यह जो सड़क पर खून बह रहा है इसे सूंघकर तो देखोऔर पहचानाने की कोशिश करो ये हिन्दू का है
या मुसलमान का किसी सिख का है या ईसाई का
किसी बहन का है या भाई का
सड़क पर इधर-उधर पड़े पत्थरों के बीच
दबे टिफिन कैरियर से
जो रोटी की गंध आ रही है
वह किस जाति की है?
राज ठाकरे के इस खतरनाक युग में कुमार विकल की यह कविता बिना डरे अपने पूरे ताप के साथ खड़ी हुई है। कुमार विकल तो अब इस दुनिया में नहीं है लेकिन वे हमें जाते-जाते बता गए हैं कि जो रक्त सने कपड़े है वे उस आदमी के है जिसके हाथ मिलों में कपड़ा बुनते हैं, कारखानों में जूते बनाते हैं। खेतों में बीज डालते हैं।
वे हमें बता गए हैं कि ‘मजदूर’ की कोई जाति नहीं होती। मजदूर सिर्फ मजदूर होता है। यदि ‘मजदूर’ की कोई जाति होती भी है तो शायद वह ‘मजदूर’ ही होगी। लेकिन बालको की चिमनी दुर्घटना में मारे गए मजदूरों के साथ ऐसा नहीं हुआ। उन्हें मजदूर मानने से पहले ‘बिहारी’ मान लिया गया। गोया बिहारी होना अपराध हो गया, और यह सब कुछ इतने महीन तरीके से हुआ कि लोगों को इसका पता भी नहीं चला। अब भी कोरबा व उसके आसपास एक ही बात है और वह यह कि जो मारे गए वे छत्तीसगढ़िया नहीं थे, इसलिए प्रोफेसर प्यारेलाल ज्यादा गम मनाने की जरूरत नहीं है। चूंकि ‘मजदूर’ छत्तीसगढ़ के नहीं थे इसलिए छत्तीसगढ़िया स्वाभिमान मंच के संयोजक ताराचंद साहू ने अब तक वहां दस्तक नहीं दी , लेकिन घटना के बाद से जो लोग भी हुंकार भरते हुए मौका-मुआयना के लिए पहुंचे और अब भी पहुंचने का सिलसिला जारी है। उनकी भूमिकाओं को लेकर भी चर्चाओं का बाजार गर्म ही है। घटना के बाद जब वहां मुख्यमंत्री डॉक्टर रमन सिंह पहुंचे तब कांग्रेसियों को यही लगा था कि यदि डाक्टर रमन ने ठीक-ठाक मुआवजे की घोषणा नहीं की तो बैठे-ठाले मुद्दा मिल जाएगा, लेकिन मुख्यमंत्री ने ऐसा होने नहीं दिया, वे न केवल मुआवजे की घोषणा कर आए बल्कि टीवी कैमरों के सामने उन्होंने यह भी कह डाला कि हर हाल में बालको प्रबंधन को मुआवजे की अच्छी खासी रकम देनी होगी।
मुझे बिहारियों से प्रेम हो गया
यदि कोरबा में मौजूद मजदूर ‘बिहारी’ है भी तो यह किसी पुराण में नहीं लिखा है कि ‘बिहारी’ नफरत के काबिल होते है? भले ही छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र की सीमा को छुता है लेकिन मैं ही क्या बहुत से लोग इस बात को दावे के साथ कह सकते हैं कि यहां कोई राज ठाकरे निवास नहीं करता है। किसी ने राज ठाकरे का पॉकेट एडीशन बनने की कोशिश भी की है तो उसे जनता ने नकार दिया है।
मुख्यमंत्री के बाद पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी ने वहां धरना दिया। उनके धरने की सूचना से प्रशासन से ज्यादा कांग्रेसियों में हड़बड़ी मची। कांग्रेसियों के एक धड़े को लगा कि जोगी उनके क्षेत्र का माहौल खराब करने के लिए नौटंकी कर रहे हैं। नतीजा यह हुआ कि धरने में राजधानी से गए लोगों के अलावा किसी दूसरे बड़े नेता ने शिरकत नहीं की। जोगी के धरने के बाद जब कोरबा की जिला कांग्रेस कमेटी ने बचे-खुचे बड़े नेताओं को फिर से धरना देने के लिए न्यौता दिया तो इस बार यह हवा फैली कि कांग्रेस का एक बड़ा नेता अपने पुत्र की नौकरी बालको में लगवाना चाहता था। काफी हाथ-पांव मारने के बाद भी जब उसका मकसद हल नहीं हुआ तो वह धरने-प्रदर्शन की राजनीति पर उतर आया। कुछ इसी तरह की बातें भाजपा के एक स्थानीय स्तर के कद्दावर नेता को लेकर भी कही गई है। बताया जाता है कि भाजपा नेता के चेले-चपाटे चिमनी निर्माण में रेत, गिट्टी और स्टील के सप्लायर थे। कुछ चेलों को तो काम मिला हुआ था लेकिन ठेके में सप्लाई के काम से जब कुछ चेले कथित तौर पर बेरोजगार हो गए तो उन्हें अपने दिल की भड़ास निकालने का अच्छा अवसर मिल गया।
