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Thursday, February 25, 2010

ढाई हजार मौतें!

राजकुमार सोनी

यह जो सड़क पर खून बह रहा है इसे सूंघकर तो देखो
और पहचानाने की कोशिश करो ये हिन्दू का है
या मुसलमान का किसी सिख का है या ईसाई का
किसी बहन का है या भाई का
सड़क पर इधर-उधर पड़े पत्थरों के बीच
दबे टिफिन कैरियर से 

जो रोटी की गंध आ रही है
वह किस जाति की है?

राज ठाकरे के इस खतरनाक युग में कुमार विकल की यह कविता बिना डरे अपने पूरे ताप के साथ खड़ी हुई है। कुमार विकल तो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन वे हमें जाते-जाते बता गए हैं कि जो रक्त सने कपड़े है वे उस आदमी के है जिसके हाथ मिलों में कपड़ा बुनते हैं, कारखानों में जूते बनाते हैं। खेतों में बीज डालते हैं।

वे हमें बता गए हैं कि ‘मजदूर’ की कोई जाति नहीं होती। मजदूर सिर्फ मजदूर होता है। यदि ‘मजदूर’ की कोई जाति होती भी है तो शायद वह ‘मजदूर’ ही होगी। लेकिन बालको की चिमनी दुर्घटना में मारे गए मजदूरों के साथ ऐसा नहीं हुआ। उन्हें मजदूर मानने से पहले ‘बिहारी’ मान लिया गया। गोया बिहारी होना अपराध हो गया, और यह सब कुछ इतने महीन तरीके से हुआ कि लोगों को इसका पता भी नहीं चला। अब भी कोरबा व उसके आसपास एक ही बात है और वह यह कि जो मारे गए वे छत्तीसगढ़िया नहीं थे, इसलिए प्रोफेसर प्यारेलाल ज्यादा गम मनाने की जरूरत नहीं है। चूंकि ‘मजदूर’ छत्तीसगढ़ के नहीं थे इसलिए छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान मंच के संयोजक ताराचंद साहू ने अब तक वहां दस्तक नहीं दी , लेकिन घटना के बाद से जो लोग भी हुंकार भरते हुए मौका-मुआयना के लिए पहुंचे और अब भी पहुंचने का सिलसिला जारी है। उनकी भूमिकाओं को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म ही है। घटना के बाद जब वहां मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह पहुंचे तब कांग्रेसियों को यही लगा था कि यदि डाक्टर रमन ने ठीक-ठाक मुआवजे की घोषणा नहीं की तो बैठे-ठाले मुद्दा मिल जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री ने ऐसा होने नहीं दिया, वे न केवल मुआवजे की घोषणा कर आए बल्कि टीवी कैमरों के सामने उन्होंने यह भी कह डाला कि हर हाल में बालको प्रबंधन को मुआवजे की अच्छी खासी रकम देनी होगी।
यदि कोरबा में मौजूद मजदूर ‘बिहारी’ है भी तो यह किसी पुराण में नहीं लिखा है कि ‘बिहारी’ नफरत के काबिल होते है? भले ही छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र की सीमा को छुता है लेकिन मैं ही क्या बहुत से लोग इस बात को दावे के साथ कह सकते हैं कि यहां कोई राज ठाकरे निवास नहीं करता है। किसी ने राज ठाकरे का पॉकेट एडीशन बनने की कोशिश भी की है तो उसे जनता ने नकार दिया है।
मुख्यमंत्री के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने वहां धरना दिया। उनके धरने की सूचना से प्रशासन से ज्यादा कांग्रेसियों में हड़बड़ी मची। कांग्रेसियों के एक धड़े को लगा कि जोगी उनके क्षेत्र का माहौल खराब करने के लिए नौटंकी कर रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि धरने में राजधानी से गए लोगों के अलावा किसी दूसरे बड़े नेता ने शिरकत नहीं की। जोगी के धरने के बाद जब कोरबा की जिला कांग्रेस कमेटी ने बचे-खुचे बड़े नेताओं को फिर से धरना देने के लिए न्यौता दिया तो इस बार यह हवा फैली कि कांग्रेस का एक बड़ा नेता अपने पुत्र की नौकरी बालको में लगवाना चाहता था। काफी हाथ-पांव मारने के बाद भी जब उसका मकसद हल नहीं हुआ तो वह धरने-प्रदर्शन की राजनीति पर उतर आया। कुछ इसी तरह की बातें भाजपा के एक स्थानीय स्तर के कद्दावर नेता को लेकर भी कही गई है। बताया जाता है कि भाजपा नेता के चेले-चपाटे चिमनी निर्माण में रेत, गिट्टी और स्टील के सप्लायर थे। कुछ चेलों को तो काम मिला हुआ था लेकिन ठेके में सप्लाई के काम से जब कुछ चेले कथित तौर पर बेरोजगार हो गए तो उन्हें अपने दिल की भड़ास निकालने का अच्छा अवसर मिल गया।

मार्क्स और माओ की विचारधारा को मानने वाले मजदूर संगठनों ने भी बालको में अपनी दस्तक दी है, लेकिन हाल-फिलहाल ‘अपना हक लेके रहेंगे’ जैसे जोरदार नारे की गूंज राजधानी तक नहीं पहुंची है। इधर भाजपा से निष्कासित और पिछले दो चुनाव में करारी हार का सामना करने वाले छत्तीसगढ़ियां विकास पार्टी के कर्ताधर्ता पीआर खुंटे ने भी कहा है कि यदि मजदूरों को उनका सही हक नहीं मिला तो वे धरना-प्रदर्शन करने को बाध्य हो जाएंगे। लेकिन क्या हकीकत में धरना-प्रदर्शन से किसी समस्या का समाधान हो सकता है? धरना-प्रदर्शन करने वाले अपने इस तौर तरीके को वाजिब ठहराते हो लेकिन आसपास का जो वातावरण बन गया है और बनता जा रहा है, उसके चलते धरना-प्रदर्शन करने वालों को ‘शक’ की निगाहों से देखा जाने लगा है। धरने-प्रदर्शन का ऐसा कोई उदाहरण दिखाई नहीं देता जिसे सही अंजाम मिला हो। पवित्र इरादों से प्रारंभ किए गए हर प्रदर्शन की असमय मौत हो रही है, और जिनकी मौत नहीं होती उन्हें ‘पेन्डुलम’ बनाकर छोड़ दिया जाता है। इधर-उधर हिलते-डुलते रहो बेटा...जब कोई सुनेगा ही नहीं तो फायदा ही क्या?

