घा में थानेदार नहीं बल्कि भारतीय पुलिस सेवा के अफसर बैठे हुए थे। यह बयान देकर उन्होंने बड़े अफसरों को यह तो बता ही दिया कि उन्हें सब पता है आप लोगों की दुकानदारी की जड़ में कौन लोग शामिल हैं? थानेदारों पर अंकुश लगाइए। यदि समय रहते थानेदारों पर अंकुश नहीं लगा तो फिर हर रोज कोई न कोई पीड़ित थाने के सामने यह चिल्लाता मिलेगा कि पुलिस ने उसे रिश्वत लेकर बुरी तरह से मारा पीटा है, फंसाया है।

सरकार को घेरने में असफल विपक्ष ने पहले दिन तो मंत्री के बयान का स्वागत किया और कहा कि पहली बार कोई बेखौफ मंत्री मिला है जो सच बोलने की हिम्मत रखता है। विपक्ष के हर सदस्य ने मंत्री के बयान पर मेजें थपथपाईं लेकिन दूसरे दिन जब फिर सदन प्रारंभ हुआ तो विपक्ष ने कहा कि इससे ज्यादा दुर्भाग्यजनक बात कोई और नहीं हो सकती कि प्रदेश का एक जिम्मेदार मंत्री यह मान रहा है कि उसका थानेदार घूस खाता है। यह दुर्भाग्यजनक है.. आदि..आदि।

कुल मिलाकर श्री कंवर के सामने इधर कुआं उधर खाई वाली स्थिति पैदा हो गई है। श्री कंवर के साथ पहली बार ही ऐसा नहीं हुआ। जब वे खाद्य मंत्री बनाए गए थे तब भी राइस मिलों में उनकी छापामार कार्रवाई को शंका के नजरिए से देखने का प्रयास किया गया था। चावल लाबी ने तो उन पर यह आरोप भी लगाया था कि उनके छापे की आड़ में वसूली का धंधा जबरदस्त ढंग से चल रहा है। तब श्री कंवर ने विपक्ष को भी चुनौती दी लेकिन कुछ दिनों बाद जब श्री कंवर हटा दिए गए तब फिर विपक्ष ने यह चिल्लाना प्रारंभ किया कि सरकार एक आदिवासी का मंत्री बने रहना बर्दाश्त नहीं कर पाई। जब प्रदेश में जोगी का शासनकाल था तब कोरबा जिले के कुंदमुरा इलाके में श्री कंवर के साथ एक घटना हुई थी। इस इलाके में कतिपय लोग काफी समय से अवैध शराब का धंधा कर रहे थे। एक दिन ननकीराम कंवर ने शराब बेचने वाले कोचियों को पकड़ा तो कोचियों ने उन्हें जबरिया अपनी जीप में बिठा लिया। इससे पहले कि कोचिए उनका अपहरण कर पाते श्री कंवर ने उनकी धुनाई प्रारंभ कर दी। कोचियों और ननकी के बीच यह संघर्ष कई किलोमीटर तक चलता रहा, अंतत: जीप में चल रहे युद्ध का नतीजा यह हुआ कि गाड़ी पलट गई और कोचिए भाग खड़े हुए। ननकी तो घायल हो गए लेकिन उस घटना के बाद से उनके इलाके रामपुर में अवैध शराब की बिक्री पूरी तरह से बंद हो गई। ऐसा नहीं है कि उनके इलाके में लोग शराब नहीं पीते लेकिन उन्हें शराब लेने के लिए कोथारी गांव तक आना होता है। इस गांव में एक शराब दुकान है जिसे शराब बेचने का लायसेंस मिला हुआ है। यह एक दुकान भी समय पर खुलती और बंद होती है। पूर्व वित्तमंत्री रामचंद्र सिंहदेव के बाद ननकी प्रदेश के दूसरे ऐसे मंत्री है जो शराब से बेहद नफरत करते हैं और बगैर चेप्टी (शराब का पौवा) बांटे ही चुनाव जीतते रहे हैं। कोई कहीं भी कुछ भी बोले या चिल्लाए लेकिन हकीकत तो यही है कि इन दिनों श्री कंवर के लिए ‘लोग’ क्या बात है जैसे शब्दों का इस्तेमाल तो कर रहे हैं।

Thursday, March 18, 2010

भंडाफोड

राजकुमार सोनी
छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में गुरूकुल आश्रम के संचालक नारायण राव के खिलाफ छिपे हुए कैमरों से अभियान चलाने वालों की नीयत को लेकर मैं पहले भी लिख चुका हूं, लेकिन आज आपको उस सीडी का सच बताने जा रहा हूं जो मुझे कहीं से मिली है। इस सीडी को आप दस नहीं बीस बार भी सुन ले तब भी कहीं से यह नहीं लगेगा कि आश्रम के संचालक ने बच्ची को बेचने के लिए अपनी ओर( इस शब्द पर ध्यान दीजिएगा) से पैसों की मांग की है। अपनी पुरानी पोस्टों में मैं लिख चुका हूं कि आश्रम का संचालक आश्रम का विस्तार चाहता था इसके लिए उसने कथित तौर पर बच्चा गोद लेने आए लोगों से निवेदन किया था कि वह आश्रम के लिए ईंट, गिट्टी, रेत सीमेंट आदि की व्यवस्था कर दें। सीडी में एक छुटभैय्ये नेता और आश्रम संचालक के बीच फोन पर जो बातचीत हुई है उसमें सीमेंट, छड़ का जिक्र है।

आश्रम संचालक और साजिशकर्ताओं के बीच बातचीत के कुछ अंशों का मैं नीचे कहीं उल्लेख करूंगा लेकिन उससे पहले कुछ जरूरी बात आपके सामने रखना चाहता हूं। पाठकों इस घटना में पहले भी बता चुका हूं कि किस तरह मूल्यों को किनारे रखकर कुछ लोगों ने एक गरीब और मजबूर आश्रम संचालक को अपना निशाना बनाया। ऐसे समय जबकि दो बच्चों का पेट पालना दूभर है तब लगभग दूसरों के लगभग पचास बच्चों की रखवाली करने वाला इसलिए निशाने पर आया क्योंकि उसके आश्रम के बच्चों ने एक दिन मेद्यापाटकर का विरोध कर दिया था। पाठकों आपको मैं बता चुका हूं कि किस तरह से सुपारी लेने वालों ने कार्रवाई के लिए पुलिस पर दबाव बनाया। एक सीडी को तैयार कर पुलिस से कार्रवाई की मांग की। जब नारायण राव को उरला की पुलिस ने पूछताछ के बहाने थाने में बिठाया तो सुपारी लेकर काम करने वाले सारी रात थाने में डटे रहे। मित्रों क्या आपको यह बताने की जरूरत है ऐसा कौन करता है। ऐसा तब होता है जब कोई किसी को पूरी तरह बरबाद कर देना चाहता है। आपका काम खबर लिखना है। लिखने के बाद पुलिस आपकी खबर पर संज्ञान लेती है या नहीं इसके लिए दबाव बनाना नहीं। यह काम वे लोग ही कर सकते हैं जो सुपारी लेकर काम करते हैं। किसने किसको सुपारी दी और कौन इसकी जड़ में है इसकी छानबीन तो शायद अब जाकर शुरू हो क्योंकि नारायण राव की पत्नी ने कई तरह के सवालों के बीच मुख्यमंत्री, गृहमंत्री तथा पुलिस अधीक्षक को एफआईआर दर्ज करने की मांग के साथ शिकायती पत्र सौंप दिया है। इस पत्र में उन्होंने नक्सलियों से सांठगांठ का उल्लेख तो किया है यह भी बताया है कि किस तरह से कांग्रेस के लोगों ने उनके आश्रम के बच्चों और युवतियों के साथ अमानवीय व्यवहार किया था। बहरहाल अब यह देखना दिलचस्प होगा कि पुलिस इस मामले में कितनी तेजी से कार्रवाई करती है क्योंकि नारायण राव पर एफआईआर दर्ज करने के मामले में पुलिस ने जो तेजी दिखाई है उससे तो ऐसा लगता है कि छत्तीसगढ़ की पुलिस को शिकायत मिलते ही एफआईआर दर्ज करने की कला में महारत हासिल है। पुलिस ने कुछ चंगू-मगुंओं के द्वारा सौंपी सीडी के बाद यह पता लगाने की कोशिश भी नहीं की कि सीडी की वास्तविकता क्या है। उसमें कहां-कहां कट हुआ है या नहीं। जो आडियो सीडी सौंपी गई है उसमें किसकी आवाज है। पाठकों सच तो यह है कि छत्तीसगढ़ में सीडी की जांच की मशीन नहीं है। इसकी जांच संभवतः बैंगलोर या कहीं और होती है। पुलिस ने सीडी की जांच भी नहीं करवाई और नारायण राव को फांसी पर लटकाने का इन्तजाम कर दिया। इस मामले में एक नया तथ्य यह भी प्रकाश में आया है कि साजिशकर्ताओं की रपट लिखवाने से पहले नारायण राव ने बच्चा ले जाने वाले के खिलाफ उरला थाने में शिकायत सौंप दी थी। कानून के जानकारों का कहना है कि जो आदमी पहले रपट लिखवाने पहुंचे तो पुलिस को चाहिए कि वह पहले उसकी रपट पर ध्यान दें लेकिन इस मामले राव के बाद शिकायत सौंपने वालों की ज्यादा सुनी गई। शिकायतकर्ताओं ने अपनी शिकायत में साफ-साफ कहा है वह किसी दूसरे के नाम से आपरेशन को अन्जाम देने पहुंचे थे। यहां सवाल यह उठता है कि किसी दूसरे के नाम से आपरेशन को अन्जाम देने वालों ने फिर उसी नाम से रपट क्यों नहीं लिखवाई। समझदार पुलिस की समझदारी देखिए कि उसने फर्जीनामधारी कौन है इसका पता चल जाने के बाद भी उसके खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। अब इससे पहले कि सीडी की बातचीत के कुछ अंशों का जिक्र किया जाए। यहां यह बताना जरूरी है कि पूरी सीडी में पेमेंट कर देने की बात तो व्यापारी बनकर गए लोग ही करते हुए सुनाई देते हैं।

हैलो

हां सर...

कल 11 बजे अम्माजी के हाथों दे दूंगा

आश्रम आएंगे

मांजी के वहां भिजवा दूंगा

11 बजे तक पहुंच जाएंगे

तो अपन सीमेंट-वीमेंट दिए उनको बोल दे

ढाई लाख कल आपको दे दूंगा। आपको जो चाहिए मंगा लीजिए। ढाई लाख कल दे दूंगा।

कल 11 बजे आप माताजी के यहां छोड़ दिए

आप बहुत ही अच्छा काम कर रहे हैं। पुण्य का काम कर रहे हैं।

बच्चे भगवान है। आपको माध्यम बनाकर भेजा हम तो आग्रह करते हैं।

(सीडी में बहुत सी बातें अस्प्ष्ट है जो कुछ और ही इशारा करती है। सीडी में एक जगह एक छुटभैय्या नेता यह बोलता है कि जो बच्चा लेने के लिए आने वाला था उसने पंडित जी से बोलकर बच्ची के प्रवेश की तिथि निकलवाई है। सीडी में सूतक आदि का भी जिक्र होता है और यह आवाज भी सुनाई देती है कि 2 मार्च को बच्ची को लेने आएंगे। बस पंडितजी ने बता दिया है कि इसी दिन बच्ची को प्रवेश दिलाना है। छुटभैय्या बार-बार यह भी कहता है कि हमारी बच्ची का ख्याल रखना। सीडी में अन्य बच्चों के पंजीकरण आदि का उल्लेख भी होता है और यह भी साफ सुनाई देता है कि कुछ लोगों का जोर सिर्फ और सिर्फ पेमेंट देने और देने को लेकर ज्यादा है)

