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Sunday, January 31, 2010

आवाज की दुनिया के दोस्तों नमस्कार...


राजकुमार सोनी


राहुल बजाज और सचिन तेंदुलकर को अपना आदर्श मानकर पिज्जा खाने वाली पीढ़ी पता नहीं इस किस्से को जानती है या नहीं लेकिन यह हकीकत है कि आज से कुछ अरसा पहले जब बुधवार की रात ‘आठ’ बजते थे तब लोग रेडियो से चिपक जाया करते थे। जिनके रेडियो की बैटरी डाउन हो जाया करती थी वे गानों को ठीक ढंग से सुनने के लिए छत पर चले जाया करते थे। यहां वे एरियल या दशा-दिशा के हिसाब से रेडियो को ठिकाने पर रखने के बाद अपने पसन्द के गानों को पायदान में ऊपर-नीचे उतरता देख प्यार से लड़ भी लिया करते थे। यह लड़ाई इस रूप में होती थी कि देखना अगली बार हमारा गाना फर्स्ट आएगा। जी हां आज हम अमीन सायानी के बारे में बात करने जा रहे हैं। वही अमीन सायानी जो किसी परिचय के मोहताज नहीं है। उनके लिए सिर्फ और सिर्फ तीन शब्दों की जरूरत पड़ती है। यह तीन शब्द है-भाइयों और बहनों। पाठक सोच सकते हैं कि भला अमीन सायानी का छत्तीसगढ़ से क्या रिश्ता हो सकता है, लेकिन ऐसा नहीं है। अपनी मखमली और जादूभरी आवाज से हर दिल पर छा जाने वाले अमीन सायानी एक बार छत्तीसगढ़ आ चुके हैं। वर्ष 1950 में जब रायपुर के प्रसिद्ध राजकुमार कालेज में देश के महाविद्यालयों के बीच क्रिकेट स्पर्धा आयोजित की गई थी तब उनके कालेज से निकलने वाली पत्रिका के संपादक ने श्री सायानी को खेल पत्रकार बनाकर यहां भेजा था। उन्होंने मैच को बेहतर ढंग से कवरेज किया था और खूब प्रशंसा पायी थी।

इसके अलावा भी छत्तीसगढ़ से श्री सायानी का एक मजबूत और गहरा रिश्ता है। देश के अन्य हिस्सों की तरह छत्तीसगढ़ में भी उनके ढेरों प्रशंसक हैं। बाजार के इस खतरनाक दौर में यह कम खुशी की बात नहीं है कि शराब पीकर बारात में नागिन की धुन पर रूमाल लहराने वाले लोगों के बीच अब भी ‘सावन का महीना पवन करे शोर’जैसे गानों पर झूमने वाली पीढ़ी मौजूद है। वह पीढ़ी जिसने आत्मा में बसने वाले संगीत का सुनहरा दौर देखा है वह अमीन सायानी को याद करती है। अमीन सायानी की बात आज यहां इसलिए भी हो रही है, क्योंकि कुछ दिनों पहले ही यह पता चला कि उनकी उद्घोषणा में आकाशवाणी रायपुर से हर रविवार को प्रसारित होने वाला कोलगेट संगीत के सितारों की महफिल नामक कार्यक्रम बंद होने वाला है। इस बारे में अहिंसा रेडियो श्रोता संघ की एक विज्ञप्ति मुझ तक पहुंची। विज्ञप्ति में इस बात का उल्लेख था कि श्रोताओं की पर्याप्त संख्या के बावजूद समीक्षा पत्र नहीं मिल पाने के चलते कार्यक्रम बंद किया जा रहा है। विज्ञप्ति में श्री सायानी का फोन नंबर भी दिया हुआ था और कहा गया था कि इस बारे में ज्यादा विस्तार से श्री सायानीजी से चर्चा की जा सकती है। जब मैंने उनके रीगल सिनेमा के पास स्थित मुबंई के दफ्तर में फोन लगाया तो फोन शायद किसी कर्मचारी ने उठाया। नाम बताने पर उन्होंने इतना ही कहा-दो मिनट रुकिए। यह दो मिनट कई पल के समान गुजरे। दो मिनट बाद फोन से जो आवाज आई उससे मैं क्या कोई भी होता तो उसे पागल होना ही था। वही आवाज.. वही खनक.. वही मिठास.. वही अपनापन और देखते ही देखते लगा वाल्व वाले रेडियों के सामने अपने पिता के साथ बैठा हूं। पिता ने आदेश दे रखा है-जो गाना पहले पायदान पर होगा उसे नोट करके रखना। अगले हफ्ते देखेंगे किसको नंबर मिलता है। जयमाला,हवा महल, बिनाका गीतमाला, एस कुमार्स का फिल्मी मुकदमा, सेरिडान के साथी, इंस्पेक्टर ईगल, उजाले उनकी यादों के और भी न जाने क्या-क्या सब कुछ एक ही पल में आंखों के सामने से गुजर गया।

कोई इसे माने या न माने लेकिन यह हकीकत है कि जब लोग बड़े होकर बचपन से गुजरते हैं तो उस वक्त केवल और केवल भीगने का काम करते हैं। (यकीन नहीं होता है तो जरा बचपन की पुरानी तस्वीरों में दोस्तों को याद करके देखिए) फोन पर दो किश्तों पर ही चर्चा हुई। कार्यक्रम के बंद होने के बारे में श्री सायानी ने मात्र इतना ही बताया कार्यक्रम का आखिरी बार प्रसारण होगा। किशोर कुमार की स्मृति में स्व. एसडी बर्मन को समर्पित कार्यक्रम की गुणवत्ता को लेकर श्री सायानी काफी उत्साहित दिखे। सायानी जी से कुछ ऐसी बातें पता चली जिसका जिक्र यहां जरूरी है। 21 दिसम्बर 1932 को बंबई में जन्मे अमीन सायानी के माता-पिता कच्छ गुजरात में रहते थे। उनकी माता कुलसुम सायानी गांधीजी की शिष्या थीं। गांधीजी के कहने पर ही उनकी माता श्रीमती कुलसुम ने नवसाक्षरों के लिए पहली पत्रिका निकाली थी। श्री सायानी के चाचा रहमानतुल्ला मुंबई कांग्रेस कमेटी के सदस्य भी थे। संगीत के शौकीन श्री सायानी वैसे तो गायक बनना चाहते थे,लेकिन जब वे बड़े हुए तब उनकी आवाज फट गई और उनका गायक बनने का सपना अधूरा रह गया। इस बीच उनके भाई हमीद जो बंबई में ब्राडकास्टर थे, उनके साथ श्री सायानी ने काम शुरू किया। शुरू-शुरू में तो उन्हें बहुत दिक्कत पेश आई लेकिन एक दिन ऐसा भी आया जब लोग रेडियो से चिपककर बैठने लगे। महल, उड़न खटोला जैसी फिल्मों के दौर में वर्ष 1952 के अंतिम सप्ताह में बिनाका गीतमाला नामक कार्यक्रम का प्रसारण हुआ था। बिनाका गीतमाला का नाम दो बार बदला भी गया, पहले सिबाका गीतमाला और फिर बाद में कोलगेट गीतमाला। सायानी ने आम बोलचाल की भाषा पर जबरदस्त ढंग से काम किया। उनकी भाषा कई तूफानों और उबड़-खाबड़ रास्ते से इस तरह गुजरी कि जिसने भी उन्हें एक बार सुना वह उनका दीवाना होकर रह गया, लेकिन जब टेलीविजन पर फिल्मी गीतों का काउंट डाउन कार्यक्रम शुरू हुआ तो लोगों में इसका प्रभाव कम हो गया। कार्यक्रम के 42 वें वर्ष में इस कार्यक्रम को बंद कर दिया गया। श्री सायानी इन दिनों न्यूयार्क, कनाडा और न्यूजीलैंड के शहर आकलैंड के लिए रेडियो प्रोग्राम बनाने का काम करते हैं, क्योंकि हमारे देश में तो शायद यही माना जाता है कि जो शख्स 70 या 80 बरस का हो गया वह किसी काम का ही नहीं रहता। ऐसे शख्स को किसी खटिया में पड़े-पड़े खांसते ही रहना चाहिए। श्री सायानी 77 साल की उम्र में भी उसी जोशो-खरोश और रुमानियत से भरे हुए हैं। हाल ही में श्री सायानी की यादों को समेटते हुए सारेगामा वालों ने गीत माला की छांव में नामक पांच वाल्यूम में सीडी कैसेट लांच किया है। संगीत के प्रेमियों के लिए यह सीडी- कैसेट इसलिए भी संग्रहणीय है क्योंकि इसमें श्री सायानी ने अपनी दास्तां के साथ फिल्मी कहानियां भी बयां की है। कौन सा गीत क्यों हिट था इस बारे में जानना वाकई सुखद लगता है।

