
राजकुमार सोनी
राहुल बजाज और सचिन तेंदुलकर को अपना आदर्श मानकर पिज्जा खाने वाली पीढ़ी पता नहीं इस किस्से को जानती है या नहीं लेकिन यह हकीकत है कि आज से कुछ अरसा पहले जब बुधवार की रात ‘आठ’ बजते थे तब लोग रेडियो से चिपक जाया करते थे। जिनके रेडियो की बैटरी डाउन हो जाया करती थी वे गानों को ठीक ढंग से सुनने के लिए छत पर चले जाया करते थे। यहां वे एरियल या दशा-दिशा के हिसाब से रेडियो को ठिकाने पर रखने के बाद अपने पसन्द के गानों को पायदान में ऊपर-नीचे उतरता देख प्यार से लड़ भी लिया करते थे। यह लड़ाई इस रूप में होती थी कि देखना अगली बार हमारा गाना फर्स्ट आएगा। जी हां आज हम अमीन सायानी के बारे में बात करने जा रहे हैं। वही अमीन सायानी जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उनके लिए सिर्फ और सिर्फ तीन शब्दों की जरूरत पड़ती है। यह तीन शब्द है-भाइयों और बहनों। पाठक सोच सकते हैं कि भला अमीन सायानी का छत्तीसगढ़ से क्या रिश्ता हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। अपनी मखमली और जादूभरी आवाज से हर दिल पर छा जाने वाले अमीन सायानी एक बार छत्तीसगढ़ आ चुके हैं। वर्ष 1950 में जब रायपुर के प्रसिद्ध राजकुमार कालेज में देश के महाविद्यालयों के बीच क्रिकेट स्पर्धा आयोजित की गई थी तब उनके कालेज से निकलने वाली पत्रिका के संपादक ने श्री सायानी को खेल पत्रकार बनाकर यहां भेजा था। उन्होंने मैच को बेहतर ढंग से कवरेज किया था और खूब प्रशंसा पायी थी।
इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ से श्री सायानी का एक मजबूत और गहरा रिश्ता है। देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में भी उनके ढेरों प्रशंसक हैं। बाजार के इस खतरनाक दौर में यह कम खुशी की बात नहीं है कि शराब पीकर बारात में नागिन की धुन पर रूमाल लहराने वाले लोगों के बीच अब भी ‘सावन का महीना पवन करे शोर’जैसे गानों पर झूमने वाली पीढ़ी मौजूद है। वह पीढ़ी जिसने आत्मा में बसने वाले संगीत का सुनहरा दौर देखा है वह अमीन सायानी को याद करती है। अमीन सायानी की बात आज यहां इसलिए भी हो रही है, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही यह पता चला कि उनकी उद्घोषणा में आकाशवाणी रायपुर से हर रविवार को प्रसारित होने वाला कोलगेट संगीत के सितारों की महफिल नामक कार्यक्रम बंद होने वाला है। इस बारे में अहिंसा रेडियो श्रोता संघ की एक विज्ञप्ति मुझ तक पहुंची। विज्ञप्ति में इस बात का उल्लेख था कि श्रोताओं की पर्याप्त संख्या के बावजूद समीक्षा पत्र नहीं मिल पाने के चलते कार्यक्रम बंद किया जा रहा है। विज्ञप्ति में श्री सायानी का फोन नंबर भी दिया हुआ था और कहा गया था कि इस बारे में ज्यादा विस्तार से श्री सायानीजी से चर्चा की जा सकती है। जब मैंने उनके रीगल सिनेमा के पास स्थित मुबंई के दफ्तर में फोन लगाया तो फोन शायद किसी कर्मचारी ने उठाया। नाम बताने पर उन्होंने इतना ही कहा-दो मिनट रुकिए। यह दो मिनट कई पल के समान गुजरे। दो मिनट बाद फोन से जो आवाज आई उससे मैं क्या कोई भी होता तो उसे पागल होना ही था। वही आवाज.. वही खनक.. वही मिठास.. वही अपनापन और देखते ही देखते लगा वाल्व वाले रेडियों के सामने अपने पिता के साथ बैठा हूं। पिता ने आदेश दे रखा है-जो गाना पहले पायदान पर होगा उसे नोट करके रखना। अगले हफ्ते देखेंगे किसको नंबर मिलता है। जयमाला,हवा महल, बिनाका गीतमाला, एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा, सेरिडान के साथी, इंस्पेक्टर ईगल, उजाले उनकी यादों के और भी न जाने क्या-क्या सब कुछ एक ही पल में आंखों के सामने से गुजर गया।