बावजूद इसके मैं यह सारी बातें नारायण राव को निर्दोष कहने के लिए नहीं लिख रहा हूं। मुझे लगता है कि यदि आदमी ने वकालत न भी की हो तो उसके भीतर का बैठा वकील उससे सवाल-जवाब तो करता ही है। यही वकील उसे बताता है कि अच्छी-बुरी बातों में जिरह कैसे होती है। मैं बार-बार यह बात कह चुका हूं। एक बार फिर कह रहा हूं कि मेरी लड़ाई आदमी से नहीं वरन प्रवृतियों से है। ऐसी प्रवृति से जो मनुष्य को मनुष्य समझने के खिलाफ है। मैं अदालत का हमेशा से सम्मान करता आया हू् और आगे भी करता रहूंगा। तथ्यों के आलोक में ही अब यह साबित हो पाएगा कि नारायण राव गलत है या अभियान चलाने वाले सही। इसके लिए हमें इन्तजार तो करना ही होगा। हो सकता है कि मैं गलत भी साबित हो जाऊँ या फिर अभियान चलाने वाले गलत हो जाए। दोनों ही हालात में मैं फिर वहीं कहूंगा- बच्चों ने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा हमें उनके बारे में सोचना चाहिए था। पाठकों.. आश्रम में बच्चे सुखी रहे। उन्हें कोई ताकत अलग न कर सकें इसके लिए आप दुआ करें। इस वक्त जबकि रात का सन्नाटा गहराता जा रहा है मैं यह सोचकर ही रोमांचित हूं कि किसी बच्चे के सपने चुपके से किसी खरगोश का प्रवेश हुआ होगा। क्या बच्चों के सपनों में छुरा घोंपने वालों के खिलाफ खड़े होकर मैंने कोई गलती की है।

Monday, March 15, 2010

उफ.. यह भयानक साजिश

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मौजूद एक अनाथ बच्चों के आश्रम को उजाड़ने की साजिश सिर्फ इसलिए रची गई ताकि देश-दुनिया के सामने प्रदेश की रमन सरकार के बारे में यह संदेश फैलाया जा सकें कि सरकार न तो नक्सलियों निपट पा रही है और न ही नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चों को सुरक्षा दे पा रही है। छत्तीसगढ़ में बच्चों को बेचने का गोरखधंधा होता है। उनका सौदा आश्रमों के जरिए होता है।

बस्तर, अंबिकापुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा सहित राजधानी के अनेक संघर्षशील एवं वरिष्ठ पत्रकारों साहित्यकारों ने इस मुद्दे पर मेरा साथ देने की बात कही है। जाने-अनजाने में रिश्ता कायम करने वाले मेरे वे मित्र जो बलाग लिखते हैं उनकी शुभकामनाएं भी मिल रही है।
यह बात कोई अकेले मैं नहीं कह रहा हूं वरन् वे सब लोग कहने को विशश हो गए हैं जिनके पास थोड़ा-बहुत भी दिमाग है। राजनीति और प्रशासन के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि हो न हो आश्रम संचालक को फंसाया गया है। इस बीच बच्चों की बेहतरी के लिए सैकड़ों लोग मुझसे फोन पर बातचीत कर रहे हैं। उनके सुझाव भी आ रहे हैं। कुछ लोगों ने तो इसे एक अभियान ही मान लिया है। एक वेब अखबार ट एआईएनएस डाट इन ने तो बकायदा मेरे ब्लाग बिगुल से वह तमाम स्टोरी भी अपनी साइट पर ले ली है जो पिछले दिनों प्रकाशित हो चुकी है। इस एंजेसी के प्रभारी ने इसके लिए लगभग छत्तीसगढ़ के दस हजार से ज्यादा प्रबुद्ध लोगों को एसएमएस के जरिए यह संदेश भी भिजवाया कि खबर क्या है। बस्तर, अंबिकापुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा सहित राजधानी के अनेक संघर्षशील एवं वरिष्ठ पत्रकारों साहित्यकारों ने इस मुद्दे पर मेरा साथ देने की बात कही है। जाने-अनजाने में रिश्ता कायम करने वाले मेरे वे मित्र जो बलाग लिखते हैं उनकी शुभकामनाएं भी मिल रही है।

राज्य निर्माण के बाद से राहुल गांधी के पिता के नाम से बने संगठन ने केवल और केवल भंडाफोड ही किया है। इतना भंडाफोड़ देखकर तो लगता है कि जैसे छत्तीसगढ़ में रिक्शा चलाने वाला भी घूंस खाता है। कभी इसकी पिटाई उसका मुंह काला। कभी इसकी कमीज खींचना कभी खाने की थाली से कीड़े निकलवाना।
मित्रों मैं पूरी ताकत लेकर जुटा हुआ हूं। मामले में नारायण राव के साथ क्या होगा यह तो अदालत तय करेंगी लेकिन मुझे लगता है हम चर्चाओं के आधार पर एक ऐसे गिरोह को सामने लाने में कामयाब तो हुए ही है जिनका एकमात्र काम सूचना के आधार के तहत जानकारी मांगकर लोगों को डराना-धमकाना है। जो मान जाता है उसे छोड़ दिया जाता है और जो नहीं मानता है उसे बेनकाब कर दिया जाता है। यह बात मैं राजधानी के लोगों के विवेक पर छोड़ता हूं कि वे जरा अपने दिमाग पर जोर डालकर यह पता करें कि छुपे कैमरे से अभियान चलाने वालों ने कब-कब कहां-कहां किसके-किसके खिलाफ साजिश रची है। इसके लिए आपको ज्यादा जोर देने की जरूरत भी नहीं पड़ेंगी। राज्य निर्माण के बाद से राहुल गांधी के पिता के नाम से बने संगठन ने केवल और केवल भंडाफोड ही किया है। इतना भंडाफोड़ देखकर तो लगता है कि जैसे छत्तीसगढ़ में रिक्शा चलाने वाला भी घूंस खाता है। कभी इसकी पिटाई उसका मुंह काला। कभी इसकी कमीज खींचना कभी खाने की थाली से कीड़े निकलवाना। सरकार इस मामले में इसलिए भी कार्रवाई नहीं करती रही क्योंकि कही न कही से छापामार कार्रवाई करने वालों को पुलिस का सहयोग मिलता रहा है। यदि कोई गलत कर रहा है तो उसे बेनकाब करने का एक तरीका तो होना चाहिए या नहीं। केवल गए और जूता-लात चालू। हंगामा, फिर पुलिस को फोन। दस-बीस गुर्गों की चीख-पुकार और अच्छा-भला आदमी थोड़ी ही देर में आरोपी। हद होती है अन्याय की। हालात यह हो गए कि इनसे कोई भी बात करने से डरता है। पता नहीं कब किसके घर गांजा रखवा दे। कब किसी महिला को इस बात के लिए तैयार कर लें कि तुम्हें ब्लाउज फाड़कर नाटक करना है। बाकी का असली नाटक हम कर लेंगे।

पाठकों आपको यह जानकार हैरत होगी कि जिस खबरिया चैनल ने आश्रम के बारे में खबर चलायी उसका एक संवाददाता आश्रम के बच्चों के बीच जाकर अपना जन्मदिन मनाता रहा है। यदि आश्रम इतना ही खराब था तो फिर आप क्या वहां डिस्को करने गए थे।
आश्रम की छापामार कार्रवाई के बारे में मैं बार-बार यह सवाल उठा ही रहा हूं कि भाइयों यदि आपका काम लिखना-पढ़ना है तो अपने काम को केवल लिखने-पढने तक आपने सीमित क्यों नहीं किया। खबर के प्रसारण के दूसरे दिन पुलिस को पत्रकारिता के कौन से मापदंडों के तहत सीडी सौंपी आपने। अब सीडी सौंप ही दी है तो फिर जाहिर सी बात है कि यदि आप किसी को फंसाने के लिए सीडी सौंप सकते हैं तो कोई किसी को बचाने के लिए भी मुख्यमंत्री से मिलकर ज्ञापन सौंप सकता है। पाठकों आपको यह जानकार हैरत होगी कि जिस खबरिया चैनल ने आश्रम के बारे में खबर चलायी उसका एक संवाददाता आश्रम के बच्चों के बीच जाकर अपना जन्मदिन मनाता रहा है। यदि आश्रम इतना ही खराब था तो फिर आप क्या वहां डिस्को करने गए थे।

थोड़े ही समय बाद संवाददाता को फोन आया तो उसने नाना पाटेकर के अन्दाज में काला चश्मा चढाते हुए कहा क्या करूं अपने बगैर पत्ता नहीं हिलता है। आश्रम जा रहा हूं नौकरी करनी है।
संवाददाता को जब विधानसभा परिसर में कुछ मित्रों ने लताड़ा तो उसने साफ तौर पर यह स्वीकार किया कि वह मजबूरी में ऐसा कर रहा है। उसे नौकरी करनी है। नौकरी करने का मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम दूसरों की घर की रौशनी बुझाकर अपने घऱ में उजाला करेंगे। यह वाक्या तब हुआ जब आश्रम संचालक की धर्मपत्नी मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह से मिलने आई हुई थी। सबने महान संवाददाता की महान बातों को सुना था। थोड़े ही समय बाद संवाददाता को फोन आया तो उसने नाना पाटेकर के अन्दाज में काला चश्मा चढाते हुए कहा क्या करूं अपने बगैर पत्ता नहीं हिलता है। आश्रम जा रहा हूं नौकरी करनी है।

मित्रों.. अभी यह लड़ाई कितने दिनों तक जारी रहनी है इसका पता नहीं लेकिन जंग जारी है। यह जंग लोगों के खिलाफ नहीं वरन प्रवृतियों के विरूद्ध है। उन प्रवृतियों के खिलाफ जो मासूमों की जिन्दगी से खिलवाड़ करने में लगी हुई थी। जरा सोचे अनाथ बच्चों ने कितनी कठिनाइयों से अपने मां-बाप से बिछुड़ जाने का गम भुला होगा। 50 वे बच्चे जो आपस में दोस्त है भाई है.. बहन है। उन्हें अलग करने की साजिश रचने वालों को मैं कमीना न कहूं तो क्या कहूं।

Sunday, March 14, 2010

राहुल गांधी के नाम एक खतरनाक चिट्ठी

पूरी दुनिया में आपके पिता के नाम पर बनाए गए संगठन कुछ न कुछ सामाजिक कार्य जरूर कर रहे हैं लेकिन क्या आपको पता है कि छत्तीसगढ़ में आपके पिता के नाम का कुछ लोग गलत ढंग से इस्तेमाल करने में लगे हुए हैं। एक बिग्रेड को दुकानदारी का जामा पहनाकर कुछ लोग जिस तरह के खतरनाक कामों में जुटे हुए हैं उसे किसी भी सूरत में न तो समाज के लिए ठीक माना जा सकता है और न ही देश के लिए। यदि आपको इन तमाम बातों की जानकारी छत्तीसगढ़ के आपस में लड़ मरने वाले कांग्रेस के नेताओं से नहीं मिलती है तो यह एक अलग बात है लेकिन मैं यह जानकारी अपने ब्लाग (डब्लूडब्लूडब्लू डाट सोनीराजकुमार डाट ब्लागस्पाट डाट काम) पत्र व अन्य माध्यमों से सिर्फ इसलिए दे रहा हूं क्योंकि अभी चंद रोज पहले ही आपके पिता के नाम से जुड़े संगठन के कुछ नेताओं ने मासूमों की जिन्दगी से खिलवाड़ करने का एक बेहद ही शर्मनाक कारनामा किया है। इस कारनामे के बाद से ही मुझे लगता रहा है कि मुझे चुप नहीं बैठना चाहिए। मैं अपने ढंग से हाथ-पांव मार ही रहा हूं लेकिन फिर भी मेरा आपसे आग्रह है कि आप अपने स्तर पर भी इसकी सच्चाई पता लगाएं। मामले की असलियत क्या है इसकी जानकारी आपको छत्तीसगढ़ के कांग्रेस के नेता नहीं देंगे क्योंकि कोई न कोई किसी न किसी स्तर पर छुटभैय्यों से जुड़ा हुआ है। एक तरह से कांग्रेस के छोटे-मंझोले व छत्तीसगढ़ के कतिपय बड़े नेताओं का उन्हें संरक्षण हासिल है। यदि यह संरक्षण नहीं मिलेगा तो रैली मैं भीड़ कैसे लायी जाएगी। चंदा-चकारी कौन करेगा। यदि कभी किसी ने नेताओं को अरे-तुरे कर दिया तो फिर थाने का घेराव कैसे होगा।