वर्ष 1958 में श्री सायानी ने रमा नामक एक युवती से विवाह रचाया था। रमा श्री सायानी के साथ ही काम किया करती थी। पति और पत्नी दोनों ही मन लगाकर अपनी दुनिया को खूबसूरत बनाने में लगे हुए थे, लेकिन एक दिन रमा चल बसीं। वजह थी सिगरेट। रमा सिगरेट बहुत पीती थी और पत्नी की वजह से श्री सायानी की भी लत बढ़ गई थी। पत्नी का देहांत हो जाने के बाद उन्होंने सिगरेट छोड़ दी। श्री सायानी इन दिनों अपने पुत्र राजील के साथ चर्चगेट में रहते हैं। व्यसनों से पूरी तरह दूर श्री सायानी को एक बार हार्टअटैक भी आ चुका है। सुबह वे मुद्रा प्राणायाम करते हैं और उसके बाद थोड़ा आराम कर काम में जुट जाते हैं। श्री सायानी को दुनिया में सिर्फ तीन चीजों से ही नफरत है। पहली नफरत वे उन लोगों से करते हैं जो धर्म की ठेकेदारी कर अपना मकसद हल करते हैं। दूसरी नफरत वे उन लोगों से करते हैं जो जीवन को गति देने वाली चीजों को बरबाद करते हैं। पानी, बिजली, भोजन को बरबाद करने वाले लोग श्री सायानी को नापसंद हैं। श्री सायानी की नफरत संचार के उस माध्यम से भी है जो आम-आदमी को कीड़ा-मकोड़ा समझने में भरोसा रखती है। क्या सायानी की नफरत गैरवाजिब है?

Friday, January 29, 2010

केमिकल लोचा

राजकुमार सोनी
कोई सही तरीके से बताने को तैयार नहीं है कि ‘केमिकल लोचा’ शब्द की उत्पति कहां से हुई है, लेकिन समझा जाता है कि राजकुमार हिरानी की फिल्म लगे रहो मुन्ना भाई में संजय दत्त ने इस शब्द की महिमा को अपने तरीके से समझाने का प्रयास किया था। मोटे तौर पर केमिकल का मतलब रसायन और लोचा का अर्थ लफड़ा होता है। कुल मिलाकर ऐसा विवाद जिसमें कई तरह की रासायनिक क्रियाएं शामिल हो गई हों उसे केमिकल लोचे की श्रेणी में रखा जा सकता है। छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में घटित एक घटनाक्रम में भी हम केमिकल लोचे की झलक पा सकते हैं।

अभी कुछ दिनों पहले जब आरएसएस से जुड़े कर्मठ लोग राजधानी की सड़कों पर पथ संचलन करते हुए निकले तो महापौर किरणमयी नायक ने उन पर फूलों की बारिश की। कांग्रेस के बड़े नेताओं को बहारो फूल बरसाओ वाला अन्दाज पसन्द नहीं आया और उन्होंने श्रीमती नायक को कारण बताओ नोटिस थमा दिया। नोटिस के मार्फत उनसे यह पूछा गया है कि आखिरकार उन्हें यह गुस्ताखी क्यों और किसलिए करनी पड़ी? हालंकि श्रीमती नायक ने नोटिस का जवाब दे दिया है, लेकिन राजनीति में रुचि रखने वाले जानकार कहते हैं कि नोटिस देने की घटना यूं ही नहीं हुई। इसके पीछे कई कई तरह की रासायनिक क्रियाएं काम करती रही हैं। अव्वल तो कांग्रेस के बड़े नेता यह चाहते ही नहीं थे कि श्रीमती नायक को टिकट मिले। जब उन्हें टिकट मिल ही गई तो पार्षद का चुनाव लड़ने वाले नेताओं से लेकर गर्मी में भी टायर जलाकर आग तापने वाले नेताओं की तरफ से यही कोशिश चलती रही कि वे चुनाव न जीत पाएं।

कई दिनों तक तो नेता खोल से बाहर ही नहीं निकले और जब बाहर निकले तो सभी खाली हाथ थे। महापौर के चुनाव के लिए धन की व्यवस्था कहां से होगी इसके लिए तीन-चार नेताओं को जवाबदारी दी गई लेकिन सभी ने पल्ला झाड़ लिया था। अमूमन राजनीतिक पार्टियों में चुनाव संचालक बनने के लिए होड़ लगी रहती है, लेकिन ऐसा पहली बार हुआ था कि जिस शख्स को चुनाव का संचालक बनाया गया था उसने यह कहकर हाथ जोड़ लिया था कि उसे ‘मरना’ नहीं है। श्रीमती नायक के लिए काम करने वाले कार्यकर्ताओं को तो इस बात की पूरी उम्मीद थी कि वे चुनाव जीत जाएंगी। लेकिन कांग्रेस के कतिपय दिग्गज नेताओं को इस बात का बिल्कुल भी भरोसा नहीं था कि राजधानी की कमान श्रीमती नायक के हाथों में आ जाएगी। और जब कमान आ गई है तो तेज-तर्रार नेत्री ने तमाम नेताओं के कार्यक्रम को एक तरह से छीन ही लिया है। हर दूसरे-तीसरे दिन उनका सम्मान हो रहा है। कार्यक्रमों के बहाने स्वयं को व्यस्त रखने वाले नेताओं को भला यह बात कैसे अच्छी लग सकती है कि कोई महिला उनकी जगह शाल और श्रीफल थामे अखबारों में क्लोजअप का विज्ञापन करते हुए नजर आए।