राजधानी में हर-दूसरे दिन कोई न कोई पार्षद दो-तीन ठेला ‘कचरा’ नगर निगम के सामने फेंक देता है। क्या इस आकस्मिक सफाई से शहर की गंदगी साफ हो जाती है? हर गर्मी में कुछ लोग महिलाओं को इक्कठा कर कलेक्ट्रेट ले जाते हैं उनसे सैकड़ों मटकिया तुड़वाते हैं। क्या इस कारनामे से लोगों को पूरे समय पानी मिलने लगता है? 23 सितंबर को बालकों में चिमनी गिरने की जो घटना हुई क्या इस घटना से पहले कभी कोई घटना नहीं हुई? इस चिमनी हादसे से पहले भी 1984 में एनटीपीसी की निर्माणाधीन चिमनी की चैली टूटकर गिर गई थी। इस दुखद घटना में भी 12 मजदूरों की मौत हो गई थी। कहने का आशय यह बिल्कुल भी नहीं है घटनाएं तो होती रहेगी...घटनाओं का क्या? लेकिन शायद यही सच है कि घटनाओं को रोका जा सकता है। सब जानते है कि बालको प्रबंधन ‘अनुमति मिल जाएगी’ वाले अंदाज में चिमनी का निर्माण करता रहा है, यदि स्थानीय जिला प्रशासन लाव-लश्कर के साथ समय रहते चिमनी का निर्माण रोक देता तो शायद प्रशासन को अब जाकर लाव-लश्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। सालों-साल से चली आ रही एक व्यवस्था ने लगभग आधा सैंकड़ा मजदूरों को मौत के आगोश में तो ले लिया लेकिन यही व्यवस्था अब यह नहीं देख पा रही है कि हादसे के बाद वहां करीब ढाई हजार मजदूर पूरी तरह बेकार हो गए हैं।

बचपन की एक कहानी रह-रहकर डराती है और वह यह कि जिन मजदूरों ने ‘ताजमहल’ का निर्माण किया था बादशाह सलामत ने अपनी सलामती के लिए उनके हाथ कटवा दिए थे। हाथ कट जाने के बाद भला कोई क्या गढ़ पाएगा? जब गढ़ेगा ही नहीं तो बचेगा कैसे? बादशाह सलामत ने तो अपने जमाने के मजदूरों को जीते जी मार डाला था, क्या आपको नहीं लगता कि बाबा आदम जमाने से चली आ रही एक व्यवस्था ने कोरबा में डर के मारे इधर-उधर छिपे ढाई हजार मजदूरों को भूखों मरने के लिए मजबूर कर दिया है। इन मजदूरों से कोई यह नहीं कह रहा है कि चलिए आप लोगों के लिए हमारे पास एक काम है। उन्हें काम के एवज में कुछ पैसों की जरूरत है। उन्हें भीख नहीं काम चाहिए। वे मजदूर है भिखारी नहीं। और यदि कोरबा में मौजूद मजदूर ‘बिहारी’ है भी तो यह किसी पुराण में नहीं लिखा है कि ‘बिहारी’ नफरत के काबिल होते है? भले ही छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र की सीमा को छुता है लेकिन मैं ही क्या बहुत से लोग इस बात को दावे के साथ कह सकते हैं कि यहां कोई राज ठाकरे निवास नहीं करता है। किसी ने राज ठाकरे का पॉकेट एडीशन बनने की कोशिश भी की है तो उसे जनता ने नकार दिया है। देश के प्रसिद्ध कवि विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता का अंश है-

मुझे बिहारियों से प्रेम हो गया
जहां जाता हूं कोई न कोई मिल जाता है
उसकी बोली से पहिचानकर यही लगता है कि
जिससे पिछली बार मिले थे
उससे ही मिल रहे हैं।
बिहार के बाहर एक बिहारी मुझे पूरा बिहार लगता। 
जब कोई मुझे पत्नी और बच्चे के साथ दिख जाता 
तो खुशी से मैं उसे देशवासियों कहकर संबोधित करता।
भागते-भागते देश की सीमा रेखा की घेराबंदी
कहा जाए जैसे बंदी
अंत में क्या बिहार-बिहार में बंदी
उत्तरप्रदेश-उत्तर प्रदेश में प्रांत नहीं नहीं कैदखाने है 
तिस पर नया राज्य जब बनता तो 
देश के स्वतंत्र होने जैसी खुशी लोगों को वहां होती
नागरिकों, देशवासियों कहकर किसे पुकारूं
वह कौन है और कहां रहता है?

Tuesday, February 23, 2010

ऐसे प्रेमी को सलाम!

राजकुमार सोनी

थकान से लकदक चिड़ियों के घर लौटने के साथ ही
जब मुंडेर के पीछे कंघी करती हुई
लड़की की तरह नदी मुस्कुराने लगे
फूलों में खूबसूरती को लेकर छिड़ जाए बहस
बूढ़ी मां जैसी कोई गाय चांद-तारों को
समझाइश देते हुए नजर आए
तो समझ लीजिए बस अभी और अभी
आसपास ही कोई गवैय्या देसी राग से दीप जलाने वाला है
संगीत का गला घोंट, गीतों को फांसी की सजा सुनाकर जो लोग
घर जा चुके उन्हें जाने दो
अपने भीतर के झरने को सूखने से बचाने के लिए
दिए के जलने का इंतजार तो करना ही होगा।

छत्तीसगढ़ में पदस्थ रहे महालेखाकार सुवीर मलिक एक उम्मीद का नाम है। जितना अच्छा वे गाते हैं उतना ही अच्छा वे बोलते भी हैं। उन्हें गाते और बोलते हुए सुनना सुखद लगता है। अनिद्रा के शिकार लोगों को तमाम तरह के डाक्टरों ने हमेशा से यही सलाह दी है कि यदि आपको नींद नहीं आती है तो संगीत सुनिए। एक वॉकमैन में सीडी डालिए। हैडफोन को कान में रखिए और पहुंच जाइए दूसरी दुनिया में। थोड़ी ही देर में नींद आपको अपनी बांहों में जकड़ लेगी। श्री मलिक ऐसी निद्रा को बीमारी मानते हैं। उनका कहना है कि जो शख्स संगीत सुनकर सो जाता है, वह बीमार है। अच्छा संगीत सुलाता नहीं बल्कि जगाता है।