खैर.. अभी चंद रोज पहले ही आदिवासी बाहुल्य छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में एक घटना घटी है। एक रोज शाम को जब एक खबरिया चैनल का संवाददाता यह चिल्लाया कि राजधानी में बच्चों को बेचने वाला शैतान मौजूद है तो लोगों का माथा ठनका। प्रारंभ्भिक तौर पर तो सब यही सोचने के लिए मजबूर हो गए कि क्या देश की राजधानी दिल्ली की तरह यहां भी कोई बच्चों के साथ गलत व्यवहार करने वाला सौदागर मौजूद है। धीरे-धीरे जब सच्चाई सामने आयी तो पता चला कि कुछ लोगों ने आश्रम संचालक को मात्र इसलिए फंसाने की कोशिश की है क्योंकि उसके आश्रम में नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चे रहते हैं। आप सोच रहे होंगे कि नक्सली हिंसा में मारे गए लोग और आश्रम में रह रहे बच्चों से आपके पिता के नाम पर बनाए गए संगठन का क्या अंतरसंबंध है। यह अंतरसंबंध इसलिए जुड़ता है क्योंकि एक चैनल के साथ मिलकर आपके पिता के नाम का संगठन चलाने वाले छुटभैय्ये नेताओं ने छिपे हुए कैमरों से जो अभियान चलाया उसमें बच्चों की जान में बन आई। भंडाफोड़ का दावा करने वालों ने यह नहीं देखा कि जब आश्रम का संचालक जेल चला जाएगा तो बच्चों को राशन-पानी कौन मुहैय्या कराएगा, लेकिन इन छुटभैय्ये नेताओं की वजह से आश्रम के बच्चों ने खाना-पीना त्याग दिया। कुछ को इसलिए भी भोजन नहीं मिला क्योंकि आश्रम में राशन खत्म हो गया था। किसी ने बच्चा बेचा है या नहीं इसका फैसला तो अदालत करेगी लेकिन संगठन चलाने वालों ने पूरे मामले में अपनी ओर से पुलिस व न्यायधीश बनने की कोशिश की है।

जिस रोज बच्चा बेचने की खबर चैनल में चली उसके दूसरे दिन कुछ लोगों के साथ मिलकर छुटभैय्ये नेताओं ने बकायदा पुलिस को सौंपी और फिर देर रात नेताओं में से कुछ शराब के नशे में धुत्त होकर आश्रम पहुंच गए। इन नेताओं ने एक-एक कर आश्रम के बच्चों की चादर खींची। इस दौरान नेताओं ने यह भी नहीं देखा कि कोई कितनी छोटी बच्ची है या बच्चा है। आश्रम में चार बच्चे ऐसे भी हैं जो एचआईवी से पीडि़त है। इन बच्चों की जिन्दगी ही बा-मुशिकल चार-पांच साल बची है। बच्चों को समय-समय पर दवाईयों की भी जरूरत होती है लेकिन छुटभैय्ये नेताओं का दिल इन्हें जगाते हुए जरा भी नहीं पसीजा। बात जगाने की होती तो समझ में आती। बच्चों को डरा-धमका इस तरह से पूछताछ की गई जैसे उन्होंने किसी का कत्ल कर दिया हो। आश्रम में एक दो युवतियां भी रहती है। इन युवतियों के साथ नेताओं ने क्या किया वह यहां के स्थानीय अखबारों में छपा है। एक युवती से नेताजी ने पूछा-वह जवान हो चुकी है तो यहां क्या करने......(आगे लिखा नहीं जा सकता)

कुल मिलाकर आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वाले नेताओं ने अपनी करतूतों के दौरान यह नहीं देखा कि वे अपने कथित मिशन में कामयाब होने के लिए किस तरह से अमानवीय व्यवहार कर रहे हैं। इस घटना की जानकारी जैसे-जैसे लोगों को पता चल रही है वैसे-वैसे उनका गुस्सा बढ़ता जा रहा है। नेताओं ने एक चैनल की मदद से आश्रम पर बार-बार हमले किए। इस हमले में हर बार यहीं बताने की कोशिश होती रही कि आश्रम का संचालक बच्चों का सौदागर है, लेकिन जब सरकार के अलावा आश्रम को दान-अनुदान से मदद करने के अतिरिक्त वहां अच्छे भाव से जाकर अपना जन्मदिन मनाते हुए बच्चों की दुआएं लेने वाले लोग सामने आएं तब यह पता चल रहा है कि माजरा कुछ और है।

आश्रम को उजाड़ने के लिए जिन लोगों ने भी जिस तरह की भूमिका का निर्वाह किया उस मामले में वे धीरे-धीरे एक्सपोज हो ही रहे हैं लेकिन आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वाले लोगों की भूमिका को लेकर भी कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही तैर रहा है कि क्या कांग्रेस के लोग नक्सलियों के हिमायती है।
यह माजरा और चर्चा क्या है इस पर मैं आपका ध्यान चाहता हूं। कुछ समय पहले राजधानी रायपुर में देश की महान नेत्री मेद्या पाटकर छत्तीसगढ़ आयी थी। मेद्या पाटकर के बस्तर (आदिवासी इलाका है जहां पर आपके कदम कई बार पड़ चुके हैं। इस इलाके के एक बड़े हिस्से में नक्सलियों का उत्पात जारी रहता है) पहुंचने पर वहां उनका खूब विरोध हुआ। लोकतंत्र में विरोध और सहमति की बातें होती रहती है लेकिन जब सुश्री पाटकर राजधानी रायपुर पहुंची तो यहां के प्रेस क्लब में आश्रम के बच्चों ने उन्हें घेरकर यह पूछ डाला कि-दीदी आप नक्सलियों के मानवाधिकारों की बात तो करती हो लेकिन कभी हमारे अधिकारों के बारे में भी पूछ लिया करो। हमारे मां-बाप को नक्सलियों ने मारा है। हमारा क्या कसूर है। बताते है कि यह बात एनजीओ संचालित करने वाले कुछ लोगों को बुरी लग गई और फिर उन्होंने कुछ लोगों के साथ मिलकर आश्रम को उजाड़ने की सुपारी दे दी।

आश्रम को उजाड़ने के लिए जिन लोगों ने भी जिस तरह की भूमिका का निर्वाह किया उस मामले में वे धीरे-धीरे एक्सपोज हो ही रहे हैं लेकिन आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वाले लोगों की भूमिका को लेकर भी कई तरह के सवाल खड़े हो गए हैं। सबसे बड़ा सवाल तो यही तैर रहा है कि क्या कांग्रेस के लोग नक्सलियों के हिमायती है। चर्चाओं के बाजार में अब यह बात भी गर्म है कि किसी तरह से छत्तीसगढ़ की सरकार के खिलाफ यह हवा बना दी जाए कि नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चे आश्रम में भी सुरक्षित नहीं है। सरकार चाहे कांग्रेस की हो या भाजपा की, मेरा यह मानना है कि बच्चे कांग्रेसी या भाजपाई नहीं है। बच्चों के साथ इस तरह की खतरनाक राजनीति क्या सही मानी जा सकती है।

कौन किसका हिमायती है और किसका नहीं यह मैं नहीं जानता, लेकिन मैं इतना जरूर जानता हूं कि मैं बच्चों का हिमायती हूं। इस विषय पर मैंने अपने ब्लाग डब्लूडब्लूडब्लू डाट सोनीराजकुमार डाट ब्लागस्पाट डाटकाम पर कुछेक पोस्ट लिखी भी है।

कांग्रेसी नेता का काफी लंबा-चौड़ा जमीन का कारोबार है। उसे जहां कहीं भी अड़चन होती थी आपके पिता के नाम के संगठन से जुड़े खद्दरधारी वहां पहुंचकर नाटक-नौटंकी करते थे और फिर दबाव बनाकर मामला सुलझा लिया जाता था। बाद में दबाव को ही नेताओं ने अपना हथियार बना लिया।
आपके पिता के नाम पर बनाए गए संगठन की शुरूआत कब और क्यों हुई इसका तो ठीक-ठाक पता नहीं है लेकिन जैसा लोगों से चर्चाओं के आधार पर पता चला है उसके मुताबिक प्रदेश के एक कांग्रेसी नेता ने संगठन को अपने जमीन के धंधे को बचाने के लिए प्रारंभ किया था। कांग्रेसी नेता का काफी लंबा-चौड़ा जमीन का कारोबार है। उसे जहां कहीं भी अड़चन होती थी आपके पिता के नाम के संगठन से जुड़े खद्दरधारी वहां पहुंचकर नाटक-नौटंकी करते थे और फिर दबाव बनाकर मामला सुलझा लिया जाता था। बाद में दबाव को ही नेताओं ने अपना हथियार बना लिया। इस हथियार के चलते कभी शीतलपेय में गंदगी डालकर हंगामा किया गया तो कभी अमूल दूध से मख्खी निकाली गई। नेताओं को अस्पताल में साइकिल स्टैंड का ठेका नहीं मिला तो अस्पताल के डाक्टरों का मुंह काला करने की कोशिश की गई। कभी मिठाई दुकान वालों को इस बात के लिए डराया गया कि वे नकली खोवे से मिठाई बनाते हैं। तो कभी ताकत की दवा बनाने का धंधा करने वाले को पैसा नहीं देने के कारण प्रताडित किया गया। मैं यहां एक चैनल में काम कर चुके  एक पत्रकार का एक बयान कोड़ कर रहा हूं। इस पत्रकार ने आज ही मुझसे कहा है- कुछ समय पहले जब मैं चैनल में था तब मेरे एक सीनियर के पास भंडाफोड के लिए मशहूर हो चुके नेताजी आएं। सीनियर ने उनके कहने पर इस काम के लिए लगाया कि मैं अमूल के जिस प्रोडक्ट में कीड़ा निकला है उसकी खबर करूं। जब मैं खबर करने पहुंचा तो मैंने पाया कि बात में उतना दम नहीं है। फिर भी नेताजी मुझ पर इस बात के लिए दबाव डालते रहे कि मैं बात में दम पैदा करूं और अमूल का प्रोडक्ट बेचने वाले दुकानदार से किसी तरह उगाही करने में उनकी मदद करूं। इस बात के लिए जब मैं अड़ गया कि नहीं जो सही खबर है वह दिखाई जाएगी तब खबर रोक दी गई और मैं कुछ दिनों के बाद नौकरी से निकाल दिया गया।

आपको भेजे कितनों पत्रों पर कार्रवाई होती है इसका मुझे अन्दाजा नहीं है लेकिन मुझे उम्मीद है कि आप संवेदनशील है और मामले की संवेदनशीलता को समझते हुए आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वालों को जरूरी निर्देश देंगे।

पिछले नौ-दस सालों में मैंने कभी आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वालों को पेड़ लगाते नहीं देखा। मैंने कभी यह नहीं देखा कि छुटभैय्ये नेताओं ने कभी गरीबों के लिए लंगर का आयोजन किया हो।
मैं पिछले कुछ सालों से राजधानी में रहकर पत्रकारिता कर रहा हूं। पिछले नौ-दस सालों में मैंने कभी आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वालों को पेड़ लगाते नहीं देखा। मैंने कभी यह नहीं देखा कि छुटभैय्ये नेताओं ने कभी गरीबों के लिए लंगर का आयोजन किया हो। हां एक बार किसी अखबार में नेताओं की एक फोटो जरूर छपी थी। इस फोटो में भी नेता और उनके साथी एक दूधमुंही बच्ची के मुंह में केला ठूंसते हुए खड़े थे। हां इन नेताओं से आप यह जरूर पूछिएगा कि उन्होंने जब कभी भी छिपा कैमरा लेकर कोई अभियान चलाया तो कानून का सहारा क्यों नहीं लिया और हर अभियान एक खास चैनल वालों के साथ ही क्यों चलाया।

आशा है आप स्वस्थ होंगे। देश के युवा आपसे ऊर्जा प्राप्त कर रहे हैं इससे अच्छी बात भला क्या हो सकती है। जरा आपके पिता के नाम पर संगठन चलाने वाले युवाओं को भी समझाएं कि ऊर्जा का उपयोग कहां और कैसे करना चाहिए। आपको मेरी कोई बात गलत लगी हो तो मैं आपसे क्षमा चाहता हूं।

