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Monday, March 15, 2010

उफ.. यह भयानक साजिश

राजकुमार सोनी

छत्तीसगढ़ की राजधानी रायपुर में मौजूद एक अनाथ बच्चों के आश्रम को उजाड़ने की साजिश सिर्फ इसलिए रची गई ताकि देश-दुनिया के सामने प्रदेश की रमन सरकार के बारे में यह संदेश फैलाया जा सकें कि सरकार न तो नक्सलियों निपट पा रही है और न ही नक्सली हिंसा में मारे गए लोगों के बच्चों को सुरक्षा दे पा रही है। छत्तीसगढ़ में बच्चों को बेचने का गोरखधंधा होता है। उनका सौदा आश्रमों के जरिए होता है।

बस्तर, अंबिकापुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा सहित राजधानी के अनेक संघर्षशील एवं वरिष्ठ पत्रकारों साहित्यकारों ने इस मुद्दे पर मेरा साथ देने की बात कही है। जाने-अनजाने में रिश्ता कायम करने वाले मेरे वे मित्र जो बलाग लिखते हैं उनकी शुभकामनाएं भी मिल रही है।
यह बात कोई अकेले मैं नहीं कह रहा हूं वरन् वे सब लोग कहने को विशश हो गए हैं जिनके पास थोड़ा-बहुत भी दिमाग है। राजनीति और प्रशासन के गलियारों में अब यह चर्चा आम हो गई है कि हो न हो आश्रम संचालक को फंसाया गया है। इस बीच बच्चों की बेहतरी के लिए सैकड़ों लोग मुझसे फोन पर बातचीत कर रहे हैं। उनके सुझाव भी आ रहे हैं। कुछ लोगों ने तो इसे एक अभियान ही मान लिया है। एक वेब अखबार ट एआईएनएस डाट इन ने तो बकायदा मेरे ब्लाग बिगुल से वह तमाम स्टोरी भी अपनी साइट पर ले ली है जो पिछले दिनों प्रकाशित हो चुकी है। इस एंजेसी के प्रभारी ने इसके लिए लगभग छत्तीसगढ़ के दस हजार से ज्यादा प्रबुद्ध लोगों को एसएमएस के जरिए यह संदेश भी भिजवाया कि खबर क्या है। बस्तर, अंबिकापुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा सहित राजधानी के अनेक संघर्षशील एवं वरिष्ठ पत्रकारों साहित्यकारों ने इस मुद्दे पर मेरा साथ देने की बात कही है। जाने-अनजाने में रिश्ता कायम करने वाले मेरे वे मित्र जो बलाग लिखते हैं उनकी शुभकामनाएं भी मिल रही है।

राज्य निर्माण के बाद से राहुल गांधी के पिता के नाम से बने संगठन ने केवल और केवल भंडाफोड ही किया है। इतना भंडाफोड़ देखकर तो लगता है कि जैसे छत्तीसगढ़ में रिक्शा चलाने वाला भी घूंस खाता है। कभी इसकी पिटाई उसका मुंह काला। कभी इसकी कमीज खींचना कभी खाने की थाली से कीड़े निकलवाना।
मित्रों मैं पूरी ताकत लेकर जुटा हुआ हूं। मामले में नारायण राव के साथ क्या होगा यह तो अदालत तय करेंगी लेकिन मुझे लगता है हम चर्चाओं के आधार पर एक ऐसे गिरोह को सामने लाने में कामयाब तो हुए ही है जिनका एकमात्र काम सूचना के आधार के तहत जानकारी मांगकर लोगों को डराना-धमकाना है। जो मान जाता है उसे छोड़ दिया जाता है और जो नहीं मानता है उसे बेनकाब कर दिया जाता है। यह बात मैं राजधानी के लोगों के विवेक पर छोड़ता हूं कि वे जरा अपने दिमाग पर जोर डालकर यह पता करें कि छुपे कैमरे से अभियान चलाने वालों ने कब-कब कहां-कहां किसके-किसके खिलाफ साजिश रची है। इसके लिए आपको ज्यादा जोर देने की जरूरत भी नहीं पड़ेंगी। राज्य निर्माण के बाद से राहुल गांधी के पिता के नाम से बने संगठन ने केवल और केवल भंडाफोड ही किया है। इतना भंडाफोड़ देखकर तो लगता है कि जैसे छत्तीसगढ़ में रिक्शा चलाने वाला भी घूंस खाता है। कभी इसकी पिटाई उसका मुंह काला। कभी इसकी कमीज खींचना कभी खाने की थाली से कीड़े निकलवाना। सरकार इस मामले में इसलिए भी कार्रवाई नहीं करती रही क्योंकि कही न कही से छापामार कार्रवाई करने वालों को पुलिस का सहयोग मिलता रहा है। यदि कोई गलत कर रहा है तो उसे बेनकाब करने का एक तरीका तो होना चाहिए या नहीं। केवल गए और जूता-लात चालू। हंगामा, फिर पुलिस को फोन। दस-बीस गुर्गों की चीख-पुकार और अच्छा-भला आदमी थोड़ी ही देर में आरोपी। हद होती है अन्याय की। हालात यह हो गए कि इनसे कोई भी बात करने से डरता है। पता नहीं कब किसके घर गांजा रखवा दे। कब किसी महिला को इस बात के लिए तैयार कर लें कि तुम्हें ब्लाउज फाड़कर नाटक करना है। बाकी का असली नाटक हम कर लेंगे।