मार्क्स और माओ की विचारधारा को मानने वाले मजदूर संगठनों ने भी बालको में अपनी दस्तक दी है, लेकिन हाल-फिलहाल ‘अपना हक लेके रहेंगे’ जैसे जोरदार नारे की गूंज राजधानी तक नहीं पहुंची है। इधर भाजपा से निष्कासित और पिछले दो चुनाव में करारी हार का सामना करने वाले छत्तीसगढ़ियां विकास पार्टी के कर्ताधर्ता पीआर खुंटे ने भी कहा है कि यदि मजदूरों को उनका सही हक नहीं मिला तो वे धरना-प्रदर्शन करने को बाध्य हो जाएंगे। लेकिन क्या हकीकत में धरना-प्रदर्शन से किसी समस्या का समाधान हो सकता है? धरना-प्रदर्शन करने वाले अपने इस तौर तरीके को वाजिब ठहराते हो लेकिन आसपास का जो वातावरण बन गया है और बनता जा रहा है, उसके चलते धरना-प्रदर्शन करने वालों को ‘शक’ की निगाहों से देखा जाने लगा है। धरने-प्रदर्शन का ऐसा कोई उदाहरण दिखाई नहीं देता जिसे सही अंजाम मिला हो। पवित्र इरादों से प्रारंभ किए गए हर प्रदर्शन की असमय मौत हो रही है, और जिनकी मौत नहीं होती उन्हें ‘पेन्डुलम’ बनाकर छोड़ दिया जाता है। इधर-उधर हिलते-डुलते रहो बेटा...जब कोई सुनेगा ही नहीं तो फायदा ही क्या?
राजधानी में हर-दूसरे दिन कोई न कोई पार्षद दो-तीन ठेला ‘कचरा’ नगर निगम के सामने फेंक देता है। क्या इस आकस्मिक सफाई से शहर की गंदगी साफ हो जाती है? हर गर्मी में कुछ लोग महिलाओं को इक्कठा कर कलेक्ट्रेट ले जाते हैं उनसे सैकड़ों मटकिया तुड़वाते हैं। क्या इस कारनामे से लोगों को पूरे समय पानी मिलने लगता है? 23 सितंबर को बालकों में चिमनी गिरने की जो घटना हुई क्या इस घटना से पहले कभी कोई घटना नहीं हुई? इस चिमनी हादसे से पहले भी 1984 में एनटीपीसी की निर्माणाधीन चिमनी की चैली टूटकर गिर गई थी। इस दुखद घटना में भी 12 मजदूरों की मौत हो गई थी। कहने का आशय यह बिल्कुल भी नहीं है घटनाएं तो होती रहेगी...घटनाओं का क्या? लेकिन शायद यही सच है कि घटनाओं को रोका जा सकता है। सब जानते है कि बालको प्रबंधन ‘अनुमति मिल जाएगी’ वाले अंदाज में चिमनी का निर्माण करता रहा है, यदि स्थानीय जिला प्रशासन लाव-लश्कर के साथ समय रहते चिमनी का निर्माण रोक देता तो शायद प्रशासन को अब जाकर लाव-लश्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। सालों-साल से चली आ रही एक व्यवस्था ने लगभग आधा सैंकड़ा मजदूरों को मौत के आगोश में तो ले लिया लेकिन यही व्यवस्था अब यह नहीं देख पा रही है कि हादसे के बाद वहां करीब ढाई हजार मजदूर पूरी तरह बेकार हो गए हैं।
मार्क्स और माओ की विचारधारा को मानने वाले मजदूर संगठनों ने भी बालको में अपनी दस्तक दी है, लेकिन हाल-फिलहाल ‘अपना हक लेके रहेंगे’ जैसे जोरदार नारे की गूंज राजधानी तक नहीं पहुंची है। इधर भाजपा से निष्कासित और पिछले दो चुनाव में करारी हार का सामना करने वाले छत्तीसगढ़ियां विकास पार्टी के कर्ताधर्ता पीआर खुंटे ने भी कहा है कि यदि मजदूरों को उनका सही हक नहीं मिला तो वे धरना-प्रदर्शन करने को बाध्य हो जाएंगे। लेकिन क्या हकीकत में धरना-प्रदर्शन से किसी समस्या का समाधान हो सकता है? धरना-प्रदर्शन करने वाले अपने इस तौर तरीके को वाजिब ठहराते हो लेकिन आसपास का जो वातावरण बन गया है और बनता जा रहा है, उसके चलते धरना-प्रदर्शन करने वालों को ‘शक’ की निगाहों से देखा जाने लगा है। धरने-प्रदर्शन का ऐसा कोई उदाहरण दिखाई नहीं देता जिसे सही अंजाम मिला हो। पवित्र इरादों से प्रारंभ किए गए हर प्रदर्शन की असमय मौत हो रही है, और जिनकी मौत नहीं होती उन्हें ‘पेन्डुलम’ बनाकर छोड़ दिया जाता है। इधर-उधर हिलते-डुलते रहो बेटा...जब कोई सुनेगा ही नहीं तो फायदा ही क्या?