राजकुमार सोनी

Saturday, March 13, 2010

कमीनों से मुकाबला-2

राजकुमार सोनी

हिमांशु कुमार ने कहा है कि उन्होंने ही सूचना के अधिकारों के तहत यह जानने की कोशिश की थी कि बस्तर से बाहर ले जाए गए बच्चों का क्या हुआ है। पाठकों ये वही हिमांशु कुमार है जो कुछ समय पहले बस्तर में रैली निकालकर चर्चा में आएं थे।
जो लोग कमीनों से मुकाबला खबर-2 को पढ़ने जा रहे हैं यदि वे इसके पहले प्रकाशित चमगादड़ की तरह लटके हुए सवाल तथा कमीनों से मुकाबला-1 ( दोनों ही बिगुल में प्रकाशित) को पढ़ लेंगे तो उन्हें सारी बात समझने में आसानी होगी कि माजरा क्या है। फिर भी एक बार मैं पाठकों को संक्षेप में बताना चाहूंगा कि मामला छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर से कथित तौर पर एक बच्ची को बेचे जाने से जुड़ा हुआ है। इस मामले में मुझे कहीं से यह लगता है कि आश्रम संचालक नारायण राव को फंसाया गया है। मेरी यह सोच गलत भी हो सकती है क्योंकि अभी तमाम गवाहों व बयानों के मद्देनजर किसी परिणाम पर पहुंचने वाली अदालत का फैसला आना अभी बाकी है। मैं एक साधारण सा पत्रकार हूं, न्यायधीश नहीं इसलिए अपनी तमाम बातों को उसी नजरिए से रखने की चेष्टा कर रहा हूं।
मानवाधिकारों की रक्षा के लिए मेद्या पाटकर छत्तीसगढ़ आई थी और प्रेस क्लब के बाहर बच्चों ने इन्हें पकड़कर पूछ लिया था कि दीदी नक्सलियों के मारे जाने पर तो सवाल उठाती हो हमारे मां-बाप मारे गए हैं उन्हें भी तो लौटा दो।

पाठकों जिस दिन से यह घटना हुई है उस दिन से समूचे शहर में यह चर्चा फैली हुई है कि जब से आश्रम के बच्चों ने एक नेत्री का विरोध किया है तब से वे मुसीबत में पड़ गए हैं। ब्लाग के अलावा एकाध अखबारों में यह बात प्रकाशित भी हुई कि नेत्री  को यह बात बुरी लग गई थी कि नक्सली हिंसा में मारे गए परिजनों के बच्चों ने उनसे यह सवाल कैसे पूछ लिया कि- दीदी हमारे मानवाधिकारों के बारे में कौन सोचेगा।

बताते है कि बच्चों के इस कथन के बाद उन्हें उजाड़ने की सुपारी दे दी गई। सुपारी लेने वालों में कौन-कौन शामिल है इसका खुलासा मैं पहले भी कर चुका हूं। बार-बार उसी बात को कहने से विषय से भटक जाने का खतरा भी बना रहता है।

शराब के नशे में धुत एक नेता ने रात को बच्चों को जगा-जगाकर पूछताछ की और एक युवती के साथ कुछ बदतमीजी भी की थी। इस बात की शिकायत बच्चों ने उस दिन भी की थी जब प्रदेश के गृहमंत्री ननकीराम कंवर मुख्यमंत्री निर्देश के बाद आश्रम की जांच-पड़ताल करने गए थे। यहां पहुंचकर गृहमंत्री ने एक चैनल वाले को छोड़ बाकी सबके सामने यह कहा कि आश्रम में कही कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पूरे मामले को देखने पर लगता है कि आश्रम संचालक को फंसाया गया है।
मित्रों, आप सब की दुआ से कमीने लगातार पटखनी खा रहे हैं। इनकी पूरी कोशिश थी कि किसी तरह से आश्रम उनके कब्जे में आ जाए, वह तो हुआ नहीं। वे यह भी चाहते थे कि आश्रम के बच्चों को इधर-उधर कहीं शिफ्ट कर दिया जाए वह भी नहीं हो सका। कल 12 मार्च को कमीनों ने एक बार फिर यह हवा बनाने की कोशिश की कि बस्तर के दंतेवाड़ा जिले से कुछ बच्चे गुरूकुल आश्रम लाए गए थे वह गायब हो गए हैं। दंतेवाड़ा की कलेक्टर रीना बाबा कंगाले ने जब दो अफसरों को गुरूकुल आश्रम भेजा तो पता चला कि सारे बच्चे आश्रम में ही है। आश्रम से तब भी गायब नहीं मिले थे जब समाज कल्याण विभाग के अफसरों ने कथित बिग्रेड और पुलिस वालों के साथ जाकर आश्रम की जांच की थी। इस जांच में आश्रम की बच्चों और वहां रह रही युवतियों के साथ नेताओं ने जो कुछ किया था उसकी खबरें स्थानीय अखबारों में प्रमुखता से छपी है। शराब के नशे में धुत एक नेता ने रात को बच्चों को जगा-जगाकर पूछताछ की और एक युवती के साथ कुछ बदतमीजी भी की थी। इस बात की शिकायत बच्चों ने उस दिन भी की थी जब प्रदेश के गृहमंत्री ननकीराम कंवर मुख्यमंत्री निर्देश के बाद आश्रम की जांच-पड़ताल करने गए थे। यहां पहुंचकर गृहमंत्री ने एक चैनल वाले को छोड़ बाकी सबके सामने यह कहा कि आश्रम में कही कोई गड़बड़ी नहीं दिख रही है। उन्होंने साफ तौर पर कहा कि पूरे मामले को देखने पर लगता है कि आश्रम संचालक को फंसाया गया है। अभी छत्तीसगढ़ में विधानसभा का सत्र चल रहा है सो मामले की गूंज जोरदार ढंग से हुई। विधानसभा अध्यक्ष ने महिला एवं बाल विकास समिति को भी जांच का जिम्मा सौंप दिया है।

अभी हचचलें खत्म नहीं हुई है सो लोग इस कोशिश में लगे ही है कि किस तरह से नया बंवडर पैदा किया जाए।

Friday, March 12, 2010

कमीनों से मुकाबला -1

राजकुमार सोनी
यह मेरी भाषा नहीं है, लेकिन पिछले दिनों हुई एक घटना के बाद न जाने क्यों यह लगने लगा है कि यह सही भाषा है। अखबार के बाद इधर ब्लाग के मेरे थोड़े बहुत जो भी पाठक है वे यह सोच सकते हैं कि आखिरकार ऐसा कौन सा कारण है जिस वजह से मुझे लिखना पड़ रहा है कि मुकाबला कमीनों से है, लेकिन राजधानी रायपुर के अनाथ आश्रम में बच्चों के साथ जो कुछ हुआ है और हो रहा है उसके बाद तो मैं यकीन के साथ कह सकता हूं कि इस बार की लड़ाई में सचमुच मेरा पाला कुछ ऐसे कमीनों से पड़ गया है। ऐसे कमीनों से जिनका वाकई कोई दीन-ईमान नहीं है। मुझे कमीनों से लड़ने में मजा आता रहा है। अपने उतार-चढ़ाव भरे जीवनकाल में मैं भांति-भांति के कमीनों से मिल चुका हूं। घाट-घाट का पानी पीकर लोगों का जीना मुहाल करने वाले कमीने चाहे जैसे भी थे उसूल वाले थे। जीवन में पहली बार ऐसे कमीनों से मुलाकात हो रही है जिन्हें देखकर मैं क्या कोई भी यह कहने का मजबूर हो जाएगा कि बस अब इस धरती का अंत निकट है।

आइए आप भी कमीनों की कमीनगी के बारे में जाने।
जीवन में पहली बार ऐसे कमीनों से मुलाकात हो रही है जिन्हें देखकर मैं क्या कोई भी यह कहने का मजबूर हो जाएगा कि बस अब इस धरती का अंत निकट है।
मित्रों अब से दो-चार दिन पहले मैंने बताया था कि किस तरह से एक निजी चैनल ने कुछ छुटभैय्ये नेताओं के साथ मिलकर एक अभियान चलाया और एक अनाथ आश्रम चलाने वाले के बारे में यह अफवाह फैलायी कि वह बच्चा बेचता है। धीरे-धीरे जब अभियान की सच्चाई सामने आ रही है तब पता चल रहा कि मामला तो कुछ और है। अभियान के बाद अब ज्यादातर लोग यही बात कह रहे हैं कि चूंकि आश्रम के बच्चों ने देश की महान नेत्री का विरोध किया था फलस्वरुप उन्हें उनके किए की सजा भुगतनी पड़ रही है। आश्रम में नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बेसहारा हो चुके बच्चे रहते हैं। इन बच्चों में से कुछ ने नेत्री को तब पकड़ लिया था जब वे यहां राजधानी में मानवाधिकारों की रक्षा विषय़ पर लेक्चर पिलाने आयी थी। इस महान नेत्री से बच्चों ने पूछ लिया था- दीदी हमारे अधिकारों की रक्षा के बारे में भी तो सोचो। हमारे मां-बाप को नक्सलियों ने मारा है। बताते हैं कि यह घटना कुछ लोगों को बुरी लगी और उसके बाद रचा जाने लगा एक चक्रव्यूह।

पिछली बार भी जब मैंने अपनी पोस्ट में लिखा था कि आश्रम संचालक के साथ जो कुछ हुआ सो हुआ लेकिन बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोचा गया तब मेरे कुछ परिचितों ने बहुत नाराजगी दिखाई। इन सबको लगा कि मुझे केवल पत्रकारिता करनी चाहिए।
इस चक्रव्यूह को अमलीजामा पहनाने के लिए एक ऐसे आदमी की तलाश की गई जो पहले से ही बाल-बच्चेदार है। खोवा वाले से लेकर जूता पालिश वाले तक को ब्लैकमेल करने के लिए मशहूर हो चुका एक छुटभैय्या नेता इस शख्स का दोस्त है। उसने चैनल के साथ मिलकर योजना बनाई कैसे आश्रम के संचालक को फंसाना है। रो-धोकर शख्स ने किसी तरह से बच्चे को कब्जे में कर लिया और फिर चैनल में यह प्रसारित होने लगा कि राजधानी में बच्चों को बेचने वाला सौदागर मौजूद है। पिछली बार भी जब मैंने अपनी पोस्ट में लिखा था कि आश्रम संचालक के साथ जो कुछ हुआ सो हुआ लेकिन बच्चों के भविष्य के बारे में नहीं सोचा गया तब मेरे कुछ परिचितों ने बहुत नाराजगी दिखाई। इन सबको लगा कि मुझे केवल पत्रकारिता करनी चाहिए। जो कुछ चैनल दिखा रहा है मुझे उसका फालो करना चाहिए। एक भाई की तो सलाह यही थी कि मैं पार्टी बनने के बजाए चुपचाप वही करता चलूं कि सब कर रहे हैं। मैं भी वैसा ही लिखूं जैसा सब लिख रहे हैं। इस मामले में मुझे पता नहीं क्यों शुरू से लगता रहा है कि कही न कही कुछ गलत जरूर हो रहा है। इस पूरे मामले में क्या गलत हुआ है मैं इसका खुलासा करने जा रहा हूं।

इस मामले का सबसे खतरनाक पक्ष तो यही है कि राजीव गांधी के नाम से बने जिस संगठन ने छुपे हुए कैमरे से अभियान चलाया है उसके पास कोई लिखित शिकायत लेकर नहीं पहुंचा कि अमुक आश्रम में बच्चा बेचने का गोरखधंधा करता है। यदि यह संगठन अपने दोस्त की शिकायत को अपने पास रख भी लेता है तो उस दोस्त को यह तो बताना ही होगा कि वह पहले पुलिस के पास क्यों नहीं गया। यदि कानून-व्यवस्था पर किसी का भरोसा नहीं भी है तो महानुभाव को कम से कम यह जानकारी तो देनी ही होगी कि उसने आश्रम संचालक के सामने फर्जी नाम का सहारा क्यों लिया। पाठकों को यह जानकार हैरत होगी कि जो शख्स आश्रम में बच्चा लेने गया था उसने अपना नाम गलत बताया और पहचान छिपाई थी। आश्रम के संचालक और बच्चा बेचने वाले के बीच बच्चे को लेकर किसी तरह का कोई दस्तावेजी अनुबंध भी नहीं हुआ है जिससे यह प्रमाणित होता हो कि बच्चा बेचने की कोशिश की गई है। केवल एक सीडी में कुछ खास बातों को रेखांकित कर देने से तो यह नहीं माना जा सकता कि कोई बच्चा बेचने के गोरखधंधे में संलिप्त है। पूरी सीड़ी की बातचीत में से अपने काम की चीज को निकालकर प्रसारित कर देने की कला अब बहुत पुरानी हो चुकी है। एक बार फिर जब मैं यह बताने की कोशिश कर रहा हूं कि गलती कहां पर हुई है तो शायद मेरे अजीज यह सवाल उठाने लगे कि मै आश्रम संचालक को बचाने में क्यों लगा हूं। मैं पत्रकारिता के पेशे में जुटे छोटे महानुभावों से लेकर बड़े तमाम महानुभाव को यह बता देना चाहता हूं कि आश्रम के संचालक से न तो मेरी कोई दोस्ती है न यारी, मै सिर्फ इतना जानता हूं कि उसके आश्रम में मासूम बच्चे रहते हैं। वे मासूम बच्चे जिनकी एक हंसी से पृथ्वी बच सकती है और जिनके टपके हुए एक आंसू से इस धरती में जलजला भी आ सकता है।