8 सितंबर 1966 को दिल्ली में जन्मे सुवीर को संगीत का साथ बचपन से ही मिला। बंगाली परिवार से होने के नाते उनके घर में वैसे ही संगीत का माहौल था। उनकी माता चित्रा मलिक आगरा घराने के उस्ताद अब्दुल रहमान अख्तर की शागिर्द थीं जबकि पिता प्रवीर मलिक 1954 बैच के आईपीएस अफसर होने के बावजूद संगीत के शौकीन और जानकार थे। किसी को भी संगीत की एबीसीडी सिखाने वाला पहला गुरु तो ग्रामोफोन ही होता है सो श्री मलिक का भी पहला वास्ता ग्रामोफोन से पड़ा था। रूमाली रोटी से कुछ छोटे आकार के तवे पर बजने वाले रिकार्डों को सुन-सुनकर मलिक ने भी गाना शुरू किया। वे जब भी गाते लोग उनके माता-पिता से जरूर कहते थे, आपका बेटा कमाल का गाता है। अभिभावकों को मिलने वाली तारीफ ने सुवीर की हौसला-अफजाई की और देखते ही देखते उन्होंने अपने पांच-छह दोस्तों के साथ मिलकर एक ग्रुप बना लिया।

कालेज के दिनों में फिल्मी गाना ही गाते रहे, लेकिन जल्द ही ऐसा कुछ हुआ कि उन्हें भीमसेन जोशी, उस्ताद अमजद अली और टीएन कृष्णन के सामने गाने का अवसर मिला। उनकी गायकी को सुनकर देश के मूर्धन्य संगीतज्ञों के मुंह से पहला सवाल यही निकला कि उन्होंने संगीत की शिक्षा किससे ग्रहण की है? श्री मलिक ने जब यह बताया कि हाल-फिलहाल किसी को गुरु नहीं बनाया है तो सभी को आश्चर्य हुआ। महान हस्तियों की राय पर श्री मलिक ने गुरु की तलाश की। विभिन्न जगहों में पदस्थापना के चलते उन्हें एक से बढ़कर एक गुरु भी मिले। आगरा घराने के पंडित एमआर गौतम एवं नसीम अहमद खान ने उन्हें विधिवत् शिक्षा दी तो पटना में पदस्थापना के दौरान उन्हें पंडित श्यामदास मिश्र का सानिध्य भी मिला। थोड़े समय के लिए जब उनकी पदस्थापना शिमला में हुई तो पटियाला घराने के प्रोफेसर सोमदत्त बटु ने भी उनकी प्रतिभा को निखारने का काम किया।

गुरु-शिष्य की परंपरा को श्रेष्ठ मानने वाले श्री मलिक मानते हैं कि घरानों ने संगीत को फायदा पहुंचाया है। यदि घराने नहीं होते तो यह कभी पता ही नहीं चलता कि कौन क्या गाता रहा है? संगीत कितना श्रेष्ठ है? भीमसेन जोशी को भारतीय शास्त्रीय संगीत की आत्मा मानने वाले श्री मलिक जब इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहे थे तब उनसे मिलने पुणे भी जा पहुंचे थे। बगैर किसी परिचय के उन्होंने भीमसेन जोशी से मिलने की इच्छा प्रकट की तो महान संगीतकार को यह जानकर भी आश्चर्य हुआ कि व्यवस्था का हिस्सा बनने वाला एक भावी इंजीनियर संगीत में रुचि रखता है और उनके दर्शन को चला आया है। लगभग 21 देशों की यात्रा कर चुके श्री मलिक वाशिंगटन में भी पदस्थ रहे हैं। वहां पदस्थापना के दौरान उन्हें भारतीय दूतावासों की ऑडिट का काम सौंपा गया था। विदेश में रहकर भी श्री मलिक की आसक्ति भारतीय संगीत के प्रति कभी कम नहीं हुई। देश वापसी के बाद वे इस संगीत के किस कदर दीवाने हैं, इसका बखान उनके ड्राइवर से बेहतर कोई और नहीं कर सकता।

रोज उन्हें सुबह-शाम घर से दफ्तर और दफ्तर से घर छोड़ने वाला वाहन चालक अपने आपको इसलिए खुशनसीब मानता है, क्योंकि उसे एक से बढ़कर एक गाने सुनने को मिलते हैं। ड्राइवर के मुताबिक एक बार साहब ने जब उनके सिर पर तबला बजाया तो उन्हें लगा कि किसी गलती पर साहब ने धौल जमाई है, लेकिन कुछ दिनों के बाद समझ में गया कि अरे अपने साहब तो मास्टरपीस हैं। पत्नी संयुक्ता मलिक और दो बेटियों सोहणी और सावेरी के साथ खुशहाल जीवन व्यतीत करने वाले सुवीर मलिकजैसा देश वैसा भेषके हिसाब से खाने में जो कुछ मिल जाए उसे ग्रहण कर लेते हैं, लेकिन पसंदीदा गानों के मामलों में वे थोड़ा चूजी हैं। वे जिन गानों को पसंद करते हैं, उन गानों को पिज्जा खाने वाली पीढ़ी पसंद नहीं करती। के एल सहगल अब क्लोजअप टूथपेस्ट के विज्ञापन का विषय बन गए हैं(क्या आप क्लोजअप करते हैं) श्री मलिक ने पिछले दिनों राजधानी के एक आयोजन में सहगल के 33 गानों की प्रस्तुति दी थी। इसके अलावा वे विभिन्न रागों पर आधारित गानों की कई दमदार और यादगार प्रस्तुति के लिए भी संगीतप्रेमियों के बीच याद किए जाते हैं। श्री मलिक को इस बात की खुशी है कि समय के साथ संगीत धर्म के अखाड़ों और बाईजी के कोठों से बाहर निकल आया है। संगीत को अपने घर की बांदी समझने वाले लोगों के लिए यह सूचना किसी दुखद खबर से कम नहीं है कि अब मास्टर मदन के दुर्लभ दो गाने इंटरनेट में मौजूद हैं।

संगीत के साथ एक खूबसूरत बात यह भी जुड़ी है कि तमाम तरह के नाम-उपनाम के बाद भी संगीत पर किसी जाति विशेष के होने का ठप्पा नहीं लगा।सास गारी देवे, ननद समझा लेवेंपर चिल्ल-पों मचाने वाले कथित प्रगतिशील लोगों की खोपड़ी में यह बात क्यों नहीं बैठती कि एक राज्य की संस्कृति किसी दूसरे राज्य में जाकर अपनी खूशबू ही फैलाती है। दुनिया भर के चोर-दलाल और शोषकों के खिलाफ तो समझौतापरस्त लोग कुछ नहीं बोलते लेकिन यदि अभिषेक बच्चन ने छत्तीसगढ़ी धुन पर ठुमका लगाया नौटंकी के ठेकेदारों को लगता है कि अस्मिता के साथ खिलवाड़ हो गया है। जिंदा कौमे संगीत में प्रेम तलाश लेती है। जबकि मुर्दाघरों में रहने वाले लोगों के पैर टेढेÞ होते हैं। टेढ़े पैरों से तेज संगीत पर थिरका जा सकता है और ही धीमे संगीत से हरकत पैदा की जा सकती है। सुवीर संगीत के प्रेमी हैं। ऐसे प्रेमी को सलाम..