कोई इसे माने या न माने लेकिन यह हकीकत है कि जब लोग बड़े होकर बचपन से गुजरते हैं तो उस वक्त केवल और केवल भीगने का काम करते हैं। (यकीन नहीं होता है तो जरा बचपन की पुरानी तस्वीरों में दोस्तों को याद करके देखिए) फोन पर दो किश्तों पर ही चर्चा हुई। कार्यक्रम के बंद होने के बारे में श्री सायानी ने मात्र इतना ही बताया कार्यक्रम का आखिरी बार प्रसारण होगा। किशोर कुमार की स्मृति में स्व. एसडी बर्मन को समर्पित कार्यक्रम की गुणवत्ता को लेकर श्री सायानी काफी उत्साहित दिखे। सायानी जी से कुछ ऐसी बातें पता चली जिसका जिक्र यहां जरूरी है। 21 दिसम्बर 1932 को बंबई में जन्मे अमीन सायानी के माता-पिता कच्छ गुजरात में रहते थे। उनकी माता कुलसुम सायानी गांधीजी की शिष्या थीं। गांधीजी के कहने पर ही उनकी माता श्रीमती कुलसुम ने नवसाक्षरों के लिए पहली पत्रिका निकाली थी। श्री सायानी के चाचा रहमानतुल्ला मुंबई कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी थे। संगीत के शौकीन श्री सायानी वैसे तो गायक बनना चाहते थे,लेकिन जब वे बड़े हुए तब उनकी आवाज फट गई और उनका गायक बनने का सपना अधूरा रह गया। इस बीच उनके भाई हमीद जो बंबई में ब्राडकास्टर थे, उनके साथ श्री सायानी ने काम शुरू किया। शुरू-शुरू में तो उन्हें बहुत दिक्कत पेश आई लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब लोग रेडियो से चिपककर बैठने लगे। महल, उड़न खटोला जैसी फिल्मों के दौर में वर्ष 1952 के अंतिम सप्ताह में बिनाका गीतमाला नामक कार्यक्रम का प्रसारण हुआ था। बिनाका गीतमाला का नाम दो बार बदला भी गया, पहले सिबाका गीतमाला और फिर बाद में कोलगेट गीतमाला। सायानी ने आम बोलचाल की भाषा पर जबरदस्त ढंग से काम किया। उनकी भाषा कई तूफानों और उबड़-खाबड़ रास्ते से इस तरह गुजरी कि जिसने भी उन्हें एक बार सुना वह उनका दीवाना होकर रह गया, लेकिन जब टेलीविजन पर फिल्मी गीतों का काउंट डाउन कार्यक्रम शुरू हुआ तो लोगों में इसका प्रभाव कम हो गया। कार्यक्रम के 42 वें वर्ष में इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया। श्री सायानी इन दिनों न्यूयार्क, कनाडा और न्यूजीलैंड के शहर आकलैंड के लिए रेडियो प्रोग्राम बनाने का काम करते हैं, क्योंकि हमारे देश में तो शायद यही माना जाता है कि जो शख्स 70 या 80 बरस का हो गया वह किसी काम का ही नहीं रहता। ऐसे शख्स को किसी खटिया में पड़े-पड़े खांसते ही रहना चाहिए। श्री सायानी 77 साल की उम्र में भी उसी जोशो-खरोश और रुमानियत से भरे हुए हैं। हाल ही में श्री सायानी की यादों को समेटते हुए सारेगामा वालों ने गीत माला की छांव में नामक पांच वाल्यूम में सीडी कैसेट लांच किया है। संगीत के प्रेमियों के लिए यह सीडी- कैसेट इसलिए भी संग्रहणीय है क्योंकि इसमें श्री सायानी ने अपनी दास्तां के साथ फिल्मी कहानियां भी बयां की है। कौन सा गीत क्यों हिट था इस बारे में जानना वाकई सुखद लगता है।
वर्ष 1958 में श्री सायानी ने रमा नामक एक युवती से विवाह रचाया था। रमा श्री सायानी के साथ ही काम किया करती थी। पति और पत्नी दोनों ही मन लगाकर अपनी दुनिया को खूबसूरत बनाने में लगे हुए थे, लेकिन एक दिन रमा चल बसीं। वजह थी सिगरेट। रमा सिगरेट बहुत पीती थी और पत्नी की वजह से श्री सायानी की भी लत बढ़ गई थी। पत्नी का देहांत हो जाने के बाद उन्होंने सिगरेट छोड़ दी। श्री सायानी इन दिनों अपने पुत्र राजील के साथ चर्चगेट में रहते हैं। व्यसनों से पूरी तरह दूर श्री सायानी को एक बार हार्टअटैक भी आ चुका है। सुबह वे मुद्रा प्राणायाम करते हैं और उसके बाद थोड़ा आराम कर काम में जुट जाते हैं। श्री सायानी को दुनिया में सिर्फ तीन चीजों से ही नफरत है। पहली नफरत वे उन लोगों से करते हैं जो धर्म की ठेकेदारी कर अपना मकसद हल करते हैं। दूसरी नफरत वे उन लोगों से करते हैं जो जीवन को गति देने वाली चीजों को बरबाद करते हैं। पानी, बिजली, भोजन को बरबाद करने वाले लोग श्री सायानी को नापसंद हैं। श्री सायानी की नफरत संचार के उस माध्यम से भी है जो आम-आदमी को कीड़ा-मकोड़ा समझने में भरोसा रखती है। क्या सायानी की नफरत गैरवाजिब है?