श्रीमती
नायक को महापौर बनने से पहले तोड़फोड़ अभियान का विरोध करने के कारण जो प्रचार मिल रहा था उस प्रचार से नेताओं को ज्यादा कष्ट नहीं हो रहा था। नेताओं का कष्ट अब जाकर शुरू हुआ है। कार्यक्रम के बगैर बेरोजगार हो चुके नेता अब यह देखने को मजबूर हैं कि शहर की सड़कों पर झाडू लगाते हुए श्रीमती नायक जितनी खूबसूरत दिख रही हैं, उतनी ही खूबसूरत पोलियो ड्राप पिलाते हुए भी नजर आ रही हैं। नेताओं को उनके झाडू लगाने से उतना एतराज नहीं है जितना एतराज इस बात पर है कि वे झाडू उठाने के बाद भी कामवाली बाई नजर नहीं आ रही हैं। किसी फिल्म अभिनेता की सुंदरता तो उसके चेहरे पर चस्पा होती है लेकिन नेता का सौंदर्य उसके काम में छिपा होता है और इस सुंदरता के लिए उसे तारीफ तब ही मिल पाती है जब जनता उसे रुककर सुनती है और उसके बोले हुए पर भरोसा करती है। श्रीमती नायक के साथ फिलहाल यही हो रहा है। वे जहां जा रही हैं लोग उन्हें देखने के लिए घर से बाहर निकल रहे हैं। कोई उन्हें चाय पर आमंत्रित कर रहा है तो कोई उन्हें नाश्ते के लिए न्यौता देता हुआ दिखाई देता है।

बड़े नेताओं की अमृतांजन लगाकर दूर नहीं होने वाली तकलीफ का विषय भी यही है कि श्रीमती नायक को अखबार जरूरत से ज्यादा स्पेस क्यों दे रहा है? हर चैनल के कैमरे की आंख उनके चेहरे पर जाकर ही क्यों टिक रही है? इतना ही नहीं कार्यकर्ताओं का एक बड़ा तबका उनमें चार साल बाद होने वाले विधानसभा चुनाव के लिए कांग्रेस की तरफ से पेश की जाने वाली मुख्यमंत्री की झलक भी देखने में लग गया है। अब ऐसे में नियंत्रण के लिए तो अनुशासन का डंडा चलना था।जहां तक श्रीमती नायक द्वारा स्वयंसेवकों पर फूल बरसाने की बात है तो सब जानते हैं कि स्वयंसेवकों ने जब कार्यक्रम तय किया था तो उन्होंने श्रीमती नायक जो महापौर भी हैं से मिलकर स्थान मांगा था। एक महापौर होने के नाते श्रीमती नायक ने उन्हें स्पोटर्स काम्पलेक्स में जगह मुहैया कराई थी। पता नहीं इस बात की जानकारी कांग्रेस के किसी हरिराम (याद करिए फिल्म शोले का हरिराम) को क्यों नहीं मिली अन्यथा बड़े नेताओं के कान फूंकने वाला हरिराम उन्हें फूल बरसाने से पहले ही पार्टी से निकाले जाने का ढिंढोरा पीट देता।

बताते हैं कि जब आरएसएस का जुलूस निकल रहा था तो निगम में पत्नी की जगह स्वयं ही आमद देने वाले एक पार्षद ने श्रीमती नायक को भारतीय संस्कृति का हवाला देते हुए यह सुझाव दिया था कि वे पथ संचलन करने वाले लोगों का स्वागत जरूर करें। आनन-फानन में फूल एकत्रित किए गए और फूल बरसाओ कार्यक्रम संपन्न हो गया। लेकिन इस फूल बरसाने वाले आयोजन के साथ ही यह सवाल भी खड़ा हो गया कि क्या कांग्रेस की विचारधारा इतनी कमजोर है कि वह स्वयंसेवकों के प्रति सदाशयता दिखाने पर आक्सीजन की मांग करने लगती है? जो कांग्रेस अमीर-गरीब सबको साथ लेकर चलने की बात करती है क्या उस कांग्रेस की विचारधारा फूल बरसाने मात्र से फांसी पर लटक जाती है? यदि ऐसा है तो निश्चित तौर पर श्रीमती नायक पर अपराध बनता है, और यदि ऐसा नहीं है तो फिर यहां के संकुचन से दूर दिल्ली के कांग्रेसी नेताओं को यह जरूर सोचना चाहिए कि अनुशासन का पाठ पढ़ाने की आड़ में उनके नुमाइंदे किस तरह का खेल कर रहे हैं।

यह बात अब तक मीडिया में सार्वजनिक नहीं हुई है, लेकिन पार्टी के उच्च पदस्थ सूत्रों का कहना है कि सोनिया गांधी के निर्देश पर दस जनपथ से जुड़े कुछ प्रमुख नेताओं ने पूरे मामले की जानकारी जुटाई है। जानकारी का ठीक-ठाक ब्योरा तो नहीं मिल पाया है लेकिन समझा जाता है कि कांग्रेस की राजनीति में प्रेक्षक की तरह निगाह रखने वाले कुछ लोगों ने आलाकमान को अवगत कराया है कि छत्तीसगढ़ में कांग्रेसी नेताओं का एक ग्रुप राजधानी की महापौर किरणमयी नायक और बिलासपुर की महापौर वाणी राव को प्रताड़ित करने में लगा हुआ है। शिकायत में यह भी कहा गया है कि पार्टी के कतिपय जिम्मेदार लोगों ने कुछ इलाकों के समर्थकों को चुनाव लड़ने के लिए 25 लाख रुपए मुहैया कराए थे जबकि श्रीमती नायक को मात्र दो लाख रुपए ही दिए गए थे। यहां तक प्रचार-प्रसार के लिए पार्टी की तरफ से झंडा-बैनर भी नहीं दिया गया था। शिकायतकर्ताओं ने कांग्रेस के एक बड़े कद्दावर नेता के प्रति इस बात के लिए भी आभार जताया है कि उन्होंने प्रदेश कांग्रेस कमेटी के सामने हाथ फैलाए बगैर श्रीमती नायक को अपनी ओर से तीन लाख रुपए की सहायता मुहैया कराई थी। लीजिए इस बीच एक खबर यह भी आ गई है कि सप्रे शाला के मैदान में भारतीय जनता युवा मोर्चा और एनएसयूआई के कार्यकर्ताओं ने एक क्रिकेट मैच भी खेला है। मैच के दौरान पूर्व मुख्यमंत्री अजीत जोगी के पुत्र अमित जोगी पूरे समय तक मौजूद थे। अब यह देखना तो दिलचस्प होगा ही कि मैच के लिए किसे किस तरह की नोटिस मिलती है?

Thursday, January 28, 2010

खतरनाक समय में भैय्यालाल का होना

राजकुमार सोनी
जी हां भाइयों और बहनों! आज हम एक ऐसे फनकार से आपका परिचय करा रहे हैं, जिसकी आवाज के सभी दीवाने हैं, बल्कि ये कहें कि सभी मस्ताने हैं। यह फनकार न केवल अभिनय का बादशाह है, बल्कि हेमंत कुमार और अभिताभ बच्चन की ओरिजनल आवाज का मालिक भी है। तो भाइयों और बहनों जोरदार तालियों से इस फनकार का स्वागत कीजिए। हमारे सामने आ रहे हैं हरदिल अजीज भैय्यालाल हेड़ाऊ। आर्केस्ट्रा का अमीन सयानी बना उद्घोषक जैसे ही यह घोषणा करता था, दर्शक दीर्घा से खूबसूरत किस्म की चीखें, सीटियां और सम्मानजनक तालियों का शोर गूंजने लगता था। (यह ताली वैसी ही होती थी जैसे स्काउट गाइड में भाग लेने वाले बच्चे एक-दो-एक- दो एक यानी लयबद्ध तरीके से बजाते हैं)