Sunday, February 21, 2010

भगवान की कंघी

राजकुमार सोनी
पता नहीं क्यों अब लगने लगा है कि छत्तीसगढ़ को सही अर्थों में जानने के लिए एक और जन्म की जरूरत पड़ सकती है। यदि हम निरंजन महावर के काम को देखें तो कम से कम यह अहसास तो होता ही है। आदिवासी राज्य में रहते हुए न तो हम आदिवासी मन को जानते हैं और न ही यह जानने की चेष्टा करते हैं कि हमारे समय के जिंदा इतिहास आदिवासी प्रकृति के कुशल चितेरे भी हैं। शहर में जीवन ‘बड़े सबेरे मुर्गा बोला, चिड़ियों ने अपना मुंह खोला, आसमान में लगा चमकने लाल-लाल सूरज का गोला’ जैसी कविता को गा-गाकर ही जागता रहा है। कविता में सूरज को देखने की कोशिश का नतीजा यह निकला कि हम कभी यह जान ही नहीं पाए कि हमारे हिस्से की सौ ग्राम रोशनी किसी काल कोठरी का हिस्सा बनकर रह गई है। शाम हुई तो एक अंधी लालटेन पकड़ ली और पंक्चर की दुकान खोलने के बाद जब थोड़ा पैसा आ गया तो मरकरी बल्ब की दुधिया रोशनी में अजय माला पढ़कर आईएएस बनने का ख्वाब देखते हुए लमलेट होना जरूरी समझा। वीआईपी प्रश्नों की एक बारीक सी गली में उधमबाजी के बाद जीवन थोड़े समय के लिए सफल तो हुआ, लेकिन शायद पूरी तरह से सफल नहीं। ऐसा भी नहीं है कि जो आदिवासी मामलों के जबरदस्त जानकार निरंजन महावर जैसा नहीं बन पाएंगे, उनका जीवन व्यर्थ चला जाएगा या फिर वे गांधी डिवीजन पाने वाले छात्र की तरह नर्वस ही रहेंगे। यह भी एक सच्चाई है कि निरंजन महावर बनने के लिए एक तपस्या की जरूरत पड़ेगी। यह तपस्या एक जन्म में तो पूरी नहीं हो सकती। इसके लिए कम से कम दूसरा जन्म तो लेना ही होगा।

चौबे कालोनी में जहां पुराना पुलिस थाना है, वहीं स्टेट बैंक भी है। ठीक वहीं निरंजन महावर रहते हैं। आसपास के लोग नहीं जानते कि निरंजन महावर कौन हैं, लेकिन जब दिल्ली-मुंबई, भोपाल से (कई बार विदेश से) लोग आटो या कार में बैठकर श्री महावर का घर खोजते हुए आते हैं तो नुक्कड़ पर कपड़ा प्रेस करने वाला निर्मलकर समाज का एक दुबला-पतला नवयुवक उनके घर का पता जरूर बताता है। पता बताने के बाद वह यह जरूर कहता है-साहब को देखा तो नहीं लेकिन लगता है साहब कोई बिजनेस करते हैं। काफी लोग पूछने आते हैं। यह सच है कि श्री महावर पहले बिजनेस किया करते थे। वैसे तो उनका पूरा परिवार राजस्थान के अलवर जिले के पहल गांव का रहने वाला है, लेकिन काफी पहले उनके पूर्वज धमतरी आ गए थे। श्री महावर के ताऊजी की धमतरी में राइस मिल थी। वर्ष 1954 में मैट्रिक पास करने के बाद जब उन्हें लगा कि थोड़ा और पढ़ लेना चाहिए तब उन्होंने छत्तीसगढ़ कालेज से ग्रेजुवेशन किया। सागर विश्वविद्यालय से एमए, एलएलबी करने वाले श्री महावर ने हाल ही में अपना 72वां जन्मदिन मनाया है। लोग यह सोच सकते हैं कि आखिर श्री महावर के पास ऐसा क्या जादुई करिश्मा है, जिसके लिए लेखक लंबी-चौड़ी भूमिका तैयार कर रहा है, लेकिन जो चीज श्री महावर के पास है वह किसी के पास नहीं है। जी हां, श्री महावर के पास वह कंघी है जिसका उपयोग भगवान किया करते थे(हैं)। भगवान की कंघी सुनकर आश्चर्य हो सकता है, लेकिन यह सच्चाई है। उनके पास केवल भगवान की कंघी ही नहीं बल्कि दो ढाई हजार दुर्लभ और भी कंघियां हैं। उनके पास सिंदूर का वह डिब्बा है, जिसमें आइना हुआ करता था। उनके पास तरह-तरह के गुल्लक हैं। आरती के खूबसूरत वे दीए हैं, जिसमें सांपों की आकृति है। हाथी-घोड़े, बैल, मुखौटे, मछली, तम्बाकू की डिबियों और सरोते के अलावा उनके पास जनजातियों की यथार्थ, तिलिस्म और चमत्कार से भरी दुनिया की अद्भूत जानकारियां हैं। देश-विदेश की तमाम जनजातियों के संबंध में जो किताबें उनके पास हैं, संभवत: वह किसी के पास नहीं। आदिवासियों के दैनिक जीवन में उपयोग में आने वाली हर वह वस्तु उनके पास है, जिसे देखकर कोई भी दांतों तले उंगली दबा सकता है।

स्व. उमराव लाल महावर के पुत्र निरंजन महावर को लोक संग्रहण का शौक कैसे हुआ इसकी भी एक कथा है। दरअसल श्री महावर के परिजन ने जगदलपुर में एक नई राइस मिल खोली थी। इस मिल के सुपरविजन का काम उन्हें सौंपा गया था। मिल का सुपरविजन करते-करते श्री महावर आदिवासी जन-जीवन में झांकने लगे। निष्कपट आदिवासियों की बेजोड़ कलाकृतियों एवं उनके आचार-व्यवहार ने श्री रंजन को इतना अधिक प्रभावित किया कि उन्होंने तय कर लिया लोक जनजीवन के लिए ही अपना जीवन लगा देंगे। जनजातियों के आचार-व्यवहार, खानपान, उनकी कला और संस्कृति को सहेजने में ही उन्होंने इतना वक्त बिता दिया कि उन्हें पता ही नहीं चला कि जो कुछ वे सहेजकर रख रहे हैं, उसे पीढ़ियों के लिए तैयार भी करना है।