राजधानी में हर-दूसरे दिन कोई न कोई पार्षद दो-तीन ठेला ‘कचरा’ नगर निगम के सामने फेंक देता है। क्या इस आकस्मिक सफाई से शहर की गंदगी साफ हो जाती है? हर गर्मी में कुछ लोग महिलाओं को इक्कठा कर कलेक्ट्रेट ले जाते हैं उनसे सैकड़ों मटकिया तुड़वाते हैं। क्या इस कारनामे से लोगों को पूरे समय पानी मिलने लगता है? 23 सितंबर को बालकों में चिमनी गिरने की जो घटना हुई क्या इस घटना से पहले कभी कोई घटना नहीं हुई? इस चिमनी हादसे से पहले भी 1984 में एनटीपीसी की निर्माणाधीन चिमनी की चैली टूटकर गिर गई थी। इस दुखद घटना में भी 12 मजदूरों की मौत हो गई थी। कहने का आशय यह बिल्कुल भी नहीं है घटनाएं तो होती रहेगी...घटनाओं का क्या? लेकिन शायद यही सच है कि घटनाओं को रोका जा सकता है। सब जानते है कि बालको प्रबंधन ‘अनुमति मिल जाएगी’ वाले अंदाज में चिमनी का निर्माण करता रहा है, यदि स्थानीय जिला प्रशासन लाव-लश्कर के साथ समय रहते चिमनी का निर्माण रोक देता तो शायद प्रशासन को अब जाकर लाव-लश्कर लगाने की जरूरत नहीं पड़ती। सालों-साल से चली आ रही एक व्यवस्था ने लगभग आधा सैंकड़ा मजदूरों को मौत के आगोश में तो ले लिया लेकिन यही व्यवस्था अब यह नहीं देख पा रही है कि हादसे के बाद वहां करीब ढाई हजार मजदूर पूरी तरह बेकार हो गए हैं।
बचपन की एक कहानी रह-रहकर डराती है और वह यह कि जिन मजदूरों ने ‘ताजमहल’ का निर्माण किया था बादशाह सलामत ने अपनी सलामती के लिए उनके हाथ कटवा दिए थे। हाथ कट जाने के बाद भला कोई क्या गढ़ पाएगा? जब गढ़ेगा ही नहीं तो बचेगा कैसे? बादशाह सलामत ने तो अपने जमाने के मजदूरों को जीते जी मार डाला था, क्या आपको नहीं लगता कि बाबा आदम जमाने से चली आ रही एक व्यवस्था ने कोरबा में डर के मारे इधर-उधर छिपे ढाई हजार मजदूरों को भूखों मरने के लिए मजबूर कर दिया है। इन मजदूरों से कोई यह नहीं कह रहा है कि चलिए आप लोगों के लिए हमारे पास एक काम है। उन्हें काम के एवज में कुछ पैसों की जरूरत है। उन्हें भीख नहीं काम चाहिए। वे मजदूर है भिखारी नहीं। और यदि कोरबा में मौजूद मजदूर ‘बिहारी’ है भी तो यह किसी पुराण में नहीं लिखा है कि ‘बिहारी’ नफरत के काबिल होते है? भले ही छत्तीसगढ़ का कुछ हिस्सा महाराष्ट्र की सीमा को छुता है लेकिन मैं ही क्या बहुत से लोग इस बात को दावे के साथ कह सकते हैं कि यहां कोई राज ठाकरे निवास नहीं करता है। किसी ने राज ठाकरे का पॉकेट एडीशन बनने की कोशिश भी की है तो उसे जनता ने नकार दिया है। देश के प्रसिद्ध कवि विनोद कुमार शुक्ल की एक कविता का अंश है-
मुझे बिहारियों से प्रेम हो गया
जहां जाता हूं कोई न कोई मिल जाता है
उसकी बोली से पहिचानकर यही लगता है कि
जिससे पिछली बार मिले थे
उससे ही मिल रहे हैं।
बिहार के बाहर एक बिहारी मुझे पूरा बिहार लगता।
जब कोई मुझे पत्नी और बच्चे के साथ दिख जाता
तो खुशी से मैं उसे देशवासियों कहकर संबोधित करता।
भागते-भागते देश की सीमा रेखा की घेराबंदी
कहा जाए जैसे बंदी
अंत में क्या बिहार-बिहार में बंदी
उत्तरप्रदेश-उत्तर प्रदेश में प्रांत नहीं नहीं कैदखाने है
तिस पर नया राज्य जब बनता तो
देश के स्वतंत्र होने जैसी खुशी लोगों को वहां होती
नागरिकों, देशवासियों कहकर किसे पुकारूं
वह कौन है और कहां रहता है?