भैय्यालाल जैसे ही गाना शुरू करते-याद किया दिल ने कहां हो तुम, प्यार से पुकार लो जहां हो तुम... एक सन्नाटा छा जाता। गाना खत्म होते ही भैय्यालाल, भैय्यालाल का शोर सुनाई देने लगता था। लोगों की आत्मा तब तक रूह-अफ्ज्.ाा में तब्दील नहीं होती थी, जब तक वे भैय्यालाल से अपनी पसन्द का गाना नहीं सुन लेते थे। युवा दर्शकों की फरमाइश पर जब भैय्यालाल रंग बरसे भीगे चुनर वाली की शुरूआत करते तो मानो भूचाल आ जाता था। आर्केस्टा सुनने आए दर्शकों में से लंबी हाइट के कई अमिताभ बच्चन तुरन्त पैदा हो जाते थे। बैल बाटम पहना कोई अमिताभ सोने की थाली में जेवना परोसा.. जेवना परोसा कहता हुआ मंच की ओर चढ़ने लगता था तो पीछे सैकड़ों अमिताभ जेवना परोसा.. हां जी जेवना परोसा के कोरस में शामिल नजर आते थे। एक अमिताभ मंच के पास जाकर बाल झटकता था तो दूसरा अमिताभ लड़कियों के पास जाकर चिल्लाता था- होली है। कोई अभद्रता इसलिए भी नहीं होती थी क्योंकि गीत की दूसरी पंक्ति पर ध्यान देने का समय आ जाता था। एसएमएस वाले इंडियन आइडल और माइंड ब्लोइंग जुमले के जरिए दिमाग को दही बनाने वाली गदह पचीसी से हर रोज गुजरने वाले दर्शकों को यह जरूर लग सकता है कि एक आर्केस्ट्रा में गाने वाले शख्स में ऐसे क्या खास बात थी (है.. अभी भैय्यालाल जिंदा हैं) जो उन्हें औरों से थोड़ा अलग करती है। आखिर ऐसी क्या बात है कि भैय्यालाल भीड़ का हिस्सा होते हुए भी भीड़ का हिस्सा नहीं बन पाए?

भैय्यालाल सिर्फ इसलिए अलग नहीं हो जाते कि उनके पास रजामुराद, अभिताभ या हेमंत कुमार जैसी आवाज है, बल्कि वे औरों से इसलिए भी जुदा है, क्योंकि उन्हें अपनी मिट्टी से बेहद प्यार है। उनमें जितनी प्रतिभा है उसके मुकाबले चवन्नी छाप टैलेंट लेकर सेठों की औलादें मुबंई को बाहों में जकड़े हुए हैं। नए अमीरों के कला प्रेम के चलते ही आज हालात यह हैं कि जिसकी जो समझ में आ रहा है वह उसे मध्यान्ह भोजन बनाकर परोस रहा है। यह बात सर्वविदित है कि आसिफ की फिल्म मुगले-आजम को देखने के लिए लोग गांवों की पंचायतों में प्लान बनाते थे और फिर दो-दिन के अनाज-पानी का बंदोबस्त कर शहर की ओर निकल पड़ते थे। छत्तीसगढ़ में ऐसा वाकया दाऊ रामचंद्र देशमुख की देख-रेख में तैयार एक नाटक के साथ हो चुका है। दुख- दर्द, प्यार, परम्परा, तीज-त्यौहार के तानों-बानों से बुने गए नाटक चंदैनी-गोंदा के एक प्रमुख पात्र भी थे भैय्यालाल हेड़ाऊ।

राजनांदगांव के गोलबाजार इलाके में 8 अक्टूबर 1933 को जन्मे भैय्यालाल को इस नाटक में काम करने का अवसर तब ही मिल गया था जब इसकी शुरुआत की जा रही थी। इसके पहले भैय्यालाल शारदा और मिलन संगीत समिति के अलावा राजभारती आर्केस्ट्रा में गाया करते थे। 1971 को शुरू हुआ यह नाटक 1991 के आसपास ही विसर्जित हुआ। इन वर्षों में नाटक के कई हजार शो हुए। यह बात थोड़ी विचित्र लग सकती है लेकिन एक समय ऐसा भी था जब गांवों की चौपालों में समारू- बिसाहू इस बात के लिए प्यार भरा झगड़ा कर लिया करते थे कि उन्होंने चंदैनी गोंदा को बारम्बार देखकर रिकार्ड बनाया है। इस नाटक में काम करने वाले विजय वर्तमान जो हिन्दी के बेहद अच्छे कहानीकार भी हैं, बताते हैं कि वैसे तो नाटक का हर पात्र नाटक की जान था, लेकिन भैय्यालाल नाटक के दिल थे। नाटक की शुरुआत ही उनसे होती थी और नाटक का अंत भी उनके ही गायन से होता था। नाटक के हर सीन में वे प्रभावकारी उपस्थिति के साथ खड़े रहते थे। श्री वर्तमान बताते हैं कि दिल्ली के अशोका होटल में जहां सिर्फ एक बार लता मंगेशकर का कार्यक्रम हुआ था वहां जब चंदैनी गोंदा खेला गया तो धूम मच गई थी। झांसी के महुरानीपुर में भी नाटक के मंचन ने धमाका कर डाला था।

1980 में जब प्रसिद्ध फिल्म निर्माता सत्यजीत रे को मुंशी प्रेमचंद की कहानी सद्गति पर फिल्म बनाने का आइडिया आया तो वे छत्तीसगढ़ आए। यहां आकर उन्हें स्थानीय कलाकार तो याद आए लेकिन सबसे पहले उन्होंने भैय्यालाल हेड़ाऊ को ही खोजा। ओमपुरी, स्मिता पाटिल और मोहन अगाशे के अभिनय से सजी इस फिल्म में भैय्यालाल ने एक गोंड़ की भूमिका निभाई थी। उनके अभिनय को देख सामानांतर सिनेमा के कलाकार हक्का-बक्का थे। उनमें से कइयों ने भैय्यालाल से कहा आप कहां सड़ रहे हैं, लेकिन भैय्यालाल छत्तीसगढ़ छोड़कर नहीं गए। हिन्दी सिनेमा के जानकारों का मानना है कि यदि भैय्यालाल मुबंई चले जाते तो शायद बलराज साहनी की कमी काफी हद तक पूरी हो सकती थी। हो सकता है हिन्दी सिनेमा के जानकार सही कहते हों, लेकिन यह भी हकीकत है कि कई बार समाज भी अपने आसपास की प्रतिभा को पहचानने की भूल कर बैठता है। समाज को ज्यादा कोसना इसलिए भी ठीक नहीं है क्योंकि समाज गांधी की चीजों को नीलाम होने से बचा तो पाता नहीं है, लेकिन जब एक दारूवाला सामने आता है तो चिल्लाने लगता है।