एक घटना ने उन्हें भीतर तक हिला दिया। आज से ठीक पांच साल पहले जब एक बार उनका स्वास्थ्य खराब हुआ तो वे बेहद चिंतित हुए। पहले-पहल तो उन्हें लगा कि साधारण सी बीमारी होगी जो दो-चार दिनों में ठीक हो जाएगी, लेकिन जब उन्हें यह ज्ञात हुआ कि भूख, प्यास सब कुछ भूलकर केवल काम और काम करने के कारण उनकी दोनों किडनी खराब हो गई है तो वे हिल गए। उन्हें लगा कि अब दुनिया को अलविदा कहने का समय आ गया है, लेकिन इसे सौभाग्य मानना ही ठीक होगा कि डाक्टरों ने उन्हें एक बात का भरोसा दिलाया था कि चूंकि वे नशा आदि नहीं करते हैं, फलस्वरूप किडनी ठीक भी हो सकती है। ऐसा हुआ भी। बीमारी से मुकाबला करते हुए श्री महावर खूब लिख रहे हैं। वे हर रोज लगभग सौ पेज पढ़ते हैं और दस पेज लिखते हैं। मध्यप्रदेश में आदिवासी लोककला परिषद के सदस्य एवं चौमासा जैसी चर्चित पत्रिका के सलाहकार संपादक रहे श्री महावर ने हाल ही में वेरियर एलविन की किताब का हिन्दी अनुवाद किया है। जनजातीय मिथक नामक शीर्षक से प्रकाशित किताब का प्रकाशन राजकमल द्वारा किया गया है, लेकिन यही उनकी उपलब्धि नहीं है। देश के विभिन्न प्रकाशकों ने श्री महावर द्वारा लिखित पांडुलिपियां ले रखी हैं। इस साल उनकी 27 से ज्यादा किताबें बाजार में आएंगी। दुर्भाग्य की बात है कि लोक जनजीवन के इस गहरे जानकार की प्रतिभा से राज्य का संस्कृति विभाग अनजान बना हुआ है। ऐसा नहीं है कि श्री महावर को कभी संस्कृति विभाग वालों ने पूछा नहीं, लेकिन विभाग की यह पूछताछ वैसी ही थी जैसी हमेशा से होती है। विभाग का दुर्भाग्य कहें या कुछ और, लेकिन यह हकीकत है कि यहां मात्र एक बार कल्याण कुमार चक्रवर्ती को छोड़ किसी ऐसे अफसर की पदस्थापना नहीं हुई, जिसे संस्कृति की समझ हो। कोई विभाग को जंगल महकमा समझकर चलाता रहा तो कोई पुलिस का परेड ग्राउंड समझकर कलाकारों को पीटी करवा रहा है। एक बार विभाग के एक प्रमुख अफसर ने श्री महावर से कहा कि वे छत्तीसगढ़ की लोक परंपराओं पर कुछ लिखें। श्री महावर ने चार साल कड़ी मेहनत कर जब उन्हें तीन पांडुलिपियां सौंपी तो अफसर ने यह कहकर पांडुलिपि लौटा दी कि वे अब इसे नहीं छाप सकते।

इतना ही नहीं एक मर्तबा किसी कार्य के सिलसिले में विभाग ने श्री महावर से संपर्क किया था। जब श्री महावर ने यह चाहा कि विभाग उन्हें एक पत्र लिखकर दे दे तो अफसर ने जवाब दिया-पत्र भी आप ही लिख दीजिएगा मैं पढ़कर साइन कर दूंगा। संस्कृति के ऐसे माई के लालों के बीच भी श्री महावर चुपचाप अपने काम में लगे हुए हैं। वे ऐसा क्यों कर रहे हैं क्या पाठक जानना चाहेंगे? चलिए यह बात उन्हीं की जुबानी सुनते हैं- मित्रों, जब यूरोप दो महायुद्धों से गुजरा तो वहां सारी चीजें तहस-नहस हो गई थीं। संस्कृति के बड़े केंद्र भी पूरी तरह बरबाद हो गए थे। अब वहां के लोग अपने अतीत का एक-एक टुकड़ा सहेजकर रख रहे हैं। ठीक है कि अभी हमारे देश में ऐसा कुछ नहीं हुआ, लेकिन यदि हमने पुरानी चीजों, परंपराओं को बचाने में ध्यान नहीं दिया तो अपने बच्चों को क्या बताएंगे कि कभी हम सांस्कृतिक रूप से काफी समृद्ध थे। सही है कि हमारे आपके दर्शन में हम सारी चीजों को नश्वर मानते हैं। हम हमेशा सोचते हैं कि खाली हाथ आए थे तो खाली हाथ ही जाएंगे। खाली हाथ जाने से आपको कोई नहीं रोकेगा, लेकिन दूसरों को इतना तो दे ही दीजिए कि आपको खाली होकर जाने का अफसोस न हो। क्या प्रबुद्धजन महावरजी से संवाद करना चाहेंगे। उनका फोन नंबर है- 0771-4060054.

Thursday, February 18, 2010

बिना शीर्षक

राजकुमार सोनी

26 सितंबर 1982 को दिनमान में प्रकाशित पत्रकार बलराम की एक टिप्पणी ने सबका ध्यान अपनी ओर खींचने का काम किया था। टिप्पणी कुछ इस प्रकार थी-‘बस्तर क्षेत्र से बिक्रीकर की राशि, जो पिछले तीन साल से एक करोड़ बासठ लाख से एक करोड़ चौहत्तर लाख तक ही सीमित थी, डाक्टर महेंद्र ठाकुर ने उसे तीन करोड़ पैंसठ लाख तक पहुंचा था। उन्होंने लगभग 18 करोड़ का ही एक ऐसा प्रकरण पकड़ा जिसे रफा-दफा करने के लिए व्यापारी उन्हें पांच लाख रुपए रिश्वत देने को तैयार था। जब वे उनके चंगुल में नहीं फंसे, तब उनकी हत्या करवा देने की धमकी दी गई। बाद में रिश्वत का पैसा उच्चाधिकारियों तक पहुंचा और श्री ठाकुर का तबादला कर दिया गया। इतना ही नहीं उन्हें व्यापारी को परेशान करने के जुर्म में पदावनत भी कर दिया गया। घटना यह बताने के लिए काफी है कि ईमानदारी का फल कुछ इसी तरह से मिलता है।’