पाठकों आपको यह जानकार हैरत होगी कि जिस खबरिया चैनल ने आश्रम के बारे में खबर चलायी उसका एक संवाददाता आश्रम के बच्चों के बीच जाकर अपना जन्मदिन मनाता रहा है। यदि आश्रम इतना ही खराब था तो फिर आप क्या वहां डिस्को करने गए थे।
आश्रम की छापामार कार्रवाई के बारे में मैं बार-बार यह सवाल उठा ही रहा हूं कि भाइयों यदि आपका काम लिखना-पढ़ना है तो अपने काम को केवल लिखने-पढने तक आपने सीमित क्यों नहीं किया। खबर के प्रसारण के दूसरे दिन पुलिस को पत्रकारिता के कौन से मापदंडों के तहत सीडी सौंपी आपने। अब सीडी सौंप ही दी है तो फिर जाहिर सी बात है कि यदि आप किसी को फंसाने के लिए सीडी सौंप सकते हैं तो कोई किसी को बचाने के लिए भी मुख्यमंत्री से मिलकर ज्ञापन सौंप सकता है। पाठकों आपको यह जानकार हैरत होगी कि जिस खबरिया चैनल ने आश्रम के बारे में खबर चलायी उसका एक संवाददाता आश्रम के बच्चों के बीच जाकर अपना जन्मदिन मनाता रहा है। यदि आश्रम इतना ही खराब था तो फिर आप क्या वहां डिस्को करने गए थे।

थोड़े ही समय बाद संवाददाता को फोन आया तो उसने नाना पाटेकर के अन्दाज में काला चश्मा चढाते हुए कहा क्या करूं अपने बगैर पत्ता नहीं हिलता है। आश्रम जा रहा हूं नौकरी करनी है।
संवाददाता को जब विधानसभा परिसर में कुछ मित्रों ने लताड़ा तो उसने साफ तौर पर यह स्वीकार किया कि वह मजबूरी में ऐसा कर रहा है। उसे नौकरी करनी है। नौकरी करने का मतलब यह तो नहीं होना चाहिए कि हम दूसरों की घर की रौशनी बुझाकर अपने घऱ में उजाला करेंगे। यह वाक्या तब हुआ जब आश्रम संचालक की धर्मपत्नी मुख्यमंत्री डाक्टर रमन सिंह से मिलने आई हुई थी। सबने महान संवाददाता की महान बातों को सुना था। थोड़े ही समय बाद संवाददाता को फोन आया तो उसने नाना पाटेकर के अन्दाज में काला चश्मा चढाते हुए कहा क्या करूं अपने बगैर पत्ता नहीं हिलता है। आश्रम जा रहा हूं नौकरी करनी है।

मित्रों.. अभी यह लड़ाई कितने दिनों तक जारी रहनी है इसका पता नहीं लेकिन जंग जारी है। यह जंग लोगों के खिलाफ नहीं वरन प्रवृतियों के विरूद्ध है। उन प्रवृतियों के खिलाफ जो मासूमों की जिन्दगी से खिलवाड़ करने में लगी हुई थी। जरा सोचे अनाथ बच्चों ने कितनी कठिनाइयों से अपने मां-बाप से बिछुड़ जाने का गम भुला होगा। 50 वे बच्चे जो आपस में दोस्त है भाई है.. बहन है। उन्हें अलग करने की साजिश रचने वालों को मैं कमीना न कहूं तो क्या कहूं।

3 comments:

Udan Tashtari said...

यह जंग लोगों के खिलाफ नहीं वरन प्रवृतियों के विरूद्ध है।-सही है, जंग जारी रहना चाहिये.

डॉ महेश सिन्हा said...

बड़ी हास्यास्पद बात है की राज बीजेपी का और कांग्रेसी खुले आम गुंडागर्दी कर रहे यह तो सीधे सीधे प्रसाशन को चुनौती है

Jandunia said...

क्या छत्तीसगढ़ की सरकार सो रही है। कोई आश्रम के जरिए किसी की इज्जत लूट रहा है तो कोई किसी की कोख। रमनजी जरा ध्यान दीजिए।