भैय्यालाल के छत्तीसगढ़ नहीं छोड़ पाने की जड़ में गरीबी भी कारण रही है। भैय्यालाल का बचपन बेहद गरीबी में बीता। उनकी मां उमादेवी अक्सर बीमार रहती थी। फलस्वरुप उनके पिता का सारा पैसा उनके इलाज में ही खर्च हो गया। यहां तक दो मंजिला मकान पहले गिरवी रखा गया और फिर बाद में बिक गया। परिवार का भरण-पोषण करने के लिए उन्हें हाट-बाजारों में आलू-प्याज तक बेचना पड़ा। एक मित्र हरिप्रसाद ठाकुर के प्रयासों से जब उन्हें शिक्षक की नौकरी मिली तब जाकर दो वक्त का भोजन नसीब हुआ। अन्यथा हालात यह थे कि कभी उन्हें सूखे चने से गुजारा करना पड़ता था तो कभी पानी पीकर ही सीलन भरी जमीन पर सोना पड़ता था। भैय्यालाल के सात बच्चों में से दो का देहांत हो चुका है। एक लड़का वेल्डिंग का काम जानता है तो एक टेडेसरा की फैक्ट्री में कार्यरत है। चल रही है गुजर-बसर। ... तो आवाज की दुनिया के दोस्तों ये हैं भैय्यालाल। वही भैय्यालाल जिनका गाना आमार सोनार बंगला देश रायपुर आकाशवाणी से तब बजा था जब बंगला देश आजाद हुआ।

वही भैय्यालाल जिनसे उनके पिता ने एक रोज पूछा था बताओ युद्ध दृश्यों से सजी फिल्म सिकंदर देखोगे या सूरदास। भैय्यालान ने तुरन्त कहा-सूरदास देखूंगा क्योंकि हमारे मोहल्ले में भी एक सूरदास आता है जो अच्छा गाता है। जी हां भाईयों और बहनों मैं बात कर रहा हूं उस भैय्यालाल की जिसने अपने गाने की पै्रक्टिस बिस्कुट के खाली पीपे और पानी के घड़े में घंटों मुंह डालकर की है। क्या आप भैय्यालाल को जानते है? क्या आप भैय्यालाल से मिलना चाहेंगे? आप उन्हें एक फोन तो कर ही सकते हैं। लिखिए नंबर-099816-42855

Wednesday, January 27, 2010

सफर में कुमार


राजकुमार सोनी



शांतिनगर, एफ-13 सुलभ शौचालय के पास, अरे क्या कहते हैं वही जहां बच्चे खेलते रहते हैं। तुम आओगे तो घर का पता मिल जाएगा। सब जानते हैं रामचंद्र सिंहदेव का घर। अच्छा कब आओगे॥ चार बजे का समय ठीक रहेगा। कुछ देर बात कर लेंगे और फिर तब तक चाय पीने का समय हो जाएगा। भई दारू मैं किसी को नहीं पिलाता। इसलिए तुम्हें भी चाय ही पीनी होगी।पता खोजने में दिक्कत भी नहीं हुई। सायकिल का पंचर बनाने वाली एक दुकान संचालक से जैसे ही मैंने यह जानना चाहा कि क्या आसपास किसी पूर्व मंत्री का घर है, तो दुकानवाले ने भी तत्परता से कहा-अरे वो 
डोकरा। उसने लेफ्ट-राइट बताते हुए एड्रेस बता दिया।



जब मैं उनके घर पहुंचा तो पूर्व मंत्री के चेहरे पर एक चमक आ गई। उन्होंने कहा कि अच्छा चलो पहले मेरा महल देख लो। शांतिनगर के छोटे से घर में महल की एक बड़ी फोटो रखी हुई थी। इसके अलावा एक से बढ़कर एक खूबसूरत लड़कियों की तस्वीरें भी दीवारों की शोभा बढ़ा रही थी। ढेरों खूबसूरत तस्वीरों में एक मदर इंडिया नरगिस भी थी। तस्वीरों में लड़कियों का सौंदर्य याद आया, श्रीमानजी ने शादी नहीं की है। एक बुजुर्ग के सा
मने तस्वीरों में ही सही लड़कियों को निहारने में मुझे थोड़ी झिझक हो रही थी कि श्री सिंहदेव ने तुरन्त ही मेरी परेशानी पढ़ ली। उन्होंने कहा- बच्चू सुंदरता को शर्म और डर के साथ नहीं देखा जा सकता। महल और लड़कियों के अप्रतिम सौंदर्य को निहारने के बाद जब बातचीत की शुरूआत हुई तब पूर्व मंत्री ने बताना शुरू किया-मैं कोरिया कुमार रामचंद्र सिंहदेव पिता राजा रामानुजप्रताप सिंहदेव उम्र लगभग 80 साल बैंकुठपुर का निवासी हूं। एक राजा के परिवार में जन्म लेने के कारण मेरा बचपन वैसे नहीं बीता जैसा और लोगों के बच्चों का बीतता है। आम आदमी का बच्चा कभी भी खेल सकता है। कभी भी गा सकता है। कभी भी रो सकता है। मैं ऐसा नहीं कर सकता था। मैं राजा का लड़का था। मेरा हर कदम ऐतिहासिक माना जाता था और हर काम में अनुशासन की जंजीरे बंधी होती थी। मैं कुछ करना चाहता था। मैं छटपटा रहा था। बेचैनी मुझे कलकत्ता ले आई। मैं फोटोग्राफर बन गया। लड़कियों की जिन तस्वीरों को तुमने देखा है न वे सब मैंने खींची है। जब नरगिस की तस्वीर खींची और उन्हें भेंट की तो नरगिस ने पूछा था-क्या वाकई मैं इतनी खूबसूरत हूं? कलकता में चलाचल(हिन्दी में सफर, वही सफर जिसमें राजेश खन्ना, शर्मिला टैगोर और फिरोज खान थे) फिल्म बनाने तथा सत्यजीत रे के साथ कुछ साल काम करने के बाद मुझे लगा कि जब मेरे और मेरे पिता के पास खूब पैसा है तो फिर मैं और पैसा किसके लिए कमा रहा हूं। क्या ईश्वर ने मुझे इसलिए पैदा किया है कि मैं यूं ही इस दुनिया से गुजर जांऊ। छत्तीसगढ़ की मिट्टी मुझे खींचने लगी। मैं कलकत्ता से वापस लौट आया। यहां आकर मुझे लगा कि शायद राजनीति ही सेवा का सही माध्यम है।



1967 में जब बैंकुठपुर में 64 हजार मतदाता थे तब मैंने 35 हजार से ज्यादा वोटों से चुनाव जीता था। वर्ष 1968 में जब संविद सरकार थी तब मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री गोविन्द नारायण मिश्र थे। मैं उनके मंत्रिमंडल का सदस्य था। मेरे पास सभी बड़े विभाग थे। विपक्षी सदस्यों के तौर पर मेरे सामने डीपी मिश्रा, अर्जुन सिंह, श्यामाचरण शुक्ल बैठा करते थे, लेकिन मैं प्रश्नों 
का जवाब देता था। 82 से 90 तक मैं प्लानिंग बोर्ड का सदस्य था। 1990 में निर्दलीय चुनाव लड़कर मैंने जीत हासिल की और वर्ष 1993 में कांग्रेस की टिकट पर एमएलए रहा। 1998 में जब दिग्विजय सिंह मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने मुझे सिंचाई मंत्री बनाया। वर्ष 2000 में छत्तीसगढ़ का निर्माण हुआ तब मुझे राज्य के वित्त विभाग की जवाबदारी दी गई। सब मुझे कंजूस वित्तमंत्री कहते रहे लेकिन मैं मानता हूं कि सरकार के खजाने में गरीब जनता की गाढ़ी कमाई का पैसा ही जमा होता है। इस पैसे को कोई भी मुख्यमंत्री और मंत्री भला गाड़ी-घोड़े में ठंडी हवा खाने के लिए कैसे उड़ा सकता है? सब मुझसे पूछते है मैंने इस बार (2008) का चुनाव क्यों नहीं लड़ा? पूर्व मुख्यमंत्री जोगी मुझसे बार-बार कहते रहे आप चुनाव नहीं लड़ेंगे तो कोरिया जिले की तीनों सीटों को हम खो देंगे और यही हुआ। यही तक था शायद एक राजा का राजपथ जिसकी चाह हर किसी को होती है। लेकिन सत्य यही है कि एक न एक दिन सबको जनपथ पर आना ही होता है।