पुलिस ने आश्रम के संचालक को धारा 372 के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा है। यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई किसी नाबालिग को वेश्यावृति के लिए बेचता है। या फिर भाडे़ में देता है। क्या एक 20 दिन की लड़की वेश्यावृति कर सकती है।
तो पाठकों मैं अभियान चलाने वालों से यह पूछना चाहता हूं कि जब आप गुप्त कैमरों अभियान चला रहे थे तब क्या आपने कभी यह सोचा था कि यदि किसी आश्रम का गुरू जेल चला जाएगा तो उस आश्रम में राशन-पानी की व्यवस्था कौन करेगा। गुरूजी के जेल चले जाने के बाद आश्रम के बच्चे दो दिनों तक भूखे थे। क्या हम मीडिया में इसलिए आएं है कि लोगों को भूखा मारे। यदि हमने लिखना पढ़ना सीख लिया है या जान लिया है तो क्या हम लोगों को तलवार ही घोंपते चलेंगे। अनजाने में न जाने हमसे कितने अपराध हो ही जाते हैं। हमारे काले अक्षर कई घरों में अँधेरा करने के लिए पर्याप्त है, लेकिन भाइयों जानबूझकर अंधेरा करना कहां का न्याय है। वह भी उन लोगों के साथ जिनके मां-बाप इस दुनिया में नहीं है। जिन्होंने हमारा कुछ नहीं बिगाड़ा हम उनका बिगाड़कर कौन सी पत्रकारिता करना चाह रहे है। पाठकों चैनल कई दिनों से बच्ची को बेचने की खबर तो दिखा रहा है लेकिन उसने एक दिन भी यह नहीं दिखाया कि आश्रम के बच्चे किस दशा में है। चैनल का यह अभियान यह बताता है कि उसकी नीयत कैसी है और वह क्या करना चाहता है।

पूरे आपरेशन को यदि हम एक सरसरी निगाह से भी देखेंगे तो पाएंगे कि आपरेशन चलाया ही इसलिए गया था ताकि आश्रम संचालक को फंसाया जा सकें। आश्रम संचालक के बारे में यह कहा जा रहा है कि उसने बच्चा बेचने के एवज में ढाई लाख रुपए लिए। यह पैसे किसने दिए उस शख्स ने जिसका नाम ही गलत था। या उस शख्स ने जिसका नाम सही है। पता चला कि संचालक को जो चेक दिया गया वह किसी और का था और उस पर दस्तखत किसी और के थे। यानी फर्जीवाडे की शुरुआत तो खुद अभियान चलाने वालों ने की है।  बच्चा मांगने वाला जब पुलिस में रपट लिखाता है तो वह कुछ और बन जाता है। मजे की बात यह है कि पुलिस रपट लिख भी लेती है। अपनी रपट में पुलिस उस धारा का इस्तेमाल भी करती है जो धारा एक 20 दिन की बच्ची के लिए की ही नहीं जा सकती। क्या आप जानते हैं कि पुलिस ने टंटपूजिए नेताओं के इशारे पर जो धारा लगाई है वह क्या है। पुलिस ने आश्रम के संचालक को धारा 372 के तहत गिरफ्तार कर न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा है। यह धारा तब लगाई जाती है जब कोई किसी नाबालिग को वेश्यावृति के लिए बेचता है। या फिर भाडे़ में देता है। क्या एक 20 दिन की लड़की वेश्यावृति कर सकती है।

बच्ची को बेचना भी तब माना जाता जब आश्रम संचालक को रकम प्राप्त हो जाती। इस मामले में फर्जी बाप (राजेंद्र गौतम) ने तो भुगतान ही नहीं किया। बताते है कि आश्रम संचालक अपने आश्रम के नाम से ही चेक लेना चाहता था, लेकिन चेक देने वाले सेल्फ चेक काटकर उससे यह कहा कि अब आपको दे रहा हूं तो पैसा आश्रम में ही जाएगा न। यानी फंसाना था इसलिए सेल्फ चेक देने की स्कीम बनाई गई।

तो पाठको.. करने के लिए मैंने अपने प्रेस से एक हप्ते की छुट्टी ली है। मेरी इस छुट्टी पर मेरे एक साथी मित्र की टिप्पणी मिली थी कि पत्रकार को अपना काम चुपचाप करते रहना चाहिए और सबसे पहले उस संस्थान के बारे में सोचना चाहिए जहां से उसे रोजी-रोटी मिलती है। मैं अपने साथी पत्रकार को बताना चाहता हूं कि मुझे अपनी रोजी की चिन्ता भी है और रोटी की भी। मुझे लगा कि जब मैं कमीनों से मुकाबले के लिए निकलूंगा तो थोड़ी अतिरिक्त ताकत लगेगी। वक्त तो लगेगा ही। यदि संस्थान का काम करते हुए यह सब करूंगा तो शायद कुछ लोगों को यह कहने का अवसर भी मिलेगा कि देखो संस्थान के साथ गद्दारी कर रहा है। लेकिन मैं बता देना चाहता हूं कि मेरा यह अवकाश मेरे प्रबंध संपादक हिमांशु जी ने यह सोचकर ही मंजूर किया है कि शायद मैं थोड़ा संवेदनशील हूं और मामला भी संवेदनशील हूं। मैं कमीनों से मुकाबले के लिए निकला हूं। अभी इस मामले में मैं और लिखूंगा। क्या कमीनों के इस मुकाबले में आप मेरे साथ हैं। यदि हां तो चलिए जिन लोगों ने बच्चों को रूलाने का काम किया है हम उनसे हिसाब-किताब मांगे।

घर से मसजिद है बहुत दूर, चलो यूं कर ले
किसी रोते हुए बच्चे को हंसाया जाए।

Wednesday, March 10, 2010

इंकलाब जिंदाबाद


राजकुमार सोनी
31 जुलाई 1939 को महासमुंद के एक सामान्य परिवार में जन्मे मोहम्मद याकूब राजवानी जब मात्र आठ साल के थे तब उन्हें घर के बड़े -बूढ़ों की कहानियों को सुनने के अलावा देश को खुली हवा में सांस लेते हुए देखने का सुख मिला था। 15 अगस्त 1947 को जब हर बच्चा सड़क पर वंदे मातरम् कहते हुए दौड़ रहा था तब तिरंगा थामे सड़क पर एक लंबी छलांग उन्होंने भी लगाई थी। उनकी रुचि आजादी का शेयर होल्डर बनकर ताम्रपत्र और पेंशन हासिल करने में नहीं थी सो वे जेपी के विचारों से प्रभावित होते चले गए और 13 साल की आयु में ही सक्रिय राजनीति में कूद पड़े। देखते ही देखते वे जन आंदोलनों के अगुवा नेता बन गए और नतीजा यह हुआ कि 25 जून 1975 को आपातकाल लागू होने के ठीक एक दिन बाद महासमुंद शहर को बंद करने के आरोप में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया। जेल में दो महीने सोलह रोज की सजा काटने के बाद एक वक्त ऐसा भी आया जब उन्हें अपने राजनीतिक गुरू जीवनलाल साव के खिलाफ चुनाव लड़ने का फैसला करना पड़ा। 1977 का वह समय एक ऐसा समय था जब हर आदमी का गुस्सा जायज ठिकाने की तलाश कर रहा था। घर के 14 सौ रुपए और बीड़ी बनाने वाले मजदूरों की मेहनत से एकत्रित किए गए आठ हजार छह सौ रुपयों की बदौलत उन्होंने श्री साव से टक्कर लेने की हिमाकत की। उन्हें चुनाव लड़ता देख राजनीति के कई धुरन्धरों ने कहा था कि इलाके के 80 हजार वोटरों में केवल 12 सौ वोटर मुस्लिम हैं। इतने कम मुस्लिम वोटरों के भरोसे क्या वे चुनाव जीत पाएंगे? लेकिन तब शायद कम से कम महासमुंद की फिजाओं में मुल्ला और पंडित को जंग लगा खंजर थमाने वाली जहरीली हवा मफलर लपेटे नहीं घूमा करती थी। करीब 68 सौ वोटों से चुनाव में फतह हासिल करने के बाद जब याकूब राजवानी अपने प्रशंसकों के बीच पहुंचे तो सबने उन्हें फूलमालाओं से लाद दिया। सब खुश तो थे ही लेकिन सबसे ज्यादा खुशी उनकी पत्नी कुलसुम की आंखों में देखने को मिली थी, जो छोटे-बड़े हर संघर्ष में उनके साथ थीं। जब वीरेंद्र कुमार सकलेचा मुख्यमंत्री बने तब उन्हें खनिज, पुनर्वास वक्फ और उर्दू मामलों का कैबिनेट मंत्री बनाया गया। व्यवस्था में नए परिवर्तन को व्याकुल याकूब राजवानी की आंखों में एक समाजवादी सपना तैर ही रहा था कि एक दिन.....

जिंदाबाद के लिए इंकलाब
29 अक्टूबर 1979 दिन मंगलवार को मध्य प्रदेश विधान सभा अध्यक्ष नेवालकर के सम्मुख एक आवाज गूंजी-आदरणीय अध्यक्ष महोदय मैं आज सखलेचा सरकार के सामने अपने इस्तीफे पर रोशनी डालने के लिए खड़ा हुआ हूं। हकीकत तो यह है कि इस सरकार से मेरा इस्तीफा कोई सहज और स्वाभाविक प्रक्रिया के अंतर्गत नहीं हुआ बल्कि इसके पीछे एक ऐसी घिनौनी साजिशें काम करती रही हैं,जिन्होंने शुरु से ही मेरे जैसे लोगों के लिए काम करना बिल्कुल दुश्वार कर दिया था। अध्यक्ष महोदय मैं दूसरी आजादी के अलमदारों से कहना चाहता हूं कि जनता पार्टी की स्थापना बड़े नेक इरादों के साथ लोकनायक जयप्रकाश की अगुवाई में आम जनता के लंबे संघर्ष, त्याग और राममनोहर लोहिया के इंकलाबी विचारों के साथ हुई थी। हमने जब राजघाट पर कसम ली थी तब सबने बड़े फख्र के साथ यह दोहराया था कि हम अपने देशवासियों की सेवा करेंगे और जो सबसे कमजोर और गरीब है उस पर सबसे ज्यादा ध्यान देंगे लेकिन अफसोस के साथ कहना पड़ रहा है कि मुख्यमंत्री वीरेंद्र कुमार सकलेचा ने हमारे नेताओं के सभी पाक इरादों और मसंूबों को धूल में मिला दिया है। अध्यक्ष महोदय मैं मुख्यमंत्री का शुक्रिया अदा करना चाहता हूं कि उन्होंने मुझे कैबिनेट में जगह दी और इस बात के लिए भी उनका शुक्रिया अदा करता हूं कि मैं दमतोड़ माहौल से जल्दी निजात पा गया। मैं अब स्वच्छ ताजी फिजां में पूरे आत्मसम्मान के साथ सिर ऊंचा कर चल सकूंगा और बेबस गरीबों, हरिजन, आदिवादियों की तकलीफों में हिस्सा बंटा सकूंगा। याकूब राजवानी ने अपने आठ पेज के इस्तीफे में बहुत सी बातों का जिक्र किया लेकिन सबसे अहम मसला अल्पसंख्यकों के सम्मेलन और उन पर मुख्यमंत्री द्वारा लगातार डाले जा रहे दबाव से ही संबंधित था। सदन में उनके इस्तीफे से पहले तो सन्नाटा छाया.. और फिर जोरदा तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। यह गड़गड़ाहट उन्हें आज भी सुनाई देती है। तब कांग्रेस के कद्दावर नेता अर्जुन सिंह भी उनकी पीठ थपथपाने में पीछे नहीं थे। इस घटना के बाद याकूब राजवानी ने दो मर्तबा निर्दलीय प्रत्याशी की हैसियत से चुनाव भी लड़ा लेकिन उन्हें सफलता नहीं मिल पाई। सपने को टूटने से बचाने के लिए उन्होंने कांग्रेस का दामन थाम लिया।