दिनमान पत्रिका की यह टिप्पणी किसी प्रमाण से कम नहीं थी। पत्रिका में इस रहस्य के उजागर होने के बाद डाक्टर ठाकुर चर्चा में आ गए लेकिन सत्य की इस चर्चा ने उन्हें तकलीफ में ही रखा। राज्य शासन के वाणिज्यिक कर विभाग में बतौर अपर आयुक्त रिटायर्ड हुए महेंद्र ठाकुर के साथ यह घटना केवल बस्तर में ही नहीं घटी थी, बल्कि जब वे सतना में पदस्थ थे तब उनके ऊपर लक्ष्य से ज्यादा टैक्स चोरी पकड़ने के मामले में भी जांच बिठाई गई थी। विभाग ने उन्हें 84 लाख की टैक्स चोरी पकड़ने का लक्ष्य दिया था, लेकिन जब उन्होंने दो-चार बड़े मामलों में हाथ डाला और शासन के लिए 2 करोड़ 30 लाख इक्कठे कर लिए तो उनके साथी मित्रों ने हरीशचंद्र की औलाद बताते हुए उनका मजाक उड़ाया था। शासन के नुमाइंदों को सरकार के खजाने में जनता की गाढ़ी मेहनत की कमाई से लूटे गए पैसे का जमा होना अखर गया था। इस घटना के बाद बड़े अफसर उन्हें छोटी-छोटी बातों पर परेशान करने लगे। अफसर इस बुरी तरह से उनके पीछे लग गए कि एक दिन...

एक दिन उन्होंने तत्कालीन वाणिज्यिक कर मंत्री के नाम एक पत्र लिखा। पत्र में लिखा था- ‘आपने मेरा तबादला कर दिया उसके लिए धन्यवाद, लेकिन आपने उस अफसर को नहीं हटाया जिसे हटाने का आपने वादा किया था। अब मैं आत्महत्या करने जा रहा हूं।’ डाक्टर ठाकुर सचमुच आत्महत्या करने के लिए निकल पड़े थे। उन्होंने तय कर लिया था कि ट्रेन की पटरी में अपनी गर्दन रख देंगे और फिर हमेशा-हमेशा के लिए झंझट से मुक्त हो जाएंगे, लेकिन रास्ते में उन्हें लगा कि क्यों न अपने न्यायाधीश मित्र से आखिरी बार मिलते चलें। जब वे अपने मित्र से मिलने रायपुर कोर्ट पहुंचे तो वहां किसी खास प्रकरण पर बहस चल रही थी। उन्होंने मित्र को संदेश भिजवाया तो मित्र ने अर्दली के माध्यम से यह कहलवाया कि दस से पंद्रह मिनट इंतजार करना होगा। डाक्टर ठाकुर जल्द से जल्द मुक्ति चाहते थे, लेकिन इंतजार ने उनकी सोच को बदल दिया। वे कमरे में बैठकर प्रतीक्षा करते रहे और वहां पड़ी पत्रिकाओं को टटोलते रहे। लगभग आधे घंटे के बाद उन्हें अपने बच्चों और पत्नी का चेहरा याद आया, तब उन्होंने सोचा कि स्वयं को असहाय मानकर वे एक ऐसी गलती करने जा रहे थे जिसका खामियाजा उनके परिवार को ही भुगतना पड़ता। वे मित्र को बगैर कुछ बताए लौट आए। उन्होंने तय किया यदि कुछ बदलना है तो लड़ना होगा। बदलाव लड़ने से ही आता है, भागने से नहीं।

इस घटना के बाद युवावस्था से ही लिखने-पढ़ने के शौकीन रहे श्री ठाकुर ने डिप्टी कमिश्नर की डायरी नामक एक किताब लिख मारी। भले ही किताब को लुद्दी के माफिक पैदा हो चुके लोकल नामवरों और रमाकांतों ने नहीं बांचा, लेकिन प्रशासनिक दखल रखने वाले लोगों के बीच किताब को लेकर जमकर चर्चा हुई। (जलेसियों-प्रलेसियों को फिलहाल कुएं से निकलने की फुरसत भी नहीं है। अपनी पैदाइश के समय से ही केवल अपने मित्रों की पीठ पर विक्स वेबोरब मलने वाले गिरोह के मुखियाओं को यह पता ही नहीं है कि उनके गैंग में शामिल हुए बगैर भी लोग अच्छा लिख रहे हैं।) यह बातें अब भी होती हैं, क्योंकि किताब की एक-एक लाइन यह बताने के लिए काफी है कि आज की तारीख में व्यक्ति का ईमानदार होना सबसे बड़ा अपराध है। किताब में एक जगह उल्लेखित है- ‘कोई भी कागज मैं लाखों रुपए लेकर भी नहीं छोड़ सकता था। यह शासन से सीधे-सीधे गद्दारी है और राष्ट्रद्रोह भी।’ भारतीय प्रशासनिक सेवा के अफसर सीके खेतान ने किताब की भूमिका लिखते हुए यह माना है कि किताब वरिष्ठ और कनिष्ठ दोनों अधिकारियों के लिए एक पाठ्यक्रम की तरह है, क्योंकि सरकारी सेवा में अपनी दृष्टि से काम करना गधा बनकर बोझ ढोना या फिर घोड़ा बन जाना होता है। अपनी किताब में डाक्टर ठाकुर ने शासकीय तंत्र को जिस तरह से चिंदी-चिंदी किया है, उससे हर शासकीय अधिकारी और कर्मचारी यह सोचने को मजबूर तो होता ही है कि उसकी दिशा क्या है।