मैंने अपने इलाके की एक बेहद ही खूबसूरत लड़की के कारण यह फैसला लिया कि अब मैं चुनाव नहीं लडूंगा। लड़की कौन थी क्या थी यह मत पूछो बस इतना बता सकता हूं कि एक रोज जब मैं दौरे पर निकला था तब उस लड़की ने मेरा हाथ पकड़ लिया और कहा-अरे राजा॥ मेरे प्यारे राजा॥ मुझे शराब चाहिए। मुझे पीने के लिए शराब ला दे। मैं उसकी इच्छा पूरी नहीं कर सकता था। मैंने उसे दुत्कारा तो उसने भी मेरे राजा होने का झूठा दर्प एक सेंकड़ में चूर-चूर कर दिया। लड़की जोर से चिल्लाई-अरे जो राजा अपनी प्रजा को दारू नहीं पिला सकता वह चुनाव लड़ने के काबिल नहीं है। बड़ा कोरिया का कुमार बनता है। जा तेरे जैसे कुमार बहुत देखे। काहे का राजा है रे तू...। मैंने उसी क्षण ही तय कर लिया कि अब मैं चुनाव नहीं लडूंगा। लेकिन क्या मेरे अकेले चुनाव नहीं लड़ने से व्यवस्था बदल जाएंगी? क्या राजनीतिक दलों के लोग चुनाव के समय दारू-मुर्गा बांटना बंद कर देंगे? क्या वोट के बदले लोग नोट लेना भूल जाएंगे। शायद ऐसा नहीं होगा। समाज का पतन हो चुका है। मैं काफी समय से चुनाव लड़ता रहा हूं। हर बार जीतता तो रहा हूं तो लेकिन मेरी लीड कम होती चली गई। यह लीड इसलिए
हुई क्योंकि मैं गहना, साड़ी, चेपटी(दारू) नहीं बांटता था। मैं क्यों बांटू दारू।


एक जनवरी 1948 को जब सेंट्रल प्रोविसियल बरार में स्टेट को मर्ज किया गया तब मेरे पिता ने 1 करोड़ 20 लाख रुपए अदा किए थे। क्या मैंने क्षेत्र की सेवा नहीं की? मैं इलाके को चमन बनाने के लिए दिन-रात जुटा रहूं और फिर वोट के लिए हाथ-पैर जोडूं। दारू बांटू। यह तो कोई बात नहीं हुई। मैंने सोचा है कि एक बार फिर से मैं गांव-गांव जाऊंगा। सीधे सरल लोगों से मिलूंगा। अभी जब देश की पहली महिला राष्ट्रपति आई थी तब उन्हें मेरे द्वारा डिजाइन की गई साड़ियां भेंट की गई थी। मैं डिजाइन का काम जानता हूं उसे आगे बढ़ाऊंगा। सरगुजा, बस्तर के लोगों से मिलूंगा। बीच में मैं पुरूलिया गया था वहां के लोग मुझे अच्छे लगे। मैंने जल संग्रहण को लेकर कुछ काम शुरू किया है। मैं लोगों के बीच जाकर यह बताऊंगा कि पानी को कैसे बचाना है। पानी बचेगा तो हम बचेंगे। अब यही मेरा पथ है और यदि यह पथ सही है तो मुझे इस पर लगातार चलते जाना है।

मेरे पास बहुत से काम है।मुझे लगता है कि मेरे जैसे लोगों को अब राजनीति छोड़ देनी चाहिए। राजनीति में अब वे ही लोग आगे बढ़ सकते हैं जो पैसा बांट सकते हैं। दारू बांट सकते हैं। आज के गणतंत्र में काबिल और ईमानदार लोगों के लिए कोई जगह नहीं बची। मैं विधायक और मंत्री रहा, लेकिन आज तक विधानसभा के बाहर और भीतर मुझ पर भ्रष्टाचार का एक आरोप नहीं लगा। जब मैंने रिश्वत नहीं ली, घूस का एक पैसा नहीं खाया तो फिर मुझसे यह क्यों कहा जाता है कि समय के साथ मैं अपने आपको बदल नहीं पाया। मैं दुनिया बदलने इस दुनिया में नहीं आया हूं लेकिन दोस्तों, मेरे चाहने वालों मैंने ऐसी कौन सी गलती की है जिस पर आप मुझे बदलने की सलाह देते है। मैं फिर से सैर पर निकलूंगा। फोटो खीचंूगा। लोग मुझसे बार-बार पूछते हैं-मैंने शादी क्यों नहीं की। मैंने शादी नहीं की लेकिन मोहब्बत तो की है। मैं पूरी दुनिया में मोहब्बत का पैगाम लेकर निकलूंगा।

Monday, January 25, 2010

पुरस्कारों से कोई बड़ा नहीं होता


राजकुमार सोनी

भजिया-जलेबी बेचने वाली दुकानों से लेकर गमलों में कैक्टस उगाने वाले घरों तक में किसी किसी नेता की तस्वीर जरूर लगी रहती है। यदि नेता भी हुआ तो अभिताभ या धर्मेंद के साथ प्रसन्नचित मुद्रा में वह शख्स जरूर खड़ा हुआ मिल जाएगा जिसने लोगों से ज्यादा खुद के मनोरंजन के लिए जयस्तंभ चौक या टाउन हाल में कार्यक्रम करवाया था। झूठी उपलब्धियों के चमकदार इश्तहार के मार्फत खुद की बोली लगा देने के लिए तैयार खड़े बाजार के खतरनाक दौर में एक शख्स ऐसा भी है जो पुरस्कारों को आलमारी में बंद करके रखता है। देश के अनेक लब्ध प्रतिष्ठित पुरस्कारों को तहखाने में छिपाने का अर्थ यह नहीं है वे सारे के सारे सोने और चांदी से निर्मित है और उनके चोरी चले जाने से दुनिया बरबाद हो जाएंगी। दरअसल पुरस्कार को हासिल करने वाले शख्स का यह मानना है कि पुरस्कार से कभी कोई बड़ा नहीं होता। पुरस्कार जवाबदेही करते हैं और ही उसके मिल जाने से समाज के एक बड़े वर्ग को फायदा पहुंचता है। बात साहित्य की दुनिया के सबसे चमकते नक्षत्र विनोद कुमार शुक्ल की हो रही है। नौकर की कमीज, खिलेगा तो देखेंगे, दीवार में खिड़की रहती थी, लगभग जयहिन्द, सब कुछ होना बचा रहेगा, अतिरिक्त नहीं, आकाश धरती को खटखटाता रहता है, सब कुछ होना बचा रहेगा, महाविद्यालय, पेड़ पर कमरा, कविता से लंबी कविता और वह आदमी चला गया नया गरम कोट पहनकर चला गया विचार की तरह जैसी श्रेष्ठ कृतियों के रचयिता श्री शुक्ल पर आज दुनिया भर के साहित्य के विद्यार्थी पीएचडी कर रहे हैं। कोई पीएचडी नहीं भी कर रहा है तो भारतीय प्रशासनिक सेवा का अफसर बनने के लिए उनके साथ वक्त व्यतीत करता है।