मैं लौटूंगा...
मैं याकूब राजवानी जो इन दिनों महासमुंद में अपने परिवार और बच्चों के बीच रहता है, सत्य और निष्ठा के साथ बताना चाहता हूं कि इस देश को राजनेताओं ने गर्त में डाल दिया है। जिन्होंने मीसा के दौरान एकाध डंडा खा लिया होगा सरकार उन्हें पेंशन दे रही है। जिन किसानों की जमीन सड़कों के किनारे थी उन्हें भू-माफियाओं ने लील लिया है। राजनीति को पेशेवर लोगों ने धंधा बना दिया है। ऐसा क्यों हुआ मुझे नहीं मालूम लेकिन मैं समझता हूं कि शायद सबने अपना रेट फिक्स कर रखा है। जनता को भी आन्दोलनों की जरूरत नहीं है क्योंकि वह भी आंदोलनों का रेट जान चुकी है। मेरी इन बातों का यह अर्थ नहीं निकाला जाना चाहिए कि मैं निराश हो चुका हूं। शुगर, किडनी, आंख की न जाने कितनी बीमारियों ने मुझे घेर रखा हैं। वर्ष 1987 में मैंने सिगरेट छोड़ दी थी उसके बाद से मुझे दो इंजेक्शन लगते हैं। हर रोज नौ से दस टेबलेट खानी पड़ती है। मैं बीमार और बूढ़ा जरूर हुआ हूं, लेकिन मुझे यकीन है किसी दिन कोई और याकूब लौटेगा। हजारों-हजारों हाथों के साथ आंदोलनों में इन्कलाब-जिन्दाबाद करते हुए। लड़ने और जूझने वाले लोग फिर से नजर आएंगे क्योंकि मैं मानता हूं बदलाव लड़ने से ही आता है कुर्सी के पीछे खड़े रहने और चिपकने से नहीं।

Sunday, March 7, 2010

चमगादड़ की तरह लटका हुआ सवाल

राजकुमार सोनी

पिछले दिनों छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में हुई एक घटना ने बहुत से लोगों को विचलित करने का काम किया है। एक चैनल ने अपने समाचार में यह दिखाया कि एक आश्रम के संचालक ने किस तरह से एक मासूम बच्ची का सौदा कर उसे कुछ छुटभैय्ये नेताओं के हवाले किया। घटना के बाद कई तरह की बहस चल पड़ी है। अब तक यही होता आया है कि जब कभी भी किसी आश्रम में पुलिस की छापामार कार्रवाई हुई है तब वहां काम करने वाले लोगों ने पोल खोलनी शुरू की है, लेकिन इस मामले में ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। जब आश्रम के बच्चों कुछ लोगों ने बातचीत की तो वहां एक-एक बच्चे ने रोते हुए बताया कि उनके गुरूजी किस तरह से उन्हें पालने-पोसने का काम करता रहा है। एक बच्चे के बयान पर यकीन करें तो आश्रम संचालक द्वारा उन शादियों से भी बचा हुआ खाना बटोरा जाता था जहां भोजन को फेंकने का शौक रखने वाले लोग पहुंचते रहे हैं। गुरूकुल आश्रम के इस संचालक के बारे में यह भी छपा कि वह पहले कालेज में काम करता था लेकिन पिछले कुछ सालों से गायब है। किसी ने यह भी लिखा कि वह एक मंत्री का पीए रह चुका है। मेरे एक अत्यंत करीबी से जब मैंने आश्रम संचालक के बारे में बातचीत की तो वे एकदम से नाराज हो गए और उन्होंने मुझे भी चेताया कि वह आश्रम संचालक उतना नजदीक से नहीं जानते जितना वे स्वंय जानते हैं। मैं अपने परिचित की बातों पर इसलिए भी तैयार हो गया क्योंकि हमेशा से मेरा यह मानना रहा है कि अनुभव की गठरी केवल हमारे पास ही नहीं है। जो लोग पत्रकारिता में हमसे पहले आएं हैं जाहिर सी बात है दुनिया की अच्छी-बुरी बातें वे हमसे थोड़ा जानते ही होंगे। खैर.. बात चल रही है आश्रम की तो पाठकों को थोड़ा बताना कतई बुरा नहीं होगा।

एक आश्रम में कुछ छुटभैय्ये नेता एक चैनल की मदद से एक बच्चे को खरीदने के लिए ढाई लाख रुपए का चेक देते हैं और उसके बाद आश्रम का संचालक स्वयं को बचाने में लग जाता है और बाकी लोग उसे फंसाने में लग जाते हैं। एक कहता है कि आश्रम का संचालक बच्चों का सौदा करता है तो संचालक कहता है मैंने कभी सौदा नहीं किया। कुछ लोग उसके पास बच्चा गोद लेने के लिए के आए थे। एक छुटभैय्ये नेता ने जैसे ही बच्चे को देखा तो वह फफककर रोने लगा। बच्ची को गले लगाते ही उसने कहा कि उसे जीवन हासिल हो गया है। संचालक ने जब उसे बच्चा सौंपा तो साथ में यह भी कहा कि आप जिस बच्ची को ले जा रहे हैं उसका तो जीवन बच जाएगा लेकिन आश्रम में और भी बच्चे हैं यदि आप उनके लिए कुछ कर देते हैं तो उनका जीवन भी सुधर जाएगा। इस पर बच्ची गोद लेने वाले ने उसकी यह मांग मान ली कि वह आश्रम के बच्चों के लिए कुछ कर देगा। बाद में दोनों के बीच यह तय होता है कि बच्चा गोद लेने वाला चेक देगा और आश्रम का संचालक उस पैसे से आश्रम का विस्तार करेगा। दोनों के बीच का यह सौदा उस वक्त सनसनी बन जाता है जब चैनल से रिपोटर यह चिल्लाने लगता है-राजधानी में बच्चों को बेचने वाले शैतान मौजूद हैं। सब सन्न रह जाते हैं।

इस खबर के चलने से पहले टीआरपी की दौड़ में छलांग लगाने वाला एक चैनल यह खबर दिखाने लगता है कि हकीकत वैसी नहीं है। यदि आश्रम का संचालक बच्चे को बेचता तो चेक से ही रकम क्यों लेता। इससे पहले कि कोई दूसरे चैनल की बातों पर यकीन करता, यह खबर भी बड़ी तेजी से फैल जाती है कुछ लोग सीडी लेकर पुलिसवालों के पास चले गए हैं और आश्रम संचालक जेल में डालने की मांग करने लगे हैं। इस मांग के साथ ही यह बात भी बड़ी तेजी से फैलती है कि अब तो पत्रकारिता में यह नया फंडा सामने आ गया है कि पहले तो खबर छापो या दिखाओ और फिर कार्रवाई के लिए पुलिस को ज्ञापन भी सौंपों।

इन सारी बातों से अलग मैं मात्र इसलिए विचलित हूं कि मीडिया ने तो अपना काम कर दिया। नेता भी भंडाफोड़ करके खुश हो गए। अब अनाथ आश्रम के उन बच्चों का क्या होगा जो एक बार फिर अनाथ हो गए हैं। जो कुछ मुझे पता चला है उसके मुताबिक बच्चों ने अपने गुरूजी के जेल चले जाने के बाद खाना-पीना छोड़ दिया है। कुछ कहते हैं कि गम में छोड़ दिया है तो आश्रम की एक सायानी हो चुकी लड़की बताती है कि राशन ही खत्म हो गया है। इधऱ-उधर से मांगकर काम चलाया जा रहा है। समाज कल्याण विभाग वहां झांकने नहीं जा रहा है तो किसी और को भी यह जानने की फुरसत नहीं है अचानक मासूमों की हंसी क्यों बंद हो गई। इसकी चिन्ता उन्हें भी नहीं है जो बाल-बच्चेदार है। शायद मुझे भी नहीं...मैं भी तो दोषी हूं।