डाक्टर ठाकुर अपने आसपास को कितना बदल पाए इसका तो नहीं पता, लेकिन यह साफ है कि अपने काम के प्रति जो निष्ठा, प्रतिबद्धता और ईमानदारी उनमें आई, वह उनके शिक्षक पिता से विरासत में मिली थी। 29 अक्टूबर 1949 को दुर्ग में जन्मे श्री ठाकुर के पिता त्र्यम्बकनाथ ठाकुर ने अध्यापक से प्रिंसिपल का सफर तय किया था। इस बीच उनका जगह-जगह तबादला होता रहा। सरकार जहां भेजती, वे अशिक्षा के अंधकार को दूर करने के लिए वहीं पहुंच जाते थे। श्री ठाकुर के परिजन की आमगांव के पास काफी जमीन थी। परिजन हमेशा इस कोशिश में रहते थे कि किसी तरह से प्रापर्टी को हथिया लिया जाए। उनके बेवजह के दबाव के चलते श्री ठाकुर ने यह तय कर लिया था कि वे ऐसी जमीन के चक्कर में नहीं रहेंगे, जिसके लिए लोग लड़ते हैं। उन्होंने अपनी जमीन बनानी शुरू की। जब वे मात्र 18 साल के थे तभी उन्हें मार्केटिंग फेडरेशन में नौकरी मिल गई थी। नौकरी करते-करते ही अपनी पढ़ाई पूरी की। उनके पास डिग्रियों की भरमार है। वे अर्थशास्त्र में एमए हैं। हिन्दी में एमए हैं और उन्होंने पीएचडी भी किया है। उन्होंने पत्रकारिता की उपाधि भी ली और एलएलबी भी किया। विक्रय कर विभाग में आने के पूर्व वे नायब तहसीलदार और अर्थशास्त्र के प्रोफेसर भी रह चुके हैं। उनकी अब तक 12 किताबें प्रकाशित हो चुकी हैं, लेकिन सर्वाधिक चर्चा डिप्टी कमिश्नर की डायरी को ही मिली है। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि किताब वास्तविकता के काफी करीब है। चूंकि घर की मुर्गी दाल बराबर होती है, फलस्वरूप छत्तीसगढ़ को छोड़ श्री ठाकुर का कई अनतर्राष्ट्रीय मंचों पर सम्मान हो चुका है। यह बात बहुत कम लोग जानते हैं, लेकिन है हकीकत।

आत्महत्या के प्रकरण से उबरने के बाद श्री ठाकुर ने ज्योतिष के क्षेत्र में जबरदस्त ढंग से मेहनत की। इस क्षेत्र में अब वे एक बड़े नाम हैं। इतने बड़े नाम कि पिछले दो चुनावों में वे देश के कई राजनीतिज्ञों की कुंडली तैयार कर चुके हैं। बैंगलोर का एक ज्योतिष विश्वविद्यालय उन्हें अपने यहां का चांसलर बनाने को भी तैयार है। अपनी पत्नी माया, पुत्री मान्या और पुत्र मनयनाथ के साथ रायपुर के गीतांजलि नगर में निवासरत डाक्टर ठाकुर अलसुबह तीन से चार बजे उठ जाते हैं। नींद खुलते ही वे किताबों से बातचीत शुरू कर देते हैं। भ्रष्ट व्यवस्था में बदलाव को लेकर चिंतनशील डाक्टर ठाकुर का मानना है कि एक दिन सब कुछ बदलेगा। भला किसने सोचा था कि कभी नरसिम्हा राव को कोर्ट में गवाही देनी होगी? कौन जानता था कि लालू को चारा घोटाले में फंसना पड़ेगा? कौन जानता था कि देश में नेताओं का स्वागत जूते से होने लगेगा? देश में अच्छे लोग जनता के बीच से पैदा होंगे और दुनिया को खूबसूरत बनाने का काम करेंगे। पाठक भी डाक्टर ठाकुर से अपना रिश्ता कायम कर सकते हैं। उनका फोन नंबर है-094255-03229.

जो फोन नहीं कर सकते यदि उनके पास फिल्म जनता हवलदार की कैसेट या सीडी मौजूद हैं तो वे यह गीत जरूर सुने-

हम पर इल्जाम ये हैं, चोर को क्यों चोर कहा
क्यों सही बात कही, काहे ने कुछ और कहा
इसका बदला ये मिला उलटी छुरी हमपे चली
अब तो चारों ही तरफ बंद है दुनिया की गली
हमसे का भूल हुई जो ये सजा हमको मिली।

Tuesday, February 16, 2010

एक डाक्टर का ‘विज्ञापन’ नहीं है यह समाचार

राजकुमार सोनी

धूप में निकलो, घटाओं में नहाकर देखो,
जिन्दगी क्या है किताबों को हटाकर देखो

इस चर्चित शेर से कितने लोग इत्तेफाक रखते हैं इसका ठीक-ठाक अन्दाजा तो नहीं है, लेकिन हकीकत यह है कि पैदा होते ही जो लोग चांदी के चम्मच से ग्राइप वाटर और फिर बाद में लोगों का खून पीने के आदी हो जाते हैं उनकी दृष्टि कांटों के जंगल में उड़ने जा पहुंची तितलियों के घायल हो चुके पंखों की तरफ नहीं जाती है। ज्ञानी-ध्यानी कह गए हैं कि जो जमीन में नहीं लेटा उसने मिट्टी का स्वाद नहीं जाना। जो तार तोड़ती हुई रोटी और लहसून-प्याज की चटनी का मतलब नहीं समझता उसे भूख का अर्थ समझने में एक सदी लग जाती है। चोट खाने वाले से पूछा जाना चाहिए कि ठोकर कितनी जरूरी थी? कुल मिलाकर स्वयं के आत्मसम्मान और दूसरों को भी आत्मसम्मान के साथ जीते हुए देखने के लिए संघर्ष का होना बहुत जरूरी है। संघर्ष आदमी को कुछ बनाता हो या बनाता हो वह जीवन की दृष्टि जरूर देता है। तपने और खपने के बाद हासिल आया अनुभव जीवन के करीब होता है और शायद वही लोगों के काम भी आता है।

आज हम जिस शख्स की बात कर रहे हैं उनका नाम सुनील कालड़ा है। सुनील कालड़ा छत्तीसगढ़ के ही नहीं बल्कि देश के प्रसिद्ध प्लास्टिक सर्जन हैं। सुनील अब तक विविध तरह के पचास हजार से ज्यादा आपरेशन कर चुके हैं,लेकिन उनकी विशेष पहचान कटे-फटे मानव अंगों को जोड़ने के कारण बनी है। हाल के दिनों में उन्होंने माइकल नामक एक शख्स को एलीना भी बनाया है। (हालांकि सुनील इस तरह का काफी काम पहले भी कर चुके हैं, लेकिन माइकल पहला ऐसा मरीज है जिसने स्वयं ही मीडिया को एलीना बनने की जानकारी दी है) आज सुनील कालड़ा के हाथ खाली नहीं है। वे एक दिन में दस से बारह आपरेशन करते हैं। शिविरों में आपरेशनों की संख्या 20 से 25 भी हो जाती है, लेकिन एक समय ऐसा भी था जब सुनील के हाथ पूरी तरह से खाली थे।