सबकी जिज्ञासा का एक ही विषय होता है कि श्री शुक्ल सरल होते हुए भी एक रचना को कालजयी कैसे बना देते हैं? वे प्रलेस(प्रगतिशील लेखक संघ) में है और जलेस में, उन्हें जसम वालों ने सदस्य बनाया है फिर बगैर किसी गिरोह के उनकी रचनाएं पढ़ी क्यों जा रही है? कांग्रेस की तरह ही साहित्य के कई धड़ों में विभक्त छत्तीसगढ़ के प्रेमचंदों, तोपचंदों और धर्मवीरों के लिए भी यह शोध का विषय हो सकता है कि शैलेंद्र नगर के एक छोटे से घर में मोहल्ले के बच्चों और चंपा के पेड़ से बतियाते हुए एक लेखक किस तरह से महान रचनाएं लिख लेता है। शिखर सम्मान, मैथलीशरण गुप्त सम्मान, पंड़ित सुंदरलाल शर्मा सम्मान और साहित्य अकादमी के सबसे बड़े पुरस्कार से नवाजे जाने वाले श्री शुक्ल की हर रचना किसी किसी भाषा में अनुवादित हो चुकी है लेकिन उनके दो उपन्यास नौकर की कमीज और दीवार में खिड़की रहती थी का विश्व की हर भाषा में अनुवाद हो चुका है। उनके उपन्यास नौकर की कमीज और कहानी बोझ पर देश के प्रसिद्ध निर्देशक मणिकौल ने फिल्म बनाई है। यह बात बहुत कम लोगों को मालूम है कि 1 जनवरी 1937 को राजनांदगांव में जन्मे श्री शुक्ल को गजानन माधव मुक्तिबोध से बहुत कुछ सीखने को मिला। श्री शुक्ल ने वैसे तो कृषि विज्ञान में एमएससी की है उन्होंने मीडिया के काम को अच्छा मानते हुए पत्रकारिता में भी अपनी पढ़ाई पूरी की। शासकीय सेवा में रहने के दौरान भी श्री शुक्ल सुबह चार बजे उठकर प्राणायाम कर लिया करते थे। यह काम अब भी जारी है लेकिन उनका वे अपना व्यायाम बगैर टीवी देखे करते हैं। कुछ देर टहलने के बाद उनकी रचना प्रक्रिया शुरू हो जाती है।

श्री शुक्ल उन लेखकों में से नहीं है जो जमीन पर लिखने का ढोंग करते हुए हवा में उड़ते हैं। उन्हें खुद को पवित्र बताने के लिए कभी पाखंड करने की जरूरत शायद नहीं हुई है। श्री शुक्ल ने अब जाकर एक कार खरीदी है वह भी इसलिए क्योंकि उन्हें बहुत बाद में जाकर यह लगा कि वे कभी इक्कठे अपने परिवार के साथ नहीं घूम पाएं हैं। अन्यथा 65 साल की आयु तक श्री शुक्ल सायकिल चलाते हुए अपने पुत्र शाश्वत के साथ गांवों की सैर के लिए निकल जाया करते थे। खेतों के पास ही खड़े होकर ही पिता ने पुत्र को कई बार समझाया-चिड़ियों के संगीत का मतलब क्या होता है और उसमें कितना दम होता है। इस कालम का लेखक भी एक बार उनसे साक्षात्कार के लिए उनके घर जा पहुंचा था। घर के पास लगे चंपा के पेड़ और पेड़ों से फूलों के टूट जाने का कारण बताते हुए श्री शुक्ल ने बताया था कि उनके घर के ठीक बगल में युवाओं के कसरत करने का ठिकाना खुल गया है। सुबह-शाम कानफोंडू संगीत बजता है और फूल कष्ट में दुनिया को छोड़ देते हैं। श्री शुक्ल को सुनना सबको अच्छा लगता है। याद पड़ता है कि एक कार्यक्रम में उन्होंने जादूगर ओपी शर्मा की मौजूदगी के बावजूद सिर्फ इतना कहा था कि कितना अच्छा होता यदि जादूगर उन्हें गायब कर देता। कुमार गंधर्व, भीमसेन जोशी, मल्लिका अर्जुन मंसूर का संगीत और भोजन गरम चावल-दाल चने की सब्जी पंसद करने वाले श्री शुक्ल जब लिखने बैठते हैं तो मोहल्ले का कोई कोई बच्चा उनकी पीठ पर लदा जरूर रहता है। जरा सी चिल्ल-पौ पर बच्चों की क्लास लगाने वाले अभिभावकों को यह जानकार आश्चर्य होगा कि श्री शुक्ल ने तमाम बड़ी रचनाएं बच्चों के साथ हंसते-खेलते हुए लिखी है। श्री शुक्ल की रचना के सबसे पहले पाठक उनके परिजन ही है। जब नौकर की कमीज लिखी जा रही थी तब शाश्वत(पुत्र) का जन्म नहीं हुआ था लेकिन उनकी इस रचना को उनकी पुत्री विचारदर्शिनी ने जरूर सुना था। अपने पिता को श्री शाश्वत दादा कहते हैं। वे कहते हैं कि मेरे दादा बेहद अनुशासित है। हम सब बड़े हो चुके हैं लेकिन वे अब भी हमारे काम को आधा कैसे कर दें इस जुगत में लगे रहते हैं।