Friday, March 5, 2010

नक्सली

राजकुमार सोनी
अब इसे कोई सामन्ती मानसिकता कहे या कुछ और लेकिन यह सच है कि जैसे ही लोगों को यह पता चलता है कि अमुक व्यक्ति ठाकुर है तो एकबारगी यह जरूर लगता है कि सामने वाला थोड़ा खास ही होगा। कोई न कोई बात तो ऐसी होगी जो उसे औरों से थोड़ा अलग करती होगी। पता नहीं यह बात प्रचलन में आ चुकी है या फिर परम्परा बन गई है, लेकिन ठाकुर शब्द के साथ प्राय: साहब जुड़ता ही रहा है। रमेश सिप्पी की फिल्म शोले के ठाकुर को फिल्म के सभी पात्रों ने फिल्म खत्म होने के बाद भी सम्मान देना जारी रखा था। शायद ऐसा इसलिए भी हो पाया था क्योंकि संजीव कुमार एक उम्दा अभिनेता तो थे ही उससे कही ज्यादा उन्होंने ठाकुर की भूमिका के साथ न्याय भी किया था। पूरी फिल्म में उन्होंने यही संदेश देने का प्रयास किया था कि एक असली ठाकुर टूट सकता है, लेकिन झुक नहीं सकता। अन्याय के आगे नहीं झुकने के सकारात्मक भाव के चलते ही शायद ठाकुर के पीछे ‘साहब’ जैसा शब्द चस्पा होता रहा है, लेकिन कुछ ऐसे ठाकुर भी रहे हैं जिन्हें साहब शब्द से एलर्जी रही हैं। ऐसे ठाकुर अपनी मूंछों को ऐंठते हुए गांव की बहु-बेटियों का बलात्कार करते रहे हैं। किसानों का अनाज लूटते रहे हैं। ज्यादा हुआ तो हवाई फायर करते रहे हैं और चमड़े की बेल्ट निकालकर लोगों को पीटते रहे हैं।
अभी दो दिन पहले बुंदेलखंड के एक ठाकुर ने भी बस्तर में यही किया है। बुंदेलखंड के इस ठाकुर(असली नाम कमलेश ठाकुर) को शासन ने कुछ अरसा पहले खाकी वर्दी दी थी। वर्दी के साथ-साथ दिन-रात शराब के नशे में धुत्त रहने वाले इस थाना प्रभारी ने होली के ठीक दूसरे दिन एक मामूली से विवाद में न केवल लोगों को दौड़ा-दौड़ाकर पीटा बल्कि वर्दी उतारकर लोगों को यह भी बताया कि वह बुंदेलखंड का ठाकुर है। जो कोई भी उसके पीछे लगेगा, वह उसका हुलिया बिगाड़ देगा। अपने ठाकुर टीआई की शह पाकर वे पुलिस वाले जो ठाकुर नहीं थे, उन्होंने भी लोगों की जमकर धुनाई की। पूरे मामले में कोई ऐसी बात नहीं थी जिसे संभाला नहीं जा सकता था, लेकिन जब किसी के भीतर का ठाकुर जागृत हो गया हो तो कोई क्या कर सकता है? किरन्दुल में कुछ ट्रक चालकों के साथ साइड न देने के नाम पर विवाद हुआ था। विवाद इतना अधिक बढ़ गया कि करीब पचास से अधिक जवानों ने दो घंटे तक किरन्दुल नगर में आम लोगों पर न सिर्फ अंधाधुंध लाठियां भांजी, बल्कि थाना प्रभारी के निर्देश पर पचास राउण्ड गोलियां भी चलायीं। इस घटना के बाद पुलिस महकमे की जमकर थू-थू हुई है और लोग यह कहने को मजबूर हुए हैं कि नक्सलियों के आगे घुटने टेकने को मजबूर हुई पुलिस केवल निहत्थे लोगों पर ही अपनी ताकत की आजमाइश कर सकती है।
बस्तर जहां नक्सलवाद की चुनौती विरासत में मिली है वहां इस तरह की घटना का हो जाना यही दर्शाता है कि छत्तीसगढ़ पुलिस अनुशासन को खुंटी में टांगकर काम करती है। वैसे तो हर इलाके की पुलिस अनुशासन को जूते की नोक पर रखकर ही काम करती है लेकिन छत्तीसगढ़ राज्य बन जाने के बाद से यहां पुलिस का चेहरा बदला सा है। पुलिस नक्सलियों से लड़ने के मोर्चे पर असफल दिखाई देती है लेकिन आम नागरिकों, मजदूरों और किसानों पर उसका गुस्सा जमकर उतरता है। राजधानी के तेलीबांधा इलाके के लोग जब अतिक्रमण हटाने का विरोध कर रहे थे तब पुलिस ने क्या किया था, यह किसी छिपा नहीं है। इसी तरह धमतरी में प्रदर्शनकारी किसानों पर बरसाई गई लाठियों की गूंज अभी भी विधानसभा में सुनाई दे जाती है। दवा-दारू लेने के लिए जाते हुए लोगों पर लाठियां भांजना तो जैसे पुलिस का शौक बन गया है। शायद ही कभी किसी ने सोचा हो कि लोग हर-दूसरे दिन थाना क्यों घेरते हैं? जाहिर सी बात है कि पुलिस ने लोगों को न्याय देने के बजाए अपने आपको प्रताड़ित करने वाले केंद्र के रूप में बदल लिया है। प्रताड़ना के इस केंद्र के खिलाफ कभी कोई आवाज उठाता है तो फिर पुलिस को लगता है कि नक्सल प्रभावित राज्य के जनप्रतिनिधि, यहां के नागरिक उनका मनोबल तोड़ने में लगे हुए हैं। शायद ही ऐसा कोई उदाहरण देखने को मिलता हो जब किसी पुलिसवाले की करतूत पर किसी बड़े अफसर ने तुरन्त ही कार्रवाई करने का आदेश जारी किया हो। कई बार तो प्रदेश के गृहमंत्री ही कह चुके हैं कि उनकी पुलिस गलतियों पर पर्दा डालने का काम करती है। यदि किसी एक अफसर को सस्पेंड करने की बात करो तो दूसरा अफसर तुरन्त ही उसके समर्थन में यह कहते हुए खड़ा हो जाता है कि ‘सर जाने दीजिए अब नहीं करेगा.. मैं समझा दूंगा। आदमी है सर गलती हो जाया करती है।’ यदि हम किरन्दुल की घटना को ही देखें तो यह जानकार घोर आश्चर्य होता है कि एक शराबी थानेदार अपने सहकर्मियों के साथ सड़क पर हंगामा मचाता रहा और राजधानी के बड़े अधिकारी पूरे चौबीस घंटे तक सोते रहे। कोई यह मानने को तैयार ही नहीं था कि थाना प्रभारी कमलेश ठाकुर शर्ट खोलकर छाती पीटते हुए लोगों पर रिवाल्वर भी तान सकता है? दंतेवाड़ा एसपी अमरेश मिश्रा ने मामले में लिप्त उत्पाती जवानों को तो सस्पेंड कर दिया था लेकिन कवि हृदय पुलिस महानिदेशक विश्वरंजन के आदेशों का पूरी तन्मयता के साथ पालन करने वाले श्री मिश्रा का दिल भी यह मानने को तैयार नहीं था कि उनका थानेदार जो दिन के समय बेहद आज्ञाकारी रहता है वह सरेराह चमड़े की बेल्ट निकालकर लोगों की धुनाई कर सकता है। उन्हें भी टीआई के ऊपर कार्रवाई करने में वक्त लग गया। शायद यह कार्रवाई होती भी नहीं यदि आम लोग चक्का जाम नहीं करते और एनएमडीसी के कर्मचारी काम बंद नहीं करते। दरअसल पुलिस के जवानों ने एनएमडीसी के कर्मचारियों को उनके आवास में घुसकर पीटा था। इस हरकत से सारे कर्मचारी सड़क पर उतर गए थे।कई बार तो यही लगता है कि पुलिस के भीतर एक खौफनाक किस्म का ठाकुर हमेशा बैठा रहता है। यह ठाकुर अपनी वीआईपी डयूटी लगने से परेशान होकर खीझ उठता है। नेताओं-मंत्रियों की झिड़कियों और गालियों को सुनकर गुस्से में आ जाता है। लगातार ड्यूटी करते रहने के बाद जब ढेर सारे ठाकुर एक साथ मिलकर हल्क तक महुआ उड़ेलते हैं तो फिर उसके निशाने पर झोला लेकर राशन दुकान जाने वाला आम आदमी ही होता है और फिर एक दिन यही आम आदमी झोले के बजाय गुप्ती या भाला लेकर निकलता है तो पुलिस चिल्लाने लगती है-नक्सलवाद गांव से शहर की ओर पसरने लगा है। नक्सली उनकी ओर बढ़ रहे हैं।

Thursday, March 4, 2010

गंगा नाम है मेरा


राजकुमार सोनी
बात 1980 की है। झुमुकलाल भेड़िया के भोपाल स्थित मकान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह चुनावी बैठक ले रहे थे, तभी दुबली-पतली एक लड़की ने कमरे में प्रवेश किया और कहा- सर..मैं कांकेर की रहने वाली हूं और चुनाव लड़ना चाहती हूं। क्या मैं कांग्रेस की टिकट पर चुनाव लड़ सकती हूं? लड़की के बेहिचक कमरे में प्रवेश से अर्जुन सिंह भौंचक हुए। उन्होंने लड़की को सिर से पांव तक देखा और कहा कि यदि तुमने मेरे तीन सवालों का उत्तर दे दिया तो तुम्हारी टिकट पक्की। श्री सिंह ने लड़की से पहला सवाल पूछा कि क्या वह कभी जेल गई है? यदि नहीं तो क्या वह कांग्रेस की क्रियाशील सदस्य है? और तीसरा सवाल यह था कि उसे टिकट क्यों दी जाए? श्री सिंह के सवाल पर लड़की जरा भी मायूस नहीं हुई। उसने बगैर डरे बताया कि न तो वह जेल गई है और न ही कांग्रेस की क्रियाशील सदस्य है, लेकिन इतना तय है कि उसका पूरा परिवार कांग्रेस से जुड़ा हुआ है और उसमें इतनी हिम्मत तो है कि वह चुनाव लड़ सकती है। लड़की की साफगोई से श्री सिंह बेहद प्रभावित हुए और उन्होंने बगैर कोई भूमिका बांधे कहा- तुम चुनाव की तैयारी करो। तुम्हें टिकट के लिए दिल्ली भी जाने की जरूरत नहीं पड़ेगी। देखते ही देखते लड़की को टिकट मिल गई और वह चुनाव जीत भी गई।
चुनाव जीतने वाली यह लड़की कोई और नहीं बल्कि गंगा पोटाई है जो आज राजधानी के अम्लीहडीह में अपने पति और बच्चों के साथ रहती है। अपने गुरू अर्जुन सिंह के मार्गदर्शन में राजनीतिक पारी की शुरूआत करने वाली श्रीमती पोटाई ने जीवन में कई बार उतार-चढ़ाव का सामना किया, लेकिन कभी हिम्मत नहीं हारी। पोटाई को याद है जब वह पहला चुनाव जीतकर अपने क्षेत्र कांकेर पहुंची थी। कांकेर जो धीरे-धीरे कस्बे से शहर बनने की ओर तत्पर था वहां जैसे मेला लग गया था। हर कोई अपने इलाके की बेटी को सम्मानित करना चाहता था। गंगा ने खुली जीप या कार का उपयोग करने के बजाय पैदल मार्च करना जरूरी समझा। आदिवासी परम्परा का निर्वाह करते हुए कोई उन्हें मढ़िया का पेज पेश कर रहा था कोई कुलथी दाल और अमाड़ी भाजी से मुंह झुठाई की रस्म अदा करना चाहता था। हर घर से थोड़ा बहुत कुछ न कुछ चखते हुए गंगा ने अपने क्षेत्र के मतदाताओं का आभार व्यक्त किया था। वर्ष 1981 से लेकर 1990 तक का उनका पूरा समय सुनहरे हर्फ्रों में लिपटा हुआ है। इस दौरान उन्हें आदिम जाति,पशुपालन एवं महिला बाल विकास विभाग में मंत्री बनने का अवसर मिला। कहते हैं कि स्व. श्रीमती इंदिरा गांधी गंगा पोटाई से बेहद प्रभावित थीं। जब उन्होंने पहली बार विधायक रावटे को पराजित किया था तब श्रीमती गांधी स्वयं उन्हें शाबासी देने आदिवासी इलाके बस्तर आई थी। उनके काम को देखकर ही एक मर्तबा राजीव गांधी ने उनसे मिलने की इच्छा प्रकट की तो जब हाल के दिनों में राहुल गांधी बस्तर आए उन्होंने पूछा मुझे गंगा माई से मिलना है। वर्ष 1984 में जीवनलाल ठाकुर से दांपत्य सूत्र में बंधने के बाद जब वह चुनाव लड़ने की इच्छुक नहीं थी तब पार्टी ने उन्हें यह कहकर चुनाव मैदान में उतारा था कि यदि वे चुनाव नहीं लड़ेंगी तो उस इलाके से पराजय निश्चित है। पार्टी के कहने पर श्रीमती पोटाई चुनाव लड़ने को तैयार तो हो गई लेकिन वह पार्टी के सभी वरिष्ठजनों को यह नहीं बता पाई कि वह..... ...
वह गर्भवती है। चुनाव प्रचार के दौरान जब राजीव गांधी बस्तर क्षेत्र आए तो उन्होंने श्रीमती पोटाई की स्थिति पर चिन्ता जताई। तब उन्होंने पार्टी के सभी बड़े नेताओं के समक्ष यह कहा था कि-क्या हम वास्तव में अन्याय नहीं कर रहे? गर्भावस्था में ही श्रीमती पोटाई प्रचार-प्रसार के लिए घर से बाहर निकलती रही। इस अवस्था में उनकी मेहनत को देखकर विरोधी दल से जुड़े लोग यह कहने से भी नहीं चूके कि -देखो मां के साथ बेटा भी प्रचार के लिए निकला है। विरोधियों की यह भद्दी टिप्पणी जनता को रास नहीं आई। श्रीमती पोटाई जहां कही भी प्रचार के लिए जाती तो जनता ही कहती अपना ख्याल रखो। धूप में ज्यादा मत निकलो और नतीजा यह हुआ कि श्रीमती पोटाई एक बार फिर चुनाव जीत गई। 14 मार्च 1985 की सुबह वोरा मंत्रिमंडल में शपथ लेने के कुछ देर बाद ही उन्हें भोपाल के सुल्तानिया अस्पताल में दाखिल होना पड़ा। देर शाम को उनके शुभचिंतकों को यह खबर मिली कि श्रीमती पोटाई एक खूबसूरत बच्चे की मां बन गई है। श्रीमती पोटाई ने 85 से लेकर 90 तक बाकायदा बच्चे के साथ कैबिनेट मंत्री के रूप में अपनी जवाबदारी का बखूबी निर्वाह किया लेकिन 90 के बाद उनका राजनीतिक जीवन बवंडर में फंसने लगा। वर्ष 1990 के बाद उन्होंने जो चुनाव लड़ा उन्हें सफलता नहीं मिली। जब अर्जुन सिंह और एनडी तिवारी ने मिलकर तिवारी कांग्रेस बनाई और माधवराव सिंधिया ने विकास कांग्रेस पार्टी तब उन्हें जगदलपुर से प्रत्याशी बनाया गया था। इस चुनाव में वह कांग्रेस प्रत्याशी को पीछे धकेलने में सफल तो रही लेकिन, स्वयं भी जीत नहीं पाई। जब राज्य का निर्माण हुआ तो वह अपने पति के साथ छत्तीसगढ़ चली आई। वर्ष 2003 के लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा के प्रत्याशी सोहन पोटाई के खिलाफ चुनावी समर में उतारा गया। इस चुनाव में भी उन्हें सफलता नहीं मिली।
हाल के विधानसभा चुनाव में जब पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी अपने खास समर्थक मनोज मंडावी के लिए टिकट चाहते थे तब वरिष्ठ नेता अर्जुन सिंह ने गंगा पोटाई को टिकट दिलाई। नतीजा यह हुआ कि मनोज मंडावी ने बागी होकर चुनाव लड़ा और एक बार फिर श्रीमती पोटाई के हिस्से हार ही लगी। पिछले दिनों जब कांग्रेस भवन में कांग्रेस की पराजय को लेकर समीक्षा बैठकों का दौर चला तब श्रीमती पोटाई ने यह कहकर भी सनसनी फैलाई कि यदि जोगी चाहते तो वे चुनाव जीत सकती थीं। कांग्रेस की हार के लिए उन्होंने सीधे तौर पर जोगी को जिम्मेदार ठहराया। उन्होंने कांग्रेस के कई बड़े नेताओं के समक्ष यह कहा कि बहनी-बहनी कहने वाले जोगी ने एक बार भी उनके क्षेत्र में आकर यह कहने की जरूरत महसूस नहीं की कि जिसे प्रत्याशी बनाया गया है वही असली प्रत्याशी है। 2009 में संपन्न ह्ए लोकसभा चुनाव के लिए उन्होंने टिकट के लिए कोई प्रयास नहीं किया। अब वे 15 दिनों अपने क्षेत्र में व्यतीत करती है तो 15 दिन अपने राजधानी स्थित घर में। राजनीति से मुक्ति तो नहीं मिली है, लेकिन अब घर में खाना बनता है। दो बच्चे गौरव और जयंत ठाकुर काफी बड़े हो गए हैं सो उनके साथ वक्त बीतता है। समय मिलते ही वह यह जरूर देखती है कि घर में टमाटर और धनियापत्ती की खेती कैसे की जा सकती है। श्रीमती पोटाई को बागवानी का शौक है। इस शौक को वह अब पूरा करने में जुटी हुई हैं। अभी ठहरी नहीं गंगा मैं गंगा आपको बताना चाहती हूं कि मैं और मेरा पूरा परिवार कांग्रेस के प्रति समर्पित रहा है। पार्टी ने मुझे बहुत कुछ दिया। माननीय अर्जुन सिंह की तो जैसे मुझ पर कृपा ही बनी रही। मैं लगातार क्यों हारती रही यह तो मैं भी नहीं जानती लेकिन मैं मानती हूं कि कई बार परिस्थितियां ऐसी बनाई जाती हैं कि चाहकर भी कुछ नहीं किया जा सकता। लगातार पराजय के बाद भी मैं नहीं मानती कि मेरा कुछ छिन गया है। टिकट का मिलना ही सब कुछ नहीं है। आगे भी टिकट नहीं मिली तो पार्टी जो जवाबदारी देती रहेगी उसका निर्वाह बेहतर ढंग से किया जाएगा। एक बात की तकलीफ जरूर होती है। चुनाव काफी महंगा हो गया है। मैंने पहला चुनाव साठ हजार रुपए खर्च कर जीता था। पिछले लोकसभा चुनाव में सत्तर लाख खर्च हो गए तब भी चुनाव नहीं जीत पाई। ऐसा क्यों हुआ यह चिन्तन का विषय है। पार्टी के सब बड़े नेता एकजुट होंगे ऐसा समझना थोड़ी भूल होगी, फिर भी यदि सब एकजुट हुए तो छत्तीसगढ़ क्या कांग्रेस को दुनिया में कोई पार्टी कभी पराजित नहीं कर सकती। अब तक अनुभव तो यही कहता है कि कांग्रेस को किसी दूसरी पार्टी का प्रत्याशी कभी नहीं हराता। खैर ... मैं गंगा हूं न अभी ठहरी हूं और न ही हारी हूं।