सूनील
कालड़ा को एक प्रसिद्ध चिकित्सक बनने के लिए संघर्ष भरे उबड़-खाबड़ रास्तों से होकर गुजरना पड़ा है। 6 जनवरी 1960 को रायपुर में जन्मे सुनील कालड़ा वैसे तो काफी समृद्ध परिवार में पैदा हुए थे। यहीं रायपुर के शारदा चौक के पास उनके परिजनों की साइकिल की दुकान थी तो ठेकेदारी का बड़ा काम भी उनके पास था। 1960-64 के आसपास जिस परिवार के पास कार होती थी उन्हें काफी अमीर माना जाता था। रायपुर के गिने-चुने परिवारों की तरह कालड़ा परिवार के पास भी एक शानदार कार हुआ करती थी,लेकिन सुनील कालड़ा की पैदाइश के चार साल बाद ही जब उनके पिता का एक दुर्घटना में देहांत हो गया तो उनके दो चाचाओं ने पैतृक संपत्ति पर धीरे-धीरे कब्जा कर लिया। उनकी मां श्रीमती कृष्णा कालड़ा जो बा-मुश्किल पांचवी तक पढ़ी थीं उन्होंने भी धोखे में आकर अपने पति की संपत्ति उनके भाइयों के नाम कर दी थी। सम्पति मिलते ही एक चाचा तो फरार हो गया जबकि दूसरे चाचा ने पूरे परिवार को दर-दर की ठोकर खाने के लिए छोड़ दिया। कालड़ा परिवार ने यह कभी नहीं सोचा था कि उन पर विपत्तियों का पहाड़ टूटेगा भी तो इस बुरी तरह से। सगे रिश्तेदारों से मिले धोखे की वजह से श्रीमती कालड़ा केवल सड़क पर गईं बल्कि हांडी में पानी उबालकर अपने बच्चों को अभी चावल पक जाएगा बस थोड़ी ही देर में चावल पक जाएगा कहने के लिए मजबूर हो गई। भूख को लगातार जब्त करने के अभ्यास ने कालड़ा और उनके परिवार को मजबूत बना दिया। सुनील उन दिनों बेहद छोटे थे।

सुनील की सबसे बड़ी बहन शारदा ने इधर-उधर के टयूशन के बाद शिक्षक बनना तय किया। बाद में दूसरी बहन नीतू भी यहां रायपुर के उर्दू स्कूल में पढ़ाने लगी। जबकि बड़े भाई जैसे-तैसे 12वीं पास करने के बाद सेठ नेमीचंद जैन के यहां नौकरी पकड़ ली। बाद में परिवार के सभी सदस्यों ने यह तय किया कि उन्हें हर हाल में सुनील को डाक्टर बनाना है। पहले-पहल तो सुनील इसके लिए राजी नहीं थे। वे भी कहीं लिपिक बनकर परिवार में छाई गरीबी को दूर करने की जुगत ढूंढने में लगे थे, लेकिन इस बीच उनकी मां जिसे वे बहुत प्यार करते थे उन्हें पथरी की बीमारी ने अपनी गिरफ्त में ले लिया। मां कृष्णा कालड़ा असहनीय दर्द से बिलबिला उठती थीं। मां के दर्द को देखकर सुनील ने तय किया बस वे डाक्टर बनकर रहेंगे। पहले तो वे केवल दर्द को दूर करने वाला डाक्टर ही बने, लेकिन बाद में उन्होंने तय किया कि उन्हें हर तरह की सर्जरी में मास्टरी हासिल करनी है। इस संकल्प के बाद सुनील कालड़ा ने कभी पांडिचेरी में रहकर पढ़ाई की तो कभी पंजाब में रहकर प्रैक्टिस की। चिकित्सा की हर बड़ी डिग्री उनके पास है। विज्ञान के विस्तार के साथ ही सर्जरी का क्षेत्र भी काफी फैल चुका है। अब कहीं बाल की सर्जरी होती है तो कोई केवल हाथ-पैर की उंगलियों को जोड़ने की कला में माहिर है।

डाक्टर कालड़ा जब प्लास्टिक सर्जरी के क्षेत्र में कदम रख रहे थे तब उन्होंने कुछ दिनों मुबंई में रहकर भी अपना संघर्ष तेज किया था। दरअसल वे केवल कटे-फटे होठों को ठीक करने वाले डाक्टर मात्र ही नहीं रहना चाहते थे। मुबंई में उन्होंने चुनिंदा दस डाक्टरों से यह निवेदन किया था कि वे जब-जब कोई आपरेशन करें तो उन्हें अपने साथ जरूर रखें। डाक्टरों ने उनकी बात तो मान ली, लेकिन साथ ही यह भी जोड़ दिया कि वे आपरेशन में सहयोग के लिए किसी तरह का मानदेय नहीं देंगे। भूखे-प्यासे रहते हुए डाक्टर कालड़ा का एक कदम कभी पैर की ऊंगली बदलने वाले डाक्टर के पास रहता था तो दूसरा कदम कान बदलने वाले डाक्टर के पास। आज से कुछ अरसा पहले प्लास्टिक सर्जरी से चेहरा-मोहरा बदल देने की बात केवल फिल्मों में ही हुआ करती थी, लेकिन अब ऐसा नहीं है। छत्तीसगढ़ में ही अब बड़े से बड़ा आपरेशन संभव हैं। इतना ही नहीं डाक्टर कालड़ा ने आधे-अधूरे मर्दों को भी औरत जैसी जिन्दगी जीने का रास्ता दिखाया है।

डाक्टर कालड़ा का एक छोटा नर्सिग होम राजकुमार कालेज के पास स्थित है। इस नर्सिग होम वे कभी किसी की ऊंगली जोड़ते रहते हैं तो कटने के बाद शरीर से पूरी तरह फरार होने वाले हाथों को गिरफ्त में लेने की उनकी कोशिश हरदम जारी रहती है। कटे-फटे मानव अंगों को जोड़ने की कला में निपुण डाक्टर कालड़ा कई देशों की यात्रा भी कर चुके हैं। गरीबी और मुफलिसी को बेहद करीब से देख चुके डाक्टर कालड़ा की यह कोशिश रहती है कि पैसे के अभाव में कोई गरीब उनके अस्पताल से निराश होकर लौटे। वे हर चेहरे को मुस्कुराता हुआ देखना चाहते हैं। क्या आप ऐसे डाक्टर से मिलना चाहेंगे। डाक्टर कालड़ा का यहां राजधानी में नर्सिग होम है। उनका फोन नम्बर है-098271-43060