Sunday, January 24, 2010

गुरूदेव असली गुरूदेव


राजकुमार सोनी


ऐसी लड़की जिसकी उम्र बारह-तेरह वर्ष की थी, जो देखने में बहुत ही भोली और कमसिन थी। जिसके प्यार और तैयार होते हुस्न का दीवाना था मिस्टर हम्बर्ट। यही लड़की उसकी जिन्दगी थी। हम्बर्ट उसके बिना एक पल भी जीवित नहीं रह सकता था। यह लड़की कोई और नहीं लोलिता ही थी। यह लोलिता उपन्यास का एक अंश है। साहित्य में रुचि रखने वाला शायद ही कोई शख्स ऐसा हो जिसने नोबेल पुरस्कार प्राप्त उपन्यास लोलिता को न पढ़ा हो। अश्लीलता के विवाद के चलते उपन्यास पर ढेरों मुकदमे चले। भारतीय और यूरोपीय देशों ने उपन्यास को अश्लील बताया तो साहित्य की दुनिया के विद्वानों ने यह माना कि श्लीलता और अश्लीलता का भेद मनुष्य की विचारधारा पर निर्भर करता है। विवादों में घिरा होने के बावजूद उपन्यास दुनिया के हर कोने में अनेक भाषाओं में छापा गया, लेकिन क्या आप जानते हैं कि ब्लादीमीर नाबोकोव के चर्चित उपन्यास का पहला हिन्दी अनुवादक कौन था? सौंदर्य,भाषा, अभिव्यंजना और नए मुहावरों से पाठकों की रूह को भिगो देने का महती काम अद्भुत प्रतिभा के धनी गुरूदेव काश्यप ने किया था।गुरूदेव कश्यप कौन हैं? वे अब कहां हैं? इस बारे में पत्रकारिता की पहली पीढ़ी के लोग तो अच्छे से जानते हैं, लेकिन शायद पत्रकारिता के महाविद्यालयों से निकलकर सीधे पिज्जा सेंटर में कोल्ड काफी पीने पहुंची पीढ़ी यह नहीं जानती होगी कि साहित्य और पत्रकारिता के क्षेत्र में उनका क्या अमूल्य योगदान है? जो लोग काश्यप जी के दर्शन करना चाहते हैं उन्हें राजा चक्रधर सिंह के नगर (रायगढ़) जाना होगा। वही रायगढ़ जहां पूर्व स्वास्थ्य मंत्री के के गुप्ता के अलावा आनंदी सहाय शुक्ल, वासुदेव मोदी, दयाकिशन अग्रवाल, कत्थक की सुप्रसिद्ध नृत्यांगना वासंती वैष्णव रहती हैं। चिड़िया, पेड़, बच्चा, रेलगाड़ी, कोयला जैसे शीर्षक से नई कविता लिखने वाले कवियों को जब कभी बिंब के तौर पर धुआं देखने की आदिम इच्छा होती है तो वे काले-पीले धुएं की तलाश में रायगढ़ ही कूच करते हैं। रायगढ़ की पहचान केलो नदी से है तो जिंदल का इस्पात संयंत्र भी यहीं है। इसी रायगढ़ में ठीक कलेक्टर बंगले के सामने रहते हैं गुरूदेव काश्यप।
15 अगस्त 1935 को रायगढ़ में जन्मे गुरूदेव चौबे ने अपने नाम के पीछे चौबे लिखने के बजाय अपने गोत्र काश्यप को वरीयता दी। मानव विज्ञान में एमए एवं भाषा विज्ञान डिप्लोमा प्राप्त श्री काश्यप विगत पांच दशकों से साहित्य एवं पत्रकारिता की सेवा कर रहे हैं। जो लोग उनकी कलम का लोहा मानते हैं वे यह जरूर कहते हैं कि यदि श्री काश्यप छत्तीसगढ़ में रहने का मोह छोड़ देते तो शायद दिल्ली की पत्रकारिता में सबसे चमकते नक्षत्र होते। ऐसे दैदीप्यमान नक्षत्र जिसके आसपास टिमटिमाने की कोई जरूरत महसूस नहीं करता। वे छत्तीसगढ़ के पहले ऐसे संपादक हैं, जिनके संपादकीय उद्योगपति भी पढ़ता रहा है तो रिक्शेवाला भी। संपादकीय में निजी कुंठाओं और सुझावों को तरजीह देने की बजाय उन्होंने सरल भाषा बोली में वही लिखा जो जनता के दिल की आवाज थी। एक दैनिक में घूमता हुआ आईना जैसा कालम लिखने के कारण देशव्यापी प्रसिद्धि पाने वाले राजनारायण मिश्र जो स्वयं भी अच्छी कलम के थानेदार हैं, श्री काश्यप की भाषा-शैली के कायल हैं। श्री मिश्र कभी मुक्ति नामक अखबार से जुड़े थे। एक मर्तबा उन्हें अखबार के प्रकाशन के संबंध में श्री काश्यप से मिलने जाना पड़ा। कई बार परिचय देने के बाद भी गुरूदेव ने उन्हें पहचानने से इंकार कर दिया। मिश्रा जी को बहुत गुस्सा आया क्योंकि तब तक उनके नाम का जलवा-जलाल होने लगा था। उन्हें लगा ऐसा कौन सा पत्रकार है जो मुझे नहीं जानता। एक रोज अखबार में एक कविता छपी तब श्री काश्यप ने कहा कि मिश्र जी आप तो अच्छा लिखते हैं। उनके समकालीन बबन प्रसाद मिश्र उन्हें साहित्य और पत्रकारिता का मौन साधक मानते हैं। श्री मिश्रा कहते हैं कि जो आदमी सबको खुश रखने का प्रयास करता है वह जीवन भर समझौता करता है। ऐसे आदमी की रीढ़ की हड्Þडी में एक न एक दिन प्राब्लम आती ही है। श्री काश्यप ने अपनी रीढ़ हमेशा सीधी रखी। जो अच्छा कर रहा था उसे अच्छे ढंग से चित्रित किया और जो कुछ बुरा करने में जुटा था उसे बख्शा नहीं। उनके सबसे करीबी मित्र बच्चू जांजगीरी उनका नाम सुनते ही चहक उठते हैं-अरे मेरे दोस्त की टक्कर का कोई जर्नलिस्ट न हुआ है न होगा। गुरूदेव तो सिर्फ गुरूदेव ही हो सकता है। वह एक ही समय में नानवेज भी खा सकता है, दूध भी पी सकता है और रबड़ी भी गटक सकता है। वर्ष 1952 से 1974 तक श्री काश्यप का कर्मक्षेत्र रायपुर ही रहा है।

महाकौशल, रायपुर टाइम्स, विश्वबंधु (कलकता से प्रकाशित अखबार) बिलासपुर टाइम्स, लोकस्वर, प्रजाशक्ति जैसे अखबारों में उन्होंने धुआंधार लेखन किया। रायपुर प्रेस क्लब, श्रमजीवी पत्रकार संघ, पूर्वांचल पत्रकार संघ से जुड़कर श्री काश्यप ने पत्रकारों के संघर्ष को एक आवाज भी दी। उनके कई काव्य संग्रहों में से ‘धूंप का एक दिन’ को मध्यप्रदेश साहित्य परिषद से पुरस्कार भी मिल चुका है। नैवेद्य और अभिशप्त उत्कल की चर्चा भी कम नहीं होती लेकिन वियतनाम को केंद्र में रखकर लिखी गई उनकी वे कविताएं जो ‘आहत सूर्य देश’ नामक पुस्तक में संग्रहित है, प्रगतिशील काव्यधारा का सशक्त दस्तावेज मानी जाती है।1981 से श्री काश्यप स्वयं का अखबार निकाल रहे हैं। अब भी उनकी दिनचर्या वही है। वे हर रोज रात को ढाई से तीन बजे के बीच ही सोते हैं। सुबह नौ बजे उठने के बाद सबसे पहले मिसिंग खबरों को तलाशते हैं। टाईवाले संपादकों के अखबारों में गलतियां देखकर वे दुखी होते हैं और अपने पुत्र देव चौबे को नसीहत देते हैं-बगैर पढ़े एक भी समाचार छपने के लिए मत भेजना। खाने की टेबल हो या फिर कोई दूसरी जगह, हर स्थान पर उनके हाथ में एक किताब जरूर रहती है। भले ही वह किताब चंदामामा क्यों न हो। श्री काश्यप को शास्त्रीय संगीत सुनने का शौक है। एक बार उन्होंने अपने पुत्र देव को ऐसे संगीतकारों की सूची थमाई, जिसकी तलाश काफी मुश्किल थी। काफी खोजबीन के बाद मास्टर मदन का संगीत मिल ही गया। फुरसत के क्षणों में श्री काश्यप अपने 12 साल के पोते आदित्य के साथ शतरंज खेलते हैं और पिपरमेंट-इलायची के साथ मीठा पान खाते हैं। उन्हें पान खाता हुआ देखकर यह समझना मुश्किल हो जाता है कि वे पान चबा रहे हैं या गुस्सा। अब इसे कलम को झुकने नहीं देने का संकल्प कहे या कुछ और लेकिन यह सत्य है कि लेखन के दौरान उनकी पेन एकदम सीधी रहती है। खड़ी हुई, ठीक वैसे ही जैसे बगैर रेहन के खेत में खड़ी रहती है जवान फसल।