Tuesday, March 2, 2010

सादगी का औजार

राजकुमार सोनी

जब अटल बिहारी वाजपेयी की राजनीति उफान ले रही थी तभी गुलशन नंदा, रानू के पाठकों का एक नए लेखक से परिचय हुआ था। लेखक का नाम था-प्रेम बाजपेयी। (क्षमा करेंगे साहित्य के मूर्धन्य ऐसे लेखकों को लेखक मानने से इंकार करते हैं लेकिन यह भी एक हकीकत है कि मूर्धन्यों में से कइयों ने एक अकेला और आवारा बादल जैसे उपन्यासों को पढ़कर ही अपने लिखने-पढ़ने की शुरुआत भी की है) तो प्रेम के इस वाजपेयी को लोग अटलजी का रिश्तेदार समझते थे। हालांकि बहुत से लोगों का यह भ्रम बहुत जल्द ही टूट गया और उन्हें यह समझ में आ गया कि ये वाजपेयी वो वाजपेयी नहीं है। प्रेम के इस वाजपेयी का जिक्र इसलिए आ रहा है क्योंकि उधार का सिंदूर और भी न जाने क्या-क्या लिखने वाले भावनाओं के इस चितेरे लेखक ने रात का मसीहा नामक एक कहानी भी लिखी थी।

कहानी में दिल्ली के एक ऐसे डाक्टर के बारे में बताया गया था जो अपनी डिस्पेंसरी रात के दस बजे से सुबह चार बजे तक ही खुली रखता था। रात के अंधेरे में दवाखाने को खुला रखने के पीछे डाक्टर की मंशा यह नहीं थी कि वह ज्यादा पैसे कमाने का इच्छुक था बल्कि डाक्टर चाहता था किसी भी गरीब को मौत कम से कम काली रात में तो न दबोच सके। इस कहानी का जेहन में इतना ज्यादा असर पड़ा था कि जब कभी भी तबीयत खराब होती थी तो लगता था बस रात का मसीहा आएगा और सिर पर हाथ रखते ही बुखार छू-मंतर हो जाएगा। रात के मसीहे से मुलाकात तो नहीं हुई लेकिन धीरे-धीरे मसीहा शब्द का मतलब साफ होने लगा। भले ही खिचड़ी दाढ़ी के साथ टीवी पर राय देने वाले समीक्षक यह ऐलान कर दें कि अब मसीहा पैदा नहीं होते लेकिन दिल यह मानने को तैयार नहीं है कि सचमुच मसीहों की उत्पत्ति बंद हो चुकी है।

डाक्टर रमन सिंह को लोग अनेक उपाधियों से विभूषित करते हैं लेकिन जो लोग उनके स्वभाव के बारे में जानते हैं वे यह बात अच्छी तरह से जानते हैं कि किसी भी विशेषण से न वे खुश होते हैं न नाराज। सहज-सरल, सीधे, आत्मीय, मिलनसार, हंसमुख, चांउर वाले बाबा और भी न जाने कितनी उपाधियों से नवाजे जाने वाले डाक्टर रमन से जब कोई सामान्य आदमी मिलता है तो वह उसका ही होकर रह जाता है। यह चमत्कार क्यों और कैसे होता है इस पर विपक्ष का विश्लेषण जारी है। जब चुनाव का परिणाम भाजपा के पक्ष में आया और कांग्रेस में हार के कारणों की खोजबीन की जाने लगी तो कांग्रेस के ही एक जिम्मेदार पदाधिकारी की टिप्पणी सामने आई -कोई भले ही यह कह ले कि चुनाव तगड़े प्रबंधन से जीता जाता है लेकिन हकीकत यह है कि हम एक सीधे-सादे आदमी के मुकाबले दूसरा सीधा-सादा आदमी प्रस्तुत नहीं कर सके। हमारी दिक्कत यह थी कि हमारे पास एक भी ऐसा चेहरा नहीं था जिसकी बात पर लोग यकीन करते।

15 अक्टूबर 1952 को कबीरधाम (कवर्धा) जिले के ग्राम ठाठापुर (अब रामपुर) में एक कृषक परिवार में जन्मे डाक्टर रमन छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री बनेंगे यह तय नहीं था लेकिन कुछ बनेंगे यह उनके मित्र अच्छी तरह से जानते थे। डाक्टर रमन को बचपन से जानने वाले रवेल सिंह फुर्तीला बताते हैं कि खेल के शौकीन रमन जब मैदान पर आते थे तो उनमें गजब का आत्म विश्वास दिखता था। जब 27-28 लोगों को लेकर पार्टी से जुड़ने की बात आई तो भी वे कहा करते थे-आज हम लोग संख्या में कम जरूर है, लेकिन एक दिन हम अपनी पार्टी को बड़ा बनते हुए देखेंगे। प्रदेश में जब कोई भाजपा का अध्यक्ष बनने को तैयार नहीं था तब डाक्टर रमन ने इस जवाबदारी का बखूबी निर्वाह किया। 1975 में रायपुर के शासकीय आयुर्वेदिक महाविद्यालय से बीए एमएस की उपाधि प्राप्त करने के बाद डाक्टर रमन डाक्टर बनकर गरीबों की सेवा ही करना चाहते थे। इसके लिए वे प्री-मेडिकल परीक्षा उत्तीर्ण भी कर चुके थे लेकिन कम उम्र के कारण उन्हें एमबीबीएस में दाखिला नहीं मिल पाया। 

कवर्धा के ठाकुरपारा में उन्होंने आयुर्वेद डाक्टर के रूप में अपना कामकाज प्रारंभ किया और गरीबों के डाक्टर के तौर पर खासी लोकप्रियता अर्जित की। आयुर्वेद कालेज के प्राचार्य रह चुके महादेव प्रसाद पांडे बताते हैं कि वे एक ऐसे छात्र थे जिसका किसी से कोई बैर नहीं था। उन्हें यूनियन लीडर प्रकाश शुक्ला के साथ सबसे ज्यादा देखा गया। वे पढ़ाई में तो ठीक-ठाक थे लेकिन पढ़ाई के अलावा अन्य विषयों को लेकर उनकी जानकारी अधिक थे। देश-दुनिया में कहां क्या हो रहा है उन्हें पता होता था।

प्रदेश के मुखिया की दिनचर्या सुबह योग से शुरू होती है। पूजा करने के बाद लोगों से मिलना-जुलना शुरू करते हैं। उनका भोजन भी वही है जो एक आदमी का है। दाल, चावल, रोटी, हरी सब्जी और ज्यादा हुआ तो पपीता। कभी हेलीकाप्टर से दौरे पर निकले तो उनके सहयोगी मूंगफली और छाछ रखना नहीं भूलते। उनके निवास पर जनदर्शन कार्यक्रम तो चलता ही है लेकिन इसके अलावा भी वे जरूरतमंद लोगों से मिलने के लिए तत्पर ही दिखते हैं। जब चुनाव हो रहा था तब टीवी पर बकबक करने वाले राजनीति के सैकड़ों पंड़ितों को यह लग रहा था कि भला चावल-दाल बांटकर कोई दोबारा सत्ता में वापस आ सकता है? अब जबकि सरकार की वापसी हो गई है तब वहीं लोग यह कह रहे हैं कि गरीबों की दुआ काम आ गई। जरूरत के समय लोगों की भूख मिटाना और उससे मिलने वाली दुआ का हार-जीत से क्या संबंध है इसका तो नहीं पता लेकिन डाक्टर रमन की सैकड़ों योजनाओं का कोई विश्लेषण करने कोई भी बैठेगा तो पाएगा कि हर योजना गांव और उसमें रहने वाले गरीब के लिए ही है। चावल, नमक, आवास, चरणपादुका, सायकिल और भी न जाने क्या-क्या? हर योजना का शायद एक ही लक्ष्य है गरीब आदमी के चेहरे पर संतुष्टि। पिछले पांच साल में बहुत सी योजना नौकरशाहों अकर्मण्य रवैय्ये के कारण दम तोड़ती हुई नजर भी आई है लेकिन फिर भी वे योजनाओं के क्रियावन्यन को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं। 

हाल ही में उन्होंने विधानसभा में कहा है कि विपक्ष जहां कहीं भी उंगली रख देगा वे हथौड़ा चला देंगे। उनके इस इरादे को देखकर फिलहाल यहीं लगता है कि हमारे बीच भी रात और दिन का एक मसीहा रहता है। हालंकि दूसरी पारी में लोग उनके बदले हुए व्यवहार को लेकर कई तरह की चर्चा भी करने लगे हैं, लेकिन अब भी उन्हें एक अलग तरह का राजनेता तो माना जाता ही है । उनकी सादगी ही उनका सबसे बड़ा औजार है।